भाषा की परिभाषा : अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


1. सजि सूहे दुकूलनि बिज्जु छटा सी

अटान चढ़ी घटा जोवति हैं।

सुचिती ह्नै सुनैं धुनि मोरन की

रसमाती सँजोग सँजोवति हैं।

कवि ठाकुर वै पिय दूरि बसैं

हम ऑंसुन सों तन धोवति हैं।

धानिवै धानि पावस की रतियाँ

पति की छतियाँ लगि सोवति हैं।

2. बौर रसालन की चढ़ि डारन

कूकत क्वैलिया मौन गहै ना।

ठाकुर कुंजन कुंजन गुंजत

भौंरन भीर चुपैबो चहै ना।

सीतल मंद सुगंधित बीर

समीर लगे तन धीर रहै ना।

व्याकुल कीन्हों बसंत बनाय कै।

जाय कै कंत रो कोऊ कहैना।

दूसरे ठाकुर भी असनी के रहने वाले थे। उन्होंने बिहारी की सतसई पर टीका भी लिखी है। उनकी रचनाएँ भी सुंदर और सरस होती थीं। उन्होंने नीति सम्बन्धी जो कवित्ता बनाये हैं वे बड़े ही उपयोगी और उपदेशमय हैं। जैसे ही उनके शृंगार रस के कवित्ता सुन्दर हैं वैसे ही नीति सम्बन्धी भी। उनके कुछ सवैये भी बड़े ही हृदयग्राही हैं। नीति सम्बन्धी कवित्ता यदि विवेकशील मस्तिष्क की उपज हैं तो सरस सवैये उनकी सहृदयता के नमूने हैं। उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं-

1. बैर प्रीति करिबे की मन में न राखै संक

राजा राव देखि कै न छाती धाक धा करी।

आपने अमेंड के निबाहिबे की चाह जिन्हें

एक सों दिखात तिन्हें बाघ और बाकरी।

ठाकुर कहत मैं विचार कै बिचारि देख्यो

यहै मरदानन की टेक औ अटाकरी।

गही तौन गही जौन छाड़ी तौन छाड़ी।

जौन करी तौन करी बात ना करी सोनाकरी।

2. सामिल में पीर में सरीर में न भेद राखै

हिम्मत कपाट को उघारै तौ उघरि जाय।

ऐसो ठान ठानै तो बिनाही जंत्रा मंत्रा किये।

साँप के जहर को उतारै तौ उतरि जाय।

ठाकुर कहत कछु कठिन न जानौ मीत

साहस किये ते कहौ कहा ना सुधारि जाय।

चारि जने चारि हूँ दिसा ते चारों कोन गहि

मेरु को हलाय कै उखारैं तो उखरि जाय।

3. हिलि मिलि लीजिये प्रवीनन ते आठो जाम

कीजिये अराम जासों जिय को अराम है।

दीजिये दरस जाको देखिबे को हौस होय

कीजिये न काम जासों नाम बदनाम है।

ठाकुर कहत यह मन में विचारि देखो

जस अपजस को करैया सब राम है।

रूप से रतन पाय चातुरी से धान पाय

नाहक गँवाइबो गँवारन को काम है।

4. ग्वालन को यार हैं सिंगार सुभ सोभन को

साँचो सरदार तीन लोक रजधानी को।

गाइन के संग देखि आपनो बखत लेखि

आनँद बिसेख रूप अकह कहानी को।

ठाकुर कहत साँचो प्रेम को प्रसंगवारो

जा लखि अनंग रंग दंग दधिदानी को।

पुत्र नंद जी को अनुराग ब्रजबासिन को

भाग जसुमति को सुहाग राधारानी को।

5. कोमलता कंज ते गुलाब ते सुगंधा लैके

चंद ते प्रकास गहि उदित उँजेरो है।

रूप रति आनन ते चातुरी सुजानन ते

नीर लै निवानन ते कौतुक निबेरो है।

ठाकुर कहत यों सँवारयो बिधि कारीगर

रचना निहारि जनचित होत चेरो है।

कंचन को रंग लै सवाद लै सुधा को

बसुधा को सुख लूटि कै बनायो मुख तेरो है।

6. लगी अंतर में करै बाहिर को

बिन जाहिर कोऊ न मानतु है।

दुख औ सुखहानि औ लाभ सबै

घर की कोऊ बाहर भानतु है।

कवि ठाकुर आपनी चातुरी सों

सब ही सब भाँति बखानतु है।

पर बीर मिले बिछुरे की बिथा

मिलि कै बिछुरै सोई जानतु है।

7. एजे कहैं ते भले कहिबो करैं मान

सही सो सबै सहि लीजै।

ते बकि आपुहिं ते चुप होंयगी

काहे को काहुवै उत्तार दीजै।

ठाकुर मेटे मतै की यहै धानि

मान कै जोबन रूप पतीजै।

या जग में जनमे को जिये को

यहै फल है हरि सों हित कीजे।

8. वह , कंज सों कोमल अ गुपाल

को सोऊ सबै तुम जानती हौ।

बलि नेकु रुखाई धारे कुम्हिलात

इतोऊ नहीं पहचानती हौ।

कवि ठाकुर या कर जोरि कह्यौ

इतने पै बिनै नहीं मानती हौ।

दृग बान औ भौंह कमान कहो

अब कान लै कौन पै तानती हौ।

तीसरे ठाकुर बुंदेलखंडी थे और सरस रचना करते थे। मैं यह बतला चुका हूँ कि उनकी रचनाओं के अन्त में प्राय: कहावतें आती हैं। दो पद्य उनके भी देखिए-

1. यह चारहूँ ओर उदौ मुख चन्द को

चाँदनी चारु निहारि लैरी।

बलि जो पै अधीन भयो पिय प्यारी

तौ ए तौ बिचार बिचारि लैरी।

कबि ठाकुर चूकि गयो जुगोपाल तौ

तू बिगरी को सम्हारि लैरी।

अब रैंहै न रैहै यहौ समयो

बहती नदी पाँव पखारि लैरी।

2. पिय प्यार करै जेहि पै सजनी

तेहि की सब भाँतिन सैयत है।

मन मान करौं तौ परौं भ्रम में

फिर पाछे परे पछतैयत है।

कबि ठाकुर कौन की कासों कहौं

दिन देखि दसा बिसरैयत है।

अपने अटके सुन एरी भटू

निज सौत के मायके जैयत है।

इन तीनों ठाकुरों की रचनाओं में यह बड़ी विशेषता है कि सीधो शब्दों में रस की धारा बहा देते हैं। न अनुप्रास की परवा, न यमक की खोज, न वर्ण मैत्राी की चिन्ता। वे अपनी बातें अपनी ही बोल-चाल में कह जाते हैं और हृदय को अपनी ओर खींच लेते हैं। कवि कर्म्म है भी यही। जो बातें आगे-पीछे होती रहती हैं, उनको लेकर उनका चित्रा बोल-चाल में खींच देना सबका काम नहीं, सरस हृदय कवि ही ऐसा कर सकते हैं।

रामसहायदास, भवानीदास के पुत्र थे। वे जाति के कायस्थ थे और काशिराज महाराज उदितनारायण सिंह के आश्रय में रहते थे। उन्होंने चार ग्रन्थों की रचना की है-‘वृत्ता-तरंगिनी’, ‘ककहरा’, ‘रामसतसई’ और ‘वाणी-भूषण्’। ‘वाणी भूषण’ अलंकार का, ‘वृत्तातरंगिनी’ पिंगल का, और ‘ककहरा’ नीति सम्बन्धी-ग्रन्थ है। राम सतसई बिहारी सतसई के अनुकरण से लिखी गई है। बिहारी ने अपने सतसई का नाम अपने नाम के आधार पर रक्खा है तो रामसहाय दास ने भी अपनी सतसई का नाम अपने नाम के सम्बन्धा से ही रखा। इतना ही अनुकरण नहीं, उन्होंने बिहारी सतसई का अनुकरण सभी बातों में किया है। उनके दोहे बिहारी के टक्कर के हैं। परन्तु सहृदयता और भावुकता में बिहारी की समता वे नहीं कर सके। चंदन सतसई और विक्रम सतसई भी बिहारी सतसई के ही आधार से लिखी गई हैं। परन्तु उन सतसइयों को भी बिहारीलाल की सतसई की-सी सफलता भाव-चित्राण में नहीं प्राप्त हुई। शब्द-विन्यास में बोल-चाल की भाषा लिखने में ब्रजभाषा के टकसाली शब्दों में सरसता कूट-कूट भर देने में बिहारी लाल अपने जैसे आप हैं। राम सतसई के कुछ पद्य नीचे लिखे जाते हैं-

1. गुलफनि लौं ज्यों त्यों गयो करि करि साहस जोर।

फिरि न फिरयो मुरवान चपि चित अति खात मरोर।

2. यों बिभाति दसनावली ललना बदन मँझार।

पति को नातो मानि कै मनु आई उडुनार।

3. सखि सँग जाति हुतो सुती भट भेरो भो जानि।

सतरौंही भौंहनि करी बतरौंही ऍंखियाँनि।

4. सतरौहैं मुख रुख किये कहैं रुखौहैं बैन।

रैन जगे के नैन ये सने सनेह दुरैं न।

5. खंजन कंज न सरि लहैं बलि अलि को न बखानि।

एनी की ऍंखियानि ते ए नीकी ऍंखियानि।

पजनेस एक प्रतिभाशाली कवि माने जाते हैं। इनका जन्म-स्थान पन्ना कहा जाता है और परिचय के विषय में कुछ विशेष ज्ञात नहीं। इन्होंने ‘मधुर प्रिया’ और ‘नखशिख’ नामक दो ग्रंथ बनाये थे। किन्तु दोनों ग्रंथ अमुद्रित हैं। इनकी स्फुट रचनाएँ कुछ पाई जाती हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि उनको संस्कृत और परसी का भी अच्छा ज्ञान था। इनकी रचनाओं की मुख्य भाषा ब्रजभाषा है, किन्तु उनमें अन्य भाषाओं के शब्द अधिकता से पाये जाते हैं, इस विषय में वे अधिक स्वतंत्रा हैं। इनकी रचनाओं में अकोमल शब्दों का प्रयोग भी अधिक मिलता है। परुषा वृत्तिा इन्हें अधिक प्यारी है। जो स्फुट पद्य मिले हैं, वे सब शृंगार रस के ही हैं। अवधा नरेश महाराज मानसिंह इनकी रचनाओं को लोहे का चना कहते थे। तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सरस पद-विन्यास किया ही नहीं। दोनों प्रकार के दो पद्य नीचे लिखे जातेहैं-

1. छहरै छबीली छटा छूटि छिति मंडल पै

उमँग उँजेरो महा ओज उजबक सी।

कवि पजनेस कंज मंजुल मुखी के गात

उपमाधिकात कल कुंदन तबक सी।

फैली दीप दीप दीप दीपति दिपति जाकी

दीप मालिका की रही दीपति दबकि सी।

परत न ताब लखि मुखमहताब

जब निकसी सिताब आफताब के भभकसी।

2. मानसी पूजामयी पजनेस

मलेछन हीन करी ठकुराई।

रोके उदोत सबै सुर गोत

बसेरन पै सिकराली बसाई।

जानि परै न कला कछु आज की

काहे सखी अजया इकल्याई।

पोखे मराल कहो केहि कारन एरी

भुजंगिनी क्यों पुसवाई।

पजनेस की रचना पदमाकर की रचना से सर्वथा विपरीत है। जैसी ही वह सरस, मधुर और प्रसाद गुणमयी है, वैसी ही इनकी रचना जटिल परुष और अस्पष्ट है। किन्तु इनकी प्रसिध्दि ऐसी ही रचनाओं के कारण हुई है।

महाराज मानसिंह अवध नरेश थे। नीतिज्ञता, गुणज्ञता, सहृदयता, उदारता, भावुकता अथच बहुदर्शिता के लिए प्रसिध्द थे। आपके दरबार में कवियों का बड़ा सम्मान था, क्योंकि उनमें कवि-कर्म की यथार्थ परख थी। वे स्वयं भी बड़ी सुन्दर कविता करते थे। कविता में अपना नाम ‘द्विजदेव’ लिखते थे। वे अवधी की गोद में पले थे, परन्तु कविता टकसाली ब्रजभाषा में लिखते थे। इस सरसता से पद-विन्यास करते थे कि कविता पंक्तियों में मोती पिरो देते थे। जैसी सुन्दर धवनि होती थी, वैसी ही सुन्दर व्यंजना। वास्तविक बात यह है कि इनकी कविता भाव प्रधान है, इसी से उसमें हृदयग्राहिता भी अधिक है। केवल एक ग्रन्थ’शृंगार-लतिका’ इनका पाया जाता है। उसमें से कुछ पद्य नीचे लिखे जाते हैं-

1. बाँके संक हीने राते कंज छबि छीने माते

झुकि झुकि झूमि झूमि काहू को कछू गनैन।

द्विजदेव की सौं ऐसी बानक बनाय बहु

भाँतिन बगारे चित चाह न चहूँघा चैन।

पेखि परे पात जो पै गातन उछाह भरे

बार बार तातैं तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज मेरे प्रेम-धान लूटिये को

बीरा खाइ आये कितै आपके अनोखे नैन।

2. घहरि घहरि घन सघन चहूँघा घेरि

छहरि छहरि बिष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव अरे

पात की पपीहा तू पिया की धुन गावै ना।

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ एरे

मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तो बिन प्रान प्रान चाहत तजोई अब

कत नभ चन्द तू अकास चढ़ि धावै ना।

3. चित चाहि अबूझ कहैं कितने छबि

छीनी गयंदनि की टटकी।

कबि केते कहैं निज बुध्दि उदै

यह लीनी मरालनि की मटकी।

द्विजदेव जू ऐसे कुतर्कन में सब की

मति यों ही फिरै भटकी।

वह मन्द चलै किन भोरी भटू

पग लाखन की ऍंखियाँ अटकी।

गिरधारदास का मुख्य नाम गोपालचन्द्र था। आप भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के पिता थे। इन्होंने चालीस ग्रन्थ बनाये, जिनके आधार से बाबू हरिश्चन्द्र जी की यह गर्वोक्ति है-

जिन पितु गिरिधार दास ने रचे ग्रन्थ चालीस।

ता सुत श्री हरिचन्द को को न नवावै सीस।

ग्रन्थों की संख्या अवश्य बड़ी है, पर अधिकांश ग्रन्थ छोटे और स्तोत्रामात्रा हैं। ‘जरासन्धा-वधा’ महाकाव्य बड़ा ग्रन्थ है,परन्तु अधूरा है। इनकी अधिकांश रचनाएँ नैतिक हैं और उनमें सदाचार आदि की अच्छी शिक्षा है। इनकी भाषा ब्रजभाषा है,परन्तु उसे हम टकसाली नहीं कह सकते। इनकी रचना जितनी युक्तिमयी है, उतनी ही भावमयी। युक्तियाँ उत्ताम हैं, परन्तु उनमें उतनी सरलता और मधुरता नहीं। कहीं-कहीं रचना बड़ी जटिल है, फिर भी यह कहा जा सकता है कि हिन्दी देवी की अर्चा इन्होंने सुंदर सुमनों से की है। इनके कुछ पद्य देखिए-

1. सब के सब केसव केसव के हित के

गज सोहते सोभा अपार है।

जब सैलन सैलन ही फिरै सैलन

सैलन सैलहि सीस प्रहार है।

गिरि धारन धारन सों पद के

जल धारन लै बसुधारन कार है।

अरि बारन बारन पै सुर बारन

बारन बारन बारन बार है।

2. बातन क्यों समुझावत हो मोहि

मैं तुमरो गुन जानति राधो।

प्रीति नई गिरधारन सों भई

कुंज में रीति के कारन साधो।

घूँघट नैन दुरावन चाहति दौरति

सो दुरि ओट ह्नै आधो।

नेह न गोयो रहै सखि लाज सो

कैसे रहै जल जाल के बाँधो।

3. जाग गया तब सोना क्या रे।

जो नरतन देवन को दुरलभ सो पाया अब रोना क्या रे।

ठाकुर से कर नेह आपना इंद्रिन के सुख होना क्या रे।

जब बैराग्य ज्ञान उर आया , तब चाँदी औ सोना क्या रे।

दारा सुवन सदन में पड़ि कै भार सबों का ढोना क्या रे।

हीरा हाथ अमोलक पाया काँच भाव में खोना क्या रे।

दाता जो मुख माँगा देवे तब कौड़ी भर दोना क्या रे।

गिरिधार दास उदर पूरे पर मीठा और सलोना क्या रे।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध्द में कोई ऐसा निर्गुणवादी संत सामने नहीं आता, जिसने अपने सम्प्रदाय में कोई नवीनता उत्पन्न की हो या जिसने ऐसी रचनाएँ की हों, जिनका प्रभाव साहित्य पर ऐसा पड़ा हो जो अंगुलि-निर्देश-योग्य हो। सत्राहवीं शताब्दी में पारी साहब नामक एक मुसलमान ने कबीर साहब का मार्ग ग्रहण कर कुछ हिन्दी के शब्द (भजन) बनाये। ये सूपी सम्प्रदाय के थे, परन्तु हिन्दी में प्रचार करने के कारण हिन्दुओं पर भी इनका प्रभाव पड़ा। इनके दो शिष्य थे-केशवदास और बुल्ला साहब। पहले हिन्दू थे और दूसरे मुसलमान, ये अठारहवीं शताब्दी में हुए। इनकी रचनाएँ भी हिन्दी में हुईं और इन्होंने भी हिन्दू जनता को अपनी ओर आकर्षित किया। बुल्ला साहब के शिष्य गुलाल साहब हुए। ये जाति के क्षत्रिय थे, और इन्होंने भी निर्गुण-वादियों की-सी रचनाएँ हिन्दी में कीं। पारी साहब अथवा बुल्ला साहब के रहन-सहन की प्रणाली अधिकतर हिन्दुओं के ढंग में ढली हुई थी। गुलाल साहब तक पहुँचकर वह सर्वथा हिन्दू भावापन्न हो गई। वैष्णवों की तरह इन्होंने तिलक और माला इत्यादि का प्रचार किया और सत्य राम मंत्रा का उपदेश। इनके शिष्य भीखा साहब हुए। ये जाति के ब्राह्मण थे। इसलिए इनके समय में इस परम्परा में ऐसे परिवर्तन हुए जो अधिकांश में वैष्णव सम्प्रदाय की अनुकूलता करते थे। ये अठारहवीं शताब्दी के अन्त में हुए और इन्होंने भी हिन्दी भाषा में रचनाएँ कीं, जो वैसी ही हैं जैसी निर्गुणवादी साधुओं की होती हैं। इनके शिष्य गोविन्दधार हुए जो गोविन्द साहब के नाम से प्रसिध्द हैं। इन्होंने अपना एक अलग सम्प्रदाय चलाया,जिसका मंत्रा है ‘सत्य गोविन्द’। ये भी ब्राह्मण और संस्कृत के विद्वान् थे। इसलिए इनके सम्प्रदाय की ओर हिन्दू जनता भी अधिक आकर्षित हुई। इनकी हिन्दी रचनाएँ भी पायी जाती हैं, परन्तु थोड़ी हैं और उनमें गंभीरता अधिक है। इसलिए सर्वसाधारण में उसका अधिक प्रचार नहीं हुआ। इन्हीं के शिष्य पलटूदास हुए जो इस उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध्द में जीवित थे। पारी साहब की परम्परा, इनके साथ ही समाप्त होती है। पलटू साहब जाति के बनिया थे, किन्तु सहृदय थे। जितनी रचनाएँ उन्होंने कीं, चलती और सरल भाषा में। इसलिए उनकी रचनाओं का प्रचार अधिक हुआ। वे अपने को निर्गुण बनिया कहा करते और लिखते थे। कबीर साहब के समान कभी-कभी ऊँची उड़ान भी भरते थे। उनके कुछ पद्य देखिए-

1. पलटू हम मरते नहीं ज्ञानी लेहु बिचार।

चारों युग परलै भई हमहीं करने हार।

हमहीं करनेहार हमहिं कत्तर् के कत्तर्।

कत्तर् जिसका नाम धयान मेरा ही धारता।

पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माँहिं

टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं।

जैसे काठ में अगिन है फूल में है ज्यों बास।

हरिजन में हरि रहत हैं ऐसे पलटू दास।

सुनि लो पलटू भेद यह हँसि बोले भगवान।

दुख के भीतर मुक्ति है सुख में नरक निदान।

मरते मरते सब मरे मरै न जाना कोय।

पलटू जो जियतै मरै सहज परायन होय।

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध्द ऐसा काल है जिसमें बहुत बड़े-बड़े परिवर्तन हुए। मैं पहले इस विषय में कुछ लिख चुका हूँ। परिवर्तन क्यों उपस्थित होते हैं, इस विषय में कुछ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं। किन्तु मैं यह बतलाऊँगा कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तारार्ध्द में राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक अवस्था क्या थी। मुसलमानों के राज्य का अन्त हो चुका था और ब्रिटिश राज्य का प्रभाव दिन-दिन विस्तार लाभ कर रहा था। अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ योरोपीय भावों का प्रचार हो रहा था और ‘यथा राजा तथा प्रजा’ इस सिध्दान्त के अनुसार भारतीय रहन-सहन-प्रणाली भी परिवर्तित हो चली थी। अंग्रेजों का जातीय भाव बड़ा प्रबल है। उनमें देश-प्रेम की लगन भी उच्चकोटि की है। विचार स्वातंत्रय उनका प्रधान गुण है। कार्य को प्रारम्भ कर उसको दृढ़ता के साथ पूर्ण करना और उसे बिना समाप्त किये न छोड़ना यह उनका जीवन-व्रत है। उनके समाज में स्त्री जाति का उचित आदर है, साथ ही पुरुषों के समान उनका स्वत्व भी स्वीकृत है। ब्रिटिश राज्य के संसर्ग से और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा पाकर ये सब बातें और इनसे सम्बन्धा रखने वाले और अनेक भाव इस शताब्दी के उत्तारार्ध्द में और प्रान्तों के साथ-साथ हमारे प्रान्त में भी अधिकता से फैले। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज का डंका बजाया, और हिन्दुओं में जो दुर्बलताएँ, रूढ़ियाँ और मिथ्याचार थे, उनका विरोधा सबल कंठ से किया। इन सब बातों का यह प्रभाव हुआ कि इस प्रकार के साहित्य की देश को आवश्यकता हुई जो कालानुकूल हो और जिससे हिन्दू समुदाय की वह दुर्बलताएँ दूर हों,जिनसे उसका प्रतिदिन पतन हो रहा था। यही नहीं, इस समय यह लहर भी वेग से सब ओर फैली कि किस प्रकार देशवासी अपनेर् कत्ताव्यों को समझें और कौन-सा उद्योग करके वे भी वैसे ही बनें जैसे योरोप के समुन्नत समाज वाले हैं। कोई जाति उसी समय जीवित रह सकती है, जब वह अपने को देशकालानुसार बना ले और अपने को उन उन्नतियों का पात्रा बनावे जिनसे सब दुर्बलताओं का संहार होता है, और जिनके आधार से लोग सभ्यता के उन्नत सोपानों पर चढ़ सकते हैं। इन भावों का उदय जब हृदयों में हुआ तब इस प्रकार की साहित्य-सृष्टि की ओर समाज के प्रतिभा-सम्पन्न विबुधों की दृष्टि गई और वे उचित यत्न करने के लिए कटिबध्द हुए। अनेक समाचार-पत्रा निकले और विविधा पुस्तक-प्रणयन द्वारा भी इष्ट-सिध्दि का उद्योग प्रारम्भ हुआ।

बाबू हरिश्चन्द्र इस काल के प्रधान कवि हैं। प्रधान कवि ही नहीं, हिन्दी साहित्य में गद्य की सर्व-सम्मत और सर्व-प्रिय शैली के उद्भावक भी आप ही हैं। हम इस स्थान पर यही विचार करेंगे कि उनके द्वारा हिन्दी पद्य में किन प्राचीन भावों का विकास और किन नवीन भावों का प्रवेश हुआ। बाबू हरिश्चन्द्र महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्प्रदाय के थे। इसलिए भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीमती राधिका में उनका अचल अनुराग था। इस सूत्रा से वे ब्रजभाषा के भी अनन्य प्रेमी थे। उनकी अधिकांश रचनाएँ प्राचीन-शैली की हैं और उनमें राधाकृष्ण का गुणानुवाद उसी भक्ति और श्रध्दा के साथ गाया गया है,जिससे अष्टछाप के वैष्णवों की रचनाओं को महत्ता प्राप्त है। उन्होंने न तो कोई रीति ग्रन्थ लिखा है और न कोई प्रबंधा-काव्य। किन्तु उनकी स्फुट रचनाएँ इतनी अधिक हैं तो सर्वतोमुखी प्रतिभा वाले मनुष्य द्वारा ही प्रस्तुत की जा सकती हैं।

उन्होंने होलियों, पर्वों, त्योहारों और उत्सवों पर गाने योग्य सहòों पद्यों की रचना की है। प्रेम-रस से सिक्त ऐसे-ऐसे कवित्ता और सवैये बनाये हैं जो बड़े ही हृदयग्राही हैं। जितने नाटक या अन्य गद्य ग्रन्थ उन्होंने लिखे हैं, उन सबमें जितने पद्य आये हैं वे सब ब्रजभाषा ही में लिखे गये हैं। इतने प्राचीनता प्रेमी होने पर भी उनमें नवीनता भी दृष्टिगत होती है। वे देश दशा पर अश्रु बहाते हैं, जाति-ममता का राग अलापते हैं, जाति की दुर्बलताओं की ओर जनता की दृष्टि आकर्षित करते हैं, और कानों में वह मन्त्रा फूँकते हैं जिससे चिरकाल की बन्द ऑंखें खुल सकें, उनके ‘भारत-जननी’ और ‘भारत-दुर्दशा’ नामक ग्रन्थ इसके प्रमाण हैं। बाबू हरिश्चन्द्र ही वह पहले पुरुष हैं जिन्होंने सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में देश-प्रेम और जाति ममता की पवित्रा धारा बहाई। वे अपने समय के मयंक थे। उनकी उपाधि ‘भारतेन्दु’ है। इस मयंक के चारों ओर जो जगमगाते हुए तारे उस समय दिखला पड़े, उन सबों में भी उनकी कला का विकास दृष्टिगत हुआ। सामयिकता की दृष्टि से उन्होंने अपने विचारों को कुछ उदार बनाया और ऐसे भावों के भी पद्य बनाये जो धार्मिक संकीर्णता को व्यापकता में परिणत करते हैं। ‘जैन-कुतूहल’उनका ऐसा ही ग्रन्थ है। उनके समय में उर्दू शायरी उत्तारोत्तार समुन्नत हो रही थी। उनके पहले और उनके समय में ऐसे उर्दू भाषा के प्रतिभाशाली कवि उत्पन्न हुए जिन्होंने उसको चार चाँद लगा दिये। उनका प्रभाव भी इन पर पड़ा और इन्होंने अधिक उर्दू शब्दों को ग्रहण्कर हिन्दी में ‘फूलों का गुच्छा’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें लावनियाँ हैं जो खड़ी बोली में लिखी गई हैं। वे यद्यपि हिन्दी भाषा ही में रचित हैं, परन्तु उनमें उर्दू का पुट पर्याप्त है। यदि सच पूछिए तो हिन्दी में स्पष्ट रूप से खड़ी बोली रचना का प्रारम्भ इसी ग्रन्थ से होता है। मैं यह नहीं भूलता हूँ कि यदि सच्चा श्रेय हिन्दी में खड़ी बोली की कविता पहले लिखने का किसी को प्राप्त है तो वे महन्त सोतल हैं। वरन मैं यह कहता हूँ कि इस उन्नीसवीं शताब्दी में पहले पहल यह कार्य भारतेन्दु जी ही ने किया। कुछ लोग उसको उर्दू की ही रचना मानते हैं। परन्तु मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं। इसलिए कि जैसे हिन्दी भाषा और संस्कृत के तत्सम शब्द उसमें आये हैं वैसे शब्द उर्दू की रचना में आते ही नहीं।

बाबू हरिश्चन्द्र नवीनता-प्रिय थे और उनकी प्रतिभा मौलिकता से स्नेह रखती थी। इसलिए उन्होंने नई-नई उद्भावनाएँ अवश्य कीं, परन्तु प्राचीन ढंग की रचना ही का आधिक्य उनकी कृतियों में है। ऐसी ही रचना कर वे यथार्थ आनन्द का अनुभव भी करते थे। उनके पद्यों को देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। उनके छोटे-बड़े ग्रन्थों की संख्या लगभग 100 तक पहुँचती है। इनमें पद्य के ग्रन्थ चालीस- पचास से कम नहीं हैं। परन्तु ये समस्त ग्रन्थ लगभग ब्रजभाषा ही में लिखे गये हैं। उनकी भाषा सरस और मनोहर होती थी। वैदर्भी वृत्तिा के ही वे उपासक थे। फिर भी उनकी कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो अधिकतर संस्कृत गर्भित हैं। वे सरल से सरल और दुरूह से दुरूह भाषा लिखने में सिध्दहस्त थे। ग़ज़लें भी उन्होंने लिखी हैं, जो ऐसी हैं जो उर्दू के उस्तादों के शे’रों की समता करने में समर्थ हैं। मैं पहले कह चुका हूँ कि वे प्रेमी जीव थे। इसलिए उनकी कविता में प्रेम का रंग बड़ा गहरा है। उनमें शक्ति भी थी और भक्तिमय स्तोत्रा भी। उन्होंने अपने इष्टदेव के लिए लिखे हैं, परन्तु जैसी उच्च कोटि की उनकी प्रेम संबंधी रचनाएँ हैं वैसी अन्य नहीं। उनकी कविता को पढ़कर यह ज्ञात होता है कि उनकी कविकृति इसी में अपनी चरितार्थता समझती है कि वह भगवल्लीलामयी हो। वे विचित्र स्वभाव के थे। कभी तो यह कहते-

जगजिन तृण सम करि तज्यो अपने प्रेम प्रभाव।

करि गुलाब सों आचमन लीजत वाको नाँव।

परम प्रेम निधि रसिकबर अति उदार गुनखान।

जग जन रंजन आशु कवि को हरिचंद समान।

कभी सगर्व होकर यह कहते-

चंद टरै सूरज टरै टरै जगत के नेम।

पै दृढ़ श्री हरिचंद को टरै न अविचल प्रेम।

जब वे अपनी सांसारिकता को देखते और कभी आत्म-ग्लानि उत्पन्न होती तो यह कहने लगते।

जगत-जाल में नित बँधयो परयो नारि के फंद।

मिथ्या अभिमानी पतित झूठो कवि हरिचंद।

उनकी जितनी रचनाएँ हैं, इसी प्रकार विचित्रताओं से भरी हैं। कुछ उनमें से आप लोगों के सामने उपस्थित की जाती हैं-

1. इन दुखियान को न सुखसपने हूँ मिल्यो

यों ही सदा व्याकुल विकल अकुलायँगी।

प्यारे हरिचंद जूकी बीती जानि औधि जोपै

जै हैं प्रान तऊ एतो संग ना समायँगी।

देख्यो एक बार हूँ न नैन भरि तोहिं यातें

जौन जौन लोक जैहैं तहाँ पछतायँगी।

बिना प्रान-प्यारे भये दरस तिहारे हाय

मुएहूश् पै ऑंखें ये खुली ही रह जायँगी।

2. हौं तो याही सोच में बिचारत रही रे काहें

दरपन हाथ ते न छिन बिसरत है।

त्योंही हरिचंद जू वियोग औ सँजोग दोऊ

एक से तिहारे कछु लखि न परत है।

जानी आज हम ठकुरानी तेरी बात तू तो

परम पुनीत प्रेम-पथ बिचरत है।

तेरे नैन मूरति पियारे की बसति ताहि

आरसी में रैन दिन देखिबो करत है।

3. जानि सुजानहौं नेह करी

सहि कै बहुभाँतिन लोक हँसाई।

त्यों हरिचंद जू जो जो कह्यो

सो करयो चुप ह्नै करि कोटि उपाई।

सोऊ नहीं निबही उन सों

उन तोरत बार कछू न लगाई।

साँची भई कहनावति या अरि

ऊँची दूकान की फीकी मिठाई।

4. आजु लौं जौन मिले तो कहा

हम तौ तुम्हरे सब भाँति कहावैं।

मेरो उराहनो है कछु नाहिं

सबै फल आपने भाग को पावैं।

जो हरिचंद भई सो भई अब

प्रान चले चहैं याते सुनावैं।

प्यारे जू है जग की यह रीति

बिदा के समै सब कंठ लगावैं।

5. पियारो पैये केवल प्रेम मैं।

नाहिं ज्ञान मैं , नाहिं धयान मैं , नाहिं करम कुल नेम मैं।

नाहिं मंदिर मैं नहिं पूजा मैं , नहिं घंटा की घोर मैं।

हरीचंद वह बाँधयो डोलै एक प्रेम की डोर मैं।

6. सम्हारहु अपने को गिरिधारी।

मोरमुकुट सिर पागपेच कसि राखहु अलक सँवारी।

हिय हलकत बनमाल उठावहु मुरली धारहु उतारी।

चक्रादिकन सान दै राखे कंकन फँसन निवारी।

नूपुर लेहु चढ़ाय किंकिनी खींचहु करहु तयारी।

पियरो पट परिकर कटि कसिकै बाँधो हो बनवारी।

हम नाहीं उनमें जिनको तुम सहजहिं दीन्हों तारी।

बानो जुगओ नीके अबकी हरीचंद की बारी।

एक उर्दू की ग़ज़ल भी देखिए-

दिल मेरा ले गया दग़ा कर के।

बेवप हो गया वप कर के।

हिज्र की शब घटा ही दी हमने।

दास्तां जुल्प की बढ़ा करके।

वक्ते रहलत जो आये बालीं पर।

ख़ूब रोये गले लगा कर के।

सर्वे वमत ग़ज़ब की चाल से तुम।

क्यों वयामत चले बपा कर के।

ख़ुद बखुद आज जो वह बुत आया।

मैं भी दौड़ा ख़ुदा ख़ुदा कर के।

दोस्तो कौन मेरी तुरबत पर।

रो रहा है रसा रसा कर के।

8. श्रीराधामाधाव युगल प्रेम रस का अपने को मस्त बना।

पी प्रेम-पियाला भर भरकर कुछ इसमैं का भी देखमज़ा।

इतबार न हो तो देख न ले क्या हरीचंद का हाल हुआ।

9. नव उज्ज्वलजल धार हार हीरक सी सोहति।

बिच बिच छहरति बूंद मधय मुक्ता मनि पोहति।

लोल लहर लहि पवन एक पै इक इमि आवत।

जिमि नर गन मन विविधा मनोरथ करत मिटावत।

10. तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।

झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।

किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज निज सोभा।

कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा।

मनु आतप वारन तीर को सिमिट सबै छाये रहत।

कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नयन मन सुख लहत।

उनकी इस प्रकार की रचनाएँ भी मिलती हैं, जिनमें खड़ी बोली का पुट पाया जाता है। जैसे यह पद्य-

डंका कूच का बज रहा मुसापिर जागो रे भाई।

देखो लाद चले पंथी सब तुम क्यों रहे भुलाई।

जब चलना ही निश्चय है तो लै किन माल लदाई।

हरीचंद हरिपद बिनु नहि तौ रहि जैहौ मुँह बाई।

किन्तु उनकी इस प्रकार की रचना बहुत थोड़ी हैं। क्योंकि उनका विश्वास था कि खड़ी बोलचाल में सरस रचना नहीं हो सकती। उन्होंने अपने हिन्दी भाषा नामक ग्रन्थ में लिखा है कि खड़ी बोली में दीर्घान्त पद अधिक आते हैं, इसलिए उसमें कुछ-न-कुछ रूखापन आ ही जाता है। इस विचार के होने के कारण उन्होंने खड़ी बोलचाल की कविता करने की चेष्टा नहीं की। किन्तु आगे चलकर समय ने कुछ और ही दृश्य दिखाया, जिसका वर्णन आगे किया जावेगा। बाबू हरिश्चन्द्र जो रत्न हिन्दी भाषा के भण्डार को प्रदान कर गये हैं वे बहुमूल्य हैं, यह बात मुक्तकंठ से कही जा सकती है-

पंडित बदरीनारायण चौधरी बाबू हरिश्चन्द्र के मित्रों में से थे। दोनों के रूप- रंग में समानता थी और हृदय में भी। दोनों ही रसिक थे और दोनों ही हिन्दी भाषा के प्रेमी। दोनों ही ने आजन्म हिन्दी भाषा की सेवा की और दोनों ही ने उसको यथाशक्ति अलंकृत बनाया। दोनों ही अमीर थे और दोनों ही ऐसे हँसते मुख, जो रोते को भी हँसा दें। आज दोनों ही संसार में नहीं हैं, परन्तु अपनी कीर्ति द्वारा दोनों ही जीवित हैं। चौधरी जी की रचनाएँ अधिक नहीं हैं। किन्तु जो हैं वे हिन्दी भाषा का शृंगार हैं। पंडित जी सरयू पारीण ब्राह्मण और प्रचुर सम्पत्तिा के अधिकारी थे। परसी और संस्कृत का उन्हें अच्छा ज्ञान था,अंग्रेजी भी कुछ जानते थे। उन्होंने मिर्ज़ापुर में रसिक समाज आदि कई सभाएँ स्थापित की थीं और ‘आनन्दकादम्बिनी’ नामक मासिक पत्रिका तथा ‘नागरी-नीरद’ नामक साप्ताहिक पत्रा भी निकाला था। दोनों ही सुन्दर थे और जब तक रहे अपने रस से हिन्दी संसार को सरस बनाते रहे और क्यों न बनाते, जब प्रेमघन उनके संचालक थे। घन आनन्द के उपरान्त कविता में चौधरी जी ने ही ऐसा सरस उपनाम अपना रखा जिसके सुनते ही प्रेम का घन उमड़ पड़ता है। वे आनन्दी जीव थे और अपने रंग में सदा मस्त रहते थे, इसलिए कुछ लोग यह समझते थे कि वे जैसा चाहिए वैसे मिलनसार नहीं थे। किंतु ऐसा वे ही कहते हैं जो उनके अंतरंग नहीं। वास्तव में वे बड़े सहृदय और सरस थे और जिस समय जी खोलकर मिलते, रस की वर्षा कर देते। उनकी रचनाएँ सब प्रकार की हैं। किंतु ग्रंथाकार बहुत कम छपीं। भारत-सौभाग्य-नाटक उनका प्रसिध्द नाटक है। जहाँ तक मुझे स्मरण है, उन्होंने ‘वेश्या-विनोद’ नामक एक महानाटक लिखा था। परंतु वह छप न सका और कदाचित् पूरा भी नहीं हुआ। कुछ छोटी-छोटी कविताएँ उनकी छपी हैं, जो विशेष अवसरों पर लिखी जाकर वितरण की गयीं। उन्होंने हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति पद को भी सुशोभित किया था। सभापतित्व के पद से जो भाषण उन्होंने दिया था, वह बड़ा ही विद्वत्तापूर्ण था, वह छप भी चुका है। उनके बहुत से सुंदर लेख और कितनी ही सरस कविताएँ उनके सम्पादित पत्रों में मौजूद हैं। परन्तु दुख है कि न तो अब तक उनका संकलन हुआ और न वे ग्रंथ रूप में परिणत हुए। उनकी अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं और आजीवन उन्होंने उसी की सेवा की। अंतिम समय में जब खड़ी बोली का प्रचार हो चुका था, उन्होंने कुछ खड़ी बोली की रचनाएँ भी की थीं। उनके कुछ पद्य देखिए-

1. बगियान बसंत बसेरो कियो

बसिये तेहि त्यागि तपाइये ना।

दिन काम कुतूहल के जे बने

तिन बीच बियोग बुलाइये ना।

घन प्रेम बढ़ाय कै प्रेम अहो

बिथा बारि वृथा बरसाइये ना।

इतै चैत की चाँदनी चाह भरी

चरचा चलिवे की चलाइये ना।

2. अब तो लखिये अलि ए अलियन

कलियन मुखचुंबन करन लगे।

पीवत मकरंद मनो माते ,

ज्यों अधार सुधा रस मैं राते।

कहि केलि कथा गुंजरन लगे।

रस मनहुँ प्रेम घन बरसत घन निज प्यारी के

करि आलिंगन लिपटे लुभाय मन हरन लागे।

उनके हृदय में भी समय के प्रभाव से देश प्रेम जाग्रत था। अतएव उन्होंने इस प्रकार की रचनाएँ भी की हैं। एक पद्य देखिए-

जय जय भारत भूमि भवानी।

जाकी सुजस पताका जग के दसहूँ दिसि फहरानी।

सब सुखसामग्री पूरित ऋतु सकल समान सुहानी।

जा श्री सोभा लखि अलका अरु अमरावती खिसानी।

प्रनमत तीस कोटि जन अजहूँ जाहि जोरि जुग पानी।

जिन मैं झलक एकता की लखि जग मति सहमि सकानी।

ईस कृपा लहि बहुरि प्रेमघन बनहु सोई छवि खानी।

सोई प्रताप गुन जन गरबित ह्नै भरी पुरी धान धानी।

उनकी एक खड़ी बोली की रचना भी देखिए जो अंतिम दिनों में की गयीहै।

मन की मौज

1. मन की मौज मौज सागर सी सो कैसे ठहराऊँ।

जिसका वारापार नहीं उस दरिया को दिखलाऊँ।

तुमसे नाजुक दिल की भारी भँवरों में भरमाऊँ।

कहो प्रेमघन मन की बातें कैसे किसे सुनाऊँ।

2. तिरछी त्योरी देखि तुम्हारी क्योंकर सीस नवाऊँ।

हौ तुम बड़े ख़बीस जान कर अनजाना बन जाऊँ।

हर्पे शिकायत ज़बाँ प आये कहीं न यह डर लाऊँ।

कहो प्रेमघन मन की बातें कैसे किसे सुनाऊँ।

3. लूट रहे हो भली तरह मैं जानूँ वले छुपाऊँ।

करते हो अपने मन की मैं लाख चहे चिल्लाऊँ।

डाह रहे हो खूब परा परबस मैं गो घबराऊँ।

कहो प्रेमघन मन की बातें कैसे किसे सुनाऊँ।

प्रेमघन जी ने गद्य में बहुत बड़ा कार्य किया है, उनके गद्यों में विलक्षणताएँ और माधुर्य भी अधिक हैं। इसका वर्णन आगे गद्य विभाग में होगा। इसलिए उसकी यहाँ कुछ चर्चा नहीं की जाती।

पं. प्रतापनारायण मिश्र भारतेन्दु काल के एक जगमगाते हुए नक्षत्र थे। प्रकृति बड़ी स्वतंत्र थी, लगी-लिपटी बातें पसंद नहीं थीं। इसलिए खरी बातें कहना ही उनका व्रत था। वे बाबू हरिश्चन्द्र के बड़े प्रेमी थे और अपने ‘ब्राह्मण’ मासिक पत्र पर’हरिश्चन्द्राय नम:’ लिखा करते थे। इनसे उनका हिन्दी भाषा-प्रेम प्रकट है। वे अधिक अर्थकृच्छ् होने पर भी अपने ‘ब्राह्मण’ को बराबर निकालते रहे और उस समय तक अपने इस धर्म को निबाहा जब तक उनकी गाँठ में दाम रहा। देश-ममता, जाति-ममता और भाषा प्रेम उनकी रग-रग में भरा था। आजीवन उन्होंने इसको निबाहा। इन तीनों विषयों पर उन्होंने बड़ी सरस रचनाएँ की हैं। जितनी पंक्तियाँ उन्होंने अपने जीवन में लिखीं, वे चाहे गद्य की हों या पद्य की, उन सबों में इन तीनों विषयों की धारा ही प्रबल वेग से बहती दृष्टिगत होती है। वे मूर्तिमन्त देशभक्त थे। इसीलिए उनकी सब रचनाएँ इसी भाव से भरी हैं। उन्होंने एक दर्जन पुस्तकें बँगला से अनुवादित कीं और पन्द्रह बीस पुस्तकें स्वयं लिखीं, जिनमें से ‘प्रताप-संग्रह’, ‘मानस-विनोद’, ‘मन की लहर’, ‘ब्रैडला-स्वागत’, ‘लोकोक्तिशतक’, ‘तृप्यंताम्’ आदि अनेक ग्रन्थ पद्य में लिखे गये हैं। इन सबमें उनकी मानसिक प्रवृत्तिा स्पष्टतया दृष्टिगत होती है। उन्होंने प्रार्थना और विनय के पद भी कहे हैं और ईश्वर एवं धर्म-सम्बन्धी रचनाएँ भी की हैं, परन्तु उनमें वह ओज और आवेश नहीं पाया जाता, जो देश अथवा जाति-सम्बन्धी रचनाओं में मिलता है। उनके पद्यों की एक ही भाषा नहीं है। कभी उन्होंने अपनी बैसवाड़ी बोलचाल में रचना की है, कभी उर्दू-मिश्रित खड़ी बोली में,और कभी ब्रजभाषा में। अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा ही में हैं। जितने पद्य उन्होंने देश और जाति-सम्बन्धी लिखे हैं, उनमें उनके हृदय का जीवन्त भाव बहुत ही जाग्रत् मिलता है, जो हृदयों में तीव्रता के साथ जीवनी-धाराएँ प्रवाहित करता है। जब ब्रैडला साहब भारत में पधारे उस समय उन्होंने उनके स्वागत में जो कविता लिखी; उसमें देश की दशा का ऐसा सच्चा चित्राण किया कि उसकी बड़ी प्रशंसा हुई, यहाँ तक कि विलायत तक में उसकी चर्चा हुई। उनकी अधिकांश रचनाएँ इसी प्रकार की हैं। उनमें से कुछ मैं आप लोगों के सामने रखूँगा। पहले देखिए वे ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान’ के विषय में क्या कहते हैं-

चहहु जो साँचो निज कल्यान।

तो सब मिलि भारत संतान।

जपो निरंतर एक ज़बान।

हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्थान।

तबहि सुधारिहै जन्म निदान।

तबहि भलो करि है भगवान

जब रहिहै निसि दिन यह धयान।

हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान।

अपनी ‘तृप्यंताम्’ नामक कविता में से वे किस प्रकार अपने जातीय दुख को प्रकट करते हैं, उसे भी सुनिए-

केहि विधि वैदिक कर्म होत

कब कहा बखानत ऋक यजु साम।

हम सपने हूँ में नहिं जानैं

रहैं पेट के बने गुलाम।

तुमहिं लजावत जगत जनम ले

दुहुँ लोकन में निपट निकाम।

कहैं कौन मुख लाइ हाय

फिर ब्रह्मा बाबा तृप्यंताम्।

अपने बैसवाड़ी बोलचाल में देखिए, गोरक्षा के विषय में क्या कहते हैं-

गैया माता तुम काँ सुमिरौं

कीरति सब ते बड़ी तुम्हारि।

करौ पालना तुम लरिकन कै

पुरिखन बैतरनी देउ तारि।

तुम्हरे दूधा दही की महिमा

जानैं देव पितर सब कोय।

को अस तुम बिन दूसर जेहि

का गोबर लगे पवित्तार होय।

बुढ़ापा का वर्णन अपनी ही भाषा में देखिए किस प्रकार करते हैं-

हाय बुढ़ापा तोरे मारे अब तो

हम नकन्याय गयन।

करत धारत कछु बनतै नाहीं

कहाँ जान औ कैस करन।

छिन भरि चटक छिनै माँ मध्दिम

जस बुझात खन होइ दिया।

तैसे निखवख देखि परत हैं

हमरी अक्किल के लच्छन।

असु कुछु उतरि जाति है जीते

बाजी बिरियाँ बाजी बात।

कैसेउ सुधि ही नाहीं आवत

मूँड़घइ काहें न दै मारन।

कहा चाहौं कुछु निकरत कुछु है

जीभ राँड़ का है यहु हालु।

कोऊ येहका बात न समझै

चाहे बीसन दाँय कहन।

दाढ़ी नाक याकमाँ मिलिगै

बिन दाँतन मुँहु अस पोपलान।

दढ़िही पर बहि बहि आवति है

कबौं तमाखू जो फाँकन।

बारौ पकिगै रीरौ झुकिगै

मुँड़ौ सासुर हालन लाग।

हाथ पाँव कछु रहे न आपन

केहि के आगे दुख बखान।

उनकी एक ग़ज़ल देखिए-

वो बदख़ू राह क्या जाने वप की।

अगर ग़पलत से बाज़ आया जप की।

मियाँ आये हैं बेगारी पकड़ने ,

कहे देती है शोख़ी नवशे पा की।

पुलिस ने और बदकारों को शहदी ,

मरज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।

उसे मोमिन न समझो ऐ बिरहमन ,

सताये जो कोई ख़िलवत ख़ुदा की।

बिधाता ने याँ मक्खियाँ मारने को ,

बनाये हैं खुशरू जवाँ कैसे कैसे।

अभी देखिए क्या दशा देश की हो ,

बदलता है रंग आसमाँ कैसे कैसे।

एक भजन भी देखिए-

माया मोह जनम के ठगिया

तिनके रूप भुलाना।

छल परपंच करत जग धूनत

दुख को सुख करि माना।

फिकिर वहाँ की तनक नहीं है

अंत समै जहँ जाना।

मुख ते धारम धारम गुहरावत

करम करत मनमाना।

जो साहब घट घट की जानत

तेहि ते करत बहाना।

येहि मनुआ के पीछे चलि के

सुख का कहाँ ठिकाना।

जो परताप सुखद को चीन्हे

सोई परम सयाना।

दो सवैयाओं को भी देखिए-

बनि बैठी है मान की मूरति सी , मुख खोलत बोलै न ‘ नाहीं ‘ न ‘ हाँ ‘ ।

तुमहीं मनुहारि कै हारि परे सखियान की कौन चलाई तहाँ।

बरषा है प्रताप जू धीर धारौ अब लौं मन को समझायो जहाँ।

यह व्यारि तबै बदलैगी कछू पपिहा जब पूछि है ‘ पीव कहाँ ‘ ।

आगे रहे गनिका गज गीधा सुतौ अब कोऊ दिखात नहीं हैं।

पाप परायन ताप भरे परताप समान न आन कहीं हैं।

हे सुखदायक प्रेमनिधो जग यों तो भले औ बुरे सबहीं हैं।

दीनदयाल औ दीन प्रभो तुमसे तुमहीं हमसे हमहीं हैं।

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