सुन्दरकाण्ड – श्री रामचरितमानस का पञ्चम सोपान

॥ दोहा 49 ॥

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड,जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥(क)।

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ,सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥(ख)॥

॥ चौपाई ॥

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना।ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥

निज जन जानि ताहि अपनावा।प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी।सर्बरूप सब रहित उदासी॥

बोले बचन नीति प्रतिपालक।कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

सुनु कपीस लंकापति बीरा।केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥

संकुल मकर उरग झष जाती।अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥

कह लंकेस सुनहु रघुनायक।कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥

जद्यपि तदपि नीति असि गाई।बिनय करिअ सागर सन जाई॥


॥ दोहा 50 ॥

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि,बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।

॥ चौपाई ॥

सखा कही तुम्ह नीति उपाई।करिअ दैव जौं होइ सहाई॥

मंत्र न यह लछिमन मन भावा।राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

नाथ दैव कर कवन भरोसा।सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥

कादर मन कहुँ एक अधारा।दैव दैव आलसी पुकारा॥

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥

अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।सिंधु समीप गए रघुराई॥

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥

जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।पाछें रावन दूत पठाए॥


॥ दोहा 51 ॥

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह,प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।

॥ चौपाई ॥

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥

रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥

सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

बहु प्रकार मारन कपि लागे।दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥

जो हमार हर नासा काना।तेहि कोसलाधीस कै आना॥

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥

रावन कर दीजहु यह पाती।लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥


॥ दोहा 52 ॥

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार,सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार।

॥ चौपाई ॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा।चले दूत बरनत गुन गाथा॥

कहत राम जसु लंकाँ आए।रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥

बिहसि दसानन पूँछी बाता।कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥

पुन कहु खबरि बिभीषन केरी।जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

करत राज लंका सठ त्यागी।होइहि जव कर कीट अभागी॥

पुनि कहु भालु कीस कटकाई।कठिन काल प्रेरित चलि आई॥

जिन्ह के जीवन कर रखवारा।भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥

कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥


॥ दोहा 53 ॥

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर,कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।

॥ चौपाई ॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥

मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

रावन दूत हमहि सुनि काना।कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥

श्रवन नासिका काटैं लागे।राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥

पूँछिहु नाथ राम कटकाई।बदन कोटि सत बरनि न जाई॥

नाना बरन भालु कपि धारी।बिकटानन बिसाल भयकारी॥

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥

अमित नाम भट कठिन कराला।अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥


॥ दोहा 54 ॥

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि,दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।

॥ चौपाई ॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना।इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥

राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।पदुम अठारह जूथप बंदर॥

नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥

सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥

गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥

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