Contents
टॉम काका की कुटिया-उपन्यास- हैरियट बीचर स्टो अनुवाद – हनुमान प्रसाद पोद्दार -2
16. टॉम का नया मालिक
यहाँ से टॉम के जीवन के इतिहास के साथ और भी कई व्यक्तियों का संबंध आरंभ होता है। अत: उन लोगों का कुछ परिचय देना आवश्यक है।
अगस्टिन सेंटक्लेयर के पिता लुसियाना के एक रईस और जमींदार थे। इनके पूर्वज कनाडा-निवासी थे। अगस्टिन के पिता जन्मभूमि छोड़कर लुसियाना चले आए और वहाँ कुछ जमीन लेकर बहुत से गुलामों से काम लेने लगे और धीरे-धीरे एक अच्छे जमींदार हो गए। अगस्टिन के चाचा वारमंट में जा बसे और वहाँ खेती करने लगे।
अगस्टिन की माता का जन्म हिउग्नो संप्रदाय के एक फ्रांसीसी उपनिवेशी के घर हुआ था। अगस्टिन का शरीर जन्म से ही अपनी माता की भाँति दुर्बल था। वारमंट की जलवायु बड़ी अच्छी समझी जाती थी, इससे बहुत बचपन में ही अगस्टिन को अपने चाचा के यहाँ भेज दिया गया था।
अगस्टिन सेंटक्लेयर में बचपन से ही कोमलता, उदारता और दयालुता के चिह्न स्पष्ट झलकते थे। ज्यों-ज्यों सेंटक्लेयर की उम्र बढ़ती गई, उसके इन गुणों में भी वृद्धि होती गई। उसकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। उदारता और महत्ता उसके हृदय के स्वाभाविक गुण थे। क्षुद्रता और नीचता आदि भाव उसके पास नहीं फटकने पाते थे। काम-काज में उसका मन नहीं लगता था। इससे उसके पिता ने सारे काम का भार अपने दूसरे लड़के अलफ्रेड पर डाल दिया था।
अगस्टिन की विश्वविद्यालय की पढ़ाई शीघ्र ही समाप्त हो गई। फिर उसके जीवन में उस लहर का संचार हुआ, जो एक बार सबके हृदयों को चंचल बना देती है। उस लहर से उसका प्रेमी हृदय नवीन अनुराग से उमड़ उठा, उसके जीवन-सरोवर में नया कमल खिल गया। जो हो, रूपक जाने दीजिए, संक्षेप में सुनिए, क्या बात थी। सेंटक्लेयर एक बुद्धिमती, रूप-गुणशीला रमणी के विशुद्ध प्रेम का पात्र हो गया। दोनों का विवाह तय हो गया। युवक अपने घर बड़े उत्साह से विवाह की तैयारियाँ करने लगा। इसी बीच उसकी प्रेमिका के अभिभावक का पत्र आया। लिखा था:
‘यह पत्र तुम्हारे पास पहुँचने के पहले ही तुम्हारी मनोनीता कुमारी किसी दूसरे की पत्नी हो जाएगी।’
इसी के साथ सेंटक्लेयर के वे सब प्रेम-पत्र भी वापस आए, जो समय-समय पर उसने अपनी प्रेमिका कुमारी को भेजे थे।
इस पत्र को पाकर सेंटक्लेयर दु:ख और आहत अभिमान से पागल-सा हो गया। हृदय की अनिवार्य यंत्रणा के वेग से अधीर होकर उसने निश्चय किया कि अब सारी पिछली बातों को हृदय से एकदम भुला देगा। अदम्य अभिमान के कारण उसने इस बेढंगी कार्रवाई का कारण भी न पूछा। उस पत्र के पाने के दो सप्ताह के भीतर ही उसी नगर के एक धनवान वणिक की अति रूपवती कन्या से उसका विवाह ठीक हो गया। यह संसार एकमात्र खरीद-फरोख्त का बाजार है। विशुद्ध प्रेम और अकृत्रिम परिणय का सौदा इस बाजार में बहुत कम होता है, शायद ही कभी होता हो। अगस्टिन इसका अपवाद न था। उसे लाचार होकर संसार-प्रचलित क्रय-विक्रय की प्रथा का अवलंबन करना पड़ा। देखते-देखते उसका विवाह हो गया। जिस स्त्री से सेंटक्लेयर का विवाह हुआ था, उसकी जमा-पूँजी बस रुपया और सौंदर्य, यही दो चीजें थीं।
विवाह के उपरांत नव-दंपति इष्ट-मित्रों के बीच हँसी-खुशी में दिन बिताने लगे।
किंतु एक महीना भी न होने पाया था कि एक दिन अगस्टिन के नाम एक पत्र आया। पत्र के सिरनामे पर वही परिचित अक्षर थे। पत्र देखकर सेंटक्लेयर का मुँह पीला पड़ गया। काँपते हाथों से उसने पत्र लिया। जिस समय सेंटक्लेयर को पत्र मिला था, उस समय मित्रों से उसका घर भरा हुआ था। वह एक आदमी से हँस-हँसकर बातें कर रहा था। ज्यों-त्यों अपनी बातें समाप्त करके वह चुपके से निकल पड़ा। एकांत में जाकर उसने पत्र खोला। हाय! आज इस पत्र को पढ़ने से ही क्या लाभ है?
वह पत्र सेंटक्लेयर की पूर्व प्रेमिका के पास से आया था। उसे पढ़कर विवाह का पूरा रहस्य मालूम हो गया।
पहले जिस अभिभावक का उल्लेख किया गया है, उस नर-पिशाच ने अपनी अधीनस्थ इस कुमारी को अपने पुत्र के साथ ब्याहने की बड़ी चेष्टा की; पर जब कन्या किसी तरह राजी न हुई तब वह उस पर मनमाने अत्याचार करने लगा। इससे भी जब सफलता न मिली, तो इस दगाबाज ने ऊपरवाली चाल चलकर सेंटक्लेयर से उसका पवित्र नाता तोड़ दिया। इधर सेंटक्लेयर का पत्र न पाने के कारण वह दिन-पर-दिन चिंतित रहने लगी। पत्र पर पत्र लिखे, पर उत्तर न मिला। हजार बार सोचा, पर कोई कारण समझ में नहीं आया। धीरे-धीरे उसके मन में तरह-तरह के संदेह और आशंकाएँ उठने लगीं। इसी सोच में वह दिन-पर-दिन सूखने लगी। अंत में एक दिन उस पापी अभिभावक की शठता उसे मालूम हो गई। वह जान गई कि इस नराधम ने उनके पारस्परिक प्रेम में बाधा डालने की कुचेष्टा की है।
पत्र पढ़कर सेंटक्लेयर को सब बातों का पता चला। पत्र का अंतिम भाग आशापूर्ण वाक्यों और प्रेमोक्तियों से भरा हुआ था। रमणी ने लिखा था- “मैं जीते-जी तुम्हारी ही हूँ।” अभागा युवक उसे पढ़कर छटपटाकर रह गया। उसे मौत से भी अधिक दु:ख हुआ। पर क्या करता! सोचा, अब दु:ख करने से पुरानी बात नहीं लौटती। उसने तुरंत उत्तर दे दिया। लिखा:
“तुम्हारा पत्र मिला, किंतु समय पर नहीं। अब मिलना न मिलना दोनों बराबर है। मुझे जो खबर मिली थी, उसे मैंने सच मान लिया। मैं उस समय पागल-सा हो गया था। मेरा विवाह हो गया। जो कुछ होना था, हो गया। कुछ भी बाकी नहीं रहा। अब सब बातें मन से भुला दो। जो हो गया सो हो गया।”
इस घटना से सेंटक्लेयर का सुख-स्वप्न भंग हो गया। उसका प्रेमी हृदय शुष्क हो गया। उस काल्पनिक सुख-शांति-पूर्ण संसार को कल्पना से बिना कर देने पर सेंटक्लेयर को प्रकृत संसार-पथ का पथिक होना पड़ा। वह कल्पनानुरंजित संसार यथार्थ संसार से कितना भिन्न है, इसका अनुभव उस संसार में प्रवेश किए बिना नहीं हो सकता।
उपन्यासों में प्रणय-निराशा और मृत्यु मानों एक साथ ही डोर में बँधे रहते हैं। ज्यों ही कोई प्रणय से निराश होता है, तुरंत मृत्यु महारानी पहुँचकर उसके भग्न हृदय की दारुण जलन को सदा के लिए ठंडा कर देती है।
परंतु प्रकृत जीवन और उपन्यास में बड़ा भेद है। प्रकृत जीवन में उपन्यास की भाँति मृत्यु इतनी पास नहीं खड़ी रहती। संसार में नित्य कितने ही लोगों का प्रणय टूटता है, पर कितने आदमी हैं, जो उसके लिए प्राण देते हैं? जीवन चारों ओर से दु:खों और यंत्रणाओं से घिर जाता है, सारी आशाओं पर पानी फिर जाता है। हृदय घोर निराशा में डूब जाता है। इतने पर भी मनुष्य नहीं मरता। जैसे समय पर पहले खाता-पीता था, काम करता था, सोता-घूमता था, वैसे ही अब भी सारे-के-सारे काम करता है। अगस्टिन के हृदय को बहुत गहरी चोट लगने पर भी संसार की इसी गति के अनुसार उसे काम करने पड़ते थे। किंतु उसकी पत्नी मेरी योग्य होती तो उसका अंधकारमय जीवन फिर भी प्रकाशमान हो सकता था, पर मेरी की अदूरदर्शी दृष्टि अगस्टिन के हृदय तक न पहुँचती थी। उसने यह बात जानने की कोशिश तक नहीं की कि उस हृदय पर कोई घाव लगा है। हम पहले ही कह आए हैं कि विपुल संपत्ति और रूप-लावण्य के सिवा मेरी में और कोई भी गुण न था। पर इन दोनों में एक भी गुण जी की जलन को ठंडा नहीं कर सकता था, हृदय के घाव को नहीं भर सकता था।
पत्र पाने के बाद अगस्टिन एक निर्जन कमरे में जाकर लेट गया। बड़ी देर के बाद पत्नी ने आकर पूछा – “तुम्हें क्या हो गया है?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मेरा सिरदर्द कर रहा है।”
बुद्धिमती मेरी ने इसी को सच मान लिया, फिर कोई और बात न पूछकर औषधि की व्यवस्था कर दी। किंतु वह सिरदर्द क्या एक दिन का था? उसके बाद अक्सर सेंटक्लेयर को उसी प्रकार सिरदर्द हुआ करता था। जब देखते-देखते कई दिन बीत गए, तब एक दिन मेरी ने कहा – “विवाह के पहले नहीं जानती थी कि तुम ऐसे रोगी हो। मैं देखती हूँ कि तुम्हें तो बराबर ही सिरदर्द हुआ करता है। मेरे फूटे भाग! अभी हाल में हम लोगों का विवाह हुआ है और अभी से मुझे लोगों के घर अकेले घूमने जाना पड़ता है। तुम साथ नहीं जा सकते। मुझे बड़ा नागवार मालूम होता है।”
पत्नी की मोटी बुद्धि देखकर पहले-पहल तो सेंटक्लेयर मन-ही-मन संतुष्ट हुआ, परंतु जब विवाहित जीवन के कुछ आरंभिक दिन बीत गए और आदर-सत्कार का बंधन कुछ ढीला पड़ने लगा, तब सेंटक्लेयर ने देखा कि रूप और गुण दोनों एक साथ नहीं रहते और लावण्य तथा सौंदर्य मनुष्य को अधिक दिनों तक सुख नहीं दे सकते। उनका आनंद शीघ्र ही फीका पड़ जाता है। उसने अनुभव किया कि ऐश्वर्य की गोद में पली हुई और पिता की लाडली सुंदरी से इस जीवन-यात्रा में सुख पाने की कोई संभावना नहीं है। जिसे लोग प्रेम कहते हैं, उस प्रेम की मात्रा मेरी के हृदय में एक तो थी ही बहुत थोड़ी, और जो नाममात्र को थी भी वह तो अपने ही ऊपर थी, दूसरों पर नहीं। मेरी अपने पिता की इकलौटी बेटी थी। पिता के घर नौकर-चाकरों तथा कुटुंबियों पर हुकूमत करती आई थी। उसे जब जिस बात की चाह होती थी, वह तुरंत पूरी होती थी। उसने जब चाहा, वह सुलभ हो या दुर्लभ, पिता ने उसे देकर राजी किया। दास-दासियों पर वह जैसा रौब-दाब रखती थी और दबाव डालती थी, उसका ठिकाना न था। वे बेचारे हर घड़ी मालिक की लड़की को खुश करने की चिंता में लगे रहते थे। कहीं जरा-सी भी भूल हो जाती थी, तो वह उन्हें बड़ा कठोर दंड देती थी। ऐसी दशा में पलकर मेरी का हृदय केवल अहमन्यता और स्वार्थपरता का घर हो गया था। अपने सुख के सिवा उसे और कुछ सुहाता ही न था। अपनी बात के सामने उसे पल भर के लिए भी दूसरे की बात का ध्यान न आता था। साथ ही उसे अपने परम सुंदरी होने का पूरा भान था।
उसका विचार था कि यदि वह असामान्य रूपवती न होती तो लुसियाना प्रदेश के असंख्य नवयुवक उससे विवाह करने के लिए इतनी व्याकुलता क्यों दिखाते? पर मूल कारण कुछ और ही था। असल बात यह थी कि उससे विवाह करने की इच्छा रखनेवाले युवक यह सोचकर उसके आगे शीश झुकाते थे कि जो उससे विवाह करेगा, वही उसके पिता के अपार धन का मालिक होगा। मेरी अपने स्वामी का बड़ा सौभाग्य समझती थी कि उसे उस जैसा स्त्रीरत्न मिला। स्वामी के साथ व्यवहार में भी उसका यह आंतरिक विश्वास पग-पग पर झलकता था। कभी-कभी वह बातों-बातों, में बड़े साफ शब्दों में, स्वामी से यह कह भी डालती थी।
ऐसी स्त्री के साथ रहकर गृहस्थी चलाना सेंटक्लेयर के लिए बड़ा कठिन हो गया। एक ओर तो वह अपनी पूर्व प्रेमिका को अपने हाथों दिए आघात का स्मरण करके दु:खी हो रहा था, अपने को मन-ही-मन बराबर धिक्कारता था और दूसरी ओर इसी समय श्रीमती मेरी महारानी के वचन-बाण उसके हृदय को बेंधते थे। इससे वह प्राय: काम का बहाना करके घर से चला जाया करता था। पर ऐसी स्वार्थ-परायण स्त्री सदा स्वामी के अंदर का सारा प्रेम सोखने की इच्छा किया करती है। जो स्त्री स्वामी को प्यार करना नहीं जानती, वह उतना ही अधिक स्वामी का प्रेम चाहती है। अत: सेंटक्लेयर को घर से भागकर भी छुटकारा नहीं मिलता था।
विवाह के एक साल बाद मेरी को एक कन्या हुई। इस कन्या का मुख-कमल देखते ही दयालु सेंटक्लेयर का हृदय गंभीर संतान-वात्सल्य से भर गया। वह कन्या ज्यों-ज्यों बढ़ने लगी, सेंटक्लेयर का प्रेम भी उस पर बढ़ता गया। किंतु सेंटक्लेयर का इस कन्या को प्राणों से अधिक प्यार करना उसकी स्त्री मेरी को असह्य हो गया! वह मन-ही-मन विचार करने लगी कि सेंटक्लेयर के हृदय में एक तो यों ही प्रेम नहीं है, फिर मुश्किल से जो थोड़ा बहुत था भी, सो वह इस कन्या ने ले लिया। मैं तो अब स्वामी के प्रेम से बिल्कुल ही खाली रह गई। यह सब सोचकर वह कन्या का जैसा चाहिए, वैसा लालन-पालन नहीं करती थी। कन्या के जन्म लेने के उपरांत मेरी को प्राय: सिरदर्द बना रहता था। वह सदा पलंग पर पड़ी रहती थी। कन्या के पालन-पोषण का भार दास-दासियों के जिम्मे कर दिया गया। बीच-बीच में सेंटक्लेयर स्वयं उसको सँभाल लिया करता था।
चार-पाँच वर्ष की हो जाने पर बालिका के प्रत्येक कार्य और आचरण से विशेष दया, स्नेह और ममता का भाव प्रकट होने लगा। सेंटक्लेयर ने कन्या की ऐसी कोमल प्रकृति और सहृदयता देखकर अपनी माता के नाम पर उसका नामकरण किया। सेंटक्लेयर की जननी बड़ी दयालु थी। दूसरे का जरा भी दु:ख देखकर उसका हृदय भर आता था। अगस्टिन अपनी माता पर असीम श्रद्धा और भक्ति रखता था। उसकी माता का नाम इवान्जेलिन था। इससे उसने अपनी कन्या का भी वही नाम रखा।
इधर मेरी की हालत सुनिए। उसे नित्य एक नया मन गढ़ंत रोग होने लगा। दिन भर अलहदी की तरह पलंग पर पड़े-पड़े शरीर में पीड़ा होने लगती थी और वह सोचती थी कि उसे कोई नया रोग हो गया है। उन रोगों की चिकित्सा और सेवा उसकी इच्छा के अनुकूल नहीं होती, इसकी उसे सदा ही शिकायत बनी रहती और इसके लिए वह सदैव स्वामी पर चिड़चिड़ाया करती। कभी-कभी अभिमान के वशीभूत होकर रोने लगती और कभी अपने भाग्य को कोसती। वह अपने मन में इसे केवल विधि की विडंबना ही समझती थी कि जो उसकी-सी रूपवती, गुणवती, पुण्यवती और बुद्धिमती नारी को ऐसी दुरवस्था में पड़ना पड़ा। कभी-कभी तो ऐसा होता था कि किसी-किसी मनोकल्पित रोग के कारण वह लगातार तीन-तीन, चार-चार दिन तब बिस्तर न छोड़ती थी। इसलिए घर का सब काम दास-दासियों के ही भरोसे था। इसके सिवा इवा का भी लालन-पालन अच्छी तरह न होने के कारण वह भी कुछ दुबली हो गई थी। यह देखकर सेंटक्लेयर घर के प्रबंध एवं इवा के लालन-पालन के लिए वारमंट से अपने चाचा की लड़की मिस अफिलिया को लाने के लिए वारमंट रवाना हो गया। जहाज में सेंटक्लेयर के साथ जिस महिला की बात पहले कही गई है, वह मिस अफिलिया ही थी। उसे साथ लेकर अगस्टिन इस जहाज में घर लौट रहा था।
चलते-चलते जहाज नवअर्लिंस आ पहुँचा। इन लोगों के उतरने के पहले मिस अफिलिया के संबंध में दो-एक बातें कहना उचित जान पड़ता है। मिस अफिलिया की अवस्था 45 वर्ष की है। घर के कामकाज में वह बड़ी होशियार है। उसके हर काम से उसकी सहनशीलता और फुर्तीलेपन का परिचय मिलता है। उसके सारे काम और व्यवहार नियमपूर्वक तथा उत्कृष्ट प्रणाली एवं परिपाटी के होते हैं। काम के लिए यदि वह कोई नियम बना लेती है तो उसे कभी नहीं तोड़ती। नियम की तो वह बड़ी ही पक्की है। असावधानी को वह बहुत बड़ा पाप समझती है। वह औरों को भी किसी काम में लापरवाही करता देखकर बड़ी झुँझलाती और उनपर घृणा प्रकट किया करती है। कर्तव्य-पालन में वह बड़ी कठोर है। जिस काम को वह अपना कर्तव्य समझती है, उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं रखती। वह सदा विवेक से काम लिया करती है। यदि उसे ‘विवेक की दासी’ कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।
वास्तव में अंग्रेज-ललनाओं में बहुतेरी विवेक के वश में होती हैं, पर उनका वह विवेक-यंत्र अंकुश की भाँति उन्हें चलाता है। मनुष्य-समाज में दो तरह के प्राणी दिखाई पड़ते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो केवल कर्तव्य मानकर विवेक के आदेश का पालन तो करते हैं, पर उसका पालन करने से उनके हृदय में आनंद की धारा नहीं बहती। कुछ ऐसे होते हैं, जो हृदय के वेग में पड़कर विवेक के आदेश पालन करने में उन्मत्त हो जाते हैं। पहली प्रकार के विवेक का आदेश लोहे के चने चबाने से भी कठिन काम है। जो लोग पहली प्रकार के विवेक के आदेश पर काम करते हैं, उन्हें दुनियाँ कर्तव्य-परायण कहती है। पर दूसरी प्रकार का विवेक मनुष्य को कर्तव्य-प्रमत्त बना देता है। ऐसी दशा में विवेक और आवेग इन दोनों में कोई भेद नहीं रह जाता। महाराजा जयसिंह को कर्तव्य-परायण कहा जा सकता है, पर वह कर्तव्य-मत अथवा कर्तव्य-नेता कहलाने के अधिकारी नहीं हो सकते। दूसरी पवित्र श्रेणी में बुद्ध, ईसा और चैतन्य आदि के पवित्र नाम गिनाने योग्य हैं। कर्तव्य-परायण मनुष्य मशीन की भाँति कर्तव्य के अनुरोध का पालन करता है, परंतु कर्तव्य-मत्त व्यक्ति हृदय के उमड़े हुए वेग से तन्मय होकर कर्तव्य को पूरा करता है।
17. नई मालकिन
> मिस अफिलिया कर्त्तव्य-परायण थी। हम उसे कर्त्तव्य-मत्त नहीं समझते। कर्त्तव्य-पालन में वह कभी पीछे नहीं हटती, दुर्गम पर्वत उसके कर्त्तव्य-मार्ग में कभी बाधा नहीं डाल सकता। अगाध समुद्र या प्रचंड अग्नि कर्त्तव्य-पालन से विमुख नहीं कर सकती। हृदय की अनिवार्य निर्बलता के साथ वह सदा घोर संग्राम किया करती थी। यदि वह उस विकट संग्राम में कभी हार जाती तो अपनी निर्बल प्रकृति का ध्यान करके बहुत खिन्न होती थी।
अत: इन कारणों से उसका हार्दिक धर्म-विश्वास उसे प्रसन्न बनाकर उल्टा कभी-कभी उसके अंत:करण को विषाद के अंधकार से पूर्ण कर देता था।
पर बड़ा आश्चर्य तो यह देखकर होता था कि अफिलिया जैसी कर्त्तव्य-परायण, धीर-गंभीर प्रकृतिवाली और विवेकशील स्त्री, चंचलमति अगस्टिन को प्यार करे। इन दोनों की प्रकृति में जरा-भी समता नहीं थी। दोनों के स्वाभाव में 36 का-सा संबंध था। लेकिन मिस अफिलिया लड़कपन से ही बड़े चाव से अगस्टिन को धर्म-शिक्षा दिया करती और अपने सगे छोटे भाई की भाँति उसका दुलार करती थी। अगस्टिन का स्वाभाव चंचल होने पर भी वह बड़ा स्नेहशील था। इसी से मिस अफिलिया लड़कपन से उसे प्यार करती थी और यही कारण था कि अगस्टिन के प्रस्ताव पर वह तुरंत उसके घर आने को राजी हो गई। अगस्टिन के घर का काम-काज सँभालने तथा इवान्जेलिन के पालन-पोषण का भार उठाने के लिए वह बड़ी खुशी से अगस्टिन के साथ नवअर्लिंस आ गई। जहाज नवअर्लिंस पहुँचने को हुआ तो मिस अफिलिया बड़ी फुर्ती से माल-असबाब बाँधने लगी। इधर इवा से बार-बार कहने लगी- “तेरी गुड़िया कहाँ है? कैंची कहाँ है! खिलौने कहाँ हैं? अपने सब खिलौने गिन डाल। कितनी लापरवाही रखती है। अभी तक इन चीजों को नहीं गिना?”
इवा ने कहा – “बुआ, अब तो हम लोग घर ही चलते हैं, इन सब चीजों को लेकर क्या होगा?”
अफिलिया – “क्या होगा? घर ले चल, वहाँ ठिकाने से रख देना। बच्चो को अपनी वस्तुएँ सावधानी से रखनी चाहिए।”
इवा – “बुआ, मुझे यह सब रखना नहीं आता।”
अफिलिया – “अच्छा, तू देख, मैं सब ठीक कर देती हूँ। एक यह तेरा बक्स है। यह खिलौना दो; कैंची तीन और फीता चार। सब चार चीजें हुईं। बेटी, मैं जानती हूँ, तू अकेली अपने बाबा के साथ आती तो ये सब चीजें खो जातीं।”
इवा – “हहं, मैंने यों ही कितनी ही बार कितनी चीजें खो दीं और बाबा ने सब चीजें मुझे फिर खरीद दीं।”
अफिलिया – “वाह, कैसी अच्छी बात है। एक बार एक चीज को खो देना और फिर उसी को खरीद लेना।”
इवा – “बुआ, यह तो बड़ी सीधी बात है।”
अफिलिया – “सीधी बात है! यह हद दर्जे की लापरवाही है। घोर लापरवाही।”
यों ही बार-बार “लापरवाही, लापरवाही” करते हुए मिस अफिलिया सारी वस्तुएँ बक्स में भरने लगी। जब बक्स भर गया तो इवा ने कहा – “बुआ, बक्स तो भर गया, अब इसमें और चीजें नहीं समाएँगी। अब क्या करोगी?”
यह सुनकर अफिलिया बोली – “नहीं समाएँगी। जरूर समाएँगी; क्यों नहीं समाएँगी?”
इतना कहकर बक्स के कपड़ों को जोर से दबाने लगी। अफिलिया का रुख देखकर मानो संदूक बेचारा डर गया। अफिलिया ने सारी चीजों को संदूक में रखकर हँसते हुए कहा – “अभी तो संदूक में और भी चीजें रख देने को जगह खाली है। तू इस संदूक पर खड़ी हो जा, मैं चाबी से बंद कर दूँ।”
इस प्रकार अफिलिया संदूक से संग्राम में जीतकर इवा से बोली – “तेरे बाबा कहाँ हैं? जा, उन्हें बुला ला। कह दे, हम लोग तैयार हैं।”
इवा – “बाबा तो नीचे के कमरे में खड़े एक आदमी से बातें कर रहे हैं और नारंगियाँ खा रहे हैं।”
अफिलिया – “जा, दौड़कर बुला ला। जहाज अब घाट-किनारे पहुँचने ही वाला है।”
इवा – “बाबा कभी जल्दी नहीं करते। बुआ, तुम इधर आओ। वह देखो, अपना घर दिखाई पड़ता है।”
अफिलिया – “हाँ, देख लिया। जा, झटपट अपने बाबा को बुला ला। लो, जहाज किनारे आ गया और अगस्टिन अभी भी देर कर रहा है।”
जहाज घाट पर आ लगा। सैकड़ों कुली जहाज पर चढ़ आए। उनमें से एक मिस अफिलिया से बोला – “मेम साहब, अपना बक्स मुझे दीजिए।” दूसरा कुली बोला – “मेम साहब, ये बिस्तरे मैं उठाता हूँ।” तीसरा बोला – “मेम साहब, यह संदूक मेरे सिर पर उठा दीजिए।” कुलियों का तो यह हाल था और मिस अफिलिया अपनी सारी चीजों को अपने सामने रखकर खड़ी खजाने के संतरी की भाँति पहरा दे रही थी। उसके मुख का रुख और तीव्र दृष्टि देखकर कुली डर के मारे वहाँ से खिसकने लगे। इधर अगस्टिन को देर करते देखकर अफिलिया छटपटाने लगी। कोई पंद्रह मिनट के बाद बिना किसी घबराहट के अगस्टिन ने अफिलिया के पास आकर अन्यमनस्क भाव से पूछा – “बहन, तुम तैयार हो?”
अफिलिया बोली – “मैं एक घंटे से तैयार बैठी हूँ। मैं तुम्हारे देर करने से बहुत उकता रही थी।”
अगस्टिन ने कहा – “उकताने की कौन-सी बात थी! अपनी गाड़ी किनारे खड़ी है। भीड़ छँट जाने दो तो आराम से उतरकर चल चलेंगे।”
इतना कहकर अगस्टिन ने एक कुली से कहा – “अरे, हमारा सामान गाड़ी पर रखवा देना।”
यह सुनकर मिस अफिलिया ने कहा – “मैं उसके साथ जाकर अपने सामने सब चीजें ठीक से गाड़ी पर रखवाती हूँ। तुम यहाँ खड़े रहो।”
अगस्टिन – “तुम्हारे साथ जाने की आवशकयता नहीं है। यह सब आप ही ठीक से रख देगा। हम लोग साथ ही चलते हैं।”
अफिलिया – “लेकिन यह बैग और बक्स तो मैं कुली को नहीं दूँगी। मैं इन दोनों को स्वयं ही ले चलूँगी।”
अगस्टिन – “अपनी वह उत्तर प्रदेश की चाल छोड़ दो। इस देश की रीति-नीति सीखो। बक्स और बैग तुम ढोओगी तो लोग तुम्हें दासी समझेंगे। डरो मत! सब चीजें इस आदमी को उठाने दो। वह सब चीजें बड़ी सावधानी से गाड़ी पर रख देगा।”
इसी समय इवा बोली – “टॉम कहाँ है?”
अगस्टिन ने उत्तर दिया – “टॉम नीचे है। इवा, टॉम को अपनी माँ के पास ले जाना। कहना कि टॉम को गाड़ी हाँकने के लिए लाए हैं। अब उस शराबी कोचवान को गाड़ी नहीं हाँकने दी जाएगी।”
इवा – “बाबा, टॉम बड़ा अच्छा कोचवान रहेगा। वह कभी शराब नहीं पीएगा।”
इसके बाद मिस अफिलिया और इवा को साथ लेकर अगस्टिन जहाज से उतरकर अपनी गाड़ी पर चढ़ा। मिस अफिलिया ने गाड़ी पर चढ़ने के पहले सब चीजें एक-एक करके सँभाल लीं। थोड़ी ही देर में गाड़ी एक सजे-सजाए द्वार पर पहुँच गई। बाहरी दरवाजा पारकर गाड़ी के भीतर पहुँचते ही इवा उतरने के लिए छटपटाने लगी और अफिलिया से बार-बार कहने लगी – “बुआ, देखो, हमारा घर कैसा सुंदर है? तुम्हारे घर ऐसा बगीचा नहीं है।”
अफिलिया मुस्कराकर बोली – “हाँ घर तो सुंदर है, पर ईसाई का-सा घर नहीं जान पड़ता। मालूम होता है, किसी गैर-ईसाई का घर है।”
सेंटक्लेयर को अपने लिए “गैर-ईसाई” शब्द सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। गाड़ी दरवाजे पर लगते ही टॉम सबसे पहले उतरा और घर की शोभा देखकर आश्चर्य से चारों ओर देखने लगा। मिस अफिलिया के साथ सेंटक्लेयर के गाड़ी से उतरने पर घर के बहुत-से हब्शी दास-दासी दरवाजे पर आकर जमा हो गए। सेंटक्लेयर दास-दासियों पर कभी अत्याचार नहीं करता था। उसके घर इन दास-दासियों को किसी प्रकार की तकलीफ न थी। खाने-पीने का सब तरह से आराम था। इससे उसके लौटने पर सबको विशेष आनंद हुआ। उसका हँसमुख चेहरा देखने के लिए वे सब बड़े उत्सुक थे। इन दास-दासियों में एक लंबा पुरुष था। वह बड़ा ठाट-बाट बनाकर दरवाजे पर सबके आगे आकर खड़ा हुआ। उसके पहनावे और रौब-दाब से लग रहा था कि वह इस घर के गुलामों का सरदार है। अपने पीछे बहुत-से दास-दासियों को एकत्र देखकर, उनपर रौब झाड़ने के लिए उसने तोबड़ा-सा मुँह बनाकर कहा – “अरे काले भाई-बहनों, तुम लोगों की करतूतों से मुझे कभी-कभी बहुत ही शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। अपने पैर मिलाकर, एक लाइन में खड़े होओ। आजतक तुम लोगों ने विलायती ढंग पर खड़े होना तक भी नहीं सीखा। तुम लोगों के इस तरह खड़े रहने से मालिक के घर में जाने का रास्ता रुक गया है।”
यह वक्तव्य सुनकर सब दास-दासी एक किनारे हटकर खड़े हो गए।
सेंटक्लेयर ने दरवाजे पर पहुँचते ही एडाल्फ नामक इस प्रधान से हाथ मिलाया और उसका नाम लेकर कहा – “एडाल्फ, अच्छे तो हो?”
इस प्रकार सेंटक्लेयर द्वारा आदर पाने पर एडाल्फ ने मालिक के स्वागत के लिए जो भाषण रट रखा था, वह सुनाना शुरू किया। एडाल्फ का भाषण सुनकर सेंटक्लेयर ने हँसते हुए कहा – “भाषण तो खूब तैयार किया है।”
इतना कहकर वह तुरंत घर में चला गया।
मकान में जाते ही इवा दौड़ती हुई अपनी माँ के कमरे में पहुँची। पलंग पर लेटी अपनी माता के गले से लिपट गई और बार-बार उसका मुख चूमने लगी। पर उसकी माता ने अपने कल्पित रोग के कारण कमजोर बनी रहने की वजह से उसको गोद में तो लिया ही नहीं, बल्कि गले से लिपटकर इवा के बार-बार मुँह चूमने से कुछ झुझलाकर बोली – “जा-जा, बहुत हो गया, बहुत हो गया! ठहर जा, मेरे सिर में दर्द बढ़ जाएगा।”
सेंटक्लेयर ने अपनी स्त्री के कमरे में पहुँचकर उसका मुँह चूमा और मिस अफिलिया की ओर उँगली करके कहा – “प्यारी! देखो तुम्हारी रोग की बात सुनकर अफिलिया बहन आई हैं।”
मेरी पलंग से नहीं उठ सकी। केवल अधखुले नेत्रों से अफिलिया की ओर एक बार देखकर धीमे स्वर में उसका स्वागत किया। सब दासियाँ जब कमरे के द्वार पर आकर खड़ी हुईं तो उनमें मामी नाम की एक दासी के गले लिपटकर इवा उसका मुँह चूमने लगी। उस वृद्ध ने इवा को अपनी छाती से लगाकर उसका मुँह चूमा। उसकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। वह बड़ी चाह से इवा के मुँह की ओर देखने लगी। उसने जिस प्रकार इवा को अपनी छाती से लगाया था, उससे तो यही जान पड़ता था कि वही इवा की माता होगी। कुछ देर के बाद इवा ने मामी की गोद से उतरकर घर की हर दासी का मुख चूमा।
इवा को इस भाँति दासियों का मुँह चूमते देखकर मिस अफिलिया को बड़ा अचंभा हुआ। इस पर वह सेंटक्लेयर से बोली – “अगस्टिन, क्या तुम्हारे इस दक्षिण देश में दास-दासियों के साथ ऐसा ही व्यव्हार किया जाता है? भाई, हम लोग तो दास-प्रथा के विरोधी होते हुए भी नौकरों को इतना मुँह नहीं लगाते, इतना आदर नहीं देते। हम लोग वेतनभोगी चाकरों को कभी अपने समान नहीं समझते। दास-दासियों पर दया करना उचित है पर मुँह लगाना ठीक नहीं।”
अफिलिया बहन के ईसाई धर्म संबंधी भाषण का स्मरण करके सेंटक्लेयर मन-ही-मन हँसा, पर प्रकट में कुछ नहीं बोला। फिर वह कमरे से बाहर निकलकर मामी, जिमी, पली, सूकी इत्यादि हर एक दासी का हाथ पकड़कर कुशल पूछने लगा। किसी-किसी दासी के गोद के बच्चे के सिर पर हाथ रखकर दुलार करने लगा। सेंटक्लेयर के चले जाने पर इवा ने नारंगी की टोकरी उठाकर उसमें से एक-एक नारंगी सब दास-दासियों के बच्चो को दी। उन लोगों को वे खिलौने भी बाँट दिए, जो वह उनके लिए लाई थी। फिर सेंटक्लेयर ने बरामदे में आकर एडाल्फ से कहा – “एडाल्फ, यह जो नया आदमी मेरे साथ आया है, इसका नाम टॉम है। सब पर तुम बड़ी हुकूमत दिखाया करते हो, पर देखना, खबरदार, इस आदमी पर कभी रौब न गाँठना। तुम्हारे-जैसे काले बंदरों के मूल्य की अपेक्षा इसके दूने दाम लगे हैं।”
एडाल्फ ने कहा – “सरकार, आप तो मजाक करते हैं।”
सेंटक्लेयर ने एडाल्फ के कोट की ओर देखकर कहा – “वाह-वाह! तुमने मेरा यह कोट कैसे पहन लिया।”
एडाल्फ कुछ शरमाकर बोला – “हुजूर, इस कोट में ब्रांडी के बहुत दाग लग गए थे। इससे बड़ी बदबू आती थी। मैंने सोचा, अब आप इसे थोड़े ही पहनेंगे। इसे आप जरूर ही फेंक देते, इसी से मैंने पहन लिया।”
एडाल्फ की बात पर सेंटक्लेयर हँसने लगा। इसके बाद वह टॉम को लेकर अपनी स्त्री के कमरे में गया। स्त्री से कहा – “प्यारी, तुम सदा शिकायत किया करती हो कि मैं तुम्हारे आराम का खयाल नहीं करता। यह देखो, तुम्हारी गाड़ी हाँकने के लिए एक अच्छा कोचवान लाया हूँ। यह आदमी कभी शराब मुँह से नहीं लगाता। गाड़ी हाँकने में बड़ा निपुण है। यह इस तरह गाड़ी हाँकेगा कि गाड़ी में चढ़ने पर तुम्हें जरा भी तकलीफ न होगी। आराम से ले जाएगा।”
सेंटक्लेयर की स्त्री मेरी ने फिर आँखें खोलकर एक बार टॉम की ओर देखा और दबे स्वर से बोली – “कुछ दिन हमारे यहाँ रहा कि शराब पीना सीखा।”
सेंटक्लेयर – “नहीं, यह कभी शराब नहीं पीएगा। यह शराब के पास नहीं फटकता।”
मेरी – “न पीता तो अच्छा ही है। पर मुझे यकीन नहीं आता।”
फिर सेंटक्लेयर ने एडाल्फ को बुलाकर कहा – “एडाल्फ! टॉम को रसोईघर में ले जाओ। देखो, मैंने जो कहा है, सो याद रखना। टॉम पर बहुत हुकूमत मत जताना।”
एडाल्फ के चले जाने पर सेंटक्लेयर ने अपनी अपनी स्त्री को बुलाकर कहा – “प्यारी, जरा इधर आओ।”
मेरी – “रहने दो अपना यह बनावटी प्यार। तुम्हें यहाँ से गए पंद्रह दिन से ज्यादा हो गए, बीच में कभी खोज-खबर भी ली कि मैं मरती हूँ कि जीती हूँ।”
सेंटक्लेयर – “क्या इन पंद्रह दिनों में मैंने तुम्हें पत्र नहीं लिखा?”
मेरी – “बस, वही दो लाइनों का कार्ड। ऐसी चिट्ठियाँ तो नौकरों को लिखी जाती हैं। इतने दिनों में बस दो लाइनों का एक कार्ड मिला था।”
सेंटक्लेयर – “डाक निकलने ही वाली थी, इससे जल्दी में कार्ड लिखकर डाल दिया था। अब उस बीती बात पर झगड़ने से क्या लाभ है? देखो, यह फोटो देखो। मैं इवा का हाथ पकड़े खड़ा था। क्यों, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?”
मेरी – “यों हाथ पकड़कर क्यों खड़े हुए? कोई लड़की का हाथ इस तरह पकड़कर खड़ा होता है?”
सेंटक्लेयर – “खैर, मान लो खड़े होने का ढंग बुरा था, पर देखो, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?”
मेरी – “मेरी राय से तुम्हें क्या लेना-देना! तुम्हें क्या मेरी राय कभी पसंद आती है?”
इतना कहकर मेरी ने तस्वीर उठाकर सिरहाने पटक दी। सेंटक्लेयर मन-ही-मन कहने लगा – “पापिनी का मन किसी तरह नहीं भरता। चूल्हे में जाए ऐसी स्त्री। (प्रकट रूप में) अच्छा, बोलो, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?”
मेरी – “सेंटक्लेयर, मुझे परेशान न करो। तुम्हें अक्ल तो कुछ है नहीं। तुम मेरा दु:ख नहीं समझते। मैं इधर तीन दिन में बड़ी कमजोर हो गई हूँ। मुझे हल्ला-गुल्ला बिलकुल नहीं सुहाता। घर में तुम्हारे आने से मानो बाजार-सा लग गया है। मेरा दम निकल जाता है। सिर-दर्द के मारे मरी जाती हूँ।”
मिस अफिलिया अभी तक बिलकुल चुपचाप बैठी थी। सिर-दर्द की बात सुनकर उसे बातें करने का मौका मिला। वह बोली – “क्या यों ही बराबर आपको सिर-दर्द सताया करता है? मैं समझती हूँ, आप सवेरे उठते ही यदि चिरायते का काढ़ा पीएँ तो आपको कुछ आराम हो सकता है। इब्राहिम साहब की स्त्री इन सब रोगों की खूब दवाइयाँ जानती हैं। उनसे मैंने सुना कि इस रोग के लिए चिरायते का काढ़ा बड़ा गुणकारी है।”
यह सुनकर सेंटक्लेयर ने कहा – “तो कल ही मैं एक बोतल चिरायते का अर्क ला दूँगा। अच्छा, दीदी, अब तुम अपने कमरे में जाकर कपड़े बदल डालो।”
मामी को बुलाकर कहा – “अफिलिया बहन के लिए जो कमरा ठीक की हो वह बता दो। देखो, बहन को किसी तरह की तकलीफ न होने पाए। बहुत अच्छी तरह से इसकी सेवा करना।”
18. गुलामी का समर्थन!
आज रविवार है। मेरी इन दिनों मन गढ़ंत रोगों से सदा खाट पर पड़ी रहने पर भी हर रविवार को गिर्जा अवश्य जाया करती थी। इससे गिर्जे के पादरी साहब मेरी की बड़ी तारीफ किया करते थे। वह मेरी की तारीफ में सदा कहा करते – “स्त्रियों में मैडम सेंटक्लेयर आदर्श-धर्मपालिका है। रोग, शोक, आँधी, पानी चाहे जो हो, वह गिर्जा जाने से नहीं चूकती। उसकी प्रबल धर्म-तृष्णा रविवार के दिन उसके दुर्बल शरीर में बिजली की तरह बल भर देती है।”
रविवार को मणि-मुक्ता खचित बड़े सुंदर कपड़े पहनकर मेरी गिर्जा जाने की तैयारी करने लगी। उसका यह स्वभाव था कि गिर्जा जानेवाले दिन यदि कोई दास या दासी उसके कपड़े लाने में विलंब कर देती, तो वह कोड़ों की मार से उसकी पीठ लाल करके मानती। उस समय उसके हाथ मशीन की तरह चलते थे। बाहर गाड़ी खड़ी हुई है। अफिलिया और इवा को साथ लिए हुए मेरी कमरे से उतर रही थी। बीच ही में मामी मिल गई, इवा उससे बातें करने लगी। मेरी और अफिलिया गाड़ी में जा बैठी। इवा को देर करते देखकर मेरी उसे बार-बार पुकारने लगी। मामी के साथ इवा की बातें सुन लीजिए:
इवा – “मामी, मैं जानती हूँ, तुम्हारे सिर में बड़ी भयानक पीड़ा है।”
मामी – “मिस इवा, ईश्वर तुम्हें सुखी करें। मेरे सिर में बड़ा दर्द होता है, पर तुम इसके लिए रंज मत करो।”
इवा – “मामी, आज तुम्हें गिर्जा जाने की छुट्टी मिल गई, यह जानकर मुझे बड़ी खुशी हुई।” यह कहकर उसने मामी के गले में हाथ डाल दिया। फिर बोली – “मामी, तुम मेरी यह नासदानी ले लो, इसके सूँघने से तुम्हारे सिर का दर्द मिट जाएगा।”
मामी – “नहीं बच्ची, मैं तुम्हारी यह सोने की सुंदर नासदानी लेकर क्या करूँगी? मेरे पास क्या यह अच्छी लगेगी? मैं इसे हर्गिज नहीं लूँगी।”
इवा – “मामी, तुमको इससे बहुत फायदा होगा, और मेरे पास यह बेमतलब पड़ी हुई है। माँ सिरदर्द के लिए इसे सदा काम में लाया करती थीं। और तुम्हें भी यह लाभ पहुँचाएगी। मेरी प्रसन्नता के लिए तुम्हें अवश्य लेनी पड़ेगी।”
इतना कहकर मामी की चोली में नासदानी डालकर और उसे चूमते हुए इवा अपनी माँ के पास भाग गई।
उसकी माँ ने बड़े क्रोध से पूछा – “इतनी देर कहाँ खड़ी रही?”
इवा – “मैं मामी को अपनी नासदानी देने को ठहर गई थी। मैंने वह नासदानी उसे दे दी।”
मेरी बहुत बिगड़कर बड़ी अधीरता से बोली – “इवा, वह अपनी सोने की नासदानी मामी को दे दी। कब तुझे अक्ल आएगी। जा और उसे अभी लौटा ला।”
इवा की आँखें नीची हो गई। उसे बड़ा दुख हुआ। वह धीरे-धीरे लौटी। सेंटक्लेयर वहीं मौजूद था। उसने कहा – “मेरी, मैं कहता हूँ, इवा को अपनी इच्छानुसार कार्य करने दो। वह जो करे, उसे कर लेने दो।”
मेरी – “सेंटक्लेयर, संसार में उसका कैसे बेड़ा पार होगा?”
सेंटक्लेयर – “सो तो ईश्वर जानता है। पर स्वर्ग में वह मुझसे और तुमसे अच्छी रहेगी।”
इस पर इवा ने धीरे से सेंटक्लेयर के कान में कहा – “आह बाबा, ऐसा मत कहो। इससे माँ को बड़ी वेदना होती है।”
मिस अफिलिया ने सेंटक्लेयर की ओर घूमकर कहा – “क्यों, भैया तुम भी गिर्जा चलते हो?”
सेंटक्लेयर – “इस प्रश्न के लिए तुम्हें धन्यवाद। मैं नहीं जाऊँगा।”
मेरी – “मैं बहुत चाहती हूँ कि सेंटक्लेयर मेरे साथ गिर्जे जाया करें। पर उनका हृदय बिल्कुल धर्म-हीन है। वास्तव में यह बड़े खेद की बात है।”
सेंटक्लेयर – “मैं तुम लोगों के गिर्जा जाने का मतलब खूब जानता हूँ। लोगों में वाहवाही लूटने और धार्मिक कहलाने की इच्छा से तुम गिर्जा जाती हो। यदि मैं कभी गिर्जा गया भी तो उसी गिर्जे में जाऊँगा, जहाँ मामी जाती है। कम-से-कम उस गिर्जे में जाकर सोने की गुंजाइश तो नहीं रहती।”
मेरी – “ओफ, मेथोडिस्टों का गिर्जा? बड़ा भयंकर है। वहाँ के गुलगपाड़े की भी कोई हद है। वहाँ के पादरी कितना शोर मचाते हैं।”
सेंटक्लेयर – “पर तुम्हारे उस सूने मरुभूमि सरीखे गिर्जे से तो वह कहीं अच्छा है।”
फिर इवा से पूछा – “बेटी, तू भी क्या गिर्जा जाती है? आओ, यहीं घर रहो, हम दोनों खेलेंगे।”
इवा – “बाबा, मैं भी गिर्जा जाऊँगी।”
सेंटक्लेयर – “क्या वहाँ बैठे-बैठे तेरा जी नहीं घबराता?”
इवा – “हाँ, कुछ-कुछ घबराता है और कभी-कभी नींद भी आने लगती है, पर मैं जागते रहने की चेष्टा किया करती हूँ।”
सेंटक्लेयर – “तब वहाँ क्यों जाती है?”
इवा – “बाबा, बुआ कहती है कि हमें ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए। वह हम लोगों को बहुत प्यार करते हैं। वही हम लोगों को सब-कुछ देते हैं। गिर्जे में ईश्वर की प्रार्थना के समय जी नहीं घबराता, केवल पादरी साहब के प्रवचन के समय ऊँघ आने लगती है।”
कन्या की बात सुनकर और उसका सरल विश्वास देखकर सेंटक्लेयर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कन्या का मुँह चूमकर कहा – “जाओ बेटी, जाओ! मेरे लिए भी ईश्वर से प्रार्थना करना।”
इवा – “वह तो मैं सदा से करती हूँ।”
यह कहकर वह गाड़ी पर अपनी माँ के पास बैठ गई। सेंटक्लेयर ने पायदान पर खड़े होकर उसका हाथ चूमा। फिर गाड़ी गिर्जे की ओर चली गई। सेंटक्लेयर की आँखों से हर्ष के आँसू बहने लगे। वह मन-ही-मन बोला – “इवान्जेलिन, तुमने अपने इवान्जेलिन नाम को सार्थक किया। तुम मेरे लिए वास्तव में एक इवान्जेलिन (स्वर्गीय बाला) हो।”
गाड़ी में मेरी इवा को समझाने लगी – “इवा, देख, नौकरों पर दया दिखाना मुनासिब जरूर है, पर यह ठीक नहीं कि उनसे अपने बराबर अथवा संबंधियों का-सा व्यवहार किया जाए। मान ले, आज अगर मामी बीमार पड़ जाए तो तू क्या उसे अपने बिछौने पर लेटने देगी?”
इवा – “हाँ, यह तो बड़ा अच्छा होगा, क्योंकि मेरे बिछौने पर रहने से मैं बड़े आराम से उसकी दवा तथा पथ्य-पानी की खबर रख सकूँगी। मेरा बिस्तर मामी के बिस्तर से अच्छा और नरम है, उस पर उसे अच्छी नींद आएगी।”
इवा का यह उत्तर सुनकर मेरी अपने भाग्य को कोसने लगी। बोली – “मैं इसे कैसे समझाऊँ? मैंने क्या कहा और यह क्या समझी।”
अफिलिया – “तुम्हारी बात को इसने कुछ नहीं समझा।”
इवा कुछ देर तो उदास-सी दिखलाई दी, पर सौभाग्य से बच्चों के मन पर किसी बात का प्रभाव देर तक नहीं रहता। इससे जरा-सी देर में गाड़ी की खिड़की से इधर-उधर की चीजें देखकर उसका मन बदल गया और वह फिर पूर्ववत प्रफुल्लित हो गई।
ये लोग जब गिर्जे से लौटे और सब लोग भोजन करने बैठे, तब सेंटक्लेयर ने मेरी से पूछा – “कहो, आज गिर्जे में किस विषय पर प्रवचन हुआ?”
मेरी – “आज पादरी साहब का धर्मोपदेश बड़ा ही हृदयग्राही था। यह उपदेश सुनने लायक था। वह बिल्कुल मेरे मत से मिलता हुआ था।”
सेंटक्लेयर – “तो मैं समझता हूँ, आज का उपदेश किसी गंभीर विषय पर हुआ होगा?”
मेरी – “हहं, सामाजिक बातें और ऐसे विषयों पर जो मेरा मत है, बस उसी से मेरा मतलब है। पादरी साहब ने बताया कि ईश्वर हर चीज को उपयुक्त समय पर प्रस्फुटित करते हैं। बाइबिल के वचन की उन्होंने व्याख्या की। अपनी व्याख्या में उन्होंने बड़ी स्पष्टता से बताया कि ईश्वर ने ही दुनिया में दरिद्र और धनी दोनों बनाए हैं। इसलिए इस बात को मानना चाहिए कि संसार में ऊँच-नीच का भेद-भाव ईश्वर का बनाया हुआ है। उसकी इच्छा से कुछ आदमी प्रभुत्व करने को और कुछ उनकी गुलामी करने को पैदा हुए हैं।” पादरी साहब ने अकाट्य युक्तियों द्वारा इस विषय पर बड़ी खूबी के साथ प्रतिपादन करते हुए कहा – “जो लोग गुलामी की चाल की बुराइयाँ दिखलाकर उसके विरुद्ध शोर मचाते हैं, वे भूलते हैं। वे ईश्वर की शासन-प्रणाली को बिल्कुल नहीं समझते। उन्हें बाइबिल का बिल्कुल ज्ञान नहीं है। उन्होंने बड़ी अच्छी तरह से यह ईश्वरीय नियम भी दिखाया कि मनुष्यों में विभिन्नता सदा रहेगी। कालों को गोरों की सेवा करनी चाहिए। न करेंगे तो उन्हें पाप का भागी बनना पड़ेगा। ईश्वर जो करते हैं, सबके भले के लिए करते हैं। अत: यह गुलामी की चाल गुलाम और मालिक दोनों के ही भले के लिए है। सेंटक्लेयर, तुमने आज का उपदेश सुना होता तो बहुत-कुछ सीखते।”
सेंटक्लेयर – “मुझे उपदेशों की आवश्यकता नहीं है। मुझे यहीं बैठे-बैठे चुरुट पीते हुए विचार करने में बड़ी शांति मिलती है। तुम्हारे गिर्जे में तो चुरुट पीने की मुमानियत है, यह बड़ी आफत है।”
मिस अफिलिया – “क्यों? क्या तुम इन विचारों से सहमत नहीं हो?”
सेंटक्लेयर – “कौन, मैं? मैं ऐसे विषयों में धार्मिक विचारों की जरा भी परवा नहीं करता। मैं ऐसे धर्म से कोई वास्ता नहीं रखता। यदि मुझे इस गुलामी-प्रथा पर कुछ कहना पड़े तो मैं साफ कहूँगा कि हम लोग अपने लाभ की दृष्टि से ही इसका समर्थन करते हैं। हमें आराम है, इससे इसका रहना बहुत आवश्यक और उचित है। दासों के बिना काम नहीं चलता, बिना मेहनत-मशक्कत के धन की गठरी हाथ नहीं आती, इससे दासता की प्रथा को हम नहीं हटाना चाहते।”
मेरी – “अगस्टिन, मैं समझती हूँ कि धर्म पर तुम्हारी तनिक भी श्रद्धा नहीं है। तुम्हारी बातें सुनकर हृदय काँपता है।”
सेंटक्लेयर – “हृदय काँपता है! सच है, पर मैं तो सच्ची-सच्ची कहना जानता हूँ। ये सब अपने मतलब की बातें हैं। अच्छा, पादरी लोग कहते हैं कि दास-प्रथा ईश्वर की इच्छा से है और इसकी जरूरत है, इसी से इसकी उत्पत्ति हुई है। ठीक है, मुझे भी पादरी साहब से एक चीज की व्यवस्था लेनी है। जब मैं किसी दिन ताश खेलने में अधिक रात तक जागता रहता हूँ तो मुझे ब्रांडी पीने की जरूरत पड़ती है। पादरी साहब बतावें कि जब ब्रांडी पीने की जरूरत पड़ती है तब वह जरूरत भी ईश्वर ही की बनाई हुई है, इसी लिए ब्रांडी क्यों नहीं पीनी चाहिए? फिर पादरी साहब कहते हैं कि सब चीजों का उपयुक्त समय होता है, उपयुक्त समय पर सभी चीजें अच्छी होती हैं। मेरी समझ में ब्रांडी पीने के लिए संध्या का समय ही बड़ा उपयुक्त होता है। संध्या और ब्रांडी दोनों ही ईश्वर की बनाई हुई चीजें है। दोनों में जब इतना मेल है तब मैं समझता हूँ कि पादरी साहब जरूर ब्रांडी पीने की आज्ञा देंगे।”
अफिलिया – “खैर, इन बातों को जाने दो। यह कहो कि तुम दास-प्रथा को उचित समझते हो या अनुचित?”
सेंटक्लेयर – “मैं तो दास-प्रथा की भलाई-बुराई पर कुछ भी नहीं कहना चाहता। यदि मैं इस प्रश्न का उत्तर दूँ तो मैं समझता हूँ कि तुम मुझे बहुत कोसोगी। मैं उन आदमियों में से हूँ, जो आप शीशे के घर में बैठकर ढेला फेंके हैं, पर मैं स्वयं कभी ऐसा घर नहीं बनाता कि दूसरा उस पर ढेला फेंकें। कहने का मतलब यह है कि मैं स्वयं दोषी होते हुए भी दूसरों के दोषों को देखता हूँ, किंतु मैं कभी किसी के सामने अपना मत नहीं प्रकट करता कि जिसमें कोई मुझपर दोषारोपण कर सके।”
मेरी – “बस, इनकी सदा ऐसी ही बातें करने की आदत है। तुम्हें इनसे किसी बात का ठीक उत्तर नहीं मिलेगा। सच तो यह है कि धर्म से इनका कुछ वास्ता नहीं है। जिसका धर्म पर प्रेम होगा, वह क्या कभी ऐसी बातें मुँह से निकाल सकता है?”
सेंटक्लेयर – “धर्म! देख लिया तुम्हारा धर्म! क्या तुम लोग सचमुच गिर्जे में धर्म की बातें सुनने जाती हो? समाज-प्रचलित स्वार्थपरता का तथा मनुष्य के अभ्यस्त पापों का बाइबिल से जोड़-तोड़ बिठाना ही हमारे देश का ईसाई धर्म है! देश में फैले हुए किसी भी अत्याचार या अन्याय को बाइबिल में लिखा बता दिया कि वह धर्म का भाग बन गया, तुम लोग मनुष्य के पापों को धर्म का रूप देने की फिक्र करते हो, पर मैं जब धर्म की ओर दृष्टि डालता हूँ तो धर्म को अपने से ऊपर ही, न कि नीचे देखता हूँ। मैं अपने पापों को कभी धर्म का जामा पहनाने की चेष्टा नहीं करता। जो पाप है, वह पाप ही रहेगा, चाहे तुम करती हो चाहे मैं, उसे बाइबिल से लाख बार सिद्ध करने की चेष्टा करो, तो भी वह कभी पुण्य नहीं हो सकता।”
अफिलिया – “तो तुम विश्वास नहीं करते कि गुलामी की प्रथा बाइबिल की रूह से ठीक है?”
सेंटक्लेयर – “जिस स्नेहमयी जननी की प्रतिमूर्ति सदा मेरे हृदय में बसी रहती है, बाइबिल उसकी बड़ी प्यारी पुस्तक थी। बाइबिल पर उनकी अटल श्रद्धा और भक्ति थी। बाइबिल द्वारा उनका जीवन गठित हुआ था, परंतु दास-प्रथा से उन्हें बड़ी घृणा थी। इससे दास-प्रथा बाइबिल से सिद्ध है, इसे मैं कभी नहीं मानता। विचार किया जाए तो क्या यूरोप, क्या अमरीका और क्या अफ्रीका, ऐसा कोई देश न ठहरेगा, जहाँ के मनुष्य-समाज में किसी-न-किसी प्रकार की बुराइयाँ घुसी हुई न हों। समाज में फैले हुए नीति-विरुद्ध व्यवहारों को बाइबिल से सिद्ध करने में जो लोग अपनी सारी शक्ति खर्च करते हैं और इन्हें धर्म-संगत ठहराते हैं, वे लोग सचमुच अपनी गाढ़ी स्वार्थपरता के कारण मोह के दलदल में फँसे हुए हैं। दास-प्रथा के बिना सहज में हम लोग धनी नहीं हो सकते, मौज नहीं कर सकते, इसी से अपने सुख के लिए, अपने स्वार्थ की दृष्टि से, हम लोग दास-प्रथा को आवश्यक बताते हैं। पर जो लोग सच्ची बात पर पर्दा डालकर गुलामी के बाइबिल-सम्मत होने की पुकार मचाते हैं, मेरी समझ में वे सरासर सत्य की हत्या करते हैं।”
मेरी – “तुम बड़े नास्तिक हो गए हो!”
सेंटक्लेयर – “यदि आज रूई का चालान रुक जाए और हमारे देश की रूई का भाव एकदम गिर जाए, तो फिर दास-प्रथा की जरूरत न रहेगी। उस समय बाइबिल का अर्थ भी बदल जाएगा। आज बाइबिल के मत से दास-प्रथा उचित है, पर रूई का बाजार मंदा हो जाए तो गुलामों को सीधा अफ्रीका लौटा देना ही ईश्वर-वाक्य माना जाने लगेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि रूई के भाव के साथ-साथ बाइबिल का मत भी बदल जाएगा।”
मेरी – “मैं दास-प्रथा को धर्म-विरुद्ध नहीं मानती। ईश्वर को धन्यवाद है कि मेरे हृदय में तुम्हारी भाँति नास्तिकता के भाव नहीं भरे हैं।”
इसी समय हाथ में एक सुंदर फूल लिए हुए इवा वहाँ आई। सेंटक्लेयर ने उससे पूछा – “अच्छा, इवा, तू बता कि तुझे वारमंट का दास-दासी-शून्य अपनी बुआ का घर अच्छा लगता है या अपना घर, जहाँ गुलाम भरे पड़े हैं।”
इवा – “निश्चय ही अपना ही घर अच्छा है।”
सेंटक्लेयर – “वह कैसे?”
इवा – “हमारे घर में बहुत आदमी हैं। वे सब मुझे प्यार करते हैं, और मैं उन्हें प्यार करती हूँ, इसी से हमारा घर अच्छा है।”
मेरी – “बस, इसे प्यार-ही-प्यार की सूझी रहती है। हर घड़ी प्यार! ऐसी बेअक्ल लड़की तो मैंने कहीं नहीं देखी। कहती है, दास-दासियों को प्यार करती हूँ। दास-दासियों से, और प्यार!”
इवा – “क्यों बाबा, मेरी यह प्यार की बात बेजा है?”
सेंटक्लेयर – “संसार इसे बुरी समझता है। यहाँ निस्वार्थ प्रेम का कोई पारखी नहीं है। अच्छा, तू बता, भोजन के समय से अब तक कहाँ थी?”
इवा – “मैं टॉम के कमरे में थी, उसका गाना सुन रही थी वहीं दीना चाची ने मुझे भोजन दे दिया था।” ”
सेंटक्लेयर – “टॉम का गाना सुन रही थी?”
इवा – “हाँ, वह बहुत अच्छे गीत गाता है।”
सेंटक्लेयर – “सचमुच?”
इवा – “हाँ-हाँ। और वह मुझे भी अपने गीत सिखाएगा।”
सेंटक्लेयर – “टॉम तुम्हें गाना सिखाएगा? गाने के लिए उस्ताद तो बड़ा अच्छा मिला है।”
इवा – “हाँ-हाँ, वह मुझे अपना गाना सुनाता है। मैं उसे अपनी बाइबिल पढ़कर सुनाती हूँ और वह मुझे उसका अर्थ समझाता है।”
मेरी ने हँसते हुए कहा – “टॉम बाइबिल सिखाएगा! क्या मजे की बात है।”
सेंटक्लेयर – “ऐसा मत कहो। धर्म की शिक्षा देने के लिए टॉम मेरी समझ में अवश्य उपयुक्त आदमी है। धर्म के लिए वह बहुत व्याकुल रहता है और उसका हृदय भी बड़ा धार्मिक है। कल मुझे घोड़े की जरूरत थी। इससे मैं धीरे-धीरे उसके कमरे की ओर गया। वहाँ जाकर देखा कि टॉम आँखें बंद किए हुए ईश्वर के ध्यान में मग्न है। मुझे यह जानने की बड़ी उत्कंठा हुई कि टॉम कैसे ईश्वर की आराधना करता है, पर मैंने अब तक कभी ऐसी सरल प्रार्थना नहीं सुनी थी। बड़ी व्याकुलता से उसने ईश्वर से मेरे कल्याण की प्रार्थना की। उस समय उसका चेहरा देखने से सचमुच पूरा महात्मा जान पड़ता था। मैंने बहुतेरे पादरियों के मुँह से प्रार्थना सुनी है, किंतु ऐसी विश्वासपूर्ण प्रार्थना कभी नहीं सुनी।”
मेरी – “शायद उसने जान लिया होगा कि तुम सुन रहे हो, इससे तुम्हें खुश करने के लिए उसने ढोंग रचा होगा। मैंने पहले भी कई बार उसकी ठग-विद्या की बात सुनी है।”
सेंटक्लेयर – “उसने मेरे मन को संतुष्ट करने की कोई बात मुँह से नहीं निकाली। उसने निष्कपट मन से ईश्वर के सम्मुख अपने मनोभाव प्रकट किए। उसने ईश्वर से इसी बात की प्रार्थना की कि मुझमें जो दोष हैं, वे दूर हो जाएँ। इससे यह बात मन में नहीं लाई जा सकती कि वह ढोंग करता था।”
अफिलिया – “मैं आशा करती हूँ कि तुम्हारे हृदय पर इसका अच्छा असर होगा।”
सेंटक्लेयर – “मैं समझता हूँ, तुम्हारी और टॉम की राय मेरे विषय में मिलती-जुलती है। अच्छा, मैं अपना चरित्र सुधारने की चेष्टा करूँगा।”
19. दासता के बंधन तोड़ने का प्रयास
अब हम थोड़ी देर के लिए टॉम से विदा होकर जार्ज, इलाइजा, जिम और उसकी वृद्ध माता का वृत्तांत सुनाते हैं।
संध्या का समय निकट है। जार्ज अपने लड़के को गोद में लिए हुए और अपनी स्त्री इलाइजा का हाथ अपने हाथ में पकड़े हुए बैठा है। दोनों चिंता-मग्न और गंभीर जान पड़ते हैं। उनके गालों पर आँसुओं के चिह्न दीख पड़ते हैं।
जार्ज ने कहा – “हाँ, इलाइजा, मैं जानता हूँ कि तुम जो कहती हो, सब सच है। तुम्हारा हृदय स्वर्गीय भावों से पूर्ण है। इसके विपरीत, मेरा हृदय बिल्कुल शुष्क है, लेकिन मैं तुम्हारे वचन-पालन की चेष्टा करूँगा। मैं तुमसे निश्चय कहता हूँ कि स्वतंत्र हो जाने पर मैं एक ईसाई का-सा श्रद्धालु हो जाऊँगा। सर्वशक्तिमान ईश्वर जानता है कि मैंने कभी अपने मन में बुरे विचारों को स्थान नहीं दिया। जब-जब मुझपर घोर अत्याचार हुए, तब-तब मैंने उसी का नाम लेकर अपने मन को धीरज दिया। अब मैं सारी पिछली सख्तियों और अत्याचारों को मन से भुला दूँगा। अपनी बाइबिल पढूँगा और सज्जन बनने की चेष्टा करूँगा।”
इलाइजा – “और जब हम कनाडा पहुँच जाएँगे, तब मैं तुम्हारी सहायता करूँगी। मैं बहुत अच्छे कपड़े सीना जानती हूँ। मैं बढ़िया धुलाई और इस्तरी का काम भी कर सकती हूँ। हम दोनों वहाँ कुछ-न-कुछ करके अपना जीवन-निर्वाह कर लेंगे।”
जार्ज – “हाँ, इलाइजा, मुझे पेट की इतनी चिंता नहीं है। इस बच्चे को और तुम्हें साथ लेकर जहाँ-कहीं रहूँगा, वहीं मेरे लिए स्वर्ग है। मैं अधिक नहीं चाहता। ईश्वर से इतनी ही प्रार्थना है कि तुमसे वियोग न हो। इस बालक को कोई हमसे छीन न सके। सोचने की बात है कि ये नर-पिशाच गोरे माता की गोद से बच्चों को छीनकर और पति से स्त्री को अलग करके बेच डालते हैं। इससे अभागे गुलामों के हृदयों को कितना कष्ट पहुँचता है। मैं ऐसी दशा में यही चाहता हूँ कि तुम पर और इस बच्चे पर मेरा अपना कहने का अधिकार हो जाए। इसके सिवा मैं ईश्वर से और कुछ नहीं माँगता। मैंने गत पच्चीस वर्ष की अवस्था तक प्रतिदिन कठिन परिश्रम किया है और उसके लिए कौड़ी भी नहीं पाई। न मेरे रहने के लिए झोपड़ी थी और न अपनी कहने के योग्य एक बालिश्त जमीन ही। इतने पर भी वे यदि मेरा पिंड छोड़ दें तो मुझे संतोष है। मैं उनका कृतज्ञ रहूँगा। मैं कमाकर तुम्हारे मालिक को तुम्हारा और अपने इस लड़के का मूल्य भेज दूँगा। अपने पुराने मालिक का तो मैं एक कोड़ी का भी कर्जदार नहीं। उसने मुझे जितने में खरीदा था, उससे पाँच गुना उसने मेरे द्वारा वसूल कर लिया। इलाइजा, स्वाधीनता बड़ा अमूल्य रत्न है, पर चिरपराधीन व्यक्ति स्वाधीनता के सुख को नहीं जान सकता। मिश्री खाए बिना उसका स्वाद नहीं जाना जा सकता। इसी भाँति जो सदा से पराधीन है, वह स्वाधीनता की महिमा नहीं समझ सकता। इस विपत्ति की दशा में रहते हुए भी मैं तुमसे स्वाधीनतापूर्वक बातें कर रहा हूँ, इतने ही से मेरा हृदय आनंद से नाच रहा है। आज स्वाधीनता ने मुझमें फिर जान डाल दी है। परमात्मा करे, संसार में कोई भी पराधीन न रहे, कोई स्वाधीनता के स्वाद से वंचित न हो। संसार में किसी जाति को पराधीनता की जंजीर से न जकड़ा रहना पड़े। इलाइजा, पराधीनता की बेड़ी से सर्वथा मुक्त हो जाने के लिए मैं बहुत छटपटा रहा हूँ।”
इलाइजा – “पर हम अभी संकट से पार नहीं हुए हैं। अभी कनाडा दूर है।”
जार्ज – “यह सत्य है, पर स्वाधीनता की वायु मंद-मंद लहराती जान पड़ती है और उसके स्पर्श मात्र से मैं सजीव-सा जान पड़ता हूँ।”
इसी समय बाहर किसी के बातचीत करने की आवाज सुनाई दी। तुरंत ही किसी ने दरवाजा खड़खड़ाया। इलाइजा ने जाकर दरवाजा खोल दिया।
बाहर से साइमन हालीडे एक क्वेकर-संप्रदाई भाई को साथ लिए हुए अंदर आए। इस दूसरे आदमी का नाम साइमन हालीडे ने फीनियस बताया। फीनियस लंबा-चौड़ा आदमी था। चेहरा देखने से कार्यदक्ष, चालाक और लड़ाका जान पड़ता था। साइमन हालीडे की भाँति इसके मुख पर शांत भाव न था। यह उस ढंग के आदमियों में था जो जितना होते हैं उससे अपने को अधिक समझते और प्रकट करने की कोशिश करते हैं। पर दिल का साफ था।
साइमन हालीडे ने अंदर आकर कहा – “जार्ज, बड़ी आफत है। तुम्हें पकड़ने के लिए आदमी तैनात हुए हैं। फीनियस ने उनकी कुछ-कुछ बातें सुनी हैं। अच्छा होगा कि इसी के मुँह से सारी बातें सुनो।”
फीनियस ने कहना आरंभ किया – “मेरा सदा से यह मत है कि आदमी को सर्वदा एक कान खुला रखकर सोना चाहिए। उससे बड़ा लाभ होता है। पिछली रात मैं एक होटल में ठहरा था। वहाँ एक कमरे में बिस्तर पर पड़ा हुआ था, पर अपने सिद्धांत के अनुसार मैं नींद में ऐसा बेहोश नहीं हो गया था, जैसे कि अक्सर लोग हो जाया करते हैं कि कोई उनके सिरहाने का तकिया भी खींच ले जाए तो उन्हें पता न लगे। हाँ, तो मुझे मालूम हुआ कि मेरे कमरे के बगलवाले कमरे में बैठे कुछ लोग शराब पी रहे हैं और बातें कर रहे हैं। उनकी बातें सुनने की मुझे उतनी परवा नहीं थी, पर जब मैंने उन्हें क्वेकर-मंडली का नाम लेते सुना तो मेरे जी में खटका हुआ और मैं ध्यान से उनकी बातें सुनने लगा। उनमें से एक ने कहा, ‘जरूर वे भगोड़े दास-दासी क्वेकरवालों के गाँव में ही छिपे हैं। जल्दी चलकर उस नौजवान को गिरफ्तार करना चाहिए। उसे केंटाकी ले चलकर उसके मालिक को सौंपना होगा। उसका मालिक जरूर ही उसे मार डालेगा। उसको ऐसी सजा हो जाने पर फिर गुलाम लोग भागने का दुस्साहस नहीं करेंगे। पर उस युवक के लड़के को जिस दास-व्यवसायी ने खरीदा था, उसी को दिया जाएगा, खूब माल मिलेगा और उस युवक की स्त्री को दक्षिण में बेचकर सहज में सोलह-सत्रह सौ मार लिए जाएँगे। वह स्त्री बड़ी सुंदरी है। जिम और उसकी माता को यदि उनके पहले मालिकों के यहाँ ले जाएँ तो वे जरूर हमें खूब इनाम देंगे। उस आदमी की बातों से मुझे यह भी जान पड़ा कि उनके साथ पुलिस के दो सिपाही भी हैं और तुम लोगों की गिरफ्तारी के लिए उनके पास वारंट है। इनमें से एक जो नाटा है, वह जरूर वकील है, क्योंकि बड़ी कानूनी बातें बनाता है। उसने निश्चय किया है कि वह अदालत में जाकर झूठमूठ कह देगा कि इलाइजा उसी की खरीदी हुई दासी है। फिर उसकी बात पर जब इलाइजा उसकी हो जाएगी तब वह उसे दक्षिण में ले जाकर बेच डालेगा। पुलिस के सिपाहियों के सिवा उनके साथ और भी कई आदमी हैं। मैं बड़ी तेजी से यहाँ आया हूँ। मैं समझता हूँ कि वह सवेरे सात या ज्यादा-से-ज्यादा आठ बजते-बजते यहाँ पहुँच जाएँगे। इसलिए अब जो करना हो, जल्दी किया जाए।”
इस वार्तालाप के उपरांत यह मंडली जिस विचित्र ढंग से खड़ी थी, वह दृश्य चित्र लेने योग्य था। हालीडे के चेहरे पर काफी चिंता छा गई थी। फीनियस भी बड़ी गहरी चिंता में मग्न जान पड़ता था। इलाइजा अपने स्वामी के गले में हाथ डाले खड़ी हुई उसकी ओर देख रही थी। जार्ज की आँखों में सुर्खी छा गई थी। उसकी ऐसी दशा हो गई थी, मानो उसकी आँखों के सामने उसकी स्त्री की नीलामी हो रही हो और उसका लड़का किसी दास-व्यवसायी को बेचा जा रहा हो।
इलाइजा बड़ी दीनता से बोली – “जार्ज, अब क्या उपाय होगा?”
“मैं उपाय जानता हूँ।” – यह कहकर जार्ज कोठरी के अंदर गया और अपनी पिस्तौल लाकर बोला – “जब तक मेरे हाथ में पिस्तौल है, किसी का कुछ डर नहीं। जब तक मुझ में जान है, कोई गोरा तुम्हारा बाल बाँका नहीं कर सकता।”
साइमन हालीडे ने एक ठंडी साँस लेते हुए उससे कहा – “मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि ऐसा मत करना।”
इस पर जार्ज ने साइमन से कहा – “महाशय, आपने पिता की भाँति हम लोगों को शरण दी है, इसके लिए हम सब आपके कृतज्ञ हैं, परंतु यदि पकड़नेवालों से यहाँ हम लोगों का किसी प्रकार का झगड़ा हो गया तो देश-प्रचलित घृणित कानून के अनुसार आपको भी दंड-भागी होना पड़ेगा। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आगे जाकर पकड़नेवालों से मुकाबला हो, जिससे आप पर किसी तरह की आपत्ति आने का अंदेशा न रहे। पकड़नेवालों से भेंट होने पर हम उनके छक्के छुड़ा देंगे। उन स्वार्थी, नर-पिशाच, विवेकहीन गोरों के खून की नदी बहा देंगे। जिसमें दैत्य का-सा बल है, वह बड़ा साहसी तथा मरने-मारने को सदा तैयार है। मुझे भी किसी का भय नहीं है।”
फीनियस अब तक खड़ा बातें सुन रहा था। उसने कहा – “हाँ, भाई, तुम बहुत ठीक कहते हो। पर तुम्हें एक गाड़ी हाँकनेवाले की तो जरूरत पड़ेगी ही, क्योंकि तुम्हें तो रास्ता मालूम नहीं। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”
जार्ज- “पर मैं नहीं चाहता कि तुम इस आफत में पड़ो।”
फीनियस – (आश्चर्य से) “आफत! जब आफत आए तो जरा कृपा करके मुझसे भी उसकी जान-पहचान करा देना।”
साइमन ने कहा – “फीनियस बड़ा साहसी और बुद्धिमान आदमी है। वह जी-जान से तुम लोगों की रक्षा करेगा। जार्ज, इतनी जल्दबाजी की जरूरत नहीं है। जरा धीरज से काम लो, युवकों का खून बहुत जल्दी उबल उठता है।”
जार्ज – “मैं पहले किसी पर आक्रमण नहीं करूँगा। मैं उनसे केवल इतना ही कहूँगा कि वह मुझे इस देश से जाने दें और मैं शांतिपूर्वक चला जाऊँगा। हाँ, यदि उन्होंने मेरे कार्य में किसी प्रकार की बाधा डाली तो वे हैं और यह पिस्तौल, मैं बिना उनकी जान लिए नहीं छोडूँगा। उनकी जान लेने पर उस दु:ख की शांति हो जाएगी, जो माता और बहन का वियोग होने से मुझे हरदम सताया करता है।” माता और बहन का स्मरण होते ही उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। उमड़े हुए शोक से उसका गला भर आया। वह अस्फुट-स्वर में कहने लगा – “बीती बात याद करके मेरा कलेजा फटा जाता है। मेरी एक बड़ी बहन थी। उसे मेरे नीच मालिक ने दक्षिण में बेच डाला। अब स्त्री और पुत्र से अलग करके मेरी दुर्दशा करना चाहता है। जब ईश्वर ने मुझे स्त्री-पुत्र की रक्षा के लिए ये दो दृढ़ भुजाएँ दी हैं तब यदि मैं उनके लिए इनका उपयोग न करूँ, तो ये व्यर्थ हैं। मैं निश्चय के साथ कहता हूँ कि मेरी देह में प्राण रहते मेरी स्त्री और पुत्र को कोई मुझसे अलग नहीं कर सकता। क्या आप इस आचरण के लिए मुझे दोषी कहेंगे?”
साइमन – “कभी नहीं! इन स्वार्थी नर-पिशाच गोरों के सिवा और कोई तुम्हारे इस आचरण को बुरा नहीं कह सकता। दुर्बल से दुर्बल आदमी भी इतना अत्याचार सहन नहीं कर सकता। धिक्कार है इस पाप और अत्याचार-पूर्ण संसार को! पर उससे अधिक धिक्कार है उन पाखंडियों को, जिनकी स्वार्थपरता और अर्थ-तृष्णा के कारण इस संसार में पाप और अत्याचार फैला हुआ है।”
फीनियस अब तक खामोश बैठा हुआ था। साइमन की बात समाप्त होने पर वह बोला – “भाई जार्ज, ईश्वर ने मेरी इन दो भुजाओं में भी कुछ बल दिया है। मित्र, मुझे विश्वास है कि काम पड़ने पर ये भुजाएँ तुम्हारे लिए इस शरीर से अलग हो जाने को भी तैयार रहेंगी।”
साइमन ने कहा – “फीनियस, जार्ज पर जैसे-जैसे अत्याचार हुए हैं, उससे उसके मन में बदला चुकाने की प्रवृत्ति का आना स्वाभाविक है, लेकिन तुम तो शांत रहो। हाँ, सताए हुए अपने भाई-बंधुओं की सहायता के लिए सदा प्राण देने को प्रस्तुत अवश्य रहना चाहिए और अत्याचार के विरुद्ध इसी प्रकार कटिबद्ध रहना ठीक है। पर अब तो नेताओं ने इस विषय में इससे बहुत अच्छे मार्ग का अनुसरण करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मनुष्य को कोई कार्य क्रोधांध अवस्था में नहीं करना चाहिए। क्रोध और द्वेष दोनों मन के विकार हैं। अत्याचार को दूर करने के लिए इन दोनों शत्रुओं के वश में होकर कोई काम करना उचित नहीं है। क्रोध के समय मनुष्य को भले-बुरे का ज्ञान नहीं रहता है। अतः कुछ सोचना हो, करना हो, सब शांति में होना चाहिए। ईश्वर से हम लोगों को प्रार्थना करनी चाहिए कि हम भटकने न पाएँ।”
फीनियस पर इस उपदेश का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, किंतु फिर भी वह अपनी प्रचंड प्रकृति को वश में करने की चेष्टा करने लगा। हम पहले कह आए हैं कि फीनियस एक भीम-प्रकृति का मनुष्य है, बड़ा संग्राम-प्रिय है, अवसर आने पर वह साक्षात यमराज की भाँति लड़ता है। विपदा किसे कहते हैं, यह तो वह स्वप्न में भी नहीं सोचता। असल में युद्ध के लिए शारीरिक बल की ही आवश्यकता नहीं है बल्कि मानसिक बल भी इसके लिए बहुत जरूरी है। जो मौत के मुँह में जाने से डरता है, वह कायर संग्राम के उपयुक्त नहीं। उसे कभी देव-दुर्लभ वीर की पदवी नहीं मिल सकती। वीर की जान हथेली पर रहती है, मौत उसके लिए खेल की वस्तु है। फीनियस मृत्यु से कभी नहीं डरता था। पहले तो वह और भी आग-बबूला था, किंतु अब कुछ शांत प्रकृति का हो गया है। प्रेम की छूत वज्र-हृदय को भी कोमल बना देती है। क्वेकर-संप्रदाय की किसी सुशिक्षिता, सहृदया युवती के प्रेम में फँसने के बाद फीनियस की प्रकृति कुछ ठंडी हो गई है। इसकी परोपकार-वृत्ति बड़ी प्रबल है। दूसरे का भला होता हो तो यह अपनी जान दे सकता है। पर अब पहले का-सा भाव नहीं है। पहले वह बिना सोचे-विचारे, बिना बात की, लड़ाई मोल ले लेता था; किंतु अब अपनी प्यारी के शांत मुख कमल का स्मरण आते ही फीनियस अपनी दुर्दम्य प्रकृति को वश में करने की चेष्टा करता है। अब वह सदुपदेश के सम्मुख सिर झुकाता है। ज्ञानी और महात्माओं के वाक्यों पर बड़ी श्रद्धा रखता है।
फीनियस को गरम होते देखकर साइमन की सहधर्मिणी वृद्ध राचेल ने मुस्कराकर कहा – “फीनियस किसी काम के लिए कमर कस ले तो किसी की मजाल है कि उसे उसके इरादे से हटा दे लेकिन अब उसका हृदय प्रेम की पवित्र डोर से बँधा हुआ है। इस समय उसका दुर्दम्य मन कैदी बना हुआ है।”
राचेल की बात समाप्त हो जाने पर जार्ज ने साइमन से कहा – “खैर, आप जो कहते हैं, वह सब भी ठीक है, पर यहाँ से भागने के सिवा बचने की और क्या सूरत है? जहाँ तक हो, यहाँ से जल्दी ही हट जाना अच्छा है।”
इस पर फीनियस ने कहा – “हाँ, यह ठीक है। अभी यहाँ से निकल चलने से फिर पकड़नेवालों की दाल न गलेगी। मैं तो दो घंटा रात रहे ही वहाँ से चल दिया था। वे सब आज सवेरे तुम लोगों की तलाश में निकलेंगे। यहाँ से अभी निकल चलें तो वे हम लोगों से चार कोस पीछे रहेंगे। मैं अभी जाकर माइकल क्रास को बुला लाता हूँ। वह पीछे रहकर पकड़नेवालों का भेद लेता रहेगा। हम लोग कुछ आदमी गाड़ी पर चढ़कर आगे बढ़ चलेंगे।”
फीनियस जब माइकल क्रास को बुलाने चला गया, तब साइमन ने कहा – “जार्ज, फीनियस बड़ा चतुर और कामकाजी आदमी है। तुम इसी की सलाह पर चलना। वह अपनी सामर्थ्य भर तुम्हारी भलाई करने से नहीं चूकेगा।”
जार्ज – “और तो कुछ नहीं, मुझे इस बात का बड़ा खेद हो रहा है कि कहीं हम लोगों के लिए आपको किसी आफत में न फँसना पड़े।”
साइमन – “हम लोगों के लिए तुम कोई चिंता मत करो। हमने जो कुछ किया है, अपने कर्तव्य के अनुरोध से किया है। कर्तव्य-पालन में हमारे प्राण भी जाएँ तो कोई चिंता नहीं।”
फिर साइमन ने अपनी स्त्री की ओर घूमकर कहा – “राचेल, अब शीघ्र ही इन लोगों के खाने-पीने का प्रबंध हो जाना चाहिए। हम अपने घर से इन लोगों को भूखा नहीं जाने देंगे।”
राचेल जब अपने बाल-बच्चों को लेकर जल्दी-जल्दी भोजन बनाने में लगी हुई थी, उसी समय जार्ज और उसकी स्त्री अपने छोटे कमरे में एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए बैठे कुछ ही देर में होनेवाले अपने वियोग के संबंध में बातें कर रहे थे। उनकी आँखों में आँसू भरे थे।
जार्ज ने कहा – “इलाइजा, जो लोग मित्रों से घिरे हुए हैं, और धन-धान्य, गृह तथा अनेकानेक संपत्तियों से पूर्ण हैं, उन्हें स्त्री-पुत्र का वियोग ऐसा दु:खदायी नहीं होता होगा। उनके सुख के अनेक साधन हैं, पर तुम्हारे और इस संतान के सिवा संसार में मेरे लिए तो और कुछ नहीं है। तुमसे ब्याह होने के पूर्व इस जगत में मेरी उस दुखियारी माता और बहन के अलावा और कोई प्राणी मुझे प्यार की निगाह से देखनेवाला न था। जिस दिन प्रात: काल मेरी बड़ी बहन एमिली को सौदागर खरीदकर ले गया, उस दिन की याद करके मुझे अपार दु:ख होता है। मैं दालान में पड़ा सो रहा था। उस समय उसने रोते हुए आकर मेरा हाथ पकड़कर उठाया और कहा, ‘जार्ज, आज तेरी अंतिम हिताकांक्षिणी जा रही है। अभागे बालक, तेरी क्या गति होगी?’ मैं उठ खड़ा हुआ और उसके गले से लिपटकर रोने-चिल्लाने लगा। वह भी बहुत रोई। वे अंतिम स्नेह के शब्द सुने आज मुझे दस वर्ष हो गए। मेरा हृदय जल-जलकर खाक हो गया। तुम्हारे प्रेम से मेरे मुर्दा शरीर में कुछ जान आ गई थी। बीती बातों को भुलाकर मैं नया मनुष्य बन गया। इलाइजा, अब मुझे मरना कबूल है, पर मैं उन लोगों को तुझे अपने पास से कदापि न ले जाने दूँगा। मुझे इस जीवन की कोई परवा नहीं है। जीना है तो सुख से, अपने स्त्री-पुत्र सहित, नहीं तो इनसे बिछुड़कर जीने में क्या आनंद रखा है? यों कुत्ते की मौत मरने की अपेक्षा वीरों की भाँति, अत्याचारियों को, जो हमें सताते हैं, उन नर-पिशाच गोरों को मारकर मरना हजार दर्जे अच्छा है।”
इलाइजा ने सिसकते हुए कहा – “हे परमात्मन् दीनबंधु, हमपर दया करो। हम इतना ही माँगते हैं कि हम सबको इस देश से निर्विघ्न पार कर दो।”
जार्ज – “ईश्वर की इन अत्याचारियों से सहानुभूति है? क्या वह इनके अत्याचारों को देखता है? वह क्यों हम लोगों पर इतना अन्याय होने देता है? और वे अत्याचारी गोरे हमसे कहते हैं कि बाइबिल में गुलामी लिखी है। वास्तव में शक्ति ही सब कुछ है। उनके पास धन है, जन है, वे स्वस्थ हैं और सब तरह से सुखी हैं। इससे जो चाहते हैं, करते हैं। संसार की बुरी-से-बुरी बात को ये धर्म का फतवा दिला लेते हैं। इनका धर्म केवल ढोंग के सिवा और कुछ नहीं है। क्रिश्चियन कहलाने पर भी इनमें क्रिश्चियन का एक भी गुण नहीं है। जो बेचारे गरीब सच्चे क्रिश्चियन हैं, जिनमें ईसा की-सी सहनशीलता है, उन्हें ये धूल में लुटाते हैं और ठोकरें लगाते हैं। जहाँ तक बनता है, उन्हें सताते हैं। ये उन्हें खरीदते हैं और फिर बेचते हैं। उनके जिगर के खून का, उनकी आहों का, और उनके आँसुओं का सौदा करते हैं और ईश्वर उन्हें इसकी आज्ञा देता है।”
जार्ज की ये बातें सुनकर रसोईघर से साइमन ने पुकारकर कहा – “भाई जार्ज धीरज रखो। मेरी बात सुनो। ईश्वर बड़ा न्यायी है। सांसारिक माया-मोह में फँसे रहने के कारण हम उसकी लीलाओं को नहीं समझ सकते। तुम यह मत समझो कि जो बड़ा धनी है, ऐश्वर्यवान है, और जो बहुत लोगों पर हुकूमत करता है, वह बड़ा सुखी है। धन के नशे में बावले बने हुए विषय-मदांध अत्याचारी और दूसरों पर प्रभुता करनेवालों को इस संसार में तनिक भी सुख नहीं मिलता। आठों पहर चौसठ घड़ी उनके हृदय में अशांति की आग जला करती है। यदि तुम्हें उनके हृदय की वास्तविक स्थिति का पता होता तो तुम यों धन-संपत्ति और ऐश्वर्य के लिए ईश्वर से शिकायत न करते। तुम नहीं जानते कि अनेक अवसरों पर विपत्ति, दु:ख और दरिद्रता ही मनुष्य को पवित्र सुख और शांति प्रदान करती है। ऐश्वर्य के मद में मतवाला होकर मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है और अंत में दुर्लभ मानव-जीवन के महत्व को खो बैठता है। विपत्ति और संकट मनुष्य को बहुधा ईश्वर की ओर ले जाते हैं। वह दरिद्रता और वह विपत्ति, जो मनुष्य को ईश्वर की याद करा दे, उस ऐश्वर्य और प्रभुत्व से हजार गुनी अच्छी है, जो मनुष्य को ईश्वर का स्मरण नहीं होने देती। विश्वास और भक्ति की भी क्या अनोखी शक्ति है!”
साइमन ने अपने हृदय के गंभीर विश्वास के साथ जार्ज को यह उपदेश दिया था। अतः जार्ज के मन पर इसका असर हुआ और उसे इससे शांति मिली। इससे पहले जार्ज ने कितने ही क्रिश्चियन पादरियों के कितने ही उपदेश सुने थे, पर उसके मन पर उनका कोई प्रभाव न पड़ा। इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया। सत्य तो यह है कि यदि स्वयं उपदेश देनेवाले के मन में विश्वास और भक्ति न हो, तो वह चाहे जितना गला फाड़-फाड़कर उपदेश दिया करे, किसी पर उसका कुछ असर नहीं होता। और जो अपने सिद्धांत पर स्वयं चलता है, जिसे अपने सिद्धांतों से पूरी लगन है, उसकी बात में, उसके उपदेश में जादू का असर होता है। सच्चा उपदेशक अपने विश्वास की तस्वीर खींचकर रख देता है, क्या मजाल कि किसी के हृदय पर उसकी बात का असर न हो। साइमन ऐसे ही आदमियों में थे। उनका जीवन ही परोपकार के निमित्त था। ईश्वर पर उनकी अगाध भक्ति और श्रद्धा थी। वह संपूर्ण कार्यों को ईश्वर के निमित्त ही करते थे, फिर भला उनके उपदेश का असर जार्ज के हृदय पर क्यों न होता! ऐसे परोपकारी के उपदेश तो पत्थर को भी मोम बना देते हैं।
फिर राचेल प्रेम से इलाइजा का हाथ पकड़कर उसे भोजन कराने ले गई। वे सब लोग भोजन करने बैठे ही थे कि रूथ वहाँ आ पहुँची। रूथ और इलाइजा के परिचय का उल्लेख पहले हो चुका है। रूथ अपने साथ ऊनी मोजे और कुछ भोजन की सामग्री लाई थी। उसे इलाइजा को देकर बोली – “बहन, तुम्हारे बच्चे के पैर खाली देखकर कई दिन हुए मैंने ये मोजे बना रखे थे। अभी सुना कि तुम लोग यहाँ से चले जाओगे। इसी से जल्दी-जल्दी में हेरी के लिए मोजे और कुछ खाने को भी बनाकर लाई हूँ। बच्चों को हर वक्त कुछ-न-कुछ खाने को चाहिए ही।”
इतना कहकर रूथ ने हेरी को गोद में लेकर उसका मुँह चूमा और खाने की चीजें उसकी जेब में डाल दी।
इलाइजा बोली – “बहन, मुझपर तुम बड़ी कृपा करती हो। मैं इसके लिए तुम्हारी बड़ी कृतज्ञ हूँ और हृदय से तुम्हें धन्यवाद देती हूँ।”
राचेल ने कहा – “रूथ, आओ, तुम भी कुछ खा लो।”
रूथ – “नहीं, मैं इस समय ठहर नहीं सकती। मैं लड़के को जान को देकर आई हूँ और चूल्हे पर भात चढ़ा आई हूँ। मेरे जरा भी देर करने से जान की बेपरवाही से भात खराब हो जाएगा। और जो बच्चा रोया तो पास पड़ी हुई सारी चीनी वह उस लड़के को ही दे देगा। जब-तक वह ऐसा ही करता है।” जान रूथ का स्वामी था। इतना कहकर वह इलाइजा और जार्ज से विदा लेकर चली गई।
थोड़ी देर में सब के खा-पी चुकने पर एक बड़ी गाड़ी आई। सब लोग उसी में बैठ गए। फीनियस ने सबको ठीक से बैठा दिया। इलाइजा और जिम की वृद्ध माता गाड़ी के अंदर बैठीं। जिम और जार्ज सामने बैठ गए। फीनियस पीछे बैठा। जार्ज ने जरा मंद पर दृढ़ स्वर में पूछा – “जिम, तुम्हारी पिस्तौल तो ठीक है न!”
जिम – “जी हाँ, सब ठीक है।”
जार्ज – “उन लोगों से भेंट होने पर अवश्य तुम उसका उपयोग करोगे?”
जिम – (छाती फुलाकर और एक गहरी साँस ले कर) “इसमें भी क्या शक है? तुम क्या सोचते हो कि प्राण रहते मैं उन्हें अपनी माँ को फिर ले जाने दूँगा?”
गाड़ी चलने की तैयारी होने पर साइमन ने कहा – “मेरे बंधुओ, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे! तुम लोगों के सकुशल पहुँच जाने की खबर पाकर मुझे बड़ा आनंद होगा।”
इस पर गाड़ी में से सब बोले – “ईश्वर आपका भला करे।”
गाड़ी में बातचीत करने का सुभीता न था। एक तो रास्ता खराब था, दूसरे पहियों की घड़घड़ाहट भी कम न थी। हेरी अपनी माता की गोद में शीघ्र ही सो गया, पर भय के मारे बुढ़िया और इलाइजा की आँखों में नींद कहाँ! बड़ी दुविधा और उत्कंठा में उनका समय बीत रहा था। थोड़ी रात रहे मालूम हुआ कि गाड़ी पाँच-सात कोस निकल आई है। तब धीरे-धीरे उन लोगों की चिंता घटी। इस समय इलाइजा को कुछ तंद्रा-सी आ रही थी। फीनियस सारी रात गाड़ी के पीछे खड़ा रहा। रास्ते की थकावट दूर करने के लिए वह रात भर तरह-तरह के गीत गाता रहा।
रात को तीन बजे के करीब पीछे से जार्ज को घोड़ों की टापें सुनाई दीं। जार्ज ने फीनियस को यह बात बताई। उसने भी ध्यान से सुना। सुनकर कहा – “मैं समझता हूँ, माइकल होगा, मैं उसके घोड़े की टापों को पहचानता हूँ।” फिर वह सिर उठाकर पीछे घूम कर देखने लगा। एक सवार सरपट घोड़ा दौड़ाए दूर से आता दिखाई दिया।
फीनियस बोला – “हाँ-हाँ, वही तो है।”
जार्ज और जिम दोनों उछलकर गाड़ी से बाहर आ गए। सब चुपचाप खड़े आगंतुक की बाट देख रहे थे। अब वह एक दर्रे से उतर गया, जहाँ से वह उसे देख न सके, पर शीघ्र ही फिर वह उन्हें पहाड़ की चोटी पर दिखाई दिया।
फीनियस बोला – “है-है, माइकेल ही है। लो, यह आ गया।”
माइकेल ने पास आकर कहा – “फीनियस, तुम लोग यहाँ तक आ गए?”
फीनियस – “कहो, क्या खबर है? वे आ रहे हैं?”
माइकेल – “हाँ, वे पीछे चले आ रहे हैं। दस-बारह हैं। शराब के नशे में चूर हैं, लाल-लाल आँखें हैं। मुझे तो जंगली भेड़िए-जैसे लगते हैं।” ये बातें समाप्त हुई थीं कि पीछे से घोड़ों की टापों की खटखट सुनाई देने लगी।
फीनियस गाड़ी से कूद पड़ा। घोड़ों की लगाम जोर से खींचते हुए वह गाड़ी को रास्ते से हटाकर एक पहाड़ की तलहटी में ले गया। अब वे सब पीछा करनेवाले साफ-साफ दिखाई देने लगे। इलाइजा चिल्लाने लगी और बड़ी दृढ़ता से लड़के को अपनी गोद में चिपका लिया। जिम की वृद्ध माता कहने लगी – “हे भगवान बचाओ, हे भगवान, बचाओ! बचाओ!” जार्ज और जिम पिस्तौल तान करके नीचे खड़े हो गए। फीनियस ने सबसे कहा – “तुम लोग सब गाड़ी से उतर आओ और इस चट्टान पर चढ़ जाओ।” माइकेल से कहा कि तुम शीघ्र गाड़ी लेकर आमारिया के घर की ओर चले जाओ और उसे तथा उसके पुत्रों को साथ ले आओ।
फिर फीनियस ने हेरी को इलाइजा की गोद से लेकर अपने कंधे पर चढ़ा लिया और जल्दी-जल्दी चट्टान पर आगे-आगे चढ़ने लगा। बहुत शीघ्र ये लोग चट्टान पर चढ़ गए। वहाँ पहुँचकर फीनियस बोला – “अब तो तुम लोग रास्ते से मेरे गाड़ी हटा लेने और इस चोटी पर चढ़ आने का मतलब समझ गए होगे। यहाँ के सब घाट मेरे जाने हुए हैं। यह चोटी ऐसी है कि यहाँ एक आदमी पिस्तौल लेकर खड़ा हो जाए तो सौ आदमियों को हरा सकता है। इस चोटी पर एक साथ दो आदमियों के चढ़ने का रास्ता ही नहीं है। जो कोई हिम्मत करके आने की कोशिश करेगा, उसी को गोली मारकर गिरा दिया जाएगा।”
जार्ज ने कहा – “ठीक है, मैं तुम्हारी चतुराई की प्रशंसा करता हूँ। पर अब तुम बैठ जाओ। हमारा मामला है, जो कुछ बुरा-भला होगा, हम समझें-बूझेंगे, हम लड़-भिड़ लेंगे।”
फीनियस ने हँसकर कहा – “अच्छा, तुम अकेले ही लड़ना। यहाँ से लड़ने में कई आदमियों की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी। एक आदमी ही काफी होगा। मैं खड़ा-खड़ा तमाशा देखूँगा। देखो, जरा नीचे की ओर देखो, वे सब खड़े-खड़े क्या सलाह कर रहे हैं। सब बिल्ली की-सी आँखें निकाल रहे हैं। उनके घूरने से ऐसा जान पड़ता है मानो एक ही छलांग में ऊपर आकर हम लोगों को खा लेंगे। अच्छा, पहले जरा इनसे पूछा तो जाए कि ये हजरत क्यों तशरीफ लाए हैं और क्या चाहते हैं? अगर कहें कि तुम लोगों को गिरफ्तार करने आए हैं, तो कह दिया जाए कि सीधी तरह अपना रास्ता नापो, नहीं तो सब अपनी जान से हाथ धो बैठोगे। इस बात पर अगर लौट जाएँ तो फिर झगड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं रहेगी।”
पकड़ने को आनेवालों में दो तो पाठकों के पूर्व-परिचित टॉम लोकर और मार्क ही थे। ये दोनों सबसे आगे खड़े थे। उनके पीछे दो सिपाही थे। साथ में और भी कई मतवाले थे। इनमें से एक मतवाले ने कहा – “दादा, लोग अच्छी जगह पहुँच गए हैं।”
टॉम लोकर – “यह रहा रास्ता। सब इसी रास्ते पर चढ़े हैं। मैं भी इसी रास्ते चढ़ता हूँ। आज वे नहीं भागने पाएँगे। जल्दी में कहीं कूदे तो हड्डियाँ चूर-चूर हो जाएँगी।”
मार्क – “अरे लोकर, जरा सँभलकर आगे बढ़ो। चट्टान की आड़ से किसी ने गोली दागी तो सीधे जहन्नुम पहुँचोगे।”
टॉम लोकर – “अहं, तुम्हें जब देखो तब जान ही की पड़ी रहती है, मारे डर के मरे जाते हो। क्या खतरा है? ये हब्शी गुलाम बेचारे क्या खाकर गोली चलाएँगे! एक धमकी में ही रोते-रोते नीचे उतर आएँगे।”
मार्क – “क्यों, जान की क्यों नहीं पड़ी रहेगी। रुपयों के लिए जान दूँगा? जान है तो जहान है। गुलाम समझकर मत भूलो। कभी-कभी ये काले गुलाम ही दैत्य की तरह युद्ध करते हैं। एक काला तीन गोरों को जहन्नुम की राह दिखा सकता है।”
इसी समय जार्ज ने उनके सामने की एक चोटी पर आकर बड़े धीरे और शांत भाव से स्पष्ट शब्दों में कहा:
“सज्जनों, आप लोग कौन हैं? क्या चाहते हैं?”
लोकर – “हम लोग भगोड़े गुलामों के एक दल को पकड़ने आए हैं। भगोड़ों के नाम हैं जार्ज हेरिस, इलाइजा और उनका लड़का, तथा जिम सेलडन और उसकी बूढ़ी माँ। हमारे साथ गिरफ्तारी के परवानों सहित पुलिस के कर्मचारी आए हैं। तुम केंटाकी प्रदेश के शेल्वी परगने के हेरि साहब के गुलाम जार्ज हेरिस हो न?”
जार्ज – “जी हाँ, मैं ही जार्ज हेरिस हूँ। केंटाकी के एक हेरिस साहब मुझे अपनी संपत्ति समझते हैं, किंतु इस समय स्वतंत्र हूँ, परमेश्वर के राज्य में स्वाधीनतापूर्वक विचरता हूँ और मेरी स्त्री-पुत्र पर भी मेरे सिवा और किसी का अधिकार नहीं है। जिम और उसकी माता भी यहीं हैं। अपनी रक्षा के लिए हम लोगों के पास शस्त्र हैं और जरूरत हुई तो हम लोग उनका उपयोग भी करेंगे। तुम्हारी खुशी हो तो ऊपर आओ। पर याद रखो, जो कोई पहले ऊपर चढ़ा, वह हमारी गोली का निशाना बनकर यमपुर की राह नापेगा। उसके बाद फिर जो कोई आएगा, उसकी भी यही गति होगी। और अंत में एक-एक करके सबको जान से हाथ धोना पड़ेगा।”
मार्क बोला – “आओ-आओ, जल्दी नीचे उतर आओ, खड़े-खड़े बकवाद मत करो। तुम्हारे बोलने की जगह नहीं है। तुम देखते नहीं कि पुलिस-कानून हमारे साथ है। हम लोग कानून से चले हैं, तुम लोगों को पकड़ने का हमें अधिकार है। बहुत चीं-चपड़ न करो, जल्दी नीचे उतर आओ।”
जार्ज – “अजी, मैं खूब जानता हूँ कि तुम लोग कानून से चले हो और तुम्हारे हाथ में शक्ति है। तुम चाहते हो कि मेरी स्त्री को ले जाकर नवअर्लिंस में बेच डालो, मेरे बच्चे को बकरी के बच्चे की भाँति किसी व्यवसायी के कसाईखाने में बेच डालो और जिम तथा उसकी माता को उसके उसी नरपिशाच मालिक को सौंप दो। वहाँ पर वह इस बुढ़िया पर बेंत फटकारेगा और इसी के सामने इसके लड़के की जान लेगा। बस, यही तुम्हारा मतलब है। जहन्नुम में गया तुम्हारा कानून। मैं ऐसे कानून पर लात मारता हूँ, जो केवल गरीबों को सताने और धनिकों को फायदा पहुँचाने के लिए बना हो। लानत है तुम्हारे उस कानून पर और उस कानून के अनुसार चलनेवालों और विचार करनेवालों पर। हम इस कानून की जरा भी परवा नहीं करते। और न हम इसे अपना कानून मानते हैं, न तुम्हारे मुल्क ही को अपना देश समझते हैं। हम लोग यहाँ विस्तीर्ण आकाश के नीचे खड़े हुए उतने ही स्वाधीन हैं, जितने तुम लोग। हम भी उसी ईश्वर के बनाए हुए हैं जिसने तुमको बनाया है। हम मरते दम तक अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ेगें। हमारा मूल मंत्र है – स्वाधीनता या मृत्यु।”
उपर्युकत बातों को करते समय जार्ज को बड़ा जोश आ गया। उसका चेहरा बहुत भयंकर हो गया। उसकी आँखों में क्रोध की लाली छा गई, मानो उनसे आग की चिनगारियाँ बरस रही हों। उसके ओठ फड़कने लगे और उसके दाहिना हाथ उठाकर बोलने के समय ऐसा जान पड़ने लगा, मानो वह देश में फैले हुए अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध परमपिता जगदीश्वर के सिंहासन के सम्मुख अपील करता हुआ न्याय का पक्ष समर्थन करता हो। यदि किसी अंग्रेज युवक ने इंग्लैंड से अमेरीका को भगाते हुए ऐसी वीरता प्रकट की होती तो इतिहास में स्वर्णाक्षरों में उसका नाम लिखा जाता, पर क्रीत दासी के गर्भ से उत्पन्न गुलाम जार्ज की वीरता को गोरे इतिहास-लेखक कब स्वीकार करने लगे?
जार्ज की बातें सुनकर और उसके मुख का विकट भाव देखकर पकड़नेवाले सहम गए। वास्तव में कभी-कभी साहस और दृढ़ प्रतिज्ञा बड़े-बड़े बलवानों की छाती भी दहला देती है। मार्क को छोड़कर और सबकी हिम्मत जाती रही। अब मार्क ने निशाना ताककर जार्ज पर गोली चलाई। वह मन-ही-मन सोचने लगा कि इसकी लाश इसके मालिक को देकर उससे विज्ञापन में लिखा हुआ इनाम वसूलकर लूँगा।
इधर जार्ज उछलकर पीछे हट गया। इलाइजा चीख उठी। गोली उसके पास से सनसनाती हुई निकल गई। जार्ज ने कहा – “इलाइजा, डरो मत। कोई खतरे की बात नहीं।”
फीनियस ने आगे बढ़कर जार्ज से कहा – “इलाइजा को समझाने-बुझाने का यह समय नहीं है। इन दुष्टों का मार्ग बंद करना चाहिए। ये बड़े ही कमीने हैं।”
जार्ज – “जिम, देखो तुम्हारी पिस्तौल ठीक है? जो कोई पहला आदमी चढ़ने की चेष्टा करेगा, उस पर मैं गोली दाग दूँगा। दूसरे को तुम लेना, यही क्रम रहेगा। एक मैं और एक तुम। एक आदमी के लिए दो गोलियाँ बेकार खर्च नहीं की जाएँगी।”
जिम – “अगर तुम्हारा निशाना चूक गया तो फिर क्या करना होगा?”
जार्ज ने जोश से कहा – “ऐसा नहीं होगा। मेरा निशाना बिल्कुल ठीक बैठेगा।”
फीनियस ने मन-ही-मन जार्ज के साहस को सराहा।
मार्क का निशाना चूका देखकर उसका दल सोचने लगा कि अब क्या किया जाए!
लोकर बोला – “मैं इन काले हब्शियों से कभी नहीं डरा और न इस समय डरता हूँ।”
इतना कहकर वह पहाड़ पर चढ़ने लगा। और लोग उसके पीछे-पीछे चलने लगे। कुछ दूर जाते ही जार्ज ने लोकर को ताककर गोली मारी, जो उसकी भुजाओं में लगी। किंतु चोट खाकर भी वह लौटा नहीं। पागल सांड की तरह आगे ही बढ़ता गया। तब फीनियस ने कहा – “मित्र, यहाँ तुम्हारी जरूरत नहीं, नीचे ही चलो।” यह कहकर उसने उसको धकेल दिया। लोकर एकदम वहाँ से लड़खड़ाता हुआ नीचे गिरा। इतनी ऊँचाई से गिरने पर वह अवश्य मर जाता, परंतु बीच में एक पेड़ से अटक जाने के कारण उसके ऊपर से गिरने का वेग कुछ घट गया। इससे वह मरा तो नहीं, पर जख्मी होकर बेहोश हो गया।
मार्क – “ईश्वर कुशल करे, सब-के-सब साक्षात दैत्य हैं। भागो, भागो, लौट चलो।”
अब तक सिपाही देवता चुप थे, पर लौटते समय भागने में वे भी बड़ी तेजी दिखाने लगे। यह उस श्रेणी के व्यक्ति थे, जो मारनेवालों के तो पीछे और भागनेवालों के आगे रहते हैं। फिर मार्क ने सिपाहियों को बुलाकर कहा – “भाई, तुम लोग जरा देखना, मैं अभी और सिपाहियों को लेकर आता हूँ।”
इतना कहकर वह घोड़े पर चढ़कर नौ-दो-ग्यारह हो गया।
उनमें से एक ने कहा – “क्या तुमने कभी ऐसा अधम कीट देखा था? बेईमान अपने ही काम के लिए हम लोगों को लाया और हम लोगों को इस आफत में फँसाकर आप साफ चलता बना। खैर, चलो, उसे बेचारे वीर लोकर की तो खबर ली जाए कि मरता है या जीता।”
लोकर के पास आकर उनमें से एक बोला – “कहो, हम लोगों के साथ चल सकोगे? क्या तुम्हें चोट ज्यादा लगी है?”
लोकर – “क्या पता, एक बार मुझे उठाकर तो देखो। यह क्वेकर न होता तो मैं और सभी को आनन-फानन में पकड़ लेता।”
फिर दोनों ने किसी तरह सहारा देकर लोकर को घोड़े पर लादा। इधर घोड़े का हिलना था कि वह धड़ाम से जमीन पर आ रहा। यह दशा देखकर दोनों सिपाहियों ने सोचा कि यह तो बड़ी आफत है। इसे लेकर सारी रात मुसीबत में भी कौन फँसे!
यह सोचकर उन दोनों सिपाहियों ने लोकर को उसी दुर्दशा में छोड़कर अपनी-अपनी राह पकड़ी। लोकर मुर्दे की भाँति वहीं पड़ा रहा।
लोकर को छोड़ और सबके चले जाने पर वह दल नीचे उतरा। इधर स्टीपन, आमारिया और दूसरे दो क्वेकरों को साथ लेकर माइकेल गाड़ी समेत वहाँ पहुँच गया। इलाइजा ने पहाड़ के नीचे आते ही लोकर को देखकर कहा – “देखना चाहिए कि इसमें साँस बाकी है या नहीं? मैं तो भगवान से यही मनाती हूँ कि यह मरा न हो।”
फीनियस – (मुस्करा कर) “बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। लेकिन इसके उन नालायक साथियों को क्या कहा जाए, जो इस बेचारे को इस दशा में छोड़कर चल दिए!”
इलाइजा – “यह बेचारा घावों की पीड़ा से छटपटा रहा है। हम लोगों को इसकी सेवा का प्रयत्न करना चाहिए।”
जार्ज – “इसकी जीवन-रक्षा का उपाय अवश्य किया जाएगा। दुश्मन पर दया करना ईसाई धर्म का एक अंग है।”
फीनियस – “मैं इसे लेकर किसी क्वेकर के यहाँ रखूँगा। फिर सेवा-शुश्रूषा और दवा-पानी से आराम हो जाने पर इसे इसके घर पहुँचा दूँगा। इसे यों छोड़ चलना बड़ी नीचता का काम होगा। देखो तो, इसकी क्या दशा है?”
लोकर के निकट जाकर फीनियस ने उसके शरीर की जाँच की। पहले फीनियस एक नामी शिकारी था। इससे वह घाव की मरहम-पट्टी तथा बहते हुए रक्त-प्रवाह को रोक देने की विधि खूब जानता था। वह अपनी जेब से रूमाल निकालकर पट्टी फाड़-फाड़कर लोकर के घावों पर बाँधने लगा। लोकर ने कहा – “मार्क!”
फीनियस हँसकर बोला – “मार्क कहाँ है? वह तो तुम्हें छोड़कर भाग गया। सिपाही भी चलते बने। हम लोग अब तक तुम्हारे शत्रु थे, पर अब हम लोगों को अपना शुभचिंतक समझो। जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हारी पीड़ा दूर करने का यत्न करेंगे।”
लोकर – “मैं बचता नहीं जान पड़ता। नीच कुत्ते मुझे छोड़कर चले गए। मेरी माँ मुझसे सदा करती थी कि ये साथी विपदा में तेरा साथ न देंगे। उसकी बात आज सच निकली।”
जिम की माता ने कहा – “इसकी माँ है। ओफ, उसे कितना कष्ट होगा? हे ईश्वर, इसे जीवन-दान दो।”
लोकर ने फीनियस से अपना हाथ झटककर छुड़ा लिया और तेज होने लगा। तब फीनियस ने कहा – “मित्र, जरा धीरज रखो। बहुत लाल-पीले मत पड़ो।”
लोकर बोला – “तुम्हीं ने तो मुझे धकेल दिया था।”
फीनियस – “जी हाँ, अगर मैं तुम्हें धकेल न देता तो तुम हम सबों को धकेल देते। अब उन बातों को जाने दो। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे घावों पर फौरन पट्टी बाँध दी जाए। अब धक्का-मुक्की का काम नहीं है। अब मैं तुम्हारी भलाई ही करूँगा। चलो, तुम्हें किसी क्वेकर के परिवार में पहुँचा दूँ। वहीं तुम्हारी बहुत अच्छी सेवा होगी – इतनी अच्छी कि शायद तुम्हारी माता भी उससे बढ़कर न करती।”
शारीरिक यंत्रणा के कारण लोकर अचेत हो गया। सबने उसे पकड़कर गाड़ी में लिटाया। फिर सब लोग गाड़ी पर बैठे। गाड़ी चल पड़ी। जिम की माँ ने अपनी गोद में लोकर का सिर रख लिया। इलाइजा, जार्ज और जिम सब उसके लिए काफी जगह छोड़कर बैठे।
जार्ज ने फीनियस से पूछा – “आप क्या सोचते हैं कि लोकर अवश्य बच जाएगा?”
फीनियस – “हाँ, जरूर बच जाएगा। बेहोश तो वह ज्यादा खून निकल जाने की वजह से हो गया है। इसमें शक नहीं कि यह बहुत जल्दी अच्छा हो जाएगा।”
जार्ज – “आपकी बात सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। यद्यपि मैंने अपनी जान बचाने के लिए इस पर गोली चलाई थी, फिर भी यदि मेरे हाथ से इसकी मौत हो जाती तो सदा के लिए मेरे माथे पर इसका कलंक लग जाता। अब कहो, इसका करोगे क्या?”
फीनियस बोला – “हमारे क्वेकर संप्रदाय में ग्रांडमय स्टीफन नाम की एक वृद्ध स्त्री है। वह बड़ी दयालु है। इसे उसके यहाँ पहुँचा देने से इसकी खूब सेवा होगी।”
घंटे भर में सब लोग एक साफ-स्वच्छ घर के सामने पहुँचे। लोकर को सब लोगों ने पकड़कर उतारा और वहाँ उस घर में उसे बहुत अच्छे और मुलायम बिस्तरे पर लिटा दिया। बड़ी मुस्तैदी से उसकी सेवा होने लगी।
20. सच्ची प्रभु-भक्ति
सदाचार और सुशीलता का सभी जगह आदर होता है। जिसके हृदय में धर्मभाव और साधुभाव का राज्य है, उसके लिए इस संसार में, किसी दशा में, विपत्ति और कष्ट का भय नहीं है। ऐसे आदमी को सभी प्यार करते हैं। सचमुच सद्भाव के प्रभाव से पाषाण-हृदय भी नरम पड़ जाता है। दया, उदारता, स्नेह, सच्चे त्याग और नि:स्वार्थ प्रेम के सम्मुख लोगों का सिर सदा झुका रहता है। इसी से टॉम अपने निष्कपट सरल व्यवहार के कारण दिन-प्रति-दिन अपने मालिक की आँखों में चढ़ता गया।
रुपए-पैसे के मामले में सेंटक्लेयर बड़ा लापरवाह था। वह अपने आय-व्यय का कोई लेखा-जोखा नहीं रखता था। उसका एडाल्फ नामक गुलाम ही हाट-बाजार तथा खर्च आदि का काम किया करता था। वह भी अपने मालिक के समान लापरवाह आदमी था, बेहिसाब खर्च करता था। पर टॉम के आने पर सेंटक्लेयर मौके-मौके से उससे काम लेने लगा। उसकी चतुराई और ईमानदारी देखकर सेंटक्लेयर ने शीघ्र ही अपने रुपए-पैसे एवं खर्च का कुल काम उसको सौंप दिया।
अपने हाथ से खर्च का अधिकार निकल जाने के कारण एडाल्फ कुछ उदास हुआ और मुँह बनाने लगा। इस पर सेंटक्लेयर ने कहा – “नहीं-नहीं, एडाल्फ, यह काम तुम टॉम को ही करने दो। तुम केवल खर्च करना जानते हो और टॉम खर्च और आमद, दोनों को समझता है। इस काम के लिए यदि हम किसी ऐसे आदमी को नियत न करें तो यों ही करते-करते एक दिन रुपयों का तोड़ा हो सकता है।”
टॉम सेंटक्लेयर का काम बड़ी ही ईमानदारी से करता था। उससे कभी किसी खर्च का हिसाब नहीं पूछा जाता था। वह यदि चाहता तो बेईमानी से बहुत रुपए बना लेता; पर वह अधर्म की कौड़ी लेना महापाप समझता था।
सेंटक्लेयर को मालिक जानकर टॉम उसका बड़ा सम्मान करता था, पर इस सम्मान के भाव में दूसरा ही रंग पकड़ा। टॉम बूढ़ा और सेंटक्लेयर नौजवान था। टॉम गंभीर और सेंटक्लेयर चंचल-चित्त था। इससे सेंटक्लेयर के संबंध में टॉम के हृदय में पितृ-वात्सल्य का संचार होने लगा। टॉम ने देखा कि सेंटक्लेयर का हृदय तो बड़ा दयालु है, किंतु वह न कभी बाइबिल पढ़ता है, न कभी उठते-बैठते ईश्वर का भजन ही करता है, न गिर्जे में जाकर कभी ईश्वर की वंदना करता है। वह तो सदा हँसी-खुशी में मग्न रहता है। थियेटर जाने का उसे शौक है। कभी-कभी अपने जैसे चंचल-चित्तवाले युवकों में बैठकर खूब शराब पीकर पागल बन जाता है। ये बातें देखकर टॉम के मन में बड़ा दु:ख होता था। ऐसा दयालु, सरल-प्रकृति, सहृदय व्यक्ति ईश्वर से अलग पड़ा है, उपासना-हीन जीवन व्यतीत कर रहा है, टॉम के लिए यह बड़े ही कष्ट का विषय था। वह नित्य अपनी प्रार्थना में ईश्वर से विनती करता – “भगवान, इस युवक की मति सुधार दो, उसका हृदय पलट दो! इसके हृदय में धर्म तथा अपनी भक्ति की तृष्णा उत्पन्न कर दो!”
एक दिन की बात है। सेंटक्लेयर ने कहीं बहुत अधिक शराब पी ली और बड़ी रात गए गिरता-पड़ता घर आया। उस समय टॉम और एडाल्फ ने उसे गाड़ी से उतारकर खाट पर सुलाया। सेंटक्लेयर की यह दशा देखकर एडाल्फ हँसने लगा। पर टॉम कुछ न बोल सका। उसकी आँखों से आँसू झरने लगे। टॉम का यह भाव देखकर एडाल्फ और भी हँसने लगा। किंतु टॉम को उस रात बिल्कुल नींद नहीं आई। वह रात भर बैठा-बैठा ईश्वर से मालिक के सुधार के लिए प्रार्थना करता रहा। सबेरे सेंटक्लेयर ने टॉम को कहीं भेजने के लिए बुलाया। टॉम जब आकर खड़ा हुआ तो उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं। उसको कुछ रुपए देकर सेंटक्लेयर ने किसी काम के लिए जाने को कहा, किंतु टॉम वहीं खड़ा रहा। तब सेंटक्लेयर ने पूछा – “टॉम, मैं कुछ भूल गया हूँ?”
टॉम – “नहीं, मुझे कहते डर लगता है।”
सेंटक्लेयर ने हाथ का अखबार मेज पर पटक दिया तथा चाय का प्याला भी छोड़ दिया और टॉम की ओर देखने लगा। उसने पूछा – “क्यों टॉम, मामला क्या है? तुम्हारा चेहरा देखकर तो जान पड़ता है, मानो कोई बड़ी भारी विपदा आ पड़ी है।”
टॉम – “प्रभु, मुझे बड़ा दु:ख हो रहा है। मैं समझता था कि मालिक सदा सबके साथ समान व्यवहार करते हैं।”
सेंटक्लेयर – “तो क्या तुम्हारा यह खयाल ठीक नहीं उतरा? अब बोलो, तुम क्या चाहते हो? मैं समझता हूँ कि तुम कोई चीज चाहते होगे और वह तुम्हें नहीं मिली होगी, यह उसी की भूमिका है।”
टॉम – “प्रभु, इस दास पर तो आपकी सदा ही कृपा बनी रहती है। अपने विषय में मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं करनी है, किंतु एक आदमी से आपका बर्ताव अच्छा नहीं होता?”
सेंटक्लेयर – “क्यों, मैंने किससे बुरा बर्ताव किया? अपना मतलब खोलकर कहो।”
टॉम – “कल रात की घटना का स्मरण करने से मुझे बड़ा खेद होता है। आप सब पर तो दया करते हैं, केवल अपने ऊपर आप बड़े निर्दयी हैं।”
सेंटक्लेयर ने मुस्कराकर कहा – “ओह, यह बात है!”
टॉम ने सिर झुकाकर बड़ी नम्रता से आँखों में आँसू भरकर, पैरों पर पड़कर कहा – “प्रभु, यही बात थी, जो मैं आपसे कहना चाहता था। मेरे प्यारे नवयुवा प्रभु! मुझे भय है कि यह सबकुछ, सबकुछ, शरीर-आत्मा का सत्यानाश कर देगा। बाइबिल में लिखा है कि यह बला सर्प से भी भयंकर और बुरी है, मेरे प्यारे प्रभु!”
टॉम का गला भर आया और उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह चली।
सेंटक्लेयर की भी आँखें भर आईं। उसने कहा – “टॉम, उठो। तुम भी कितने नासमझ हो। तुम्हें जरा भी अक्ल नहीं है। मैं इस योग्य नहीं कि मेरे लिए कोई रोए।”
पर टॉम नहीं उठा। वह सेंटक्लेयर की ओर इस तरह ताकने लगा, मानो उसके नेत्र विनती कर रहे हों।
टॉम की यह दशा देखकर कोमल-हृदय सेंटक्लेयर बोला – “टॉम, लो, मैं आज से प्रतिज्ञा करता हूँ कि फिर कभी इतनी शराब नहीं पीऊँगा। फिर कभी बुरों का साथ नहीं करूँगा। मैं अपने चरित्र से स्वयं घृणा करता हूँ। मैं अपने जीवन को पापमय समझता हूँ। तुम बेफिक्र रहो, मैं अब फिर बुरा काम नहीं करूँगा।”
इतना कहकर सेंटक्लेयर ने टॉम का हाथ पकड़कर उसे उठाया।
सेंटक्लेयर की प्रतिज्ञा सुनकर टॉम को बड़ा संतोष हुआ और आँखों का पानी पोंछता हुआ चला गया।
टॉम के चले जाने पर सेंटक्लेयर कहने लगा कि मैंने आज जो प्रतिज्ञा की है, उसे कभी नहीं तोड़ूँगा।
सचमुच उस दिन से सेंटक्लेयर ने मद्यपान छोड़ दिया। वह स्वभावतः इंद्रियासक्त अथवा कुप्रवृत्ति के अधीन न था। लड़कपन से ही लोग उसे सच्चरित्र समझते थे। पर इधर संसार से उसे विराग-सा हो गया था। संसार की टेढ़ी गति देखकर किसी काम में उसका मन न लगता था। उसके जीवन का कोई लक्ष्य न था। उसका यह लक्ष्य-शून्य जीवन घटना-चक्र के अनुसार चलता था। इसी से समय काटने के लिए उसे जब जैसा संग मिलता, वह उसी में रम जाता और हँसी-खुशी मनाता था। महीनों की कौन कहे, लगातार वर्ष-के-वर्ष यों ही बिना कष्ट के बीत जाते थे।
21. घर की देख-भाल
कुछ दिनों बाद बुढ़िया प्रू की जगह एक दूसरी स्त्री बिस्कुट और रोटियाँ लेकर आई। उस समय मिस अफिलिया रसोईघर में थी। दीना ने उस स्त्री से पूछा – “क्यों री, आज तू रोटी कैसे लाई है? प्रू को क्या हुआ?”
“प्रू अब नहीं आएगी” , उस स्त्री ने यह बात ऐसे ढंग से कही, जैसे इसमें कुछ रहस्य हो। दीना ने पूछा – “क्यों नहीं आएगी? क्या वह मर गई?”
उस स्त्री ने मिस अफिलिया की ओर देखते हुए कहा – “हम लोगों को ठीक-ठीक मालूम नहीं है। वह नीचे के तहखाने में है।”
मिस अफिलिया के रोटियाँ ले लेने के बाद दीना उस स्त्री के पीछे-पीछे दरवाजे तक गई। उससे पूछा – “प्रू है कहाँ? कुछ तो कह!”
वह स्त्री कहना चाहती थी, पर डर से नहीं कह रही थी। अंत में दबी जबान से चुपके-चुपके बोली – “अच्छा देख, तू किसी से कहना मत। प्रू ने एक दिन फिर शराब पी ली, इस पर उन लोगों ने उसे नीचे के तहखाने में बंद करके दिन भर रख छोड़ा। फिर मैंने लोगों को कहते सुना कि उसके शरीर पर मक्खियाँ भिन-भिना रही हैं और वह मरी पड़ी है।”
यह सुनकर दीना ने विस्मय से हाथ उठाया और पीछे हट गई। तभी देखती क्या है कि इवान्जेलिन उसके पास खड़ी है। इवा की आँखें स्थिर हैं, मुँह सूख गया है, गालों और होंठों की सुर्खी गायब होकर सफेदी छा रही है। दीना चिल्ला उठी – “बाप-रे-बाप! भगवान बचाएँ! इवा बेहोश हो रही है। अरे, हम लोगों को क्या पड़ी थी जो उसे ये सब बातें सुनने दीं? मालिक को पता लगने से वह बहुत नाराज होंगे।”
बालिका ने दृढ़ता से कहा – “मुझे बेहोशी नहीं होगी। और मुझे ये बातें सुननी क्यों नहीं चाहिए? कष्ट की बातें सुनने में मुझे उतनी पीड़ा नहीं होगी, जितनी प्रू को कष्ट सहने में।”
दीना ने कहा – “नहीं, तुम-सरीखी कोमल नन्हीं बालिकाओं को ये कष्ट-कथाएँ नहीं सुननी चाहिए। इन बातों से तुम्हें बड़ी पीड़ा होती है।”
इवा ने फिर ठंडी साँस ली, और बड़े वितृष्ण चित्त से पैर धरती हुई दुमंजिले कमरे में चली गई।
मिस अफिलिया ने प्रू के बारे में बड़ी सरगर्मी से पूछताछ की। दीना से जो कुछ सुना था, उसे खूब नमक-मिर्च लगाकर कह सुनाया। टॉम ने अपने पहले दिन की तहकीकात सुनाई।
सेंटक्लेयर जिस कमरे में बैठा अखबार पढ़ रहा था, उसमें जाकर पैर रखते ही मिस अफिलिया ने कहा – “ओफ, कैसा बीभत्स कांड है! कैसा जघन्य व्यापार है!”
सेंटक्लेयर ने पूछा – “जीजी, आज कौन-सा अधर्म का पहाड़ टूट पड़ा?”
मिस अफिलिया बोली – “तुम्हारे लिए कोई बात ही नहीं है। मैंने तो ऐसी बात कभी नहीं सुनी। उन लोगों ने मारे कोड़ों के प्रू को मार डाला।” मिस अफिलिया ने बहुत विस्तार से वह बात कह सुनाई।
सेंटक्लेयर ने अखबार पढ़ते-पढ़ते कहा – “मैंने तो पहले से समझ रखा था कि किसी दिन यही होना है।”
अफिलिया बोली – “तुमने समझ रखा था और इसके प्रतिकार का कोई उपाय नहीं किया! क्या तुम्हारे यहाँ ऐसे पाँच भलेमानस नहीं हैं, जो मिलकर इन निष्ठुरताओं का निवारण करने का यत्न करें।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “जो अपने दास-दासियों की जान लेता है, वह स्वयं अपना माल नष्ट करता है। इसमें दूसरे को बोलने का कोई अधिकार नहीं। अपना नफा-नुकसान हरेक आदमी दूसरे की अपेक्षा अच्छी तरह समझता है। भरसक अपने दास-दासियों को मारकर अपना नुकसान कोई नहीं करता, पर प्रू पैसे चुरा-चुराकर शराब पीती थी, इससे उसके मालिक का बहुत नुकसान होता था, इसी से उसे मार डाला होगा।”
मिस अफिलिया ने कहा – “अगस्टिन, वास्तव में यह बड़ा ही भयंकर धंधा है। निश्चय ही इसके लिए तुम्हें ईश्वर का कोप-भाजन बनना पड़ेगा।”
सेंटक्लेयर बोला – “प्यारी जीजी, मैंने कभी ऐसा नहीं किया, पर मैं दूसरों को नहीं रोक सकता। यदि नीच पशु के जैसे मनुष्य अपनी इच्छानुसार यह अत्याचार करते हैं तो बताओ, मैं उसमें क्या करूँ? कानूनन हर आदमी अपने-अपने दास-दासियों पर पूर्ण अधिकार रखता है। दास-दासियों को जान से मारकर भी कोई दंड नहीं पा सकता। जब कानून ने उन्हें इतना अधिकार दे रखा है तो कोई क्या कर सकता है? इसलिए सबसे भली बात चुप रहना है। उधर से अपने आँख-कान बंद किए बैठे हैं। जो होता है सो होता है।”
मिस अफिलिया ने कहा – “तुम कैसे अपनी आँखों और कानों को इधर से बंद कर लेते हो? तुम कैसे चुपचाप ये अत्याचार होने देते हो? इस भयंकर आचरण की कैसे उपेक्षा की जा सकती है?”
सेंटक्लेयर बोला – “बहन, तुम क्या आशा करती हो? देखो, यह एक मूर्ख, आलसी, भले-बुरे का ज्ञान न रखने वाली, चिर-पराधीन मनुष्य-जाति दूसरी बहुत ही स्वार्थ-परायण, अर्थ-पिशाच मनुष्य-जाति के पंजों में फँसी हुई है। इन स्वार्थियों को जब इतनी बेहिसाब ताकत दे दी गई है, तब ऐसे भयंकर और कठोर आचरणों का होना अवश्यंभावी है। ऐसे समाज में एकाध सज्जन होकर ही क्या कर सकते हैं? मेरी अकेले की ऐसी बिसात नहीं कि इस देश भर के गुलामों को खरीदकर उन्हें दु:ख से मुक्त कर दूँ।”
यह कहते-कहते सेंटक्लेयर का सदा प्रफुल्ल मुख कुछ देर के लिए कुम्हला गया। उसकी आँखें डबडबाई-सी जान पड़ीं, पर तुरंत उसने अपने मनोभाव को छिपाकर मुस्कराते हुए कहा – “बहन, तुम वहाँ यमराज की नानी का-सा मुँह बनाए क्या खड़ी हो? इधर आओ। तुमने अभी देखा क्या है? इस संसार भर के पाप, अत्याचार और सख्तियों का हिसाब लगाकर सोचा जाए तो जीवन मुश्किल हो जाए। इस संसार में कुछ भी अच्छा न लगे।”
यह कहकर सेंटक्लेयर लेट गया और अखबार पढ़ने लगा।
मिस अफिलिया जमीन पर बैठी-बैठी उदासी के साथ मोजा बुनने लगी। उसके हाथ चलते थे, पर जब वह उन बातों को सोचने लगी तो अकस्मात उसके हृदय में आग भभक उठी और अंत में वह फूट पड़ी। उसने कहा – “अगस्टिन, मैं तुम्हारी भाँति इस विषय की उपेक्षा नहीं कर सकती। मेरा मत है कि इस प्रथा का समर्थन करना तुम्हारे लिए बहुत ही घृणाजनक है।”
सेंटक्लेयर बोला – “क्यों बहन, तुमने फिर वही पचड़ा छेड़ा।”
अफिलिया ने और तेजी के साथ कहा – “मैं कहूँगी कि इस प्रथा का समर्थन करना तुम्हारे लिए बहुत ही घृणाजनक है।”
सेंटक्लेयर बोला – “प्यारी बहन, मैं इसका समर्थन करता हूँ? किसने कहा कि मैं इसका समर्थन करता हूँ।”
अफिलिया ने कहा – “निस्संदेह तुम इसका समर्थन करते हो – तुम सब जितने दक्षिणी हो वे सब। नहीं, तो बताओ कि तुमने दासों के लिए क्या किया?”
सेंटक्लेयर बोला – “क्या तुम मुझे संसार में कोई ऐसा निर्दोष मनुष्य बताओगी, जो किसी काम को बुरा समझ लेने पर फिर उसे नहीं करता? क्या तुमने कभी ऐसा काम नहीं किया या नहीं करती हो, जिसे तुम बिल्कुल ठीक नहीं समझती?”
अफिलिया ने कहा – “यदि कभी करती हूँ तो मैं उसके लिए पश्चाताप करती हूँ।”
सेंटक्लेयर ने नारंगी छीलते-छीलते कहा – “मैं भी ऐसा ही करता हूँ। सारा समय इस पश्चाताप ही में बीतता है।”
अफिलिया बोली – “पश्चाताप करने के बाद आखिर उस को क्यों करते जाते हो?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “बहन, तुम क्या अनुमान करने के बाद फिर उस बुरे काम को नहीं करती?”
अफिलिया ने उत्तर दिया – “केवल ऐसी दशा में जब मैं बहुत लोभ में पड़ जाती हूँ।”
सेंटक्लेयर बोला – “हाँ, तो मैं बड़े लोभ ही में फँसा हुआ हूँ। जो मुश्किल तुम्हें पड़ती है, वही मुझे भी पड़ती है।”
अफिलिया ने कहा – “पर मैं सदा अपने दोष को दूर करने की चेष्टा किया करती हूँ।”
सेंटक्लेयर बोला – “बहुत ठीक। मैं भी तो दस वर्षों से चेष्टा कर रहा हूँ, पर अभी तक मैं अपने कितने ही दोष दूर नहीं कर पाया। कहो बहन, तुम क्या सब पापों से छुटकारा पा चुकी हो?”
इस बार मिस अफिलिया ने बड़ी गंभीरता से बुनने के काम को किनारे रखकर कहा – “भाई अगस्टिन, मुझमें अनेक दोष हैं, उनके लिए तुम मेरी भर्त्सना कर सकते हो। तुम्हारा कथन यथार्थ है। अपनी कमजोरी के विषय में मुझसे अधिक कोई दूसरा अनुभव नहीं कर सकता। पर मैं तुमसे कहूँगी कि अपना यह दाहिना हाथ काटकर फेंक सकती हूँ, पर अपने दोष की उपेक्षा कभी नहीं कर सकती। जिस काम को मैं बुरा समझती हूँ, उसे सदा कभी नहीं करती रह सकती।”
अगस्टिन ने कहा – “बहन, क्या तुम्हें मेरी बात पर गुस्सा आ गया? तुम तो जानती हो कि मैं बराबर दुष्ट लड़का था। मुझे तुम्हें खिझाने में हमेशा आनंद आया करता था। तुम्हारा स्वभाव कितना पवित्र है, सो क्या मैं जानता नहीं! तुम्हारी सहृदयता क्या मैं भूल गया हूँ? पर तुम जरूरत से ज्यादा भली हो – इतनी भली कि तुम्हारे मरने का खयाल करके मुझे बड़ा दु:ख होता है।”
अफिलिया ने माथे पर हाथ रखकर कहा – “अगस्ट, यह बड़ी गंभीर बात है। हँसी-मजाक की नहीं।”
सेंटक्लेयर बोला – “हाँ, हिसाब से गंभीर है सही, पर मैं इतनी गर्मी में तो गंभीर होने से रहा। गर्मी तो गर्मी, उस पर मच्छरों का उपद्रव अलग परेशान किए हुए है। इस समय कोई भी इतनी ऊँचाई की नैतिक आलोचना नहीं कर सकता।”
सेंटक्लेयर ने एकाएक अपने आप उठकर कहा – “मैंने अब समझा कि तुम्हारे यहाँ के उत्तरवाले लोग हम दक्षिणवालों से यों अधिक धार्मिक होते हैं। इसका कारण यह जान पड़ता है कि तुम्हारे वहाँ यहाँ के जैसी गर्मी नहीं पड़ती। लो, मुझे इस नए आविष्कार के लिए बधाई दो।”
अफिलिया बोली – “अगस्टिन, तुम बड़े ही खफ्ती दिमाग के हो।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैं खफ्ती दिमाग का हूँ! ठीक है, होऊँगा, कोई ताज्जुब की बात थोड़े ही है। पर अब मैं एक बार गंभीर बनता हूँ। तुम जरा यह नारंगी की टोकरी मुझे उठा देना। देखो, तुम मेरे लिए थोड़ा कष्ट करो, मैं भी तो गंभीर बनने में कितना कष्ट उठाऊँगा।”
इतना कहने के बाद सचमुच ही उसका चेहरा गंभीर हो आया। वह बड़ी संजीदगी से, अपने भाव प्रकट करने लगा – “बहन जहाँ तक मेरा खयाल है, इस दासत्व-प्रथा के खयाल पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। पर हमारे यहाँ के अर्थलोभी गोरे जमींदार, स्वार्थवश, दासत्व प्रथा को न्यायसंगत बताते हैं और उनके टुकड़ों पर बसर करनेवाले खुशामदी पादरी इन्हें खुश रखने के लिए इसे बाइबिल से साबित करने को तैयार रहते हैं। वकील और नीति के पंडित अपना मतलब गाँठने के लिए आडंबर फैलाकर इस भयंकर रीति का समर्थन करते हैं। ये लोग अपने मतलब के लिए भाषा, नीति और धर्मशास्त्र का मनमाना अर्थ लगाते हैं। इस काम में इनकी अक्ल की दौड़ देखकर हैरान होना पड़ता है। पर सच तो यह है कि चाहे इसे बाइबिल से सिद्ध किया जाए, अथवा कानून की दुहाई दी जाए, या कितनी युक्तियाँ क्यों न दिखाई जाएँ, किंतु दुनिया कभी उनपर विश्वास नहीं कर सकती। यह घृणित दास-प्रथा नरकीय प्रथा है, नरक से निकली हुई है।”
अगस्टिन बड़ी उत्तेजना से ये बातें कह रहा था। मिस अफिलिया को इस पर बड़ा विस्मय हुआ। वह अपना बुनना छोड़कर सेंटक्लेयर का मुँह देखने लगी। उसे विस्मित देखकर सेंटक्लेयर फिर कहने लगा – “तुम मेरी बात पर विस्मित-सी जान पड़ती हो, पर मैं आज जब कहने ही बैठा हूँ तब सारी बातें खोलकर कहता हूँ। गुलामी की इस घृणित प्रथा का मूल कारण देखना चाहिए, इसके ऊपर के सारे आवरणों को अलग करके देखना चाहिए कि यह क्या है? वास्तव में, हम भी इंसान हैं और कुएशी (जो लोग दास बनाए जाते थे) भी इंसान हैं। पर वे बेचारे मूर्ख और निर्बल हैं और हम बुद्धिमान और सबल हैं। हम छल-बल में पक्के हैं, इससे हम उनका सब कुछ हर लेते हैं और उसमें से जितना हमारा जी चाहता है, उन्हें लौटा देते हैं। जो काम गंदा, कठिन और अप्रिय जान पड़ता है, उसे हम कुएशियों से कराते हैं, क्योंकि हमें मेहनत करना पसंद नहीं, इसलिए कुएशी हमारे लिए पिसेंगे। हमें धूप अखरती है, कुएशी धूप में जलेगा। कुएशी रुपए कमाएगा और हम उसे खर्च करेंगे। हमारे जूतों में कीचड़ न लगे, इसके लिए कुएशी अपने हाथ से कीचड़ उठाकर रास्ता साफ रखेगा। यहाँ तो कुएशी को हमारी इच्छा के अनुसार चलना ही है, किंतु उसके परलोक के स्थान के निर्णय का ठेका भी हमीं लोगों के हाथ में है। हमारी कोई स्वार्थ-सिद्धि होती हो तो उसे अवश्य नरक में जाना पड़ेगा। हमारे देश के कानून का मतलब इसके सिवा और कुछ नहीं है। गुलामी की प्रथा के दुर्व्यवहार करने का हल्ला मचाना पागलपन है। इतनी बड़ी कुप्रथा का और क्या दुरुपयोग हो सकता है? इस घृणित रिवाज का जारी होना ही मनुष्य-शक्ति का घोरतर दुरुपयोग है। इस पाप से यह पृथ्वी रसातल को क्यों नहीं चली जाती? इसका कारण यह है कि हम में से सब जंगली जानवर ही नहीं है, कोई-कोई आदमी बनकर पैदा हुए हैं। हम में से कुछ के हृदय में थोड़ी बहुत दया भी है। कानून ने गुलामों पर अत्याचार करने की जो शक्ति प्रदान की है, उसका भी हम पूरा-पूरा प्रयोग नहीं करते। इस देश का नीच-से-नीच दास-स्वामी गुलामों के साथ चाहे जितना बुरा बर्ताव करता हो, चाहे जितने अत्याचार करता हो, सब कानून की सीमा के अंदर ही हैं।”
इतना कहते-कहते सेंटक्लेयर बेहद उत्तेजित हो गया। वह उठकर फर्श पर जल्दी-जल्दी टहलने लगा। उसका सुंदर चेहरा सुर्ख हो गया, और उसके विशाल नेत्रों से आग-सी निकलने लगी। इसके पहले मिस अफिलिया ने कभी उसकी ऐसी भावभंगिमा नहीं देखी थी। इससे विस्मित होकर वह चुपचाप उसकी ओर देखती रही। सेंटक्लेयर ने एकाएक मिस अफिलिया के सामने रुककर कहा – “इस विषय पर कुछ कहने या सोचने का कोई नतीजा नहीं है। पर मैं तुमसे कहता हूँ, एक समय था जब मैं सोचता था कि सारी पृथ्वी रसातल में चली जाए और यह भीषण अन्याय और अविचार निबिड़ अंधकार में लुप्त हो जाए, तो मैं सानंद इसके साथ रसातल को चला जाऊँगा। जब-जब मैं जहाज की यात्रा में या अपने खेतों के दौरे के समय सैकड़ों नीच, निष्ठुर पशुप्रकृति गोरों को अन्याय से प्राप्त किए गए धन द्वारा उन अनगिनत स्त्री-पुरुषों और बालक-बालिकाओं को खरीदकर उनपर मनमाना अत्याचार करते देखता हूँ तब मेरी छाती फट जाती है। मैं मन-ही-मन अपने देश को कोसता हूँ और सारी मनुष्य-जाति को शाप देता हूँ।”
मिस अफिलिया बोली – “अगस्टिन, अगस्टिन, मैं समझती हूँ कि तुमने बहुत-कुछ कह डाला। मैंने अपने जीवन में गुलामी की प्रथा के विरुद्ध ऐसे ओजस्वी घृणापूर्ण वाक्य कभी उत्तर प्रदेश में भी नहीं सुने।”
यह सुनकर सेंटक्लेयर के मुँह का भाव बदल गया। उसने स्वाभाविक व्यंग्य के साथ कहा – “उत्तर प्रदेश में? तुम्हारे उत्तर प्रदेशीय लोगों का खून बहुत ही सर्द है। तुम लोग हर बात में ठंडे हो। हृदय के आवेग द्वारा उत्तेजित होकर उत्तर प्रदेशवाले हम लोगों की भाँति अन्याय के विरुद्ध जोरदार आंदोलन करके आकाश-पाताल नहीं गुँजा सकते। तुम्हारे उत्तर प्रदेश में निम्नश्रेणी के लोगों से क्या सच्ची सहानुभूति रखी जाती है?”
पाठक जरा ध्यान से देखेंगे तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि गुलामी की यह प्रथा संसार भर में फैली हुई है। संसार में कोई स्थान ऐसा नहीं है, कोई जाति ऐसी नहीं है, जहाँ और जिसमें यह घृणित प्रथा किसी-न-किसी रूप में प्रचलित न हो। मनुष्य-समाज के मानसिक भावों की जाँच कीजिए और देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर क्या भाव काम कर रहे हैं। दूसरों पर प्रभुत्व रखना, दूसरों को नीचे रखकर स्वयं ऊपर जाना, यही मनुष्यों के मन का एक सार्वभौमिक भाव है। इसी लिए समाज में, जहाँ देखिए, वहीं सबल निर्बल को सताता है, पंडित मूर्ख पर प्रभुत्व जमाता है। बड़े आदमी अपने से छोटी श्रेणी के मनुष्यों का खून चूस-चूसकर मोटे बन रहे हैं। अपने से ऊपरवाली श्रेणी के कारण निम्न श्रेणी के लोग बड़े दु:ख से दिन बिता रहे हैं।
मिस अफिलिया ने उत्तर प्रदेश क बात सुनकर कहा – “ठीक है, पर यहाँ एक प्रश्न उठता है।”
सेंटक्लेयर बोला – “मैं तुम्हारे प्रश्न को समझ गया। तुम यही कहना चाहती हो न कि यदि मैं गुलामी की प्रथा का अनुमोदन नहीं करता, तो फिर क्यों इन दास-दासियों को रखकर अपने सिर पाप की गठरी लादता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हारे ही शब्दों में इसका उत्तर दूँगा। तुम बचपन में मुझे बाइबिल पढ़ाने के समय कहा करती थीं कि हमारे पाप पुरुष-परंपरा से हमारे पीछे लगे हुए हैं। वही बात इन दासों के संबंध में भी है। ये पुरुष-परंपरा से मुझे मिले हैं। मेरे दास मेरे पिता के थे। और तो क्या, मेरी माता के भी थे। अब वे मेरे हैं। तुम जानती हो कि मेरे पिता पहले न्यू इंग्लैंड से यहाँ आए थे और उनकी प्रकृति बिल्कुल तुम्हारे पिता के समान ही थी। वह सब तरह से प्राचीन रोमनों की भाँति न्यायी, तेजस्वी, महानुभाव और दृढ़-प्रतिज्ञ मनुष्य थे। तुम्हारे पिता न्यू इंग्लैंड में ही रहकर पत्थरों और चट्टानों पर शासन करते हुए कमाने-खाने लगे और मेरे पिता लुसियाना आकर अगणित नर-नारियों पर प्रभुत्व फैलाकर उन्हीं के परिश्रम से अपनी जीविका का निर्वाह करने लगे। मेरी माता…”
कहते-कहते सेंटक्लेयर उठ खड़ा हुआ और कमरे में दूसरे सिरे पर लटकती हुई माता की तस्वीर के पास जाकर खड़ा हो गया और बड़े भक्ति-भाव से उस चित्र की ओर देखकर कहने लगा – “वह देवी थी… मेरी ओर इस तरह क्या देखती हो? तुम जानती हो कि मेरे कहने का तात्पर्य क्या है। यद्यपि माता ने मानव का तन धारण किया था तथा जहाँ तक मेरा अनुभव है, मैंने देखा और समझा है, उनमें मानसिक दुर्बलता और भ्रम का लेश तक न था। क्या अपने, क्या पराए, और क्या दास-दासी, सभी की यही राय है। बहन, माता ने ही मुझे कट्टर नास्तिकता के भाव से उबारा। मेरी माता एक जीती-जागती धर्मशास्त्र थीं और मैं उस धर्मशास्त्र की सत्यता में संदेह नहीं कर सकता।”
यह कहते हुए सेंटक्लेयर का हृदय एकदम उछल उठा। वह अपने को भूलकर हाथ जोड़कर माता के चित्र की ओर देखते हुए, ‘माँ, माँ’ कहकर पुकारने लगा और फिर सहसा अपने को सँभालकर वह लौट आया। अफिलिया के पास एक कुर्सी पर बैठकर उसने फिर कहना आरंभ किया – “मेरा भाई और मैं, दोनों जुड़वा पैदा हुए थे। लोग कहा करते हैं कि जुड़े हुए पैदा होनेवाले दो भाइयों में विशेष समानता होती है; पर हम दोनों में सब विषयों में भिन्नता थी। उसकी गठन रोमनों की भाँति दृढ़ थी, आँखें दोनों काली और ज्योतिपूर्ण थीं, सिर के बाल घने और छल्लेदार थे, शरीर का रंग भी गोरा था। मेरी आँखें नीली, बाल सुनहरे, देह की गठन ग्रीकों की-सी और रंग सफेद है। वह कामकाजी और चतुर था; मैं भावुक था, पर कामकाज में बिल्कुल निकम्मा। वह बराबरवालों तथा मित्रों के साथ बड़ी सज्जनता का व्यवहार करता था; पर अपने से छोटे लोगों पर बड़ा रौब रखता था। अपनी इच्छा के विरुद्ध काम करनेवाले पर वह कभी दया नहीं करता था। हम दोनों ही सत्यवादी थे। उसकी सत्य-प्रियता साहस और अहंकार से उत्पन्न हुई थी, और मेरी सत्यनिष्ठा भावुकता से। हम दोनों एक-दूसरे को चाहते थे। वह पिता का प्यारा था और मैं माता का दुलारा। मैं बड़ा भावुक था। मैं हर बात की बारीकी से छान-बीन करता था, जरा-सी बात से मेरा हृदय टूट जाता था। मेरे इस भाव से उसकी और पिता की जरा भी सहानुभूति न थी, पर माता मेरे हृदय को समझती थी और मेरे भाव से पूरी हमदर्दी रखती थी। इसी कारण अलफ्रेड से झगड़ने पर जब पिता मुझे तीखी निगाह से देखते थे, तब मैं माता के कमरे में आकर उसके पास बैठ जाता था। माँ की उस समय की वह स्नेह-भरी दृष्टि मुझे आज भी याद आती है। वह हमेशा सफेद कपड़े पहना करती थीं। मैं जब कभी बाइबिल के ‘रेवेलेशन’ अंश में निर्मल, शुभ्रवस्त्रधारी देवताओं का वर्णन पढ़ता हूँ तब मुझे अपनी माता की याद आ जाती है। अनेक विषयों में माता बड़ी पारदर्शिनी थी। संगीत में उनकी बड़ी पहुँच थी। माँ जब आर्गन बाजे पर अपने देवोपम कंठ से गातीं, तब मैं उनकी गोद में सिर रखकर कितना विह्वल हो जाता, कितने स्वप्न देखता, कितना सुख पाता – इसका वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।…”
“उन दिनों दास-प्रथा का विषय इतने वाद-विवाद का विषय नहीं था। कोई व्यक्ति स्वप्न में भी इसे हानिप्रद नहीं समझता था।”
“मेरे पिता जन्म से ही जात्यभिमानी थे। जान पड़ता है कि इस लोक में जन्म होने के पूर्व वे आध्यात्मिक जगत की किसी उच्च श्रेणी में थे और वहीं से अपनी कुल-मर्यादा और अहंकार को साथ लेकर उतरे थे, नहीं तो दरिद्र और उच्च-कुल से रहित व्यक्ति के घर में जन्म लेकर भी कुल का ऐसा अभिमान होना पूर्वसंस्कार के सिवा और क्या कहा जा सकता है? मेरे भाई ने पिता की प्रकृति पाई थी।”
“तुम जानती हो, जाति-कुलाभिमानियों के हृदय में सार्वभौम प्रेम का स्थान नहीं हो सकता। उनकी सहानुभूति समाज की एक निर्दिष्ट-सीमा के पार नहीं जा सकती। इंग्लैंड में सीमा की यह रेखा एक जगह टिकी हुई है, तो ब्रह्मदेश में दूसरी जगह, अमरीका में तीसरी जगह; पर इन सब देशों के जाति-कुलाभिमानियों की दृष्टि इससे आगे कभी नहीं बढ़ती। इस श्रेणी के लोग केवल अपने बराबरवालों से ही सहानुभूति रखते हैं। वे अपनी श्रेणीवालों के लिए जिन बातों को अत्याचार और अन्याय में गिनते हैं, उन्हीं बातों को दूसरी श्रेणीवालों के लिए कुछ भी नहीं समझते। पिता की दृष्टि में ‘रंग’ सीमा-निदर्शक था। गोरों को वह अपनी श्रेणी का समझते थे और उनके साथ उनका व्यवहार भी न्याय-संगत और आदर्श था। पर इन बेचारे गुलामों को वह मनुष्य नहीं समझते थे – इन्हें तो वे मनुष्यों और पशुओं के बीच की श्रेणी का जीव मानते थे। मैं समझता हूँ कि अगर कोई उनसे पूछता कि इन गुलामों में आत्मा है या नहीं, तो वह बड़े संदेह में पड़कर, ‘हाँ’ में इसका उत्तर देते। मेरे पिता आध्यात्मिक आलोचना की कुछ भी परवा नहीं करते थे। धर्म पर भी उनकी वैसी श्रद्धा न थी। वह समझते थे कि कोई ईश्वर है तो जरूर, पर वह भी उच्चजाति के लोगों का ही रक्षक है।”
“मेरे पिता के कपास के खेतों में कम-से-कम पाँच सौ गुलाम काम करते थे। इनके काम की देखरेख के लिए स्टव नाम का एक नर-पिशाच रखवाला था। वह गुलामों को दिन-रात सताया करता था। वह व्यक्ति माता को और मुझे फूटी-आँख न सुहाता था, पर पिता उसे चाहते और उसका विश्वास करते थे, इससे गुलामों को वह खूब सताता और मारता-पीटता था…”
“मैं उस समय बच्चा ही था, पर उसी समय से मामूली आदमियों पर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। मैं सदा खेत और घर के गुलामों की झोंपड़ियों में जाया करता, उनकी सब तरह की शिकायतें सुनकर आता और माता से कहता। फिर हम दोनों मिलकर उनका दु:ख दूर करने के उपाय साचते थे। हम लोगों की कोशिश से जुल्म कुछ कम होने लगे। हम जब कभी गुलामों का दु:ख थोड़ा भी दूर करने में सफल हो जाते, तो हमारे हर्ष की सीमा न रहती। इन सब बातों को देखकर एक दिन स्टव ने जाकर मेरे पिता से शिकायत की कि उससे प्रबंध नहीं हो सकेगा, उसका इस्तीफा मंजूर कर लिया जाए। मेरी माता पर पिता का बड़ा अनुराग था, पर वह जिस काम को आवश्यक समझते थे, उसमें कभी पीछे नहीं हटते थे। सो उन्होंने सम्मानसूचक पर स्पष्ट शब्दों में मेरी माता से कहा कि घरेलू दास-दासियों पर उनका पूरा अधिकार है, किंतु खेत के गुलामों के संबंध में उनकी कोई बात न मानी जाएगी। वह कहा करते कि मेरी माता ही क्या, स्वयं ईसा की माता मेरी भी आकर उनके काम में व्याघात डालें तो वह ऐसी ही खरी-खरी सुनाएँगे।”
“इसके बाद भी माता कभी-कभी पिता से स्टव के अत्याचारों की बातें कहा करती थी। पिता अविचलित मन से उन बातों को सुन लेते और अंत में कह देते कि क्या करें, स्टव को नहीं छुड़ा सकते। उसके जैसा काम में होशियार और बुद्धिमान आदमी दूसरा नहीं मिलेगा। स्टव इतना ज्यादा सख्त भी नहीं है। यों कभी-कभी थोड़ी-बहुत सख्ती कर लेता है, उसके लिए उसे दोष नहीं दिया जा सकता। बिना शासन के काम बिगड़ जाता है। कहीं की शासन-प्रणाली देख लो, कोई भी निर्दोष नहीं मिलेगा। आदर्श शासन-प्रणाली इस संसार में है ही नहीं। जिनका हृदय मेरी माता की भाँति कोमल और ममतामय है, जिनकी प्रकृति महान है, वे जब चारों ओर अत्याचार-अविचार और दु:ख यंत्रणाएँ देखते हैं तथा उन्हें दूर नहीं कर सकते, तब उन्हें जैसी मानसिक वेदना होती है, इसका हाल अंतर्यामी के सिवा दूसरा नहीं जान सकता। वे जिसे अन्याय समझते हैं उसे दूसरा कोई अन्याय नहीं कहता; वे जिसे भीषण निष्ठुर समझते हैं, उसे दूसरे दस निष्ठुरता नहीं मानते। इसी से लाचार होकर वे चुपचाप अपने मन के दु:ख को मन ही में दबाए बैठे रहते हैं। इस पाप-संताप-कलुषित पृथ्वी पर उनका जीवन सदा दु:खों का आधार बना रहता है। मेरी माता ने जब देखा कि वह दु:खी दासों का दु:ख दूर नहीं कर सकतीं तब वह निराश हो गईं। लेकिन हम दोनों भाइयों को भविष्य में निष्ठुर न होने देने के विचार से अपने विचारों और भावों की शिक्षा देने लगीं। शिक्षा के संबंध में तुम चाहे जो कुछ क्यों न कहो, पर मैं समझता हूँ कि जन्म से मनुष्य की जैसी प्रकृति होती है, वह सहज में नहीं बदलती। अलफ्रेड जन्म से ही हुकूमत-पसंद और जात्याभिमानी था। उस पर माता के उपदेशों और अनुरोधों का कोई असर न होता था। मानो संस्कारवश अलफ्रेड की युक्तियाँ और तर्क दूसरा पक्ष समर्थन करते थे, परंतु मेरे हृदय में माता की कथनी अच्छी तरह जमने लगी। उनका जीता-जागता विश्वास और उनके हृदय की गाढ़ी भक्ति, उनके प्रत्येक उपदेश के साथ-साथ मेरे हृदय में प्रवेश करती थी। वह मुझे समझाया करती थीं कि ‘मनुष्य धनी हो या दरिद्र, उसके धनी या दरिद्र होने से उसकी आत्मा का महत्व नष्ट नहीं हो जाता। एक दिन आकाश में तारे दिखाकर मुझे कहने लगीं, ‘बेटा अगस्टिन! आकाश में जो लाखों तारे दिखाई दे रहे हैं, किसी समय इनका नाम-निशान मिट जाए ऐसा हो सकता है; सारा संसार भी नष्ट हो सकता है, और सूर्य का पूर्व से पश्चिम में उदय हो सकता है; पर एक आत्मा का चाहे वह कितना ही दीन और दरिद्र क्यों न हो, नाश नहीं हो सकता। धनी, निर्धन, पंडित, मूर्ख, सब अमर रहेंगे और मंगलमय ईश्वर की गोद में सदा सुख-शांति पाएँगे। प्रत्येक दीन-दरिद्री के लिए उसकी भुजाएँ सदा फैली रहती हैं।’…
“माता के कमरे में बहुत-सी तस्वीरें थीं। उनमें एक वह तस्वीर थी, जिसमें ईसा मसीह का अंधे को आँखें देने का दृश्य दिखाया गया था। उस तस्वीर को दिखाकर माता कहा करतीं, ‘देखो अगस्टिन, परम धार्मिक यीशु की दीन पर कितनी दया है। वह अपने हाथों से बेचारे अंधे की सेवा-शुश्रूषा कर रहे हैं। अंधे को आराम पहुँचाने का प्रयत्न कर रहे हैं।’ यदि मुझे अधिक दिन तक ऐसी स्नेहमयी दयालु जननी की छत्रछाया का सौभाग्य रहता तो मैं अवश्य उच्च कोटि का मनुष्य होता। यदि जवानी तक भी मुझे माता का साथ मिला होता तो मेरा जीवन ऐसा सुगठित हो जाता कि फिर मैं इन दास-दासियों के उद्धार के लिए अपने प्राणों की मोह-माया तज सकता था। देश-सुधार का व्रत ले सकता था। पर मेरा दुर्भाग्य कि मुझे तेरह वर्ष की अवस्था में ही उत्तर की ओर जाना पड़ा और जननी का साथ छोड़ना पड़ा। यही कारण है कि मैं जैसा चाहता था, वैसा जीवन प्राप्त नहीं कर सका।”
सेंटक्लेयर सिर पर हाथ रखकर जरा देर तक चुप रहा। वह फिर कहने लगा – “इस संसार के कामें में क्या कहीं सत्य धर्म-भाव, न्यायसंगत आचरण और नि:स्वार्थ प्रेम दिखाई पड़ता है? मैंने लड़कपन में भूगोल में पढ़ा था कि सब जगह की जलवायु भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, इसी से भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़-पौधे होते हैं। यही हाल मनुष्य-समाज के आचरण और मतामत का है। जिस देश का जैसा आचार-व्यवहार होता है वहाँ के लोगों का, सामाजिक दशा के अनुसार, वैसा ही चरित्र बन जाता है। हमारे देश में दास-प्रथा प्रचलित है, इसी से यहाँ के लोग इस दास-प्रथा में कोई बुराई नहीं समझते। पर इंग्लैंडवालों के कानों में जब इस प्रथा की कठोरता की भनक पहुँचती है तब उनकी छाती दहल जाती है। इस संसार में क्या शिक्षित और क्या गँवार, अधिकतर लोग ऐसे ही होते हैं कि जिनका निज का कोई स्वतंत्र मत नहीं होता। वे प्रवाह के साथ बहते हैं। वे अवस्था के दास होते हैं। देश में प्रचलित अवस्था उन्हें जिस ओर ले जाती है उसी ओर आँख-कान बंद करके बहे चले जाते हैं…।”
“किसी विषय की भलाई-बुराई की स्वाधीनतापूर्वक परख करने की शक्ति उनमें नहीं होती। तुम्हारे पिता उत्तर की दास-प्रथा के विरोधी संप्रदाय के साथ रहते थे, इससे दासत्व-प्रथा के विरोधी हो गए थे; और मेरे पिता इस दास-प्रथा के चलनेवाले देश में रहते थे, इससे इस प्रथा के पक्षपाती थे। पर इस देश और संग-भेद से उत्पन्न हुई भिन्नता के सिवा उनमें और किसी प्रकार की भिन्नता नहीं थी। और बातों में उनकी प्रकृति में पूरी समता थी। दोनों में ही अपनी जाति का अभिमान था और शासन को पसंद करते थे।”
22. आपसी चर्चाएँ
मिस अफिलिया सेंटक्लेयर की इस बात का प्रतिवाद करने जा रही थी, पर सेंटक्लेयर ने उसे रोककर कहा – “तुम जो कहना चाहती हो, उसे मैं जानता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि वे बिल्कुल एक से-ही थे। मैं मुक्त कंठ से स्वीकार करता हूँ कि तुम्हारे और मेरे पिता के कामों में भिन्नता थी, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वभाव दोनों का एक ही-सा था। इस संसार में दो तरह के आदमी होते हैं। एक तो जो वृथाभिमान में फूलकर लोगों के साथ बात तक नहीं करते, मनुष्यों को मनुष्य नहीं गिनते; अपने को सबसे बड़ा और दूसरों को अपने से छोटा समझते हैं। और दूसरे वे जो इन सब दुर्गुणों के रहते हुए भी लोगों के सामने यह साबित करने की फिक्र में लगे रहते हैं कि उनमें अहंकार की छूत भी नहीं है। इसी लिए वे छोटे-बड़े सबका ऊपर से आदर-सत्कार करते हैं, खुले दिल से आत्माभिमानियों की निंदा करते हैं, वे भी वैसे ही कुलाभिमानी हैं जैसे पहली श्रेणी वाले। एक खुल्लमखुल्ला दूसरों से घृणा करके अपने हार्दिक अभिमान को तृप्त कर लेते हैं और दूसरी श्रेणीवाले वैसा अवसर न पाने के कारण अपने अभिमान को तृप्त करने के लिए दूसरे उपाय की शरण लेते हैं। इन दो श्रेणियों के मनुष्यों में जितना भेद है, उतना ही भेद तुम्हारे और मेरे पिता के आचरणों में भी था। तुम्हारे पिता जाति के अभिमान से घृणा दिखाकर हृदय के महत्व का परिचय देते थे और मेरे पिता हजारों मनुष्यों के मस्तक पर पैर रखकर अपनी श्रेष्ठता साबित करते थे। दोनों अगर लुसियाना के जमींदार होते तो बिल्कुल ही एक प्रकृति के होते, इसमें कोई संदेह नहीं।”
अफिलिया ने कहा – “अगस्टिन, तुम कैसे आदमी हो!”
अगस्टिन बोला – “मैं पिता या चाचा की निंदा की नीयत से ये बातें नहीं कहता, लेकिन किसी पर मेरी झूठी भक्ति भी नहीं है, विशेषकर मुझे अपने जीवन की घटनाओं के प्रसंग में इन बातों का उल्लेख करना पड़ा है। पर अब फिर मैं अपने रामकहानी चलाता हूँ। पिता मरते समय सारी संपत्ति हम दोनों भाइयों के लिए छोड़ गए और उसको आपस में बाँट लेने का भार हमीं लोगों पर रहा। हम दोनों भाइयों ने बड़ी सफाई से आपस में बँटवारा कर लिया। मैं कहूँगा कि आपसवालों के साथ उत्तम व्यवहार करने में अल्फ्रेड-सरीखा आदमी इस संसार में शायद ही दूसरा होगा। हम दोनों ने खेत का काम उठा लिया। थोड़े ही दिनों में अल्फ्रेड खेत के काम में बड़ा पक्का अनुभवी और पारदर्शी मनुष्य बन गया। पर मैंने दो वर्षों के परिश्रम से समझ लिया कि मुझसे यह काम पार नहीं पड़ेगा, क्योंकि कम-से-कम सात सौ कुली हमारे खेतों में काम करते थे। उन्हें पीट-पीटकर काम लेना, उनकी देख-रेख के लिए शैतान से बढ़कर देखभाल करनेवाला रखना, इत्यादि सैकड़ों तरह के ऐसे काम थे, जिनसे मुझे बड़ी घृणा थी। यह पैशाचिक व्यवहार मुझे असह्य हो उठा। मुझे अपनी जननी के वचनों का ध्यान आने लगा कि इन काले दीन-दु:खी गुलामों में भी हमारी-जैसी आत्मा है, ये भी उसी मिट्टी के बने हैं, जिसके हम। इन्हें सताने से उतना ही दु:ख मिलता है, जितना हमें। ये सब बातें सोचकर तथा दास-दासियों की यंत्रणा देखकर मेरा हृदय पिघल जाता था। मैं ईश्वर से प्रार्थना किया करता था कि इस पाप-भरे संसार से मुझे शीघ्र उठाकर माता के पास पहुँचा दो। भला ऐसी मानसिक दशा में क्या कभी किसी का काम में जी लग सकता है? धीरे-धीरे मेरे दिल में यह खयाल पक्का होने लगा कि इन गुलामों का सत्यानाश हम लोगों के हाथों से हो रहा है। ईश्वर ने इन्हें मनुष्य बनाया है, पर हमने इन्हें पशुओं से बदतर बना डाला है। वास्तव में ऐसी पराधीन अवस्था में रहकर मनुष्य क्या मनुष्यत्व को पहुँच सकता है? मनुष्य की स्वाधीन इच्छा में बाधा पड़ते ही वह मनुष्यत्व-विहीन हो जाता है। यह सब सोचते-सोचते मैंने खेत का काम छोड़ने का संकल्प कर लिया।”
अफिलिया ने कहा – “अगस्टिन, मेरा सदा से यह विश्वास था कि तुम सब लोग दास-प्रथा को बाइबिल से सिद्ध सचाई मानते हो। और तुम लोगों की दृष्टि में दास-प्रथा ईश्वरीय विधान है।”
अगस्टिन बोला – “हम लोगों का अभी यहाँ तक पतन नहीं हुआ है। अल्फ्रेड इतना सख्त आदमी है कि बाध्य होने पर दासों की जान लेने में संकोच नहीं करता। दासों को किसी प्रकार के मानुषिक अधिकार हैं – इस बात तक को वह स्वीकार नहीं करता, किंतु इस दास-प्रथा को तो वह भी बाइबिल-अनुमोदित या ईश्वर-सम्मत विधान नहीं समझता। इस विषय में उसका यह मत है कि जब तक एक श्रेणी के मनुष्य आत्मविहीन होकर पशुओं की भाँति काम न करें, तब तक मनुष्य-समाज की उन्नति नहीं होती, संसार की सभ्यता आगे नहीं बढ़ती। उसका कथन है कि मनुष्य-समाज के अधिकार उन्नत बनाने के लिए बलवान और बुद्धिमानों का निर्बल मूर्खों पर प्रभुत्व रहना आवश्यक है, अपने इस मत के समर्थन में वह कह सकता है कि दास-प्रथा कहाँ नहीं, सारे विश्व में तो छाई हुई है। अमरीका के जमींदार अपने गुलामों से जैसा सख्त बर्ताव करते हैं, इंग्लैंड के बड़े आदमी और महाजन लोग दूसरी तरह से अपने देश के मजदूरों से ठीक वैसा ही व्यवहार करते हैं कि मानव-समाज की व्यवस्था को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि जब तक एक श्रेणी के लोगों का दासत्व न करें तब तक किसी प्रकार सामाजिक-उन्नति और सभ्यता का विकास संभव नहीं है। उसके मतानुसार संसार की समता-वृद्धि के लिए निर्बल और मूर्खों को सदा बलवान और बुद्धिमानों के अधीन रहना पड़ेगा; आजन्म उन्हें पशुवत्-कार्य करना पड़ेगा और बलवान तथा बुद्धिमानों के आराम के लिए अपने शरीर को कष्ट देना पड़ेगा। पर मैं अल्फ्रेड की इन युक्तियों में सार नहीं देखता। स्वार्थी मनुष्य ही अपने मन को समझाने के लिए ऐसी युक्तियों का सहारा लेते हैं।”
अफिलिया बोली – “भला इंग्लैंड के मजदूरों के साथ तुम्हारे यहाँ के गुलामों की तुलना कैसे हो सकती है? तुम्हारे यहाँ की तरह न वे बेचे ही जाते हैं, न उनका सौदा ही किया जाता है, और न वे अपने कुटुंब से अलग ही किए जाते हैं। उन्हें दोष भी नहीं लगाए जाते।”
अगस्टिन ने कहा – “बहन, हम कोड़ों की मार से गुलामों को मारते हैं, पर इंग्लैंडवाले क्या करते हैं कि मजदूरों का सारा धन चूसकर उन्हें भूखों मारते हैं। हम लोग गुलामों के बाल-बच्चों को उनके माता-पिता से अलगकर बेचते हैं; पर इंग्लैंड के मजदूरों के बाल-बच्चे बिना भोजन के भूखों मरते हैं। इसमें कौन बुरा और अच्छा है, यह नहीं कहा जा सकता।”
अफिलिया ने कहा – “पर तुम्हारी इस युक्ति से दास-प्रथा का पाप दूर नहीं होता। दूसरी जगह कोई बुराई होती हो, तो क्या उसका उल्लेख करके तुम अपने यहाँ के अत्याचार का समर्थन कर सकते हो?”
अगस्टिन बोला – “मैंने दास-प्रथा के समर्थन के अभिप्राय से इस विश्वव्यापी अत्याचार का उल्लेख नहीं किया। मैंने तो उन्हीं युक्तियों को दोहराया है, जिनके बल पर अल्फ्रेड दास-प्रथा का समर्थन करता है। मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि हमारे यहाँ की गुलामी की चाल हद से ज्यादा घृणित है। यह भी सही है कि अन्य देशों में निम्न श्रेणी के मनुष्यों पर जो अत्याचार होते हैं, उनसे हजार गुना भारी अत्याचार और उत्पीड़न हमारे यहाँ के गुलामों को सहना पड़ता है। हमारे देश के गोरे इन कालों को निरा पशु समझते हैं। क्रीत-दासियों के गर्भ से संतान पैदा करके उन्हें भेड़-बकरियों की भाँति बेचते हैं। ऐसा हृदय कँपानेवाला व्यापार और कहीं नहीं दिखाई पड़ता। और देशों में निर्बल को सताने के लिए छल-बल की दरकार होती है, पर यहाँ कोई जरूरत नहीं। जैसे जी चाहे, निर्बल को सताया जा सकता है, उनके प्राण तक लेने में कोई कानून किसी तरह की बाधा नहीं डालता।”
अफिलिया ने कहा – “आज मैंने दास-प्रथा के संबंध में तुमसे बहुत-सी नई बातें सुनीं। मैंने इस विषय में कभी इतना नहीं सोचा था।”
अगस्टिन बोला – “मैंने इंग्लैंड के अनेक स्थानों की सैर करके वहाँ की निचली श्रेणी के लोगों की अवस्था का खूब अनुभव किया है। उनकी दुर्दशा देखकर हृदय पिघल जाता है। अल्फ्रेड सदैव बड़े अहंकार से कहा करता है कि उसके गुलाम इंग्लैंड के मजदूरों से अधिक सुखी हैं। वह सचमुच अपने दास-दासियों को खाने-पहनने का कष्ट नहीं देता। यों उसकी प्रकृति बहुत कठोर भी नहीं है। कोई उसका कहा नहीं मानता, तभी वह आग-बबूला होकर उसकी जान तक लेने में नहीं हिचकता। उसके कहे पर चलने से वह किसी को कभी नहीं पीटता। जब हम दोनों भाई साथ-साथ खेत का काम करते थे तब मैंने अल्फ्रेड से बड़ा अनुरोध किया कि इन दास-दासियों की शिक्षा के लिए एक पादरी रख दो। अल्फ्रेड का खयाल था कि कुत्ते-बिल्लियों के लिए पादरी रखने से जो नतीजा होता है, वही इन गुलामों के लिए पादरी रखने से होगा। फिर भी उसने मेरी प्रसन्नता की खातिर गुलामों की शिक्षा के वास्ते एक पादरी रख दिया। हर रविवार को पादरी साहब आकर उन्हें धर्म-शिक्षा दिया करते थे, लेकिन गुलामी में पड़े-पड़े इन गुलामों की आत्माएँ जड़ हो गई हैं। अच्छे-अच्छे उपदेश और शिक्षा का इनके जड़ हृदय पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता। बहन, तुम मुझे इन गुलामों को शिक्षा देने के संबंध में अक्सर कहा करती हो। लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक इन्हें गुलामी की जंजीर मुक्त करके स्वाधीनता नहीं दी जाएगी, तब तक इन्हें शिक्षा देने का कोई नतीजा न होगा। इनमें कुछ धर्म जीवित जरूर दीखता है, पर उस धर्म-भाव में किसी प्रकार की वीरता व निर्भीकता का भाव नहीं है। यह भयभीत प्रकृति से उत्पन्न धर्म है।”
अफिलिया बोली – “हाँ, तुमने खेती के काम से कब संबंध छोड़ा, सो तो बताया ही नहीं।”
अगस्टिन ने कहा – “हाँ, दो बरस तक मैंने अल्फ्रेड के साथ खेत का काम किया। पर इतने दिनों के अनुभव से ही मुझे मालूम हो गया कि मेरे लिए यह काम बड़ा मुश्किल है और अल्फ्रेड ने भी जान लिया कि मुझसे कोई काम नहीं होता। मेरे संतोष के लिए वह कुलियों को नाना प्रकार की सुविधाएँ भी देने लगा, पर मेरा मन किसी तरह राजी न हुआ। मुख्य बात यह थी कि मैं कुलियों के साथ जैसा बर्ताव करने को कहता था, वैसा करने से काम में पूरी हानि होने की संभावना थी। मैं कुलियों से पशुओं की भाँति काम लेना बिल्कुल नहीं चाहता था। मनुष्य को पशु बनाकर धन बटोरने की फिक्र करना मुझे अत्यंत घृणित मालूम होने लगा। मैं स्वयं बड़ा आलसी हूँ, इससे स्वभावत: मुझे आलसी कुलियों पर भी तरस आ जाता था। आलस्य करने पर भी मैं उन्हें कभी मारने नहीं देना चाहता था। ऐसी दशा में मैंने सोचा तो यही उचित जान पड़ा कि मुझसे कुछ होना-जाना तो है नहीं, मेरे द्वारा अल्फ्रेड के काम में उल्टे और अड़चन पड़ती है, इससे उस काम को मैंने बिल्कुल छोड़ दिया। अल्फ्रेड ने सब खेत ले लिए और मैंने मकान और नकद संपत्ति ले ली।”
अफिलिया बोली – “इसके बाद फिर अपने दासों को तुमने क्यों नहीं छोड़ दिया?”
अगस्टिन ने कहा – “मेरा दिल इतना ऊँचा नहीं था। मैंने सोचा कि इन्हें रुपए कमाने की कल न बनाना ही काफी है, घर रखकर इनका भरण-पोषण करने से कोई दोष न होगा, खासकर इनमें से बहुतेरे हमारे पुराने नौकर हैं। मैं उन्हें बहुत चाहता था, और वे भी मुझे बहुत चाहते थे। जिन नए लोगों को तुम देखती हो, ये सब उन्हीं पुराने गुलामों के वंशज हैं। ये हमारे घर से किसी तरह हटना नहीं चाहते। ये यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, इससे मुझसे इनकी बड़ी ममता हो गई है। बहन, मेरे जीवन में भी कोई समय था जब मैं बड़े-बड़े खयाली पुलाव बनाता था। मैं सोचा करता था कि इस संसार में मैं कुछ-न-कुछ करूँगा जरूर। यों ही निकम्मा जीवन नहीं बिताऊँगा। देश-सुधारक बनकर जन्म-भूमि से दास-प्रथा का कलंक दूर करने की मेरी बड़ी इच्छा थी, पर कोई भी इच्छा पूरी न हुई। जान पड़ता है, युवावस्था में सबके मन में ऐसी ही तरंगे उठा करती हैं। पर जब संसार की बेड़ी पाँव में पड़ जाती हैं तो जवानी के सब मंसूबे जहाँ-के-तहाँ रह जाते हैं।”
अफिलिया ने पूछा – “तुमने अपने जीवन के इस महान उद्देश्य को छोड़ क्यों दिया? अभी क्या बिगड़ा है। अब से तुम अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए यत्न कर सकते हो।”
अगस्टिन बोला – “युवा-अवस्था के आरंभ में ही मेरी आशा-लता पर पाला पड़ गया। मैं जैसे जीवन की आशा करता था, उसे प्राप्त नहीं कर सका। इसी से किसी काम में मेरा उत्साह नहीं रह गया। अब तो घटना-स्रोत के साथ बह रहा हूँ। पूर्णरूप से अवस्था का दास बन गया हूँ। संसार की वर्तमान अवस्थाओं और घटनाओं के पीछे खिंचा चला जा रहा हूँ। सच तो यह है कि अल्फ्रेड मुझसे सौगुना मजे में है। वह अर्थ-संग्रह को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य समझता है और अपने उसी विश्वास के अनुसार काम भी कर रहा है। पर मेरा जीवन व्यर्थ ही जा रहा है। वही मसल हुई कि ‘धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का’।”
अफिलिया ने कहा – “भैया, यों लक्ष्यहीन जीवन बिताकर क्या तुम शांति प्राप्त कर सकते हो?”
“शांति! कहाँ है शांति? अपने इस पाप-भरे जीवन में मुझे स्वयं से घृणा है। अपने आचरण और व्यवहार से मैं स्वयं संतुष्ट नहीं हूँ। ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि शीघ्र ही यहाँ से उठाकर जननी से मिला दे। मैं इस दास-प्रथा के संबंध में कभी अपना मत प्रकट नहीं करता, पर आज तुमने बड़े आग्रह से बार-बार पूछा, तब मुझे अपने मन की इतनी बातें तुमसे कहनी पड़ीं। इस देश में ऐसे बहुत से आदमी हैं, जो मेरी ही तरह गुलामी की प्रथा से हृदय से घृणा करते हैं। इस प्रथा के कारण सारे देश का सत्यानाश हुआ जा रहा है। तरह-तरह के पाप और व्यभिचार हमारे समाज में घुसते जाते हैं। नैतिक वायु दूषित होकर नाना प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न कर रही है। इस घृणित दास-प्रथा के कारण गुलामों का ही बुरा नहीं हो रहा है, बल्कि जो लोग इन्हें अपने घर में रखते हैं, इन पर प्रभुत्व करते हैं, उनकी इनसे भी अधिक क्षति हो रही है। मानसिक रोग भी, कई शारीरिक रोगों की भाँति, संक्रामक होते हैं। इन गुलामों की गिरी हुई मानसिक अवस्था संक्रामक रोग की भाँति हमारे सभ्य समाज का नाश कर रही है। यह निश्चित बात है कि जहाँ कहीं अथवा जिस किसी जाति में किसी एक श्रेणी के लोग बिल्कुल गिरी हुई दशा में जीवन बिताते हैं, वहाँ अथवा उस जाति के सब लोगों की अंतरात्माएँ उन गिरी हुई दशावाले लोगों की छूत से धीरे-धीरे कलुषित हो जाती हैं। समाज में एक श्रेणी के लोगों की अवनति दूसरी श्रेणी के लोगों को भी अवनति की ओर आकर्षित करती है। पर हमारे यहाँ इन गुलामों की गिरी हुई अवस्था सभ्य लोगों के जीवन को जितना कलुषित करती है, वैसी दशा और कहीं नहीं है। कारण यह है कि हमें दिन-रात इनके साथ रहना पड़ता है, क्योंकि इन्हें आठ पहर चौंसठ घड़ी घर में ही रखना पड़ता है, पर इंग्लैंड में यह बात नहीं। वहाँ गरीब मजदूरों के साथ रईस, जमींदार और महाजनों को रहना नहीं पड़ता। वहाँ काम लिया, दाम लिया और छुट्टी। यहाँ तो ये दिन-रात घर में बने रहते हैं। इसलिए इनके जीवन के बुरे उदाहरण, इनसे मालिकों का कठोर व्यवहार हमारे बाल-बच्चे दिन-रात देखते रहते हैं। इन बुरे उदाहरणों का प्रभाव उनके जीवन पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इससे उनके चरित्र बिगड़ जाते हैं और मन विकृत हो जाते हैं। इवा यदि जन्म से ही देव-बाला सरीखी निर्मल प्रकृति की न होती तो अवश्य इनके साथ बरबाद हो जाती। हैजे के रोगी के पास रहने से जैसे हैजा होने का डर रहता है, वैसे ही इन्हें घर में रखकर सदैव अपना बुरा होने का डर है। हमारे यहाँ के राज-कर्मचारी इन्हें शिक्षित नहीं बनाना चाहते। वे कहते हैं कि शिक्षा पाते ही इनकी आँखें खुल जाएँगी और फिर ये तत्काल अपनी स्वाधीनता के लिए विद्रोही बन खड़े होंगे। पर इन अक्ल के अंधों को यह बात नहीं सूझती कि शिक्षा पाने से तो ये स्वाधीनता के लिए विद्रोही होंगे और दासता की बेड़ी काटने की चेष्टा करेंगे, पर बिना शिक्षा के कौन-सी भलाई हो रही है? भीतर-ही-भीतर उससे भी अधिक नाश हुआ जा रहा है, इसका उन्हें ख्याल ही नहीं। सचमुच इन कानून बनानेवालों और वकीलों से मनुष्य-समाज का जितना नुकसान हो रहा है, उतना और किसी श्रेणी के लोगों से नहीं।”
अफिलिया बोली – “गुलामी की इस प्रथा का अंतिम परिणाम क्या होगा?”
अगस्टिन ने कहा – “पता नहीं। पर एक बात निश्चित है; इनकी आँखें खुल रही हैं और इनकी दृष्टि स्वाधीनता की ओर बढ़ रही है। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि थोड़े ही दिनों में बड़ा भारी सामाजिक विप्लव होनेवाला है। संसार के सभी देशों में निम्नश्रेणी के लोगों में नवजीवन का संचार दिखाई दे रहा है। मेरी माता कभी-कभी कहा करती थी कि जगत में शीघ्र ही स्वर्ग का राज्य होगा। उस समय ईसा मुकुट धारण करके इस संसार में राज्य करेंगे। तब संसार में दु:ख, कष्ट और यंत्रणा का नाम भी न रहेगा। सारे संसार में शांति छा जाएगी। मेरी माता ने जो प्रार्थना मुझे सिखलाई थी, उसमें यह वाक्य भी था-‘हे पिता! संसार में आपका राज्य हो।’ कभी-कभी मैं इन बेचारे गुलामों की आहें और उत्तेजित भाव देखकर, सोचता हूँ कि अब शीघ्र ही संसार में वह राज्य होनेवाला है। पिछले फ्रांसीसी विप्लव की आलोचना करने से सहज ही मालूम हो जाता है कि संसार में बहुत थोड़े ही दिनों में समानाधिकार की दुंदुभि बजनेवाली है।”
अफिलिया ने अपना बुनने का काम छोड़कर कहा – “मैं तो कभी-कभी सोचती हूँ कि तुम इसी स्वर्ग-राज्य में विचरते हो।”
अगस्टिन बोला – “हाँ, मेरी बातों से यही जान पड़ेगा, पर कार्य देखकर मालूम होगा कि मैं घोर नरक में पड़ा हुआ हूँ।”
ये बातें हो ही रही थीं कि भोजन की घंटी हुई।
भोजन के समय मेरी ने प्रू की घटना का उल्लेख करके कहा – “दीदी, मैं समझती हूँ कि तुम हम सब लोगों को जंगली जानवर समझती हो।”
अफिलिया बोली – “प्रू के साथ जैसा व्यवहार हुआ है, उसे मैं अवश्य पशु-तुल्य व्यवहार समझती हूँ। लेकिन मैं तुम सब लोगों को जंगली जानवर नहीं समझती।”
मेरी ने कहा – “तुम्हें नहीं मालूम कि इस गुलाम-जाति में कोई-कोई ऐसे पाजी होते हैं कि वे किसी तरह वश में नहीं आते। ऐसे पाजियों का मरना ही भला है। मुझे ऐसे लोगों से जरा भी हमदर्दी नहीं होती। मालिक के कहने पर चलें और भले बनने का यत्न करें तो इन लोगों को मार खाकर कभी न मरना पड़े।”
इवा ने कहा – “माँ, वह बेचारी बड़ी दु:खी थी। अपना दु:ख भूले रहने के लिए शराब पीती थी।”
मेरी बोली – “तू रहने दे दु:ख की बातें। दास-दासियों को दुख क्या? मैं तो दिन-रात शारीरिक दु:ख में पड़ी रहती हूँ, पर शराब नहीं पीती। मुझसे अधिक दुख उसे क्या होगा? पर सच तो यह है कि गुलामों की जाति बड़ी पाजी होती है। कितने तो ऐसे भी होते हैं कि हजार बेंत मारो, तब भी वे सीधे नहीं होते। मुझे याद है कि मेरे पिता के यहाँ एक गुलाम बड़ा ही आलसी था। वह काम से बहाना करके दलदल में रहता था। चोरी करता था, और भी कितने ही बुरे-बुरे काम करता था। उस पर बहुत मार पड़ती, पर उसका चाल-चलन तनिक भी न सुधरा। अंत में एक दिन कोड़ों की मार से उसकी चमड़ी उधड़ गई, फिर भी वह भटकते-भटकते दलदल में चला गया और वहीं मर गया। अब कोई क्या करे, पिता तो दासों के साथ बड़ी दया का बर्ताव करते थे।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैंने एक बार बदमाश गुलाम को सीधा किया था। कितने ही मालिक और खेतों की देखभाल करनेवाले उससे हार चुके थे।”
मेरी बोली – “अच्छा, बताओ, तुमने भी इस जन्म में कभी कोई ऐसा काम किया था?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैंने जिसे वश में किया था वह आदमी बड़ा बलवान था, सूरत-शक्ल में दैत्स-सा था। बड़ा स्वतंत्रता-प्रिय और तेजस्वी था। किसी से नहीं दबता था। ठीक अफ्रीकी सिंह-सा था। लोग उसे सीपिओ कहते थे। बहुतों के हाथ के नीचे वह रहा, पर किसी से सीधा न हुआ। अंत में अल्फ्रेड ने उसे खरीदा, क्योंकि उसने सोचा कि वह उसे दुरुस्त कर लेगा। एक दिन सीपिओ खेत के ओवरसियर को लात मारकर जंगल में भाग गया। मैं उसी समय अल्फ्रेड से मिलने गया था। यह बात मेरे खेत का साझा छोड़ देने के बाद की है। इस घटना से अल्फ्रेड बड़ा क्रुद्ध हो रहा था। मैंने उससे कहा कि उसके निज के दोष से ऐसा हुआ है। मैं उसे सहज ही वश में कर सकता हूँ। और यह तय हुआ कि उसे पकड़कर दुरुस्त होने के लिए मुझे सौंप दिया जाएगा। उसे पकड़ने के लिए पाँच-छ: आदमी, शिकारी कुत्ते और बंदूकें लेकर चले। हिरन का शिकार करने में मनुष्य जैसे उत्साही रहता है, वैसा ही मनुष्य का शिकार चालू रहने पर शिकार में भी मनुष्य का उत्साह हो जाता है। मैं भी थोड़ा उत्साही हो गया था, पर मेरा भाव उसे शिकारियों से बचाकर ही वश में करने का था। खैर, हम लोगों के इस दल ने उसका पीछा किया। कुछ देर तक तो वह भागा और उछला, पर थोड़ी ही देर में एक बेंत के झाड़-झंकार में उलझ गया और पकड़ा गया। तब उसने घूंसों से लड़ना आरंभ किया, और मैं तुमसे कहता हूँ कि वह बड़ी ही भयंकरता से लड़ा। उसने केवल घूंसों की मार से तीन कुत्तों को मार गिराया, पर अंत में हम लोगों की गोली की चोट खाकर वह धरती पर, मेरे पैरों के पास, गिर पड़ा। उसका सारा शरीर लहू-लुहान हो गया। उसने आँख उठाकर मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में वीरता की ज्योति और निराशा का अंधकार, दोनों दिखाई पड़ते थे। मैंने अल्फ्रेड के आदमियों को उसे मारने से मना किया और मैं अल्फ्रेड से उसे खरीदकर ले आया। यहाँ वह पंद्रह दिन में ही इतना सीधा हो गया कि मेरे लिए जान तक दे सकता था।”
मेरी ने कहा – “तुमने उस पर ऐसा कौन-सा जादू कर दिया था?”
सेंटक्लेयर बोला – “मुझे उसके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ा। मैं उसे साथ लेकर अपने निजी कमरे में गया और उसके लिए अच्छा बिछौना लगा दिया, उसकी मरहम-पट्टीकर दी और अपने हाथों से उसकी सेवा करता रहा। जब वह ठीक हो गया, तब मैंने उसे मुक्ति-पत्र देकर कहा कि जहाँ जी चाहे, वहाँ चला जा।”
अफिलिया ने पूछा – “क्या वह चला गया?”
सेंटक्लेयर ने जवाब दिया – “नहीं। उस मूरखराज ने उस कागज के दो टुकड़े करके फेंक दिए और मुझे छोड़कर जाने से इनकार कर दिया। ऐसा साहसी और विश्वासी नौकर मुझे फिर कभी नहीं मिला। थोड़े दिनों बाद वह ईसाई हो गया, और बच्चों की तरह सीधा हो गया। एक बार हैजे का बड़ा प्रकोप हुआ। मैं भी उसके चक्कर में आ गया। उस समय उसने मेरे लिए अपनी जान की बाजी लगा दी, क्योंकि मेरे बचने की आशा न देखकर घर के जितने लोग थे सब भाग गए, पर वह निर्भीक होकर जी-जान से मेरी सेवा करता रहा। उसी के यत्न और परिश्रम से मैं जीवित बच गया। पर अफसोस, कुछ ही दिनों बाद उसे भी हैजा हो गया और बहुत कोशिश करने पर भी वह मृत्यु के पंजे से न बच सका। उसकी मृत्यु से मुझे जितना दु:ख हुआ, उतना कभी नहीं हुआ।”
सेंटक्लेयर जब ये बातें कह रहा था, उस समय इवा धीरे-धीरे उसके पास आकर खड़ी हो गई थी। वह बड़ी उत्सुकता से आँखें फाड़कर एकाग्रता से पिता की ओर देख रही थी। सेंटक्लेयर की बात समाप्त होते ही वह उससे लिपटकर रोने लगी। उसका सारा शरीर काँपने लगा।
सेंटक्लेयर ने कहा – “इवा, प्यारी बच्ची, क्या हुआ?” और फिर कहा – “तुमको ये बातें नहीं सुननी चाहिए। तुम बहुत ही कमजोर हो।”
तब इवा ने आत्मसंयम करके कहा – “नहीं बाबा, मैं कमजोर नहीं हूँ; पर ये बातें मेरे हृदय में बहुत चुभती हैं।”
सेंटक्लेयर बोला – “इवा बेटी, तुम्हारे कहने का क्या मतलब है?”
इवा ने कहा – “बाबा, मैं तुम्हें समझा नहीं सकती। मेरे मन में बहुतेरे विचार चक्कर लगाया करते हैं। शायद किसी दिन मैं तुमसे कहूँगी।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “बेटी, चाहे जितना सोचती-विचारती रहो, केवल रोकर अपने बाबा का जी मत दुखाना। लो, यह देखो, तुम्हारे लिए मैं कैसा सेब लाया हूँ।”
पिता के हाथ से सेब लेकर इवा मुस्कराई, किंतु उस समय भी उसके होठ काँप रहे थे। सेंटक्लेयर उसका हाथ पकड़कर उसे बरामदे में ले गया और तरह-तरह की चीजें दिखाकर उसे बहलाने लगा। कुछ ही क्षणों के बाद दोनों को हँसी सुनाई दी, मानो दोनों खेल रहे हों।
बड़ों की बातें कहते-कहते हम अपने मित्र टॉम की बात भूले जा रहे हैं, पर यदि आप हमारे साथ अस्तबल की कोठरी में चलें तो टॉम की कुछ खबर पा सकते हैं। टॉम की यह कोठरी बहुत ही साफ-सुथरी है। उसमें एक चारपाई, एक कुर्सी और एक मेज रखी है। उस पर एक बाइबिल और भजनों की एक पुस्तक है। टॉम इसी कोठरी में बैठा हुआ किसी गहरी चिंता में डूबा है। सामने एक स्लेट है। स्त्री, पुत्र और कन्या आदि के लिए उसका मन व्याकुल हो रहा है। उनका समाचार जानने के लिए उसने इवा से चिट्टी लिखने का एक कागज माँग लिया है और पत्र लिखने के कठिन काम में जुट गया है। पहले के मालिक के लड़के जार्ज से टॉम ने थोड़ा-थोड़ा लिखना सीखा था; लेकिन सब अक्षर अब उसे याद नहीं हैं। जो याद हैं, उनमें भी कोई कहाँ लिखना चाहिए, यही समझ में नहीं आता। टॉम बड़ी कठिनाई से स्लेट पर पत्र-रचना कर रहा था, इसी समय चिड़ियों की तरह फुदकती हुई इवा चुपके से आकर उसके पीछे खड़ी हो गई और कंधे पर से झाँककर बोली – “अहा टॉम काका! यह तुम क्या तमाशा कर रहे हो?”
टॉम ने कहा – “मिस इवा! मैं अपनी बेचारी बुढ़िया पत्नी तथा अपने छोटे बच्चों को पत्र लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, पर मैं देखता हूँ कि यह काम मुझसे होगा नहीं।”
इवा ने कहा – “टॉम, मैं तुम्हारी सहायता करना चाहती हूँ। मैंने कुछ लिखना सीखा था। पिछले साल मैं सब अक्षर जानती थी, पर जान पड़ता है, अब मैं सब भूल गई हूँ।”
इसके बाद दोनों पास बैठकर एक मन से पत्र लिखने में लग गए। दोनों की विद्या की दौड़ बराबर ही है। बड़े परिश्रम और एक-दूसरे से सलाह करने के बाद एक-एक शब्द लिखा जाने लगा। अंत में इवा ने उत्साह से कहा – “टॉम काका, खूब अच्छी चिट्ठी बन गई। तुम्हारी पत्नी और बच्चे इसे पाकर बड़े खुश होंगे। ओह, बड़े दु:ख की बात है कि इन लोगों को छोड़कर तुम्हें आना पड़ा। मैं किसी दिन बाबा से कहूँगी कि वह तुम्हें उन लोगों के पास लौट जाने दें।”
टॉम ने कहा – “मेरी मालकिन ने कहा है कि रुपया जुटते ही वह मुझे फिर खरीद लेंगी। मालिक के बेटे जार्ज ने कहा है कि वह खुद आकर मुझे ले जाएँगे। यह देखो, उन्होंने अपनी याद की निशानी के रूप में मुझे यह मुद्रा दी है।”
उसने कपड़ों के भीतर से मुद्रा निकालकर दिखलाई।
इवा बोली – “हाँ-हाँ, तब वह जरूर आकर तुम्हें ले जाएँगे। मुझे बड़ी खुशी होती है।”
टॉम ने कहा – “इसी से मैं पत्र लिखकर उन्हें अपना पता बता देना चाहता हूँ और अपनी कुशल लिख देना चाहता हूँ। इससे मेरी पत्नी लोई को बड़ा संतोष होगा। चलते समय वह मेरे लिए बहुत रोई थी।”
इतने में सेंटक्लेयर ने दरवाजे से आते हुए आवाज दी – “टॉम!”
टॉम और इवा दोनों चौंक पड़े।
सेंटक्लेयर ने अंदर आकर और स्लेट देखकर कहा – “क्या हो रहा है यह?”
इवा बोली – “यह टॉम की चिट्ठी है। मैं लिखने में इसकी मदद कर रही हूँ। क्या यह अच्छी बात नहीं हुई?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैं तुम्हारा साहस भंग नहीं करना चाहता। पर मेरी समझ में अच्छा होता कि टॉम मुझसे चिट्ठी लिखवा लेता। मैं घूमकर आऊँगा तो लिख दूँगा।”
इवा बोली – “यह जरूर चिट्ठी लिखवाएगा क्योंकि उसकी मालकिन ने उसे रुपया भेजकर फिर खरीद लेने का वादा किया है। वह अभी मुझे बता रहा था।”
सेंटक्लेयर ने मन-ही-मन सोचा कि यह केवल फुसलाने की बात है। जो लोग कुछ दयालु होते हैं, वे दासों को बेचने के समय ऐसी ही बातें कहकर झूठमूठ उसे समझा देते हैं। लेकिन उसने मुँह से कुछ कहा नहीं, केवल टॉम को घोड़ा कस लाने की आज्ञा दी।
शाम को लौटकर सेंटक्लेयर ने टॉम की चिट्ठी लिखकर डाक में डलवा दी।
इधर मिस अफिलिया घर के कामों में लगी रहती थी। दीना से लेकर दास बच्चे तक सब कहते थे कि मिस अफिलिया अजब किसम की स्त्री है, क्योंकि उसके नियमों के कारण सब तंग आ रहे थे।
उच्च श्रेणी के दास-दासियों अर्थात् एडाल्फ, रोजा और जेन की तो राय थी कि वह भली औरत नहीं है, क्योंकि उसके हावभाव बड़े आदमियों के-से नहीं हैं। इस पर उन्हें बड़ा अचरज होता था कि वह सेंटक्लेयर की चचेरी बहन है। मेरी का कहना था कि अफिलिया दीदी जिस तरह दिन-रात काम में जुटी रहती हैं, उसे देखने से ही आदमी को थकावट हो जाती है।
23. अफिलिया की परीक्षा
एक दिन सवेरे जब मिस अफिलिया घर के कामज-काज में लगी हुई थी, उसी समय सेंटक्लेयर ने सीढ़ी के पास खड़े होकर उसे पुकारा – “बहन, नीचे आओ, मैं तुम्हें दिखाने के लिए एक चीज लाया हूँ।”
मिस अफिलिया ने नीचे आकर पूछा – “कहो, क्या दिखाते हो?”
सेंटक्लेयर ने आठ-नौ वर्ष की एक हब्शी लड़की को खींचकर उसके सामने कर दिया।
लड़की बहुत ही काली थी। अपने चंचल नेत्रों से वह कमरे की चीजों को बड़े कौतूहल से देख रही थी। जिस प्रकार अत्याचार से पीड़ित होकर हृदय की नीचता और दुष्टता बाहरी गंभीर भाव के आवरण से ढकी रहती है, उसी प्रकार बाहरी गंभीर भाव और विनय उसके मुँह पर झलक रही थी। उसके कपड़े बड़े मैले-कुचैले और फटे-पुराने थे; शरीर उसका दुबला-पतला और बड़ा ही गंदा था। उसे देखकर मिस अफिलिया ने पूछा – “अगस्टिन, क्या सोचकर तुमने इसे खरीदा है?”
सेंटक्लेयर बोला – “यही कि तुम इसे सिखाओ-पढ़ाओ और कर्तव्य का ज्ञान कराओ। इसका नाम टप्सी है। यह खूब नाचती-गाती है।”
इसके बाद सेंटक्लेयर ने टप्सी से कहा – “यह तेरी नई मालकिन हैं। मैं इनके हाथ में तुझे सौपता हूँ। देखना, इन्हें खुश रखना।”
टप्सी गंभीरता का भाव धारण करके बोली – “जो आज्ञा!”
सेंटक्लेयर ने फिर कहा – “टप्सी, तुझे भला बनना पड़ेगा।”
उसने फिर कहा – “जो आज्ञा!”
मिस अफिलिया ने सेंटक्लेयर से कहा – “अगस्टिन, तुम्हारा घर यों ही इन गुलामों और इनके बच्चों से भरा पड़ा है। इनके मारे घर में पैर रखने की तो जगह नहीं है। सवेरे उठ कर देखती हूँ, कोई दरवाजे के पास पड़ा है तो दो-एक मेज के नीचे से सिर निकाल रहे हैं, कोई सीढ़ी पर पड़ा हुआ है तो कोई नहीं। फिर इतनों के होते हुए भी यह एक और नई आफत क्यों मोल ले आए?”
अगस्टिन बोला – “मैंने तुमसे कहा न कि सिखाने-पढ़ाने के लिए। तुम शिक्षा पर बहुत भाषण दिया करती हो। इससे मैंने सोचा कि इसे तुमको दूँगा, जिससे तुम इसे खूब पढ़ा-लिखाकर अपने साँचे में ढालो और इसे कर्तव्य का ज्ञान कराओ।”
अफिलिया ने कहा – “मैं इस नहीं चाहती। पहले से ही जितने हैं, कम नहीं हैं। उन्हीं के लिए कुछ कर सकूँ तो बहुत है।”
अगस्टिन बोला – “बस, यही तुम ईसाइयों का धर्म है! एक सभा बना ली और दो-चार गरीब लड़कों को, (जो दरिद्रता के मारे पढ़ नहीं सकते) पादरी बनाकर धर्म-प्रचार करने को विदेश में भेज दिया। इन बेचारों को जन्म भर विदेश में गला फाड़-फाड़कर मरना पड़ता है। तुम लोग दो-एक को सिखा-पढ़ाकर ईसाई बनाओ तो जानूँ कि अलबत्ता तुम लोग धर्म पर श्रद्धा रखते हो। पर तुमसे परिश्रम नहीं होगा, मुँह से चाहे जो कह लो, काम पड़ने पर कहोगी कि ये मैले हैं, बड़े गंदे हैं, इन्हें देखकर घिन आती है।”
अफिलिया बोली – “मेरे कहने का मतलब यह नहीं था। इसे पढ़ाना धर्म का काम जरूर है, पर तुम्हारे घर में तो यों ही बेहिसाब दास-दासी भरे पड़े हैं। मेरा समय और दिमाग चाटने के लिए वही काफी हैं। एक नए को और लाए बिना आखिर क्या बिगड़ रहा था?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “खैर बाबा, तुम रास्ते पर आईं, यही बहुत है। सुनो, मैं इसे केवल शिक्षा दिलाने के लिए नहीं लाया हूँ। पड़ोस में हमारे एक साहब हैं। वह मर्द-औरत दोनों-के-दोनों बड़े शराबी हैं। यह लड़की उन्हीं के यहाँ रहती थी। वे दिन-रात इसे पीटते थे और यह चिल्लाया करती। इसकी चीखों के मारे घर के सामने से गुजरना मुश्किल था, इसी से मैंने इसे खरीद लिया। इसमें कुछ अक्ल जान पड़ती है। कोशिश करके देखो कि तुम इसे सिखा-पढ़ाकर आदमी बना सकती हो कि नहीं। मैं इसे तुम्ही को सौंप दूँगा। तुम इसे अपना ईसाई धर्म सिखलाओ। मुझमें तो शिक्षा देने की योग्यता नहीं है। तुम कुछ कर सको तो यत्न करके देखो!”
जैसे कोई दुर्गंधित और सड़ी हुई चीज को उठाने के लिए बेमन से आगे बढ़ता है, वैसे ही मिस अफिलिया उस बालिका के पास जाकर बोली – “ओह, कितनी गंदी है! आधे बदन पर कपड़ा ही नहीं है।”
वह उसे नीचे रसोईघर के पास ले गई। उसे देखकर दीना बोली – “मेरी तो अक्ल ही काम नहीं करती कि मालिक ने इसे किसलिए खरीदा है। मैं इसे अपने पास नहीं रहने दूँगी।”
जेन और रोजा ने मुँह बनाकर कहा – “हम इसे कभी अपने पास न आने देंगी।”
मिस अफिलिया ने देखा कि उस बालिका का बदन धोना और कपड़े पहनाना तो दूर की बात है, कोई उसको छूना भी नहीं चाहता। तब ईसाई धर्म के अनुरोध से लाचार होकर वह स्वयं ही उसका शरीर साफ करने लगी। बड़ी अनिच्छा से जेन ने उसकी कुछ मदद की।
लड़की की पीठ और कंधों पर कोड़ों की मार के दाग और घाव देखकर मिस अफिलिया को उस बच्ची पर बड़ी दया आई।
साफ कपड़े पहनाकर अफिलिया ने कहा – “अब यह जरा ईसाई-सी जान पड़ती है।” फिर मन ही मन उसका शिक्षाक्रम निश्चय करके पूछने लगी – “टप्सी, तू कितने बरस की है?”
टप्सी ने दाँत निपोरकर कहा – “मालूम नहीं।”
अफिलिया बोली – “अरी, तू अपनी उम्र नहीं जानती? तुझे कभी किसी ने नहीं बताई। तेरी माँ कहाँ है?”
टप्सी ने फिर खीस निकालकर कहा – “मेरे माँ कभी नहीं थी।”
“तेरे माँ कभी नहीं थी! इसके क्या माने? तू कहाँ पैदा हुई थी?”
“मैं कभी पैदा नहीं हुई थी।”
“मेरी बातों का जवाब इस तरह नहीं देना चाहिए। मैं तेरे साथ खेल नहीं कर रही हूँ। तू बता कहाँ जन्मी थी और तेरे माँ-बाप कौन थे?”
“मैं कभी नहीं जन्मी थी। एक व्यापारी के यहाँ बूढ़ी मौसी ने मुझे कुछ और लड़कों के साथ पाला था।”
जेन दाँत निकालकर बोली – “मिस साहब, आप जानती नहीं कि गुलामों का व्यापार करनेवाले लोग बकरी के बच्चों की तरह छोटे-छोटे लड़के-लड़कियों को खरीद लाते हैं और कुछ दिन उन्हें पालकर बड़े होने पर बाजार में बेचते हैं। शायद इसे भी किसी व्यापारी ने दो-तीन बरस की उम्र में खरीदा होगा, इसी से यह अपने माँ-बाप की बाबत कुछ नहीं जानती।”
अफिलिया ने पूछा – “इस मालिक के घर तू कितने दिनों से थी?”
“मालूम नहीं!”
जेन बोली – “हब्शी बच्चे ये सब बातें नहीं बता सकते। इन्हें न गिनती आती है और न यही जानते हैं कि बरस किसे कहते हैं।”
अफिलिया ने पूछा – “टप्सी, तुने कभी ईश्वर का नाम सुना है?”
टप्सी को इस सवाल पर अचरज हुआ, पर वह अपने स्वभाव के अनुसार खीस निकालकर हँसने लगी।
“तू जानती है, तुझे किसने बनाया है?” अफिलिया ने अगला सवाल किया।
“किसी ने नहीं बनाया। मुझे लगता है, मैं अपने-आप बड़ी हो गई।”
“तू सीना जानती है?”
“नहीं।”
“तू क्या कर सकती है? अपने मालिक के यहाँ तू क्या करती थी?”
“पानी भरती थी, बरतन माँजती थी, छुरी-काँटा साफ करती थी।”
“क्या वे तुझसे भलमनसी का बर्ताव करते थे?”
अफिलिया की ओर एकटक देखकर वह बोली – “जान पड़ता है, वे अच्छे थे।”
इसी समय सेंटक्लेयर ने आकर मिस अफिलिया की कुर्सी के पीछे से कहा – “जीजी, इसे पढ़ाने में बड़ी सुविधा रहेगी। इसके मन में कोई पूर्व संस्कार नहीं है। इसका मन एकदम कोरे कागज की तरह है। तुम्हें इसके किसी तरह संस्कार दूर करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।”
मिस अफिलिया के शिक्षा-संबंधी विचार भी उसके और विचारों की भाँति एकदम नपे-तुले हुए थे। उसके ये विचार वैसे ही थे, जैसी शिक्षा सौ बरस पहले इंग्लैंड में प्रचलित थी। छात्रों के लिए जो जरूरी हो, उसे मन लगाना सिखलाना; सवाल-जवाब के ढंग से बालकों को यह बताना कि ईश्वर ने ही इस जगत को रचा है और वही पालन कर रहा है; पुस्तक-पाठ, सीना-पिरोना और झूठ बोलने पर सड़ासड़ बेतों की मार! अफिलिया ने इन्हीं नियमों के अनुसार टप्सी को शिक्षा देने का निश्चय किया।
सेंटक्लेयर के परिवार में सब टप्सी को मिस अफिलिया की लड़की कहते और समझते थे। सताए हुए लोग इतने गिर जाते हैं कि एक-दूसरे के लिए उनकी कुछ भी सहानुभूति नहीं होती, इसी से सेंटक्लेयर के घर का कोई दास-दासी टप्सी को स्नेह की दृष्टि से नहीं देखता था। सब उसे एक बला समझते थे। इसी कारण मिस अफिलिया उसे अपने ही सोने के कमरे में रखती थी और उसे बिस्तर बिछाने का काम दे रखा था। पर टप्सी से मिस अफिलिया को कितना कष्ट मिल रहा था, इसे उसका जी ही जानता था। लेकिन उसमें हद दर्जे की सहिष्णुता भी थी, इससे वह घबराई नहीं।
पहले दिन मिस अफिलिया ने टप्सी को बिछौना करने का ढंग और उसकी बारीकियाँ बताना आरंभ किया।
“टप्सी, मैं तुझे बताती हूँ कि मेरा बिछौना इस तरह बिछाना। देख ले, अच्छी तरह सीख ले।”
टप्सी ने बड़े उत्साह से कहा – “जो आज्ञा!”
अफिलिया बोली – “टप्सी, इधर देख, यह चादर की सीधी परत है, यह उल्टी। तुझे याद रहेगा न? उल्टी ओर से मत बिछाना।”
बड़े ध्यान से देखते हुए टप्सी ने कहा – “जो आज्ञा!”
जिस समय मिस अफिलिया उसे बिछौना बिछाने का ढंग सिखा रही थी, उसी समय टप्सी ने धीरे-धीरे उसके फीते और दस्ताने चुराकर अपनी आस्तीन में छिपा लिए। अफिलिया ने कहा – “अच्छा, अब बिछाकर दिखला।”
टप्सी बड़ी चतुराई से बिस्तर बिछाने लगी। अफिलिया बड़ी प्रसन्न हुई। लेकिन तभी दुर्भाग्यवश टप्सी की आस्तीन से अकस्मात् फीता बाहर निकल आया। यह देखकर अफिलिया बोली – “अरी, यह क्या? तू बड़ी खोटी है। तूने चोरी करना भी सीखा है?”
यह कहकर उसकी आस्तीन से फीता निकाल लिया। लेकिन टप्सी इससे जरा भी नहीं झेंपी। बड़ी गंभीर बनकर खड़ी रही और जरा देर बाद मानो कोई बात ही न हो, बोली – “मेम साहब का फीता मेरी आस्तीन में कैसे आ गया?”
अफिलिया ने कहा – “तु बड़ी दुष्ट है। मुझसे झूठ मत बोल। तूने फीता चुराया था।”
टप्सी बोली – “मेम साहब, मैं सच कहती हूँ कि मैंने इससे पहले कभी ऐसा फीता नहीं देखा था।”
“टप्सी, तू नहीं जानती कि झूठ बोलना कितना बड़ा पाप है।”
“मेम साहब, मैं कभी झूठ नहीं बोलती। मैं सच-ही-सच कहती हूँ।”
“टप्सी, इस तरह झूठ बोलेगी तो मैं तुझे कोड़े लगाऊँगी।”
“दिन भर बेंत लगाने से भी कोई दूसरी बात नहीं हो सकेगी। मैंने कभी यह फीता नहीं देखा था। आपने बिछौने पर रखा था, सो मेरी आस्तीन में चला गया।”
टप्सी के यों लगातार झूठ बोलने से मिस अफिलिया को ऐसा गुस्सा आया कि उसने कुर्सी से उठकर उसे पकड़कर झकझोरा और कहा – “फिर कभी मुझसे झूठ मत बोलना।”
अफिलिया का झकझोरना था कि टप्सी की दूसरी आस्तीन से दस्ताने निकल पड़े?
अफिलिया ने कहा – “अब बोल, अब भी कहेगी कि तूने दस्ताने नहीं चुराए? फीता तो अपने-आप आस्तीन में चला गया! ये दस्ताने किसने तेरी आस्तीन में ठूँस दिए?”
टप्सी ने दस्तानों की चोरी स्वीकारकर ली, पर फीते की चोरी से इनकार करती गई।
अफिलिया ने कहा – “टप्सी, अगर तू अपनी गलती मान ले तो तुझे चाबुक नहीं लगाऊँगी।”
टप्सी ने सब चीजों की चोरी स्वीकार कर ली और अपनी भूल के लिए बहुत पछतावा करने लगी।
अफिलिया ने कहा – “मैं जानती हूँ कि तूने घर की और भी चीजें चुराई होंगी। कल मैंने तुझे घर में बहुत बार इधर-उधर फिरते देखा था। अगर और कोई चीज चुराई हो तो सही-सही बता दे, मैं तुझे नहीं मारूँगी।”
“मेम साहब, मैंने इवा के गले का हार चुराया है।”
“अरी दुष्टा, और बोल!”
“रोजा के कान की बाली चुराई है।”
अफिलिया ने संयत स्वर में कहा – “जा, अभी दोनों चीजें ला।”
“मेरे पास नहीं हैं। मैंने फूँक डाली।”
“फूँक डाली! झूठ बोलती है। जा, झटपट ला, नहीं तो कोड़े खाएगी।”
टप्सी ने रोते और सिसकते हुए कहा कि वह नहीं ला सकती। सब चीजें जल गईं।
“तूने उन चीजों को जलाया क्यों!”
“मैं बड़ी पापिन हूँ, दुष्टा हूँ, इसी से ऐसा किया।”
ठीक इसी समय इवा अपना हार गले में पहने हुए वहाँ आई। अफिलिया ने कहा – “क्यों इवा, तुमने अपना हार कहाँ पाया?”
इवा विस्मय से बोली – “पाया! खोया कहाँ था! यह तो मेरे गले ही में पड़ा है।”
“कल तूने इसे पहन रखा था?”
“हाँ बुआ, यह सारी रात मेरे गले ही में रहा है। सोते समय मैं इसे उतारकर रखना भूल गई थी।”
अफिलिया अब बड़े चक्कर में पड़ी। इतने में रोजा भी अपनी बाली झुलाती हुई आ पहुँची। उसे देखकर अफिलिया को और भी अचरज हुआ। उसने बड़ी निराशा से कहा – “हे राम, मैं इस लड़की को लेकर क्या करूँगी?” फिर बोली – “टप्सी, तूने जो चीजें नहीं चुराईं, उनके लिए कैसे कह दिया कि तूने चुराई हैं?”
टप्सी ने आँखें मलते हुए कहा – “मेम साहब, आपने मुझे सब स्वीकार करने को कहा था, इसी से मैंने सब स्वीकार कर लिया।”
“लेकिन मैंने तुझसे यह तो नहीं कहा था कि जो नहीं लिया है उसे भी स्वीकार कर ले। यह भी वैसा ही बड़ा झूठ है, जैसा दूसरा।”
टप्सी ने बड़े सरल और आश्चर्य भाव से कहा – “अच्छा यह बात है?”
इस पर रोजा ने टप्सी की ओर तीव्र दृष्टि से देखकर कहा – “भला यह सच कहेगी? मैं इसकी मालिक होती तो मारे कोड़ों के इसकी चमड़ी उधेड़ देती।”
इवा ने आज्ञा के ढंग से कहा – “चुप रहो रोजा, मैं तुम्हारी ऐसी बातें सुनना पसंद नहीं करती।”
रोजा ने कहा – “मिस इवा, तुम बड़ी दयालु हो। इन शैतानों से व्यवहार करना नहीं जानती हो। ये जितने ही काटे जाएँ, उतने ही सीधे रहते हैं।”
इवा ने क्रुद्ध होकर कहा – “रोजा, खबरदार जो ऐसी बात मुँह से फिर कभी निकाली।”
रोजा सकपका गई।
इवा खड़ी टप्सी को देखती रही। आमने-सामने खड़ी ये बालिकाएँ पराधीनता और स्वाधीनता के दो जीत-जागते उदाहरण हैं। स्वाधीनता के उत्तम और पराधीनता के बुरे फल का कैसा अच्छा चित्र है! स्वाधीनता की गोद में पली हुई इवान्जेलिन उमंग से उमड़े हुए सरल और स्नेह भाव से टप्सी को उपदेश दे रही है और टप्सी शुष्क हृदय से बनावटी विनय दिखलाकर संदिग्ध चित्त से उसकी बातें सुन रही है। कितना भेद है! इवा ने कहा – “टप्सी, तू चोरी क्यों करती है? तुझे जो चीज चाहिए, मैं दूँगी। तू फिर चोरी मत करना।”
यह पहला अवसर था जब टप्सी ने ऐसे मधुर और स्नेह-पूर्ण वचन सुने। इस स्नेह-संभाषण से उसका हृदय पिघलने लगा। उसकी आँखों से दो बूँद आँसू गिर पड़े, पर तुरंत ही उसके कठोर भाव ने आकर फिर उसके हृदय पर अधिकार कर लिया। उसने दाँत दिखलाकर इवा की बात हँसी में उड़ा दी। उसे इस बात का बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ कि इवा उसे अपनी चीजें दे सकती है।
टप्सी के मन में ऐसे भावों का उदय होना स्वाभाविक था। उसे इस जन्म में न किसी ने प्यार किया, न उसके प्रति दया दिखलाई। उसे कोड़ों की मार और ऊपर से तिरस्कार के सिवा कभी और कुछ नसीब नहीं हुआ। भला ऐसी दशा में पली हुई लड़की इवा की उन सरलतापूर्ण बातों पर सहसा कैसे विश्वास कर सकती थी? उसे इवा की बातें मजाक-सी जान पड़ीं। अफिलिया ने टप्सी को पढ़ाने-लिखाने के अनेक ढंग सोचे, अनेक उपाय किए, पर कोई विधि कारगर न हुई। टप्सी की दुष्टता किसी तरह कम न हुई। हारकर एक दिन अफिलिया ने सेंटक्लेयर से कहा – “मेरी तो समझ में ही नहीं आता कि बिना कोड़े लगाए मैं कैसे उसे राह पर लाऊँ?”
सेंटक्लेयर बोला – “तब तुम अपने दिल के संतोष के लिए उसे कोड़े ही लगाओ। मैं तुम्हें उस पर पूरा अधिकार देता हूँ। जो चाहो, सो करो।”
“लड़के बिना मार के सीधे नहीं होते, पिटने से ही उनकी अक्ल दुरुस्त होती है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “हाँ-हाँ, जरूर। जो तुम ठीक समझो, करो। पर, मैं तुमसे एक बात कहता हूँ। मैंने देखा है कि इस लड़की पर खूब कोड़े पड़ते थे, लोहे की छड़ को गर्म करके इसे दागा जाता था, इसकी लात-घूँसों से ठुकाई होती थी, फिर भी इसका स्वभाव दुरुस्त नहीं हुआ। इसी लिए जब तक इसकी और ज्यादा मरम्मत न होगी, तब तक कुछ न होगा।”
“तब बोलो, क्या उपाय हो? अफिलिया ने पूछा।”
“तुम्हारा सवाल टेढ़ा है।” सेंटक्लेयर बोला – “मैं चाहता हूँ कि तुम अपने-आप ही इसका उत्तर सोच लो। मुझे ऐसे लोगों की दवा नहीं मालूम, जिन्हें कोड़े खाने पड़ते हैं और जो कोड़े खाकर भी नहीं सुधरते।”
अफिलिया बोली – “मेरी तो अक्ल ही काम नहीं करती। मैंने कभी ऐसी लड़की नहीं देखी।”
“क्यों? बस मुझको ही दोष देने के लिए हो? मेरी तो तुम बहुत लानत-मलामत किया करती हो – दास-दासियों को शिक्षा नहीं देते, इनका सत्यानाश कर रहे हो! अब क्या हो गया? तुमसे एक छोटी-सी आत्मा का भी उद्धार करते नहीं बनता? मैं तुमसे यह भी कह देता हूँ कि कोड़ों की मार से इनका सुधार कभी नहीं हो सकता। कोड़ों की मार अफीम की खुराक की तरह होती है। रोज-रोज खुराक बढ़ानी पड़ती है, अंत में बढ़ते-बढ़ते उसका ठिकाना नहीं रहता। प्रू की मौत क्यों हुई? रोज उसके मालिक को कोड़ों की संख्या बढ़ानी पड़ती थी। यों ही बढ़ाते-बढ़ाते आखिर कोड़ों ने ही उसकी जान ले ली। इसी से मैं अपने दास-दासियों को कोड़े नहीं लगाता। मेरे यहाँ के दास-दासी भी बिगड़े हुए हैं। पर कोड़ों की मार से ये नहीं सुधारे जा सकते। इन्हें मारकर और तो कुछ होना नहीं है, अपनी भी प्रकृति पशुओं जैसी बना लेनी है।”
“तुम्हारे यहाँ की दास-प्रथा की बलिहारी!”
“बेशक मैं तो खुद कहता हूँ। पर अब तो ये बुरे बन गए। अब इनके लिए क्या होना चाहिए।”
अफिलिया बोली – “यह तो मैं नहीं कह सकती, लेकिन मैंने अब इनके सुधार को अपना कर्तव्य मान लिया है। अब मैं जी-जान से टप्सी के सुधार का यत्न करूँगी।”
इसके बाद अफिलिया टप्सी के सुधार के लिए बड़ा परिश्रम करने लगी। वह अपने कई घंटे इस काम में लगा देती थी। कैसी भी हैरानी हो, वह परवा नहीं करती थी। इस मेहनत का नतीजा यह हुआ कि टप्सी ने जल्दी ही किताब पढ़ना सीख लिया। पर और कामों में उसका नटखटपन ज्यों-का-त्यों रहा। सिलाई सीखने के समय कभी वह सुई तोड़ डालती, कभी तागे का गोला नोच डालती और कभी कूदकर पेड़ पर चढ़ जाती। ये सब उत्पाद देखकर अफिलिया ने सोचा कि कहीं इसके संग का बुरा प्रभाव इवा पर न पड़े। उसने सेंटक्लेयर से इसकी चर्चा की तो सेंटक्लेयर ने इसे हँसी में उड़ा दिया और कहा कि इवा पर किसी की संगत का बुरा प्रभाव नहीं पड़ सकता। कमल पर जैसे जल असर नहीं कर सकता, वैसे ही इवा के हृदय को कोई भी बुराई नहीं छू सकती।
शुरू में घर के दास-दासी टप्सी से घृणा करते थे। वह उनके पास नहीं फटकने पाती थी, पर अब उससे सब चौंकते थे। वह बड़ी धूर्त थी। जो कोई उसे नाखुश करता, उसका वह नाक में दम कर देती। चुपके से उसके कपड़े कैंची से या दाँतों से काट देती, नहीं तो स्याही ही पोत देती, या उसकी कोई चीज ही चुरा लेती। किसी से छिपा नहीं था कि यह टप्सी की ही करतूत है। कोई उससे कुछ कह भी नहीं सकता था, क्योंकि उसके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता था, और बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के, संदेह का लाभ अपराधी को उठाने देने की पक्षपातिनी अफिलिया दंड न देती थी। टप्सी दास-दासियों को ही तंग नहीं करती थी, वह अफिलिया को भी बहुत परेशान करती थी। एक दिन अफिलिया अपने कपड़ों के संदूक की कुंजी बाहर भूल गई। वह टप्सी के हाथ लग गई। उसने किया क्या कि संदूक से अफिलिया का बहुत बढ़िया दुशाला निकालकर उसे सिर पर लपेट लिया और कुर्सी पर बैठकर आईने में मुँह देखने लगी। अफिलिया ने कमरे में आकर जब यह हाल देखा तो गुस्से में भरकर बोली – “यह तू क्या कर रही है?”
टप्सी ने जवाब दिया – “मैं कुछ नहीं जानती। मैं बड़ी दुष्ट हूँ।”
अफिलिया ने झुँझलाकर कहा – “मेरी समझ में नहीं आता कि तेरे साथ किस तरह पेश आऊँ?”
टप्सी बिना झिझक के बोली – “मेम साहब, मुझे बेंत मारिए, मेरे पहले मालिक भी मुझे बेंत लगाते थे।”
“टप्सी” , अफिलिया ने दया से प्रेरित होकर कहा – “मैं तुझे बेंत नहीं लगाना चाहती, तू अपनी इच्छा से ही सुधर सकती है। तू इस तरह की दुष्टता छोड़ क्यों नहीं देती?”
“मेम साहब, मैंने बेंत खाए हैं। मैं समझती हूँ कि मेरे लिए वही ठीक दवा होगी।” टप्सी ने कहा।
अफिलिया अब कभी-कभी टप्सी को बेंत जमाने लगी। बेतों की मार खाते समय वह बहुत चीखती और तरह-तरह के स्वाँग रचती पर छूटते ही दूसरे लड़कों से जाकर कहती – “मिस अफिलिया का बेंत मारने का ढंग अच्छा नहीं है। उनकी मार तो मुझे मालूम ही नहीं होती। मेरे पहले मालिक की मार से तो चमड़ी निकल आती थी, वह बेंत मारना खूब जानते थे।”
मिस अफिलिया हर रविार को टप्सी को धर्म-शिक्षा दिया करती थी। टप्सी की स्मरण-शक्ति बड़ी अच्छी थी। वह अनायास सब यादकर लेती थी।
अफिलिया के सामने खड़ी होकर अब टप्सी अपना धर्म-पाठ सुनाने लगी :
“हम लोगों के आदि-पुरुष, आदम और हौआ, पूर्ण स्वाधीनता के साथ उच्च-प्रदेश में बिचरने लगे। फिर ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण वे वहाँ से गिरा दिए गए।”
इतना कहकर टप्सी कौतूहलपूर्ण दृष्टि से देखने लगी।
अफिलिया ने कहा – “टप्सी, चुप क्यों हो गई?”
“मेम साहब, क्या हमारे आदि-पुरुष केंटाकी में रहते थे?”
“क्या मतलब?”
“क्या वे केंटाकी से गिराए गए थे? मेरे पहले मालिक कहा करते थे कि वे हम लोगों को केंटाकी से खरीदकर लाए थे।”
सेंटक्लेयर जोर से हँस पड़ा। बोला – “बहन, इन्हें जाकर समझाओ। इसका अर्थ जब तक न समझा दोगी, तब तक ये यों ही अपना अर्थ लगाते रहेंगे।”
अफिलिया ने झुँझलाकर कहा – “तुम रहने दो! तुम्हारे हँसने से पढ़ाने में गड़बड़ होती है।”
“अच्छा अब माफ करो, अब मैं हँसकर कोई गड़बड़ नहीं करूँगा।”
यह कहकर सेंटक्लेयर अखबार पढ़ने लगा। पर मिस अफिलिया की शिक्षा-प्रणाली ऐसी अनोखी थी कि सेंटक्लेयर को बीच-बीच में हँसी आए बिना नहीं रहती थी और अफिलिया उसके हँसने पर बहुत चिढ़ती थी।
टप्सी अफिलिया से धर्मशास्त्र और लिखना-पढ़ना सीखती रही, पर उसकी दुष्टता जरा भी कम न हुई। दूसरे सब दास-दासी उस पर बहुत चिढ़ते थे, पर कोई कभी उसे मारने आता तो वह दौड़कर सेंटक्लेयर की कुर्सी के नीचे छिप जाती थी। दयालु सेंटक्लेयर किसी को उसे मारने नहीं देता था।
24. शेल्वी की प्रतिज्ञा
गर्मी के दिन थे। दोपहर की सख्त गर्मी के कारण शेल्वी साहब अपने कमरे की खिड़कियाँ खोले हुए बैठे चुरुट पी रहे थे। उनकी मेम पास बैठी हुई सिलाई का बारीक काम कर रही थीं। बीच-बीच में मेम के बड़ी उत्सुकतापूर्वक शेल्वी साहब की ओर देखने से प्रकट हो रहा था, जैसे वह अपने मन की कोई बात कहने के लिए मौका ढूँढ़ रही हों। थोड़ी देर बाद मेम ने कहा – “तुम्हें मालूम है, क्लोई के पास टॉम की चिट्ठी आई है?”
शेल्वी बोला – “हाँ, चिट्ठी आई है? जान पड़ता है, टॉम को वहाँ दो-एक भाई मिल गए हैं।”
मेम ने कहा – “मेरा अनुमान है कि किसी बहुत अच्छे परिवारवालों ने उसे खरीदा है। वे टॉम के साथ बड़ी मेहरबानी का बर्ताव करते हैं। और उसे कुछ ज्यादा करना-धरना नहीं पड़ता।”
“यह बड़े आनंद की बात है। मैं समझता हूँ, अब टॉम दक्षिण छोड़कर मुश्किल से यहाँ आना चाहेगा।”
“वहाँ रहने की कहते हो! वह तो यहाँ आने के लिए बेचैन हो रहा है। उसने दरियाफ्त किया है कि उसके खरीदने के लिए रुपए जुट गए या नहीं?”
“मुझे तो रुपए जुटने की आशा नहीं जान पड़ती। कर्ज बड़ी बुरी बला है। एक बार हो जाने के बाद फिर उसका चुकाना पहाड़ हो जाता है। एक का लिया दूसरे को दिया, दूसरे से तीसरे को, इसी उलटफेर में पड़ा हुआ हूँ।”
“मैं समझती हूँ, कर्ज चुकाने का एक उपाय हो सकता है – मान लो, हम अपने सब घोड़े बेच डालें और खेत का कुछ हिस्सा भी बेच दें।”
शेल्वी ने कहा – “ऐमिली यह बड़े शर्म की बात होगी, केंटाकी भर में तुम अच्छी समझी जाती हो, लेकिन तुम दुनियादारी की बातें नहीं समझ सकती। स्त्रियाँ कभी दुनियादारी की बातें नहीं समझती हैं।”
मेम बोली – “खैर, मैं समझूँ या न समझूँ, इससे कोई मतलब नहीं। तुम मुझे अपने कर्ज की एक सूची दो तो मैं देखूँ कि कोई रास्ता निकल सकता है या नहीं।”
“एमिली, मुझे नाहक तंग मत करो। मैं कहता हूँ कि तुम दुनियादारी की बाबत कुछ नहीं जानती।”
स्वामी की बात सुनकर मेम फिर कुछ न बोली। ठंडी साँस लेकर चुप हो गई। पर शेल्वी साहब अपनी स्त्री की सलाह पर चलते, तो सहज में कर्ज से उनका छुटकारा हो जाता। उनकी स्त्री बड़ी होशियार और किफायतशार थी। उन्होंने काम-काज का भार स्त्री को सौंप दिया होता तो कभी उनकी यह दुर्दशा न होती। पर वह तो सदा यही मानकर चलते थे कि स्त्रियों में काम-काज की बातें समझने की अक्ल ही नहीं होती।
मेम मन ही मन सोचने लगी कि मैंने टॉम को फिर खरीदकर अपने यहाँ रखने का वचन दिया है, अब भला मैं कैसे उस प्रतिज्ञा से भ्रष्ट होऊँ। कहा है कि सज्जन अपने वचन से पीछे नहीं हटते। इन्हीं विचारों में गोते खाती हुई फिर बोली – “बेचारी क्लोई स्वामी के शोक में बहुत दुख पा रही है। उसका दिल बैठा जाता है। उसे देखकर मेरा जी भर आता है। क्या इन रुपयों को इकट्ठा करने की कोई सूरत नहीं हो सकती?”
“तुम्हारी शोचनीय दशा देखकर मुझे दु:ख होता है, पर हम लोगों का इस तरह वचन देना ही अन्याय है। टॉम वहाँ एक-दो बरस में कोई दूसरी स्त्री रख लेगा। तुम क्लोई से कह दो कि अच्छा होगा, वह भी यहाँ किसी से अपना संबंध जोड़ ले।”
“मिस्टर शेल्वी” मेम बोली – “मैंने अपने यहाँ के नौकरों को सीख दी है कि उनका भी विवाह-बंधन उतना ही पवित्र है, जितना हमारा। मैं क्लोई को ऐसी सलाह देने का विचार भी मन में नहीं ला सकती।”
“प्यारी, तुमने इन्हें ठीक शिक्षा नहीं दी। इनकी दशा को ध्यान में न रखकर इन पर नैतिक शिक्षा का बोझ लाद दिया है।”
“मैंने इन्हें बाइबिल की नीति सिखलाई है। उसमें मैंने कौन-सी बुराई की?”
“एमिली, मैं तुम्हारी धर्म-संबंधी बातों में दखल नहीं देना चाहता। मेरा केवल इतना ही कहना है कि ये लोग उस शिक्षा के बिल्कुल ही अनुपयुक्त हैं। इनकी दशा उस शिक्षा का भार उठाने योग्य नहीं है।”
मेम ने गंभीर होकर कहा – “वास्तव में इन लोगों की दशा बहुत खराब है और यही कारण है कि मैं दिल से गुलामी की प्रथा से घृणा करती हूँ, पर यह बात पक्की समझो कि मैं इन निराश्रितों को वचन देकर कभी उसे भंग न करूँगी। मैं गाना सिखाने का काम करके रुपए इकट्ठा करूँगी और उससे टॉम को फिर से बुलाने की अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूँगी।”
“एमिली, तुम अपने को इतना मत गिराओ। मैं तुम्हारे इस कार्य का कभी समर्थन नहीं कर सकता।”
मेम ने दु:ख के साथ कहा – “गिराने की कहते हो, और प्रतिज्ञा-भंग करने से मेरा पतन नहीं होगा? उससे सौगुना पतन होगा।”
“रहने दो अपने स्वर्गीय नैतिक भाव!”
शेल्वी और उनकी स्त्री में ये बातें हो रही थीं कि इसी बीच क्लोई ने आकर पुकारा – “मेम साहब, जरा इधर तो आइए।”
मेम ने बाहर जाकर पूछा – “क्लोई, क्या बात है?”
उसने कहा – “कहिए तो आज एक मुर्गी का शोरबा बना दूँ।”
मेम ने कहा – “जो तुम्हारी इच्छा हो, बना लो। किसी भी चीज से काम चल जाएगा।”
क्लोई को जब मेम साहब से कोई बात कहनी होती थी, तब वह अच्छे भोजन की बात उठाकर भूमिका बाँधती थी। आज भी उसने आपनी कोई बात कहने के लिए यह भूमिका बाँधी थी। हँसते हुए बोली – “मेम साहब, आप रुपया इकट्ठा करने के लिए गाने का काम सिखाने की तकलीफ क्यों उठाएँगी? इससे साहब की बदनामी होगी। कितने ही लोग अपने दास-दासियों को किराए पर देकर रुपए वसूल करते हैं। इतने दास-दासियों को बैठे-बिठाए मुफ्त में भोजन देने से क्या फायदा?”
“अच्छा क्लोई, किसे किराए पर देना चाहिए?”
“मैं और किसी को किराए पर देने को नहीं कहती। साम कहता था कि लूविल नगर में एक हलवाई है, वह मिठाई बनाने के लिए किसी अच्छे आदमी की खोज में है। मैं वहाँ जाऊँ तो वह हर हफ्ते मुझे चार डालर देगा। यहाँ का काम सैली चला लेगी। वह सब तरह का भोजन बनाना सीख गई है।”
“अपने बच्चों को छोड़कर वहाँ जाओगी?”
“दोनों लड़के तो बड़े हो गए हैं। अब वे काम-काज कर लेते हैं। रही छोटी बच्ची, सो उसे सैली पाल लेगी।”
“लूविल दूर बहुत है।”
“उसी के पास शायद कहीं मेरा बूढ़ा है।”
“नहीं क्लोई, टॉम लूविल से बहुत दूर है, दो-तीन सौ कोस परे है। पर तुम लूविल जाना चाहो तो मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है। मिठाईवाले के यहाँ तुम्हें जो कुछ तनख्वाह मिले वह सब अपने स्वामी को फिर खरीदने के लिए जमाकर रखना। उसमें से मैं तुम्हें कौड़ी भी खर्च नहीं करने दूँगी।”
क्लोई ने कहा – “मेम साहब, मैं आपके गुणों का बखान नहीं कर सकती। मैंने यही सोचा है कि बूढ़े को छुड़ाने के लिए सब रुपया जमा करती जाऊँगी। हफ्ते पीछे चार डालर मिलेंगे। मेम साहब, साल भर में कितने हफ्ते होते हैं?”
“बावन।”
“तो साल भर में चार डालर हफ्ते के हिसाब से कितने डालर होंगे?”
“दो सौ आठ डालर।”
“तो कितने बरस काम करने से बूढ़े के दामों जितने रुपए होंगे?”
“चार-पाँच बरस। पर चार-पाँच बरस तुझे काम नहीं करना पड़ेगा। कुछ डालर मैं भी दे दूँगी।”
क्लोई ने कातर भाव से कहा – “पर मेरे हाथ-पाँव रहते आप डालरों के लिए गाना सिखाने का काम क्यों करेंगी?”
“अच्छा, तुम कब जाना चाहती हो?”
“कल, साम उधर जाने को है। मैं उसी के साथ जाना चाहती हूँ। आप ‘पास’ लिख दें तो चली जाऊँ।”
मेम ने बड़ी दयालुता से कहा – “मैं अभी लिखे देती हूँ।”
यह कहकर मेम अपने स्वामी के पास गई और उनकी अनुमति से ‘पास’ लिखकर क्लोई को दे दिया। क्लोई बड़ी खुशी से अपना सामान बाँधने लगी। वहाँ शेल्वी साहब का लड़का खड़ा था। उसे देखकर बोली – “जार्ज मैं लूविल जा रही हूँ। वहाँ चार डालर हफ्ते में मिलेंगे। वे सब मैं तुम्हारी माता के पास बूढ़े को छुड़ा लाने के लिए अमानत की तरह जमा करती जाऊँगी।”
“कब जाओगी?”
“कल साम के साथ जाऊँगी। मास्टर जार्ज, तुम अभी बूढ़े को जो जवाब दो, उसमें ये सब बातें साफ-साफ लिख देना।”
“मैं अभी लिख दूँगा। अपने नए घोड़े की खरीद की बात भी लिख दूँगा।”
“जरूर-जरूर लिख देना। अच्छा चलो, मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ लाती हूँ। अब न मालूम फिर कितने दिनों बाद तुम्हें अपने हाथ का बनाया खाना खिलाना नसीब होगा!”