कहाँ गया चौपाल बैठका याद गाँव की आती है

कब बसंत कब पतझड़ आया कब मौसम बरसाती है,
शहर में दिन और रात में अंतर यहाँ ना कोयल जाती है,
गाँव की एक एक बात आती है तड़पाती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

यहां ना डाल पे झूला को यहाँ न कोई कजरी गाये,
लगता है सुनाएं यहाँ चेता बिरहा बिसराये,
यहाँ ना चाचा भोर सुनती है माँ नहीं लोरी गाती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

माना मैंने शहर में आके कमा लिया दो पैसा,
पर नहीं कोई हिट मीट है फनी के गाँव के जैसा,
मिटटी की सोंधी सुगंध अपनी और बुलाती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

बैशाखी हिल मिल के मनाये लगे मनोहर जैसा,
जब पहली बरसात होये मन नाचे मोर के जैसा,
ना कोई भाभी हंसी करे ना कोई बहना गाल फुलाती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

नहीं चाहिए ऐसी दुनिया जो अपनों से दूर करे,
जो अपनों से दूर करे,
चारो तरफ है प्रदूषण जीने को मजबूर करे,
दौलत शोहरत वापस लेलो अब नहीं मुझको भाति है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

कब बसंत कब पतझड़ आया कब मौसम बरसाती है,
शहर में दिन और रात में अंतर यहाँ ना कोयल जाती है,
गाँव की एक एक बात याद आती है तड़पाती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है,
कहाँ गया चौपाल-बैठका याद गाँव की आती है।।

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