जिनके राम भरोसा भारी उनको डर नहीं लागे रे

राम के नाम की कोई निंदा करे,
पार ब्रह्म से कर्म हैं माटा
चांतरा देवरा धोक देता फिरे,
तेल सिंदूर ले रंगे भाटा।
जीव जागे नहीं शब्द लागे नहीं,
भेड़ रा पूत ज्यूँ कीना भेका,
कहे कबीर वो अधमी जीवड़ा,
जमड़ा रा देश में जावे नाटा
राम के नाम की कोई निंदा करे,
पार ब्रह्म से कर्म हैं माटा।।

जिनके राम भरोसा भारी वाने डर नहीं लागे रे,
जिनके राम भरोसा भारी जाने डर नहीं लागे रे
भूत पलीत डाकन और स्यारी देखत दूरा भागे रे
जिनके राम भरोसा भारी जाने डर नहीं लागे रे।।

और विघ्न की कौन चलायी यम नेड़ा नहीं आवे रे,
हरि भगतां ने देखत डरपे निव कर पाछा जाही रे
जिनके राम भरोसा भारी उनको डर नहीं लागे रे
जिनके राम भरोसा भारी जाने डर नहीं लागे रे।।

प्रथम साख पंखेरू री कहिये समर्थ सांही उतारे रे,
काळ ने महाकाल खायगो एक पलक में तारे रे।।

जिनके राम भरोसा भारी उनको डर नहीं लागे रे,
भूत पलीत डाकन और स्यारी देखत दूरा भागे रे।।

जो उपदेश दियो मेरे दाता मैं वारी कथा निहारु रे,
कष्ट पड़े जद और न जांचू मैं रसना राम उच्चारु रे।।

हरि का भजन बिना कबहु नहीं उबरे कोटि जतन कर लीजो रे,
जनध्रुवदास सतगुरु का शरणा निर्भय होय भज लीजो रे।।

जिनके राम भरोसा भारी उनको डर नहीं लागे रे,
भूत पलीत डाकन और स्यारी देखत दूरा भागे रे।।

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