भाषा की परिभाषा : अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


स्वामी हरिवंस के टट्टी सम्प्रदाय में एक महन्त शीतल नाम के हो गये हैं। इन्होंने इश्कचमन नाम की एक पुस्तक चार भागों में लिखी है। ये संस्कृत के विद्वान थे और परसी का भी इन्हें अच्छा ज्ञान था। ये टट्टी सम्प्रदाय के महन्त तो थे ही, साथ ही प्रेममय हृदय के अधिकारी थे। इनकी रचना खड़ी बोली में हुई है, जिसमें परसी और ब्रजभाषा के शब्द भी अधिक आये हैं। हिन्दी में खड़ी बोली की नींव डालने वाले प्रथम पुरुष यही हैं। इनकी भाषा ओजमयी और रचना शैली सरस है,भाषा में प्रवाह है और कविता पढ़ते समय यह ज्ञात होता है कि सरस साहित्य का दरिया उमड़ता आ रहा है। इनमें लगन मिलती है और इनका प्रेम भी तन्मयता तक पहुँचा ज्ञात होता है। इस शताब्दी में यही एक ऐसे कवि पाये गये जिन्होंने ब्रजभाषा में कविता की ही नहीं! फिर भी इनकी रचना में ब्रजभाषा का पुट कम नहीं। इनकी रचनाओं में भक्ति की मर्म-स्पर्शिनी मधुरता नहीं पायी जाती। परन्तु उनका मानसिक उद्गार ओजस्वी है, जिसमें मनस्विता की पूरी मात्रा मिलती है। प्रेम के जिस सरस उद्यान में घूमकर रसखान और घन आनन्द बड़े सुन्दर कुसुम चयन कर सके, उसमें इनका प्रवेश जैसा चाहिए वैसा नहीं। इनकी रचना में संस्कृत तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। मैं समझता हूँ, वह वर्तमान खड़ी बोली कविता के पूर्व रूप की सूचना है।

इन्होंने इच्छानुसार लघु को दीर्घ और दीर्घ को लघु बनाया है और संस्कृत के तत्सम शब्दों को यत्रा-तत्रा ब्रजभाषा के रूप में भी ग्रहण किया है। एक बात और इनमें देखी जाती है। वह यह कि नायिका के शिख-नख से सम्बन्धा रखने वाले कतिपय परसी उपमानों को भी इन्होंने अपनी रचना में ग्रहण कर लिया है, जैसा इनके पहले के किसी हिन्दी के कवि अथवा महाकवि ने नहीं किया था। उन्होंने शब्दों को इच्छानुसार तोड़ा-मरोड़ा भी है और कई प्रान्तिक शब्दों से भी काम लिया है। इनके कुछ पद्य नीचे लिखे जाते हैं। उनको पढ़िए और चिद्दित शब्दों पर विचार भी करते जाइए-

1. शिव विष्णु ईश बहु रूप तुई A

नभ तारा चारु सुधाकर है।

अंबा धारानल शक्ति स्वधा

स्वाहा जल पौन दिवाकर है।

हम अंशाअंश समझते हैं

सब ख़ाक जाल से पाक रहैं।

सुन लाल बिहारी ललित ललन

हम तो तेरे ही चाकर हैं।

2. कारन कारज ले न्याय कहै

जोतिस मत रवि गुरु ससी कहा।

ज़ाहिद ने हक्व हसन यूसुप

अरहन्त जैन छवि बसी कहा।

रति राज रूप रस प्रेम इश्व

जानी छवि शोभा लसी कहा।

लाला हम तुम को वह जाना जो

ब्रह्म तत्व त्वम असी कहा।

3. मुख सरद चन्द पर ठहर गया।

जानी के बुंद पसीने का।

या कुन्दन कमल कली ऊपर

झमकाहट रक्खा मीने का।

देखे से होश कहाँ रहवै जो

पिदर बूअली सीने का।

या लाल बदख्शाँ पर खींचा

चौका इल्मास नगीने का।

4. हम खूब तरह से जान गये

जैसा आनँद का कन्द किया।

सब रूप सील गुन तेज पुंज

तेरे ही तन में बन्द किया।

तुझ हुस्न प्रभा की बाकी ले

फिर विधि ने यह फरफन्द किया।

चंपकदल सोनजुही नरगिस

चामीकर चपला चंद किया।

5. मुख सरद चन्द्र पर ò मसीकर

जगमगैं नखत गन जोती से।

कै दल गुलाब पर शबनम

के हैं कनके रूप उदोती से।

हीरे की कनियाँ मंद लगै हैं

सुधा किरन के मोती से।

आया है मदन आरती को

धार कनक थार में मोती से।

6. चंदन की चौकी चारु पड़ी

सोता था सब गुन जटा हुआ।

चौके की चमक अधार बिहँसन

मानो एक दाड़िम फटा हुआ।

ऐसे में ग्रहन समै सीतल इक

ख्याल बड़ा अटपटा हुआ।

भूतल ते नभ नभ ते अवनी ,

अग उछलै नट का बटा हुआ।

इनकी कविता की भाषा कवि-कल्पित स्वतंत्रा भाषा है। उसमें किसी भाषा के नियम की रक्षा नहीं की गयी है। सौन्दर्य के लिए हमारे यहाँ काम उपमान बनता है, परन्तु इन्होंने यूसुप को उपमान बनाया। यह परसी का अनुकरण है। इसी प्रकार की काव्य-नियम-सम्बन्धी अनेक अवहेलनाएँ इनकी रचना में पायी जाती हैं। परन्तु यह अवश्य है कि ये इस विचित्राता के पहले उद्भावक हैं।

बोधा प्रेमी जीव थे; कहा जाता है प्रेम अन्धा होता है (Love is Blind) प्रेम क्यों अन्धा होता है? इसलिए कि वह अपने रंग में मस्त होकर केवल अपने प्रेम पात्रा को देखता है, और किसी को नहीं, संसार को भी नहीं। इसीलिए वह अन्धा है। जब किसी का प्रेम वास्तविक रूप से हृदय में जाग्रत् हो जाता है, उस समय न तो हम उसके गुण-दोष को देखते हैं, न उसके व्यवहार की परवा करते हैं, न उसकी कठोरता को कठोरता मानते हैं, न उसकी कटुता को कटुता समझते हैं, और न उसकी पशुता को पशुता। प्रेमोन्माद में न तो हम लोक-मर्यादा का धयान करते हैं, न शिष्टता का, न कुल-परम्परा का, न इस बात का कि हमको संसार क्या कहता है। यदि यह अंधापन नहीं है तो क्या है। यदि यह प्रेम ईश्वरोन्मुख हो तो उसमें यह शक्ति होती है कि वह दुर्गुण को गुण बना देता है, पशुता को मानवता में बदल देता है, दुर्जनता को सुजनता में परिणत कर देता है और इस बात का अनुभव कराता है कि ‘सर्वंखल्विदं ब्रह्म’ जो कुछ विश्व में है, ब्रह्म है। अतएव उसका संसार सोने का हो जाता है और सब ओर उसको ‘सत्यं शिवं सुंदरं’ दृष्टिगत होता है। किंतु जब यह प्रेम मनुष्य तक ही परिमित होता है तो उसमें स्वार्थपरता की बू आने लगती है और मनुष्य का इतना पतन हो जाता है कि वह उस उच्च सोपान पर नहीं चढ़ सकता जो जीवन को स्वर्गीय बना देता है। ‘घन-आनन्द’, ‘रसखान’ का आदिम जीवन कैसा ही रहा हो, यौवन-प्रमाद उनको कुछ काल के लिए भले ही भ्रांत बना सका हो, किन्तु उनका अन्तिम जीवन उज्ज्वल है और वे उस महान-हृदय के समान हैं, जो पथ-च्युत होकर भी अंत में सत्पथावलंबी हो जाता है। मानव-प्रेम यदि उच्च होकर आदर्श प्रेम में परिणत हो जाये तो वह मानव-प्रेम अभिनन्दनीय है। जिस मानव-प्रेम में स्वार्थ की बू नहीं, वासनाओं का विकार नहीं, इन्द्रिय-लोलुपता की कालिमा नहीं, लोभ-लिप्सा का प्रलोभन नहीं,र् कर्तव्य-ज्ञान की अवहेलना नहीं, वह स्वर्गीय है और उसमें लोक-कल्याण की विभूति विद्यमान है। इसीलिए यह वांछनीय है। दुख है कि प्रेमिक जीव होने पर भी बोधा इस तत्तव को यथातथ्य नहीं समझ सकते। वे सरयूपारीण ब्राह्मण थे, परन्तु एक यवनी के प्रेम में ऐसे उन्मत्ता हुए कि अपनी कुल-मर्यादा को ही नहीं विसर्जन कर दिया,अपनी आत्मानुभूति को भी तिलांजलि दे दी। उनके मुख से प्रेम-मंत्रा-स्वरूप जब निकलता है तब ‘सुभानअल्लाह’ निकलता है। उनके पद्यों में ‘सुभान’ ही का गुणगान मिलता है। उसमें ईश्वरानुराग की गंधा भी नहीं आती। अच्छा होता यदि उन्होंने उस पंथ को स्वीकार किया होता, जिसको घनानंद और रसखान ने मानवी प्रेमोन्माद की समाप्ति पर ग्रहण किया, संतोष इतना ही है कि उन्होंने अपने धर्म को उस पर उत्सर्ग नहीं किया। हम अपने क्षोभ का शासन उसी से करते हैं। बोधा अपनी धुन के पक्के थे। प्रेम उनकी रग-रग में भरा था। उनमें जब इतनी आत्म-विस्मृति हो गयी थी कि वे सुभान के अभाव में संसार को अन्धाकारमय देखते थे और वही उनकी स्वर्गीय विभूति थी तो लोक-परलोक से उनका सम्बन्धा ही क्या था? देखिए, वे प्रेम के कंटकाकीर्ण मार्ग का चित्राण किस प्रकार करते हैं-

1. अति खीन मृनाल के तारहुँ ते

तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।

सुई बेह हूँ बेधि सकी न तहाँ

परतीति को टाँडो लदावनो है।

कवि बोधा अनी घनी नेजहुँ की

चढ़ितापै न चित्ता डगावनो है।

यह प्रेम को पंथ करार महा

तरवार की धार पै धावनो है।

2. लोक की लाज औ सोक प्रलोक को

वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।

गाँव को गेह को देह को नातो

सनेह में हाँ तो करै पुनि सोऊ।

बोधा सुनीति निबाह करै

धार ऊपर जाके नहीं सिर होऊ।

लोक की भीति डेरात जो मीत

तो प्रीति के पैंडे परै जनि कोऊ।

कवि के लिए सहृदय होना प्रधान गुण है। जिसका हृदय स्वभावत: द्रवणशील नहीं, जिसके हृदय में भावों का विकास नहीं, उसकी रचना में वह बात नहीं होती जिसको मर्मस्पर्शी कहा जाता है। बोधा की अधिकांश रचनाएँ ऐसी ही हैं, जिनसे उनका सरस हृदय कवि होना सिध्द है। उनके दो ग्रन्थ बतलाये जाते हैं। एक का नाम ‘विरह वारीश’ और दूसरे का ‘इश्वनामा’। इन दोनों में उन्होंने प्रेम सम्बन्धी सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का बड़ा ही सुन्दर चित्राण किया है। इश्वनामा सुभान की प्रशंसा से पूर्ण है। उनके कुछ मानसिक उद्गार ऐसे हैं जिनमें भावुकता की मात्रा अधिक पाई जाती है। उनका वाच्यार्थ बहुत साप है। उनकी भाषा ललित ब्रजभाषा है यद्यपि उसमें कहीं-कहीं खड़ी बोली के प्रयोग भी मिल जाते हैं। उनकी रचना में जितने शब्द आते हैं वे उनके हृदय के रंग में रँगे होते हैं। इसलिए यदि वे कहीं शब्दों को तोड़-मरोड़ देते हैं या अन्य भाषा के शब्दों को लाते हैं तो उनका प्रयोग इस प्रकार करते हैं जिससे वे उनकी शैली के ढंग में ढले मिलते हैं। उनकी कुछ रचनाएँ देखिए-

1. एक सुभान के आनन पै

कुरबान जहाँ लगि रूप जहाँ को।

कैयो सतक्रतु की पदवी लुटिये

लखिकै मुसकाहट ताको।

सोक जरा गुजरा न जहाँ कबि

बोधा जहाँ उजरा न तहाँ को।

जान मिलै तो जहान मिलै नहिं जान

मिलै तो जहान कहाँ को।

2. बोधा किसू सों कहा कहिये ,

सो बिथा सुनि पूरि रहै अरगाइ कै।

याते भलो मुख मौन धारैं उपचार

करैं कहूँ औसर पाई कै।

ऐसो न कोऊ मिल्यो कबहूँ

जो कहै कछु रंच दया उर लाइ कै।

आवत है मुखलौं बढ़ि कै

फिर पीर रहै या सरीर समाइ कै।

3. कबहूँ मिलिबो कबहूँ मिलिबो

यह धीरज ही में धारैबो करैं।

उर ते कढ़ि आवै गरेते फिरै

मन की मन ही में सिरैबो करै।

कवि बोधा न चाव सरो कबहूँ

नितहूँ हरबा से हरैबो करै।

सहतेइ बनै करते न बनै

मन ही मन पीर पिरैबो करै।

4. हिलि मिलि जानै तासों मिलि कै जनावै हेत ,

हित को न जानै ताको हितू न बिसाहिये।

होय मगरूर तापै दूनी मगरूरी कीजै

लघु ह्नै चलै जो तासों लघुता निबाहिये।

बोधा कवि नीति को निबेरो यही भाँति अहै

आप को सराहै ताहि आप हूँ सराहिये।

दाता कहा सूर कहा सुन्दर सुजान कहा

आप को न चाहै ताके बाप को न चाहिए।

रसनिधि का मुख्य नाम पृथ्वी सिंह था। वे दतिया राज्य के एक जागीरदार थे। उनका रचा हुआ ‘रतन हज़ारा’ नामक एक ग्रन्थ है। यह बिहारी सतसई के अनुकरण से लिखा गया है। बिहारी के दोहों से टक्कर लेने की इसमें चेष्ट की गई है। किन्तु कवि को इसमें सफलता नहीं प्राप्त हुई उनके कुछ दोहे अवश्य सुन्दर हैं उन्होंने ‘अरिल्लों’ और ‘माझों’ की भी रचना की है, वे भी संगृहीत हो चुके हैं। उनके कुछ स्फुट दोहे भी हैं। वे शृंगार रस के ही कवि थे। अन्य रसों की ओर उनकी दृष्टि कम गई। महंत सीतल की तरह वे भी परसी के शब्दों, मुहावरों, उपमाओं और मुस्लिम संसार के आदर्श पुरुषों के भी प्रेमी थे। अपनी रचनाओं में यथास्थान उन्होंने उनको ग्रहण किया है। उनकी कविता की भाषा ब्रजभाषा है परन्तु उन्होंने अन्य भाषा के शब्दों का व्यवहार भी स्वतंत्रातापूर्वक किया है। बिहारी लाल के भावों ही की नहीं, उनके शब्दों और वाक्यों तक को आवश्यकतानुसार ले लिया है। फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि रसनिधि चाहे रसनिधि न हों पर वे रसिक हृदय अवश्य थे। उनकी अनेक रचनाएँ सरस हैं और उनमें मधुरता पाई जाती है, उन्होंने परसी के कुछ ऐसे विषय भी ले लिये हैं जो अशिष्ट कहे जा सकते हैं। किन्तु उनकी मात्रा थोड़ी है। उनके कुछ पद्य नीचे दिये जाते हैं-

1. रसनिधि वाके कहत हैं याही ते करतार।

रहत निरंतर जगत कों वाही के करतार।

2. हित करियत यहि भाँति सों मिलियत है वहि भाँति।

छीर नीर तैं पूछ लै हित करिबे की बात।

3. सुन्दर जोबन रूप जो बसुधा में न समाइ।

दृग तारन तिल बिच तिन्हैं नेही धारत लुकाइ।

4. मन गयंद छबि सद छके तोर जँजीरन जात।

हित के झीने तार सों सहजै ही बँधि जात।

5. उड़ो फिरत जो तृणसम जहाँ तहाँ बेकाम।

ऐसे हरुए कौ धारयो कहा जान मन नाम।

6. अद्भुत गति यह प्रेम की लखो सनेही आइ।

जुरै कहूँ , टूटै कहूँ , कहूँ गाँठ परि जाइ।

7. कहनावत मैं यह सुनी पोषत तन को नेह।

नेह लगाये अब लगी सूखन सगरी देह।

8. यह बूझन को नैन ये लग लग कानन जात।

काहू के मुख तुम सुनी पिय आवन की बात।

9. जेहि मग दौरत निरदई तेरे नैन कजाक

तेहि मग फिरत सनेहिया किये गरेबाँ चाक

10. लेउ न मजनूँ गोर ढिग कोऊ लैला नाम।

दरदवंत को नेक तौ लैन देउ बिसराम।

इन पद्यों में से छठे दोहे का उत्तारार्ध्द अक्षरश: बिहारीलाल के दोहे से ग्रहण कर लिया गया है। नौवें दोहे में ‘गरेबाँ चाक’बिलकुल परसी का मुहावरा है। दसवें दोहे में लैला मजनूँ मुस्लिम संसार के प्रेमी और प्रेमिका हैं, जिनकी चर्चा कवि ने अपनी रचना में की है। ब्रजभाषा के नियमों का भी इन्होंने कहीं-कहीं त्याग किया है। चौथे दोहे के ‘तोर’ पाँचवें दोहे के ‘जान’और आठवें दोहे के ‘लग लग’ शब्दों के अन्तिम अक्षरों की ब्रजभाषा के नियमानुसार इकार युक्त होना चाहिए। कवि ने ऐसा नहीं किया। दसवें दोहे का ‘दरदवंत’ शब्द भी इन्होंने गढ़ लिया है। ‘दरद’ परसी शब्द है और ‘वंत’ संस्कृत प्रत्यय है इन दोनों को मिलाकर जो कर्तृवाचक संज्ञा बनाई गई वह उनकी निरंकुशता है। इस प्रकार की शब्द-रचना युक्ति-संगत नहीं। उनकी रचना में इस तरह की बातें अधिकतर पाई जाती हैं। फिर भी वह आदरणीय कही जा सकती हैं।

इस शताब्दी के नीतिकार कवि, वृन्द, बैताल, गिरधार कविराय और घाघ हैं। इनकी रचनाओं ने हिन्दी संसार में नूतनता उत्पन्न की है, अच्छे-अच्छे उपदेशों और हितकर वाक्यों से उसे अलंकृत किया है। इसलिए मैं इन लोगों के विषय में भी कुछ लिख देना आवश्यक समझता हूँ। इस उद्देश्य से भी इन लोगों के विषय में कुछ लिखने की आवश्यकता है, जिससे यह प्रकट हो सके कि अठारहवीं शताब्दी में कुछ ऐसे नीतिकार कवि भी हुए जिन्होंने अपना स्वतन्त्रा पथ रक्खा, फिर भी उनकी रचना में ब्रजभाषा का पुट पाया जाता है। समाज के लिए नीति सम्बन्धी शिक्षा की भी यथासमय आवश्यकता होती है। इन कवियों ने इस बात को समझा और साहित्य के इस अंग की पूर्ति की, इसलिए भी उनकी चर्चा यहाँ आवश्यक है।

वृन्द औरंगजेब के दरबारी कवि थे। यह देखा जाता है कि अकबर के समय से ही मुगल सम्राटों के दरबार में कुछ हिन्दी कवियों का सम्मान होता आया है। अकबर के बाद जहाँगीर और शाहजहाँ के दरबारों में भी हिन्दी-सत्कवि मौजूद थे। इसी सूत्रा से औरंगजेब के दरबार में भी वृन्द का सम्मान था। औरंगजेब के पौत्र अजीमुश्शान ने ब्रजभाषा और उर्दू दोनों में अच्छी रचनाएँ की हैं। वृन्द प्राय: उन्हीं के साथ रहते थे। अजीमुश्शान बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा का सूबेदार था। वह ढाके में रहता था और वृन्द को भी अपने साथ ही रखता था। बिहारीलाल ने यदि शृंगार रस की सतसई बनाई तो वृन्द ने नीति सम्बन्धी विषयों पर सतसई की रचना कर ब्रजभाषा को एक उपयोगी उपहार अर्पण किया। कहा जाता है कि वृन्द संस्कृत और भाषा के विद्वान् थे और गौड़ ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। वे कृष्णगढ़ के राजा राजसिंह के गुरु थे; मारवाड़ प्रान्त उनका जन्म स्थान था। वृन्द के तीन ग्रन्थ बतलाये जाते हैं, ‘शृंगार शिक्षा’, ‘भाव-पंचाशिका’ और ‘वृन्द सतसई’। प्रधानता वृन्दसतसई को ही प्राप्त है, यही उनका प्रसिध्द ग्रन्थ है। उनकी रचनाएँ सरस एवं भावमयी हैं और कोमल शब्दों में की गई हैं। उनका वाच्यार्थ प्रा)ल है और कथन-शैली मनोहर। उपयोगिता की दृष्टि से वृन्द सतसई आदरणीय ग्रन्थ है, उसका यथेष्ट सम्मान हुआ भी। ग्रन्थ की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। नीति विषयक रचना होने पर भी वह कवितागत विशेषताओं से रहित नहीं है। कुछ पद्य देखिए-

1. जो कुछ वेद पुरान कही

सुन लीनी सबै जुग कान पसारे।

लोकहुँ में यह ख्यात प्रथा छिन में

खल कोटि अनेकन तारे।

वृन्द कहै गहि मौन रहे किमि हां

हठि कै बहु बार पुकारे।

बाहर ही के नहीं सुनौ हे हरि

भीतर हूँ ते अहौ तुम कारे।

2. जो जाको गुन जानही सो तेहिं आदर देत।

कोकिल अंबहि लेत है काग निबौरी हेत।

3. ओछे नर की प्रीति की दीनी रीति बताय।

जैसे छीलर ताल जल घटत घटत घटि जाय।

4. करिये सुख को होत दुख यह कहु कौन सयान।

वा सोने कौ जारिये जासों टूटै कान।

5. भले बुरे सब एक सों जौ लौं बोलत नाहिं।

जानि परत हैं काक पिक ऋतु बसंत के माहिं।

इनके दोहों में विशेषता यह है कि प्रथमार्ध्द में जो विषय कहा गया है उत्तारार्ध्द में दृष्टान्त देकर उसी को पुष्ट किया गया है। यह दृष्टान्तालंकार का रूप है। इस प्रणाली के ग्रहण से उन्होंने जो बात कही है उसको अधिक पुष्टि प्राप्त हो गई है और इसी से इनकी सतसई की उपयोगिता बहुत बढ़ गई है। वृन्द पहले कवि हैं जिन्होंने इस मार्ग को ग्रहण कर पूरी सफलता लाभ की। स्फुट श्लोक और दोहे इस प्रकार के मिलते हैं, परन्तु ऐसे सात सौ दोहों का एक ग्रन्थ निर्माण कर देना वृन्द का ही काम था। इस दृष्टि से ब्रजभाषा साहित्य में उनका विशेष स्थान है।

नीति विषयक रचनाओं में वृन्द के बाद बैताल का ही स्थान है। वे जाति के बंदीजन थे और चरखारी के राजा विक्रमशाह के दरबार में रहते थे। उनका कोई ग्रन्थ नहीं है। परन्तु स्फुट छप्पय अधिक मिलते हैं जो नीति-सम्बन्धी हैं। उनकी मुख्य भाषा ब्रजभाषा है, परन्तु वे शब्द-विन्यास में अधिक स्वतंत्रा हैं। कभी ग्रामीण शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं, कभी बैसवाड़ी और अवधी का। उनकी भाषा चलती और प्रा)ल अवश्य है। भाव-प्रकाशन-शैली भी सुन्दर है, यद्यपि उसमें कहीं-कहीं उच्छृंखलता पाई जाती है। वे इच्छानुसार शब्द और मुहावरे भी गढ़ लेते हैं, परसी और श्रुति-कटु शब्द का प्रयोग भी ऐसे ढú से करते हैं जिससे भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार नहीं पाया जाता। रोचकता उनकी रचना में है, साथ ही कटुता भी। कुछ पद्य उनके देखिए-

1. दया चट्ट ह्नै गई धारम धाँसि गयो धारन में

पुन्न गयो पाताल पाप भयो बरन बरन में।

राजा करै न न्याय प्रजा की होत खुआरी

घर घर में बेपीर दुखित भे सब नर-नारी।

अब उलटि दानगजपति मँगै सील सँतोष कितै गयो।

बैताल कहै बिक्रम सुनो यह कलियुग परगट भयो।

2. ससि बिनु सूनी रैनि ज्ञान बिनु हिरदय सूनो।

कुल सूनो बिन पुत्र पत्रा बिनु तरुवर सूनो।

गज सूनो इक दंत ललित बिनु सायर सूनो।

बिप्र सून बिनु बेद और बन पुहुप बिहूनो

हरि नाम भजन बिनु संत अरु घटा सून बिनु दामिनी।

बैताल कहै विक्रम सुनो पति बिनु सूनी कामिनी

3. बुधि बिनु करै बेपार दृष्टि बिनु नाव चलावै।

सुर बिन गावै गीत अर्थ बिनु नाच नचावै।

गुन बिन जाय बिदेस अकल बिन चतुर कहावै।

बल बिन बाँधो जुध्द हौस बिन हेत जनावै।

अन इच्छा इच्छा करे अन दीठी बाताँ कहै।

बैताल कहै बिक्रम सुनो यह मूरख की जात है

4. पग बिन कटे न पन्थ बाहु बिन हटे न दुर्जन।

तप बिन मिलै न राज्य भाग्य बिन मिलै न सज्जन।

गुरु बिन मिलै न ज्ञान द्रव्य बिन मिलै न आदर।

बिना पुरुष शृंगार मेघ बिन कैसे दादुर।

बैताल कहै बिक्रम सुनो बोल बोल बोली हटे।

धिक्क धिक्क ता पुरुष को मन मिलाइ अन्तर कटे

चिद्दित शब्दों और वाक्यों को देखिए। उनसे ज्ञात हो जावेगा कि जो दोष मैंने उनकी रचना में बतलाये हैं, वे सब उनमें विद्यमान हैं। फिर भी उपयोगिता-दृष्टि से बैताल की रचना सम्मान योग्य है।

गिरधार कविराय इस शताब्दी के तीसरे नीतिकार हैं। इन्होंने अपनी प्रत्येक कुंडलियों के अन्त में अपने को गिरधार कविराय लिखकर प्रकट किया है। कविराय शब्द यह बतलाता है कि वे जाति के ब्रह्मभट्ट थे। किसी दरबार से इनका सम्बन्धा नहीं पाया जाता। यदि हो भी तो इस विषय में कहीं कुछ लिखा नहीं मिलता। जिस भाषा में उन्होंने अपनी रचनाएँ की हैं, उससे ये अवधा प्रान्त के मालूम होते हैं। इनकी भाषा में खड़ी बोली, अवधी (बैसवाड़ी) और ब्रजभाषा तीनों का मेल है। भाषा का झुकाव अधिकतर अवधी की ओर है। ये अनगढ़ और भद्दे शब्दों का प्रयोग भी कर जाते हैं, जिससे भाषा प्राय: कलुषित हो जाती हैं। ये सब दोष होने पर भी इनमें सीधो-सादे शब्दों में यथार्थ बात कहने का अनुराग पाया जाता है, जो गुण है। इसी से इनकी रचनाएँ अधिकतर प्रचलित भी हैं। इस कवि का उद्देश्य जनता में नीति-सम्बन्धी बातों का प्रचार करना ज्ञात होता है। इसलिए उसने ठेठ ग्रामीण शब्दों के प्रयोग करने में भी संकोच नहीं किया। इनका कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। स्फुट रचनाएँ ही पायी जाती हैं जो कुछ लोगों के कण्ठ से सुनी जाती हैं। जो पठित नहीं हैं उनके मुख से भी कभी-कभी कविराय जी की कुंडलियाँ सुन पड़ती हैं। इससे उनकी रचना की व्यापकता प्रकट होती है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि सन्तों की बानियों के समान उनकी रचना में भी साहित्यिकता नहीं मिलती, किन्तु यह सत्य है कि उनका शब्द-विन्यास संयत नहीं। ये ऊटपटाँग बातें नहीं कहते, परन्तु ऊटपटाँग शब्दों से अवश्य काम लेते हैं। उनके कुछ पद्य देखिए और उन शब्दों और वाक्यों पर भी विचार-दृष्टि डालते जाइए जो चिद्दित हैं-

1. रहिये लटपट काटि दिन बरु घामे माँ सोय

छाँह न वाकी बैठिये जो तरु पतरो होय

जो तरु पतरो होय एक दिन धोखा दैहै

जा दिन बहै बयारि टूटि तब जर से जैहै

कह गिरधार कविराय छाँह मोटे की गहिये।

पाता सब झरि जाय तऊ छाया में रहिये।

2. साई घोड़े आछतहिं गदहन पायो राज।

कौआ लीजे हाथ में दूरि कीजिये बाज।

दूरि कीजिये बाज राज पुनि ऐसो आयो।

सिंह कीजिये कैद स्यार गजराज चढ़ायो।

कह गिरधार कविराय जहाँ यह बूझि बड़ाई।

तहाँ न कीजे भोर साँझ उठि चलिये साँई।

3. साँई बेटा बाप के बिगरे भयो अकाज।

हरिनाकस अरु कंस को गयउ दुँहुन को राज।

गयउ दुहुँन को राज बाप बेटा में बिगरे।

दुसमन दावादार भये महिमंडल सिगरे।

कह गिरिधार कविराय युगन याही चलि आई।

पिता पुत्र के बैर नफा कहु कौने पाई।

4. बेटा बिगरे बाप सों करि तिरियन सों नेहु।

लटापटी होने लगी मोहिं जुदा करि देहु।

मोहि जुदा करि देहु घरी माँ माया मेरी।

लैहौं घर अरु द्वार करौं मैं फजिहत तेरी।

कह गिधिर कविराय सुनो गदहा के लेटा।

समै परयो है आय बाप से झगरत बेटा।

इनकी दो सरस रचनाएँ भी सुनिये-

5. पानी बाढ़ो नाव में घर में बाढ़ो दाम।

दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम।

यही सयानो काम राम को सुमिरन कीजै।

परस्वारथ के काज सीस आगे धारि दीजै।

कह गिरिधार कबिराय बड़ेन की याही बानी।

चलिये चाल सुचाल राखिये अपनो पानी।

6. गुन के गाहक सहस नर बिनु गुन लहै न कोय

जैसे कागा कोकिला सब्द सुनै सब कोय।

सब्द सुनै सब कोय कोकिला सबै सुहावन।

दोऊ को एक रंग काग सब भये अपावन।

कह गिरिधार कविराय सुनौ हो ठाकुर मन के।

बिनु गुन लहै न कोय सरस नर गाहक गुन के।

इनकी एक शृंगार रस की रचना भी सुनिये-

7. सोना लादन पिय गये सूना करि गये देस।

सोना मिला न पिय मिले रूपा ह्नै गये केस।

रूपा ह्नै गये केस रोय रँग रूप गँवाया

सेजन को बिसराम पिया बिन कबहुँ न पाया

कह गिरिधार कविराय लोन बिन सबै अलोना।

बहुरि पिया घर आउ कहा करिहौं लै सोना।

इनके किसी किसी पद्य में साँईं शब्द मिलता है। यह किंवदन्ती है कि जिन कुंडलियों में साँईं शब्द आता है वे उनकी स्त्री की बनाई हुई हैं। सम्भव है कि ऐसा हो। परन्तु निश्चित रूप से कोई बात नहीं कही जा सकती। जो दो सरस पद्य मैंने ऊपर लिखे हैं और एक पद्य जो शृंगार रस का लिखा गया है, उनसे कवि का सरस हृदय होना स्पष्ट है। शृंगार रस के पद्य में कितनी भावुकता है! इसका वाच्यार्थ कितना साफ है। मेरी सम्मति है कि गिरिधार कविराय वास्तव में कवि-हृदय थे। हाँ, कुछ पद्यों में वे असंयत शब्द-प्रयोग करते देखे जाते हैं। इसका कारण पद्य गत विषय के यथार्थ चित्राण की चेष्टा है। प्रमाणस्वरूप चौथे पद्य को देखिए। शिष्टता की दृष्टि से उसमें असंयत-भाषिता अवश्य है। परन्तु विषयानुसार वह बुरा नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टि से अपने इस प्रकार के प्रयोगों के विषय में वे इस योग्य नहीं कि उन पर कटाक्ष किया जाय। उनकी भाषा में भी अधिकतर अवधी और ब्रजभाषा के ही शब्द आते हैं। अन्य भाषा के या ग्रामीण शब्द जो यत्रा-तत्रा आ गये हैं, उनके लिए केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वे यदि और अधिक संयत होते तो अच्छा था। कुछ लोगों की सम्मति है कि बैताल की भाषा इनकी भाषा से अच्छी है। निस्संदेह, शब्द-विन्यास में बैताल उनसे अधिक संयत हैं। परन्तु दोनों के हृदय में अंतर है। वे असरस हृदय हैं और ये सरस-हृदय।

घाघ कौन थे, किस जाति के थे, यह नहीं कहा जा सकता। उनका नाम भी विचित्र है। उससे भी उनके विषय में कुछ अनुमान नहीं किया जा सकता। कुछ लोग कहते हैं, वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे, वे जो हों, परन्तु उनके अनुभवी पुरुष होने में सन्देह नहीं। उन्होंने जितनी बातें कही हैं, वे सब नपी-तुली हैं और उनमें समाज के मानसिक भावों का अनेक स्थल पर सुन्दर चित्रा है। उन्होंने ऋतुओं के परिवर्तन और कृषि आदि के विषय में कुछ बातें ऐसी कही हैं जिनसे समय-ज्ञान पर उनका अच्छा अधिकार पाया जाता है। कैसी हवा बहने पर कितनी वृष्टि होने की आशा होती है, वर्षा के किन नक्षत्रों का क्या प्रभाव होता है, और किस नक्षत्रा में कृषिकार्य किस प्रकार करने से क्या फल होगा, इन सब बातों को उन्होंने बड़े अनुभव के साथ कहा है। भाषा उनकी ग्रामीण है और उसमें अवधी एवं बैसवाड़ी का मिश्रण पाया जाता है, उसमें ग्रामीणों की बोलचाल और मुहावरों का भी बहुत सुंदर व्यवहार है। उनके कथन में प्रवाह है और भाषा उनकी चलती है। कुछ रचनाएँ तो उनकी ऐसी हैं जो समाज के हृदय का दर्पण हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं का युक्त प्रान्त के पूर्वी भाग में अधिक प्रचार है। प्रचार ही नहीं,उसके अनुसार लोग किसानी का काम करने में ही सफलता की आशा करते हैं। मूर्ख किसानों को भी उनकी रचनाओं को पढ़ते और उनके अनुसार कार्य करते देखा जाता है। नीति और लौकिक व्यवहार-सम्बन्धी बातें भी उन्होंने अधिकता से कही हैं। उनकी रचना की विशेषता यह है कि जिस भाषा में उन्होंने रचना की है उस पर उनका पूरा अधिक ज्ञात होता है। उनकी दृष्टि इस ओर भी पाई जाती है कि उसमें सरलता और स्वाभाविकता की न्यूनता न हो। उनके कुछ पद्य देखिए-

1. भुइयाँ खेड़े हर होइ चार।

घर होइ गिहिथिन गऊ दुधार।

रहर दाल जड़हन का भात।

गागल निबुआ औ घिउ तात।

2. सहरस खंड दही जो होइ।

बाँके नैन परोसै जोइ।

कहै घाघ तब सबही झूठा।

उहाँ छाड़ि इहँवैं बैकुंठा।

3. नसकट खटिया दुलकन घोड़।

कहै घाघ यह बिपति क ओर।

बाछा बैल पतुरिया जोय।

ना घर रहै न खेती होय।

4. बनियाँ क सखरज ठकुर क हीन।

बैद क पूत रोग नहिं चीन्ह।

पंडित चुप चुप बेसवा मइल।

कहै घाघ पाँचों घर गइल।

5. माघ क ऊषम जेठ क जाड़।

पहिले बरषे भरि गये गाड़।

कहै घाघ हम होब बियोगी।

कुऑं खोदि कै धोइहैं धोबी।

6. मुये चाम से चाम कटावै।

सकरी भुइँ महँ सोवै।

कहै घाघ ये तीनों भकुआ।

उढ़रि गये पर रोवै।

7. गया पेड़ जब बकुला बैठा।

गया गेह जब मुड़िया पैठा।

गया राज जहँ राजा लोभी।

गया खेत जहँ जामी गोभी।

8. नीचे ओद उपर बदराई।

कहै घाघ तब गेरुई खाई।

पछिवाँ हवा ओसावै जोई।

घाघ कहै घुन कबहुँ न होई।

घाघ की रचनाएँ ग्रामीण भाषा में होने के कारण प्राय: हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने उनकी उपेक्षा की है। परन्तु मैं समझता हूँ कि ऐसा करना उचित नहीं। घाघ ने जिस भाषा में अपनी रचना की है वह हिन्दी ही है और वास्तव में बोल-चाल की भाषा है। साथ ही उनकी उक्तियाँ उपयोगिनी हैं। इसलिए उनकी रचना का महत्तव कम नहीं। जिस समय ब्रजभाषा और अवधी में रचना हो रही थी, उस समय एक ग्रामीण भाषा की रचना लेकर घाघ का सामने आना साहस का काम था। उनका यह साहस प्रशंसनीय है, निन्दनीय नहीं। विषय की दृष्टि से भी उनकी रचना कम आदरणीय नहीं। उनकी रचनाओं में वह अनुभव भरा हुआ है, जिसका ज्ञान सबके लिए समान हितकारक है।

इन्हीं नीतिकार कवियों के साथ ‘प्रीतम’ कवि की चर्चा भी उचित जान पड़ती है। इनका असली नाम मुहिब्ब खाँ था। ये आगरे के रहने वाले थे। इन्होंने ‘खटमल बाईसी’ नामक एक छोटे से ग्रन्थ की रचना की है, जिसमें बाईस कवित्ता हास्य रस के हैं। शायद यही हिन्दी संसार का एक ऐसा कवि है जिसने एक रस पर इतनी थोड़ी रचना करके बहुत कुछ प्रसिध्दि प्राप्त की,चर्चा होने पर प्रीतम को हिन्दी-संसार का प्रत्येक सहृदय कवि प्रीति के साथ स्मरण करता है और उनकी रचनाओं को पढ़कर खिलखिला उठता है। उनकी रचना सरस है और साहित्यिक ब्रजभाषा में लिखी गई है। जिसमें प्रतिभा छलकती है। और वह चमत्कार दृष्टिगत होता है जो हास्य रस का चित्रा सामने खड़ा कर देता है। दो पद्य देखिए-

1. जगत के कारन करन चारों वेदन के

कमल में बसे वै सुजान ज्ञान धारिकै।

पोषन अवनि दुख सोषन तिलोकन के

समुद में जाय सोये सेस सेज करिकै।

मदन जरायो जो सँहारैं दृष्टि ही में सृष्टि

बसे हैं पहार बेऊ भाजि हरिबरिकै।

बिधि हरि हर और इनसे न कोऊ

तेऊ खाट पर न सोवैं खटमलन सों डरिकै।

2. बाघन पै गयो देखि बनन मैं रहैं छकि

साँपन पै गयो ते पताल ठौर पाई है।

गजन पै गयो धूलि डारत हैं सीस पर

वैदन पै गयो काहू दारू ना बताई है।

जब हहराय हम हरि के निकट गये

हरि मों सों कही तेरी मति भूल छाई है।

कोऊ ना उपाय भटकति जिन डोलै सुन

खाट के नगर खटमल की दोहाई है।

इस शताब्दी में तीन प्रसिध्द प्रबन्धकार भी हुए हैं। एक सूदन, दूसरे ब्रजवासीदास और तीसरे मधुसूदनदास। सूदन माथुर ब्राह्मण थे और भरतपुर के राजा सूरजमल के यहाँ रहते थे। भूषण और गोरेलाल के उपरान्त हिन्दी-संसार के वीर रस के अन्यतम प्रसिध्द कवि सूदन ही हैं। इनका सुजान-चरित्रा बड़ा विशद ग्रन्थ है, इसमें उन्होंने सूरजमल के अनेक युध्दों का वर्णन बड़ी ही ओजपूर्ण भाषा में किया है। इस ग्रन्थ की भाषा खड़ी बोलचाल मिश्रित ब्रजभाषा है। इसमें उनकी पंजाबी भाषा की कुछ रचनाएँ भी मिलती हैं। इसका कारण यह है कि प्रसंगवश जब किसी पंजाबी से कुछ कहलाना पड़ा है तब उसको उससे उन्होंने पंजाबी भाषा में ही कहलाया है, इसलिए उनकी कृति में पंजाबी शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। किन्तु उनकी संख्या थोड़ी है। अपने इस एक ग्रन्थ के कारण ही हिन्दी-संसार में सूदन को वीररस के कवियों में एक विशेष स्थान प्राप्त है। इनके ग्रन्थ में नाना छन्द हैं, उनमें कवित्ताों की संख्या भी पर्याप्त है। दशम ग्रन्थ साहब में वीर रस के जैसे ‘तागिड़दं तीरं’ इत्यादि छन्द लिखे गये हैं उसी प्रकार और उसी ढंग के कितने छंद इस ग्रन्थ में भी हैं। कुछ पद्य नीचे लिखे जाते हैं-

1. एकै एक सरस अनेक जे निहारे तन

भारे लाज भारे स्वामि काज प्रतिपाल के।

चंग लौं उड़ायो जिन दिली की वजीर भीर

मारी बहु मीरन किये हैं बेहवाल के।

सिंह बदनेस के सपूत श्री सुजान सिंह

सिंह लौं झपटि नख दीन्हें करवाल के।

वेई पठनेटे सेल सांगन खखेटे

भूरि धूरि सों लपेटे लेटे भेंटे महाकाल के।

2. सेलन धाकेला ते पठान मुख मैला होत

केते भट मेला हैं भजाये भ्रुव भंग मैं।

तंग के कसेते तुरकानी सब तंग कीनी

दंग कीनी दिली और दुहाई देत बंग मैं।

सूदन सराहत सुजान किरवान गहि

धायो धीर धारि बीरताई की उमंग मैं।

दक्खिनी पछेला करि खेला तैं अजब खेल

हेला मारि गंग मैं रुहेला मारे जंग मैं।

3. बंगन के लाज मऊ खेत की अवाज यह

सुने व्रजराज ते पठान वीर बबके।

भाई अहमद खान सरन निदान जानि

आयो मनसूर तौ रहै न अब दब के।

चलना मुझे तो उठ खड़ा होना देर क्या है

बार बार कहेते दराज सीने सब के।

चण्ड भुज दण्ड बारे हयन उदण्ड वारे

कारे कारे डोलनि सवारे होत रब के।

एक पद्य इनका और सुनिए, जिसमें श्रीमती पार्वती अपने घर का विचित्र हाल वर्णन कर रही है-

आप विष चाखै भैया षट मुख राखै

देखि आसन मैं राखै बसवास जाको अचलै।

भूतन के छैया आस पास के रखैया

और काली के नथैया हूँ के धयान हूँ ते न चलै।

बैल बाघ वाहन वसन को गयन्द खाल

भाँग को धातूरे को पसारि देत ऍंचलै।

घर को हवाल यहै संकर की बाल कहै

लाज रहै कैसे पूत मोदक को मचलै।

सूदन की रचना की विशेषता यही है कि उन्होंने प्रौढ़ भाषा में वीर रस का एक उल्लेखनीय ग्रन्थ लिखा। ये ब्रजभूमि के ही निवासी थे और ब्रजराज कहलाने वाले राज-दरबार में रहते थे इसलिए वे अपने ग्रन्थ को साहित्यिक ब्रजभाषा में ही लिख सकते थे। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। अनेक भाषाओं पर अपना अधिकार प्रकट करने के लिए पंजाबी और खड़ी बोली के वाक्य और शब्द भी उसमें मिलाये। ऐसा करने से उनकी अनेक भाषा-भिज्ञता तो प्रकट हुई परन्तु ब्रजभाषा की साहित्यिकता सुरक्षित न रह सकी। उनकी ब्रजभाषा उतनी प्रौढ़ नहीं है जितनी उसे होना चाहिए था। फिर भी सुजान-चरित्रा में उसका बड़ा सुन्दर साहित्यिक रूप कहीं-कहीं दृष्टिगत होता है, जिससे उनका कवि-कर्म अपनी महत्ता बनाये रखता है।

ब्रजवासी दास अपने ‘ब्रजविलास’ के कारण बहुत प्रसिध्द हैं। ये जाति के ब्राह्मण और वल्लभ सम्प्रदाय के शिष्य थे। मथुरा या वृन्दावन में इनका निवास था। इन्होंने संस्कृत ‘प्रबोधा चन्द्रोदय’ नाटक का विविधा छन्दों में अनुवाद किया, परन्तु यह ग्रन्थ सर्वसाधारण को उतना प्रिय नहीं हुआ जितना ‘ब्रज-विलास’। ब्रज-विलास की रचना उन्होंने सूरदास के पदों के आधार से की है। वरन् यह कहा जा सकता है कि उनके पदों को, चौपाइयों, दोहाओं, सोरठाओं और विविधा छन्दों में परिणत कर दिया है। ये स्वयं इसको स्वीकार करते हैं। यथा-

भाषा को भाषा करौं छमिये सब अपराधा।

जेहि तेहि विधि हरि गाइये कहत सकल श्रुति साधा।

या मैं कछुक बुध्दि नहिं मेरी।

उक्ति युक्ति सब सूरहिं केरी।

मोते यह अति होत ढिठाई।

करत विष्णु पद की चौपाई।

ब्रजवासी दास का यह महत्तव है कि वे ब्रजविलास की रचना से अपनी प्रतिभा का कोई सम्बन्धा स्वीकार नहीं करते। परन्तु उसमें उनका निजस्व भी देखा जाता है। उन्होंने स्थान-स्थान पर कथाओं को संगठित रूप में इस सरलता के साथ कहा है कि उनमें विशेष मधुरता आ गई है। यह उनकी भावमयी और सरस प्रकृति का ही परिणाम है। उन्होंने गोस्वामी जी का अनुकरण किया है, परन्तु उनकी भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिससे सरसता टपकी पड़ती है। उनके ग्रन्थ का शब्द-विन्यास इतना कोमल है और उसमें कुछ ऐसा आकर्षण मिलता है जो स्वभावतया हृदयों को अपनी ओर खींच लेता है। उनके इस ग्रन्थ का प्रचार भी अधिक है, विशेषकर ब्रजप्रान्त और युक्त-प्रान्त के पश्चिमीय भाग में। ‘प्रबोधा चन्द्रोदय’ का अनुवाद मेरे देखने में नहीं आया। सुना है उसकी भाषा भी ऐसी ही ललित है। मैं उनके कुछ पद्य ब्रजविलास से उठाता हूँ। उनके पढ़ने से आपको यह अनुभव होगा कि उनकी रचना में कितना लालित्य है। चन्द्रमा को देखकर कृष्णचन्द्र मचल गये हैं और उसको लेना चाहते हैं। माता ने एक थाली में जल भरकर चन्द्रमा को उनके पास पकड़ मँगाया। उसी समय का यह वर्णन है। देखिए उसकी मनोहरता और स्वाभाविकता-

लेहु लाल यह चन्द्र मैं लीन्हों निकट बुलाय।

रोवै इतने के लिए तेरी स्याम बलाय

देखहु स्याम निहारि या भाजन में निकट ससि।

करी इती तुम आरि जा कारन सुन्दर सुअन

ताहि देखि मुसुकाइ मनोहर।

बारबार डारत दोऊ कर।

चंदा पकरत जल के माहीं।

आवत कछू हाथ में नाहीं।

तब जल पुट के नीचे देखे।

तहँ चंदा प्रतिबिंब न पेखे।

देखत हँसी सकल व्रज-नारी।

मगन बाल-छबि लखि महतारी।

तबहिं स्याम कछु हँसि मुसकाने।

बहुरो माता सों बिरुझाने।

लउँगौ री या चंदा लउँगौ।

वाहि आपने हाथ गहूँगौ।

यह तो कलमलात जल माहीं।

मेरे कर में आवत नाहीं।

बाहर निकट देखियत नाहीं।

कहौ तो मैं गहि लावौं ताही।

कहत जसोमति सुनहु कन्हाई।

तुअ मुख लखि सकुचत उड़घराई।

तुम तेहि पकरन चहत गुपाला।

ताते ससि भजि गयो पताला।

अब तुमते ससि डरपत भारी।

कहत अहो हरि सरन तुम्हारी।

बिरुझाने सोये दै तारी।

लिय लगाय छतियाँ महतारी।

लै पोढ़ाये सेज पर हरि को जसुमति माय।

अति बिरुझाने आज हरि यह कहि कहि पछिताय

देखिए इस पद्य में बालभाव का अथच माता के प्यार का कितना स्वाभाविक वर्णन है। निस्सन्देह, यह प्रवाह सूर-सागर से आया है। परन्तु उसको अपने ढंग से प्रवाहित कर ब्रजवासीदास ने बहुत कुछ सहृदयता दिखलाई है और यही उनका निजस्व है। जो लोग सूर-सागर में धाँसकर उसका पूर्ण आनन्द लाभ करने के अधिकारी नहीं हैं, उनके लिए ब्रजविलास की रचना है जो सर्वसाधारण के हृदय में चिरकाल से आनन्द रस-धारा बहाती आई है।

मधुसूदनदास माथुर चौबे थे। इन्होंने ‘रामाश्वमेधा’ नामक एक बड़ा मनोहर प्रबन्धा काव्य लिखा है, इसको संस्कृत रामाश्वमेधा का अनुवाद नहीं कह सकते। यह अवश्य है कि उसी के आधार से इस ग्रंथ की रचना हुई है। परन्तु मधुसूदनदास ने अनेक स्थानों पर स्वतंत्रा पथ भी ग्रहण किया है। उनके इस ग्रंथ को हम रामचरितमानस का परिशिष्ट कह सकते हैं। रामाश्वमेधाकार ने रामचरितमानस का ही अनुकरण किया है और उसमें अधिकतर सफलता लाभ की है। उनकी यह रचना कहीं-कहीं रामचरितमानस की भाषा से इतनी मिल जाती है कि वह ठीक गोस्वामीजी की कृति जान पड़ती है। अवधी भाषा ही में यह ग्रंथ लिखा गया है। परन्तु गोस्वामीजी की रचना के समान उसमें भी संस्कृत के तत्सम शब्द अधिक आते हैं। उनकी भाषा को हम परिमार्जित अवधी कह सकते हैं, जिसमें कहीं-कहीं गोस्वामीजी के समान ही ब्रजभाषा का पुट पाया जाता है। इस ग्रंथ का प्रचार बहुत कम हुआ, परन्तु ग्रंथ सुंदर और पठनीय है। इसके कुछ पद्य देखिए-

सिय रघुपति-पद-कंज पुनीता।

प्रथमहिं बंदन करौं सप्रीता।

मृदु मंजुल सुन्दर सब भाँती।

ससि कर सरिस सुभग नखपाँती।

प्रणत कल्पतरु तरु सब ओरा।

दहन अज्ञ तम जन चित चोरा।

त्रिविधा कलुष कुंजर घनघोरा।

जग प्रसिध्द केहरि बरजोरा।

चिंतामणि पारस सुर धोनू।

अधिक कोटि गुन अभिमत देनू।

जन मन मानस रसिक मराला।

सुमिरत भंजन बिपति बिसाला।

इस शताब्दी में निर्गुणवादियों में चरनदास का नाम ही अधिक प्रसिध्द है। उनके बाद उनकी शिष्या सहजोबाई और दयाबाई का नाम लिया जा सकता है। चरनदास जी राजपूताना निवासी थे। कहा जाता है कि उन्नीस वर्ष की अवस्था में उनको वैराग्य हो गया था। वे बाल ब्रह्मचारी थे। उनके शिष्यों की संख्या बावन बतलाई जाती है। उनकी बावन गद्दियाँ अब तक वर्तमान हैं। उनके पंथ वाले चरनदासी कहलाते हैं। उनके दो ग्रन्थ मिलते हैं, एक का नाम है ‘ज्ञान-स्वरोदय’ और दूसरे का’चरनदास की बानी’। दादूदयाल का जो सिध्दान्त था लगभग वही सिध्दान्त उनका भी था। कबीर पंथ की छाया भी उनके पंथ पर पड़ी है। वे भी एक प्रकार से अपठित थे। उनकी भाषा भी संत बानियों की-सी ही है। उसमें किसी भाषा का विशेष रंग नहीं। परन्तु ब्रजभाषा के शब्द उसमें अधिक मिलते हैं और कहीं-कहीं राजस्थानी की झलक भी दृष्टिगत होती है। ‘स्वरोदय’ की रचना जटिल है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्द भी अधिक आये हैं, और वे कहीं-कहीं उसमें अव्यवस्थित रूप में पाये जाते हैं,जिससे भाषा का माधार्ुय्य बहुत कुछ नष्ट हो जाता है। यत्रा-तत्रा छन्दोभंग भी है। उनके कुछ पद्य देखिए और जो चिद्दित शब्द हैं, उन पर विशेष धयान दीजिए-

1. चार वेद का भेद है गीता का है जीव।

चरनदास लखु आपको तोमैं तेरा पीव।

2. मुक्त होय बहुरै नहीं जीव खोज मिटि जाय।

बुंद समुंदर मिलि रहै दुनिया ना ठहराय।

3. सूछम भोजन कीजिये रहिये ना पड़ सोय।

जल थोरा-सा पीजिये बहुत बोल मत खोय।

4. सतगुरु मेरा सूरमा करै शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का ढहै भरम का कोट।

5. धान नगरी धान देस है धान पुर पट्टन गाँव।

जहँ साधु जन उपजियो ताका बल बल जाँव।

6. जग माँही ऐसे रहो ज्यों अंबुज सर माहिं।

रहै नीर के आसरे पै जल छूवै नाहिं।

7. दया नम्रता दीनता छिमा सील संतोष।

इन कहँ लै सुमिरन करै निहचै पावै मोख।

8. चरनदास यों कहत हैं सुनियो संत सुजान।

मुक्ति मूल आधीनता नरक मूल अभिमान।

9. चंद सूर्ज दोउ सम करै ठोढ़ी हिये लगाय।

षट चक्कर को बेधा कर शून्य शिखर को जाय।

10. ब्याह दान तीरथ जो करै। बस्तर भूषण घर पगधारै।

11. दहिने स्वर झाड़े फिरै , बाएँ लघुशंकाय

मुक्ती ऐसी साधिये , दोनों भेद बताय।

सहजोबाई और दयाबाई दोनों चरनदास की शिष्या थीं और दोनों ही ढूसर वंश की थीं। दोनों ही आजन्म उनकी सेवा में रहीं और परमार्थ में ही अपना जीवन व्यतीत किया। इन दोनों की गुरु-भक्ति प्रसिध्द है। इनकी रचनाओं में भी इसकी झलक पायी जाती है। भाषा इन दोनों की ब्रजभाषा है। परंतु निर्गुणवादियों का ढंग भी उसमें पाया जाता है। ये दोनों भी चित्ता की उमंग से ही कविता करती थीं। उनके बोधा पर सत्संग का प्रभाव था, पढ़ी-लिखी वे थीं या नहीं, इस विषय में कहीं कुछ लिखा नहीं मिलता। सहजोबाई ने कोई ग्रन्थ नहीं बनाया। उनकी स्फुट कविताएँ पायी जाती हैं। उनमें से कुछ यहाँ लिखी जाती हैं-

1. निश्चय यह मन डूबता लोभ मोह की धार।

चरनदास सतगुरु मिले सहजो लई उबार।

2. सहजो गुरु दीपक दियो नैना भये अनंत।

आदि अंत मधा एक ही सूझि परै भगवंत।

3. जब चेतै जहँ ही भला मोह नींद सूँ जाग।

साधू की संगति मिलै सहजो ऊँचे भाग।

4. अभिमानी नाहर बड़ो भरमत फिरत उजार।

सहजो नन्ही बाकरी प्यार करै संसार।

5. सीस कान मुख नासिका ऊँचे ऊँचे नाँव।

सहजो नीचे कारने सब कोई पूजे पाँव।

दयाबाई का एक ग्रन्थ है, जिसका नाम है ‘दयाबोधा’। उसके आधार से उनके कुछ पद्य नीचे दिये जाते हैं-

1. बौरी ह्नै चितवत फिरूँ हरि आवैं केहि ओर।

छिन उट्ठू छिन गिर परूँ राम दुखी मन मोर।

2. प्रेम पुंज प्रगटै जहाँ तहाँ प्रगट हरि होय।

दया दया करि देत हैं श्रीहरिदरसन सोय।

3. दया कुँवारि या जगत में नहीं रह्यो थिर कोय।

जैसो बास सराय को तैसो यह जग होय।

4. बड़ो पेट है काल को नेक न कहूँ अघाय।

राजा राना छत्रापति सबकूँ लीले जाय।

5. दुख तजि सुख की चाह नहिं नहिं बैकुंठ विमान।

चरन कमल चित चहत हौं मोहि तुम्हारी आन।

उन्नीसवीं शताब्दी जैसे भारतवर्ष के लिए एक विचित्र शताब्दी है, वैसे ही हिन्दी भाषा के लिए भी। इस शताब्दी में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बड़े-बड़े परिवर्तन जिस प्रकार हुए वैसे ही भाषा सम्बन्धी अनेक लौट-फेर भी हुए। हिन्दी भाषा ही नहीं, भारतवर्ष की समस्त प्रान्तिक भाषाओं का कायाकल्प इसी शताब्दी में हुआ। उर्दू भाषा की नींव अठारहवीं शताब्दी के उत्तारार्धा में पड़ चुकी थी। इस शताब्दी में वह भी खूब फली-फूली। मीर, इंशा, ज़ौव और नासिख़ ऐसे महाकवियों ने उसका लोकोत्तार शृंगार किया। मुसलमान राज्य का वह अंतिम प्रदीप जो दिल्ली में धुँधाली ज्योति धारण कर जल रहा था,उसका निर्वाण इसी शताब्दी में हुआ। जिससे ब्रिटिश सर्य्य अपनी अतुल आभा भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्तों में विस्तार करने में समर्थ हुआ। परिणाम उसका यह हुआ कि नवीन ज्योति के साथ नये-नये भाव एवं बहुत से नूतन विचार देश में फैले और एक नवीन जागृति उत्पन्न हो गयी। इस जागृति ने भारत की वर्तमान सभ्यता में हलचल मचा दी और उसमें नवीन आविष्कारों का उदय हुआ।

राजा राममोहन राय, परमहंस रामकृष्ण, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ ऐसे धर्म संस्कारक,न्यार्यमूत्तिा महादेव गोविन्द रानाडे ऐसे समाज-सुधारक, दादा भाई नौरौजी, लोकमान्य बालगंगाधार तिलक, माननीय गोपालकृष्ण गोखले, बाबू सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी एवं महात्मा गांधी ऐसे राजनीतिक नेता, महर्षि मालवीय जैसे हिन्दू-धर्म के रक्षक, समाज के उन्नायक अथच राजनीति के धुरंधार संचालक इसी शताब्दी में उत्पन्न हुए। ऐसी दशा में यदि साहित्य में नव-स्फूर्ति उत्पन्न और हिन्दी भाषा को भी नवजीवन इस शताब्दी में प्राप्त हो तो कोई आश्चर्य नहीं। क्योंकि साहित्य सामाजिक भावों के विकास का ही परिणाम होता है। साहित्य के लिए अनुकूल भाषा की बड़ी आवश्यकता होती है। यही कारण है कि इस शताब्दी में हिन्दी भाषा ने अपना कलेवर विचित्र रूप से बदला। उसमें यह परिवर्तन इस शताब्दी के उत्तारार्ध्द में हुआ। पूर्वार्ध्द में पूर्वागत परम्परा ही अधिकतर दृष्टिगत होती है, यद्यपि उसमें परिवर्तन के लक्षण प्रकट हो गये थे। मैं क्रमश: परिवर्तन-प्रणाली को आपके सामने उपस्थित करूँगा।

इस शताब्दी में निम्नलिखित प्रसिध्द रीति ग्रंथकार हुए हैं। क्रमश: मैं इनका परिचय आपको दूँगा और यह भी बतलाता चलूँगा कि इनके समय में भाषा का क्या रूप था और उस समय का क्या प्रभाव पड़ा-पदमाकर, ग्वाल, राय रणधीर सिंह,लछिराम, गोविंदगिल्लाभाई, प्रताप शाह।

पदमाकर का कविता-काल अठारहवीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है, किंतु उनकी प्रौढ़ कविता का काल यही शताब्दी है। इसलिए हमने इसी शताब्दी में उनको रक्खा है। हिन्दी-साहित्य-संसार में पदमाकर एक विशेष स्थान के अधिकारी हैं। उनकी रचना में ऐसा प्रवाह है, जो हृदय को रस-सिक्त किये बिना नहीं रहता। शब्द-विन्यास में उन्होंने ऐसी सहृदयता का परिचय दिया है जैसी महाकवियों में ही दृष्टिगत होती है। भाव को मूर्तिमन्त बनाकर सामने लाना उनकी विशेषता है। शब्द में झंकार पैदा करना, उसको भावचित्राण के अनुकूल बना लेना, अपनी उपज से उसमें अनोखे बेल- बूटे तराशना, जिनमें रस छलकता मिले, ऐसी उक्तियों को सामने लाना उनकी रचना के विशेष गुण हैं। अनुप्रास एवं वर्ण मैत्राी उनकी कविता का प्रधान अंग है, किन्तु इस सरसता और निपुणता से वे उसका प्रयोग करते हैं कि उनके कारण से न तो भाषा दब जाती है और न भाव के स्फुटन में व्याघात उपस्थित होता है। जैसे दर्पण में से आभा फूटती है, वैसे ही उनकी वाक्यावली में से भाव विकसित होता रहता है। अलंकार इनकी कृति में आते हैं, किंतु उसे अलंकृत करने के लिए, दुरूह बनाने के लिए नहीं, उनकी भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। उसमें कहीं-कहीं अन्य भाषा के शब्द भी आ जाते हैं, परन्तु वे आभूषण में नग का काम देते हैं। उन्होंने कुछ भाव संस्कृत और भाषा के अन्य कवियों के भी लिये हैं, किन्तु उनको बिलकुल अपना बना लिया है। साथ ही उनमें एक ऐसी मौलिकता उत्पन्न कर दी है, जिससे यह ज्ञात होता है कि वे उन्हीं की सम्पत्तिा हैं।

पदमाकर जी बड़े भाग्यशाली कवि थे। वे उस वंश के रत्न थे जो सर्वदा बड़े-बड़े राजाओं, महाराजाओं द्वारा आदृत होता आया था। जितने राजदरबारों में उनका प्रवेश हुआ और जितने राजाओं-महाराजाओं से उन्हें सम्मान मिला, हिन्दी-संसार के किसी अन्य कवि को वह संख्या प्राप्त नहीं हुई। वे तैलंग ब्राह्मण थे। इसलिए उनकी पूजा कहीं गुरुत्व लाभ करके हुई, कहीं कवि-कर्म्म द्वारा। उनके पूर्व पुरुष भी विद्वान् और कवि थे और उनके पुत्र एवं पौत्र भी। उनके पौत्र गदाधार हिन्दी-संसार के परिचित प्रसिध्द कवि हैं। वे कवि-कर्म्म में तो निपुण थे ही, सम्मान प्राप्त करने में भी बड़े कुशल थे। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है। कहा जाता है कि ‘रामरसायन’ नामक एक राम-चरित्रा सम्बन्धी-प्रबंधा काव्य भी उन्होंने लिखा था। परन्तु उसकी कविता ऐसी नहीं है जैसी उनके जैसे महाकवि की होनी चाहिए। इसलिए कुछ लोगों की यह सम्मति है कि वह ग्रंथ उनका रचा नहीं है। उनका सबसे प्रसिध्द ग्रन्थ जगद्विनोद है, जो हिन्दी भाषा कवि कुल का कण्ठहार है। प्रबोधा पचासा और गंगालहरी भी उनके सुंदर ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों में निर्वेद जैसा मूर्तिमन्त होकर विराजमान है वैसी ही उनमें मर्म-स्पर्शिता भी है। पदमाकर के ग्रंथों की संख्या एक दर्जन से अधिक है, और उन सबों में उनकी प्रतिभा सुविकसित मिलती है। उनमें से कुछ कविताएँ नीचे लिखी जाती हैं-

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