तेरे दया धर्म नहीं मन में मुखड़ा क्या देखे दर्पण में

तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

जब तक फूली रही फुलवारी,
ओ बास रही फूलन में,
एक दिन ऐसा आएगा प्राणी,
ख़ाक उड़ेगी तानी में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

चन्दन अग्रि कसूबा जामा,
सोवत गोर तानी में,
भर योवनी बुंदिया का पानी,
पुत्र जाए एक दिनी में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

गहरी नदिया नाव पुरानी,
ओ उतर जाए एक छीन में,
धर्मी धर्मी पार उतर गया,
पापी रहे रे अग्नि में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

कोडी कोडी माया जोड़ी,
सूरत लागि अब धन में,
दस दरवाजेबंद भये अब,
ओ रह गयी मन की मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

नाना दुःख तो पिता मात
ने पाए तेरे जनम में
कर सेवा जीते जी उनकी,
फिर क्या प्राण गगन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

जिसरे जीवा ने वेद पढ़ा रे
नहीं सोहे व्रता बदनी में
जो नहीं करे मदरसु बचन ये
गिनिए उन्हें अब सन में
मुखड़ा क्या देखे अब दर्पण में।।

तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

पगड़ी बांध बांध कर बेचा समरथ
तेल मेल आंगन में
कहत कबीर सुनो भाई साधु
काय पड़ेगी रण में
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में,
तेरे दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे।।

सिंगर – रामनिवास राव।

Leave a Reply