तेरी महफिल में गुनगुनाने से दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से

जग दोषी कहे कितना भी हमे,
हमको इसकी परवाह नहीं,
प्रभु प्रेम बया भी अगम्य बड़ा,
इसमें सब पाते थाह नहीं ।।

हँसते हँसते ये जीवन दे,
हँसते हँसते ये जीवन दे,
मुख से पर निकले आह नहीं।।

बस चाह है तेरे मिलने की,
अब कोई रही नहीं चाह नहीं ।।

तेरी महफिल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

मुझे अपना के छोड़ मत देना,
डर मुझे लगता है रूठ जाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

तेरी चौखट को चूमता ही रहूं,
ना हटू गैर के हटाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

मुझे मदहोश बना ही डाला,
जब से आया मैं तेरे मयखाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

मेरी जुबां पर जिक्र तेरा रहे,
बेफिकर हो गया मैं अब मर जाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

मिल गई मंजिले सफर मुझको,
तेरे कदमों में सर झुकाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

मिला है तोहफा हमको पागल का,
चित्र विचित्र की गजल गाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

तेरी महफिल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
तेरी महफ़िल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से।।

सिंगर – श्री चित्र विचित्र जी महाराज।

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