ऐसी गुराँ ने पिलाई मैनु होश न रही

दोनों कर को जोड़ कर मस्तक घुटने तक
तुझको हो प्रणाम मम शत शत कोटि अनेक।।

कुमति कूप में पतन था पकड़ निकला अपने
धाम बताया ईश का देकर पूरा साथ।।

पहले ये मन पाग था करता जीवन घात
अब तो मन हंसा भया मोती चुन चुन खात।।


ऐसी गुराँ ने पिलाई मैनु होश न रही जी
कोई होश न रही जी कोई होश न रही जी
सात गुराँ ने पिलाई मैनु होश ना रही
मेरे गुराँ ने पिलाई मैनु होश न रही
ऐसी गुराँ ने पिलाई मैनु होश न रही।।

सतगुरु देंदे भर भर प्याला पिके होव मन मतवाला
पिके होव मन मतवाला पिके होव मन मतवाला
सतगुरु देंदे भर भर प्याला पिके होव मन मतवाला
ऐसी मस्ती चढाई मैनु होश ना रही
ऐसी गुराँ ने पिलाई मैनु होश न रही।।

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