अगर तुम में चोरी की आदत न होती

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

जो घरघर में माखन चुराया न होता
तो हर दिन तुम्हारी शिकायत न होती
जो माखन की मटकी लुटाई न होती
यूँ घरघर में चर्चा कन्हाई न होती
अगर तुम में चोरी की।।

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

भला कौन कहता तुम्हें चोर छलिया
बिगाड़ी किसी की अमानत न होती
ये हँसना हँसाना ये मन का लुभाना
सभी भूल जाते ये बातें बनाना
अगर तुम में चोरी की।।

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

मज़ा तुम को चोरी का मिल जाता मोहन
गुजरिया में अगर जो शराफत न होती
पकड़ के गुजरिया तुम्हे कैद करती
नन्द की कचहरी में फिर पेश करती
अगर तुम में चोरी की।।

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

तो दफा 457 तुम पे लगती
कसम से तुम्हारी जमानत न होती
कभी चीर हरना कभी लूट लेना
ये करम हैं तुम्हारे किसे दोष देना
अगर तुम में चोरी की।।

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

गुजरिया को झूठी समझ लेते चेतन
अगर तुम में ऐसी शरारत न होती
अगर तुम में चोरी की।।

अगर तुम में चोरी की आदत न होती
तो ब्रज में यूँ मोहन बगावत न होती।।

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