किश्मत से हारी अभागन बेचारी राधा तुम्हारी

तेरी सूरत देखती है जिस और नजर करती राधा
देखले श्याम पिया घुट घुट कर कैसे मरती है राधा
तेरे सपने साजे सूने नयन में
तुम्हे जग से जीता बिठाया है मन में
मगर अपनी किश्मत से हारी
अभागन बेचारी राधा तुम्हारी तुम्हारी तुम्हारी
अभागन बेचारी राधा।।

यादो को तेरी ओढू तन पे लपेटो मैं
खुद को बिखेरू कान्हा खुद को समेटू मैं
तुमसे मिलान की लगी आस है
बुझाये न बुझती है अजब प्यास है
कभी सुधि लेलो हमारी
अभागन बेचारी राधा तुम्हारी तुम्हारी तुम्हारी
अभागन बेचारी राधा।।

तू जो नहीं है तो इन बहारो में क्या है
तू जो नहीं है कान्हा नजारो में क्या है
है खोया मेरा श्याम जाने कहा
उसे ढूढती यहाँ से वहाँ
तुम्हारे विरह की है मारी
अभागन बेचारी राधा तुम्हारी तुम्हारी तुम्हारी
अभागन बेचारी राधा।।

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