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टॉम काका की कुटिया-उपन्यास- हैरियट बीचर स्टो अनुवाद – हनुमान प्रसाद पोद्दार -3
25. पुष्पी की कुम्हालाहट
दिनों के बाद महीने और महीनों के बाद वर्ष, देखते-देखते सेंटक्लेयर के यहाँ टॉम के दो वर्ष यों ही बीत गए। टॉम ने अपने घर जो पत्र भेजा था, कुछ ही दिनों बाद उसके उत्तर में मास्टर जार्ज का पत्र आ पहुँचा। इस पत्र को पाकर टॉम को बड़ा आनंद हुआ। टॉम के छुटकारे के निमित्त क्लोई के लूविल में नौकरी करने जाने, टॉम के दोनों पुत्र मोज और पिटे बड़े आनंद में है और कुछ काम-काज करने लायक हो गए हैं, उसकी छोटी कन्या का भार सैली को सौंपा गया है, ये सब बातें इस चिट्ठी में लिखी हुई थीं। जार्ज अपने नए घोड़े की खरीद की बात भी लिखना नहीं भूला था। पत्र पाने के बाद से टॉम को जब फुर्सत मिलती, तभी वह उसे सामने रखकर बड़ी चाह से पढ़ने की चेष्टा करता था। इवा और टॉम में बड़ी देर तक इस बात पर आलोचना होती रही कि इस पत्र को शीशे के साथ एक सुंदर चौखटे में जड़वाकर दरवाजे पर लटकाना ठीक होगा या नहीं। अंत में बहुत सोच-विचार के बाद तय हुआ कि ऐसा करने से पत्र के दोनों हिस्से दिखाई नहीं पड़ेंगे, इससे चौखटे में जड़वाना ठीक नहीं।
टॉम और इवा का स्नेह दिन-दिन बढ़ता गया। टॉम इवा को बहुत प्यार करता था। जब बाजार जाता, उसके मन-बहलाव के लिए कोई अच्छी-सी चीज खरीद लाता। इवा को वह कभी फूलों का सुंदर गुच्छा, कभी सुंदर-सुंदर फूल चुनकर उसकी माला बना कर देता। इवा जब टॉम के पास बैठकर बाइबिल पढ़ती और धर्म-चर्चा करती, उस समय वह उसे मनुष्य-लोक की न मानकर, देव-लोक की कन्या समझकर, मन-ही-मन उसकी आराधना करता था।
गर्मी की ऋतु आ जाने के कारण सेंटक्लेयर शहर छोड़कर, वहाँ से कुछ दूर झील के किनारे अपने उद्यान में सपरिवार जाकर रहने लगा। वहाँ रोज शाम के समय इवा और टॉम बैठकर बाइबिल की चर्चा किया करते थे।
एक दिन रविवार को संध्या-समय वहीं टॉम के पास बैठी हुई इवा बाइबिल पढ़ रही थी। उसमें उसने पढ़ा – “स्वर्ग का राज्य बहुत पास है।” यह पढ़कर उसने कहा – “टॉम काका, मैं जाऊँगी।”
“कहाँ?”
“स्वर्ग के राज्य में।”
“स्वर्ग कहाँ है?”
इवा ने आकाश की ओर अंगुली उठाकर कहा – “वह स्वर्ग है। मैं जल्दी ही जाऊँगी।”
यह सुनकर टॉम के मन को बड़ा धक्का लगा। इवा का शरीर सूखते देखकर टॉम के हृदय में बड़ी चिंता रहा करती थी, खासकर इस बात से कि मिस अफिलिया कहा करती थी, इवा को जिस ढंग की खाँसी की बीमारी हो रही है, वह बीमारी किसी दवा से आराम नहीं होती। इस समय वह बात भी टॉम के मन में जाग उठी। टॉम इवा को देवकन्या समझता था। उसका खयाल था कि उसके मुँह से कभी कोई असत्य वचन नहीं निकलता। इससे आज की बात सुनकर टॉम के हृदय में किस भाव का उदय हुआ होगा, इसका सहज में अनुमान किया जा सकता है।
क्या कभी किसी के घर इवा-सरीखे बच्चे हुए हैं? हाँ, हुए हैं; पर उनका नाम समाधि के पत्थरों पर ही खुदा हुआ मिलता है। उनकी मधुर मुस्कान, उनके स्वर्गीय सुधावर्षी नयन, उनके साधारण वाक्य और आचरण गुप्त धन की भाँति केवल उनके स्नेही आत्मीयों ही के मन-मंदिर में छिपे पड़े रहते थे। कितने ही घरों की बात सुनी जाती है कि उस से एक बच्चा जाता रहा। उसका रंग-ढंग ऐसा सुंदर था कि उसके सामने और बालकों के रूप-गुण फीके थे। जान पड़ता है, मानो विधाता ने मनुष्यों के पापी मन को स्वर्ग की ओर खींचने के लिए वहाँ एक विशेष श्रेणी के देवदूतों का दल रख छोड़ा है। वे थोड़े दिनों के लिए शिशु के रूप में जन्म लेकर मृत्यु-लोक में आते हैं, और चारो ओर के विपथगामी हृदयों को अपने स्नेह-बंधन में इस तरह जकड़ लेते हैं कि जब वे अपने स्वदेश-स्वर्ग-को जाने लगें तो वे विपथगामी हृदय भी उन्हीं के साथ स्वर्ग को जा सकें। जिस शिशु के नेत्रों में यह आध्यात्मिक ज्योति दीख पड़े; या उसकी बातों में साधारण शिशुओं से कुछ विशेषता, मधुरता और विज्ञता का आभास मिले, तब जान लो कि वह इस जगत् में घर बनाने नहीं आया है, उसके बहुत दिनों तक पृथ्वी पर रहने की आशा में मत रहो; क्योंकि उसके ललाट में बिधना के अक्षर हैं, उसके नेत्रों में अमृत की किरणें हैं। इसी से तो स्नेह-धन इवा, घर की एकमात्र उज्जवल तारा, तू भी चली जा रही है; पर जो तुझे प्राणों से अधिक प्यार करते हैं, वे इस बात को नहीं जानते।
मिस अफिलिया के अकस्मात् झील के किनारे आकर इवा को पुकारने पर टॉम और इवा की बातें बंद हो गईं। मिस अफिलिया ने कहा – “इवा बेटी, बड़ी ओस गिर रही है। यह बाहर बैठने का समय नहीं है।”
इवा और टॉम दोनों अंदर चले गए।
बच्चों के पालन-पोषण के काम में मिस अफिलिया की निगाह बड़ी तेज थी। बच्चों के रोग बड़े सहज में जान लेती थी। इवा की सूखी खाँसी देखकर उसके मन में बड़ा खटका लग गया था। ऐसे रोग से उसने कितने ही बच्चों का जीवन नष्ट होते देखा था। वह अपनी आशंका कभी-कभी सेंटक्लेयर पर भी प्रकट करती थी, लेकिन वह उसकी बात पर ध्यान नहीं देता था, उल्टा कभी-कभी असंतुष्ट होकर कहता – “बहन, तुम्हारी ये आशंकाएँ मुझे नहीं भातीं। यों ही जरा-सी बात देखकर तुम लोग जमीन-आसमान एक करने लगती हो। इवा बढ़ रही है, इसी से वह दुबली जान पड़ती है। बच्चे जब बढ़ते हैं, तब हमेशा कमजोर हो जाते हैं।”
पर अफिलिया ने फिर कहा – “अगस्टिन, उसकी खाँसी बहुत बुरी है। इस रोग से जेन, ऐलेन, और सेंडर तीन को तो मैंने मरते देखा है।”
सेंटक्लेयर ने खीझकर कहा – “तुम अपनी ये फालतू बातें रहने दो। उसे रात को बाहर न निकलने दिया करो, बहुज ज्यादा खेलने भी मत दिया करो। इसी से वह अच्छी हो जाएगी।”
कहने को उसने अफिलिया को इस प्रकार कहकर टाल दिया, पर उसके मन में खटका लग गया और बेचैनी छा गई। उसने मन-ही-मन, ‘रोग न सही, पर इसका यह धर्म-संबंधी गंभीर विषयों की बातें करना बड़े आश्चर्य में डालता है और मन में शंका उत्पन्न कर देता है।’ वह सोचता – यह कैसे आश्चर्य की बात है कि इतनी बड़ी बालिका को जहाँ अपने खेल-कूद में ही मस्त रहना चाहिए, वहाँ अभी से दूसरे का दु:ख देखकर उसका हृदय विदीर्ण होने लगता है। संसार में व्याप्त अत्याचार और उत्पीड़न की बात सोचकर जब इवा बड़ी दु:खी होती और रोने लगती, उस समय सेंटक्लेयर उसे जोर से अपनी छाती से चिपटा लेता।
इवा ने एक दिन एकाएक अपनी माँ से कहा – “हम लोग अपने गुलामों को पढ़ना क्यों नहीं सिखाते?”
मेरी बोली – “यह क्या सवाल है। कोई भी उन्हें पढ़ना नहीं सिखाता।”
“क्यों नहीं सिखाते?”
“इसलिए कि उससे उनका कोई मतलब सिद्ध नहीं होगा। वे संसार में केवल काम करने के लिए बनाए गए हैं। पढ़ाई से उन्हें किसी तरह की मदद न मिलेगी।”
इवा ने कहा – “माँ, मेरी समझ में हरएक इंसान को बाइबिल पढ़ना आना चाहिए। वे पढ़ लेंगे तो बाइबिल तथा और? आप ही पढ़ते रहेंगे।”
“इवा, तू बड़ी अनोखी लड़की है।”
“बुआ ने टप्सी को बाइबिल सिखाया है।”
मेरी ने कहा – “हाँ, पर तू देखती है कि टप्सी क्या बाइबिल पढ़कर सुधर गई?” उस-जैसी तो पाजी लड़की ही मैंने नहीं देखी।
इवा बोली – “मामी को बाइबिल से बड़ा प्रेम है, वह चाहती है कि उसे पढ़ ले…। और जब मैं उसे पढ़कर नहीं सुना सकूँगी तब वह क्या करेगी।”
इवा जब ये बातें कर रही थी, उसी समय उसकी माँ एक संदूक की चीजें ठीक कर रही थी। इवा की बातें समाप्त होने पर उसकी माँ ने कहा – “इवा, ये बातें जाने दे। तू जन्म भर इन नौकरों के सामने बाइबिल ही नहीं पढ़ती रहेगी। बड़ी होने पर सज-धजकर समाज में आना-जाना पड़ेगा। तब फिर तुझे बाइबिल पढ़ने का समय न रहेगा। यह देख, यह हीरे का हार मैं तुझे बाहर आने-जाने लगने पर दूँगी। मैं पहले-पहल जिस दिन यह हार पहनकर दावत में गई थी, उस दिन, मैं तुझसे कहती हूँ इवा, कितनों की आँखें मैंने चकाचौंध कर दी थीं।”
इवा ने उस हार को हाथ में लेकर अपनी माँ से पूछा – “माँ, क्या यह हार बहुत कीमती है?”
मेरी बोली – “निश्चय ही बड़ा कीमती है। पिता ने यह फ्रांस से मँगवाया था। एक साधारण गृहस्थ की सारी संपत्ति भी इसके सामने कुछ नहीं।”
इवा ने कहा – “मैं इसे इस शर्त पर लेना चाहती हूँ कि जो मेरे जी में आएगा, इसका करूँगी।”
“तू इसका क्या करना चाहती है?”
“मैं इसे बेचूँगी और स्वतंत्र देश में जमीन खरीदूँगी। फिर वहाँ अपने सब गुलामों को लेकर मास्टर रखकर उनको पढ़ना-लिखना सिखाऊँगी।”
इवा की बात से उसकी माँ को इतनी हँसी आई कि आगे की बातें बीच में ही रह गईं।
“बोर्डिंग स्थापित करेगी। उन्हें तू पिआनो बजाना और मखमल पर बेल-बूटे काढ़ना नहीं सिखलाएगी?”
इवा ने बड़ी दृढ़ता से कहा- “मैं उन्हें बाइबिल पढ़ना, पत्र लिखना और पत्र पढ़ना सिखलाऊँगी। माँ, मैं जानती हूँ कि वे अपने पत्र अपने हाथ से नहीं लिख सकते, और अपने पत्र अपने आप पढ़ भी नहीं सकते, इससे उनके मन को बड़ा कष्ट होता है। टॉम को, मामी को, बहुतों को इससे बड़ा दु:ख होता है।”
मेरी ने कहा – “चुप रह! तू अजीब ही लड़की है। इन बातों के विषय में कुछ जानती-बूझती नहीं है। तेरी बातों से तो मेरा सिर दुखने लगता है।”
इवा चुप हो गई। मेरी की आदत थी कि जब कोई उसकी मर्जी के खिलाफ बातें करने लगता, तब उसका सिर दुखने लगता था।
26. हेनरिक का संकल्प
जब अगस्टिन अपने झीलवाले मकान में था, उस समय सेंटक्लेयर का भाई अल्फ्रेड अपने बारह वर्ष की उम्र के बड़े बेटे हेनरिक को साथ लेकर वहाँ आया और दो-तीन दिन रहा। यह बड़े आश्चर्य की बात थी कि इन दोनों भाइयों में परस्पर किसी तरह की समानता – न रंग-रूप में, न विचार ही में होने पर भी आपस में बड़ा स्नेह था। प्रकट में ये दोनों सदा एक-दूसरे का मजाक उड़ाया करते थे, पर इनमें आंतरिक प्रेम कम न होता था। दोनों हाथ मिलाकर बाग में टहलते और खूब बातें किया करते थे।
अल्फ्रेड का बड़ा पुत्र हेनरिक बड़ा सभ्य और तेजस्वी बालक जान पड़ता था। कोमल-हृदया इवान्जेलिन को देखते ही उस पर उसका बड़ा स्नेह और प्रेम हो गया।
इवा के पास एक सफेद रंग का बड़ा अच्छा टट्टू था। संध्या के समय इवा को घुमाने के लिए टॉम ने वह टट्टू लाकर बरामदे के पास खड़ा किया, इधर डडो नामक तेरह वर्ष का बालक हेनरिक के लिए काला अरबी टट्टू लेकर आया।
हेनरिक ने घोड़ा देखकर डडो पर लाल-लाल आँखें निकालकर डाँटते हुए कहा – “क्यों बे यह क्या? आज सवेरे तूने मेरे घोड़े को मला नहीं?”
डडो ने बड़े विनीत भाव से उत्तर दिया – “सरकार, वह आप ही लोटकर धूल से भर गया।”
हेनरिक ने चाबुक उठाकर बड़े क्रोध से कहा – “चुप रह! जबान चलाता है। चाबुक से चमड़ी उधेड़ दूँगा।” इतना कहकर उसने तुरंत डडो के मुँह पर पाँच-सात चाबुक जड़ दिए।
वह “सरकार-सरकार” कहकर चीखने लगा। पर हेनरिक ने एक न सुनी और बराबर कोड़े लगाता गया। फिर एक हाथ पकड़कर ऐसी ठोकर मारी कि वह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। तब उसे छोड़कर बोला – “मेरे सामने मुँह खोलने का मजा पा गया। घोड़ा ले जा, उसे ठीक से साफ करके ला। मैं तेरी अच्छी तरह खबर लूँगा।”
टॉम ने कहा – “हुजूर, वह आपसे कहना चाहता था कि सवेरे मैंने घोड़े को मला था, इस वक्त रास्ते में आते समय वह जोश में था, इससे जमीन पर लोट गया। मैंने सवेरे उसे घोड़ा साफ करते देखा था।”
हेनरिक ने ऊँची आवाज में कहा – “तुम चुप रहो। तुमसे कौन पूछता है। फिजूल अपनी बक-बक लगाए हो।”
इतना कहकर हेनरिक इवा के पास जाकर बोला – “प्यारी बहन, मुझे बड़ा खेद है कि उस पाजी के कारण तुम्हें भी इंतजार करना पड़ा। आओ, जब तक वह आए तब तक यहाँ बैठ जाएँ। पर यह क्या बहन! तुम इतनी उदास क्यों हो?”
इवा ने कहा – “तुमने बेचारे डडो के साथ बड़ा जुल्म किया। तुम बड़े ही बेरहम और पापी हो।”
हेनरिक ने बड़े आश्चर्य से कहा – “बेरहम! पापी! यह तुम क्या कह रही हो, प्यारी इवा?”
इवा बोली – “जब तुम ऐसी बेरहमी का काम करते हो, तो मैं नहीं चाहती कि तुम मुझे ‘प्यारी इवा’ कहकर पुकारो।”
हेनरिक ने कहा – “प्यारी बहन, तुम डडो को नहीं जानतीं। बिना मार खाए वह सीधा नहीं रह सकता। वह बड़ा झूठा और बहानेबाज है। इन लोगों को दुरुस्त करने का यही ढंग है। इनको मुँह नहीं खोलने देना चाहिए। बाबा इसी ढंग से इन पर शासन करते हैं।”
“पर टॉम काका ने तो कहा कि उसका कसूर नहीं था। आकस्मिक बात थी। टॉम काका कभी झूठ नहीं बोलता।”
हेनरिक बोला – “वह बुड्ढा तो हब्शियों में एक साधारण आदमी है। डडो तो बेहिसाब झूठ बोलता है।”
“मार के डर से वह झूठ बोलना सीखता है।”
“इवा, तुम डडो पर बड़ी कृपा दिखाती हो, इससे मेरा मन बड़ा दु:खी होता है।”
“पर तुम उसे बिना कसूर मारते हो!”
“अच्छा, तुम्हें दु:ख होता है तो मैं आगे से उसे तुम्हारे सामने नहीं मारूँगा। मुझे नहीं मालूम था कि काले गुलाम को मार खाते देखकर तुम्हें कष्ट होता है।”
इवा को संतोष नहीं हुआ, पर उसने देखा कि अपने विचार को हेनरिक को समझाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। कोई फल नहीं होगा।
डडो घोड़ा लेकर शीघ्र ही आ पहुँचा।
हेनरिक ने बड़ी कृपा की दृष्टि से कहा – “डडो, इस बार तू बड़ी जल्दी घोड़ा ले आया। इधर आ, मिस इवा का घोड़ा पकड़ ले। मैं उसे सवारी करा दूँ।”
इवा के घोड़े पर चढ़ते समय देखा कि बालक शारीरिक पीड़ा से रो रहा है। उसने डडो को घोड़ा पकड़ने के लिए धन्यवाद दिया और कहा – “तुम बड़े अच्छे लड़के हो।”
मार का यह दृश्य बाग में घूमते हुए सेंटक्लेयर और अल्फ्रेड ने भी देखा। यह देखकर अगस्टिन का चेहरा लाल हो गया। उसने अल्फ्रेड से बड़े व्यंग्य से कहा – “अल्फ्रेड, मैं समझता हूँ कि यही वह शिक्षा है, जिसे हम लोग साधारण तंत्र-प्रणाली की शिक्षा कहा करते हैं।”
अल्फ्रेड ने कहा – “जब हेनरिक को जोश आ जाता है, तब वह शैतान हो जाता है।”
अगस्टिन बोला – “मेरे खयाल से तुम समझ रहे हो कि वह यह बहुत अच्छा काम सीख रहा है।”
अल्फ्रेड ने कहा – “मेरे किए से यह सब दूर नहीं हो सकता। मैं या मेरी स्त्री, दोनों इस विषय में चुप रहते हैं। पर यह डडो छोकरा भी बड़ा बदमाश है। इसे चाहे जितना मारो, सीधा नहीं होता।”
अगस्टिन बोला – “और मैं समझता हूँ कि हेनरिक को साधारण तंत्र-प्रणाली की शिक्षा देने का यही ढंग है, क्योंकि उस प्रणाली का पहला सूत्र है – सब मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और समान हैं।”
अल्फ्रेड ने कहा – “ये फिजूल की बातें हैं। फ्रांस में भी एक बार ऐसा ही आंदोलन उठा था। समान अधिकार की बात केवल शिक्षित और उच्च श्रेणी के लोगों में ही चल सकती है, इन नीचों में नहीं।”
अगस्टिन बोला – “पर आँखें खुलने पर वे सब बदला चुका लेते हैं। फ्रांसीसी क्रांति का मूल कारण जानते हो? हाँ, इन निम्न श्रेणी के लोगों की कभी आँखें न खुलने पाएँ, तो बात दूसरी है।”
अल्फ्रेड ने बड़े जोर से पृथ्वी पर पैर पटककर, मानो वह निम्न-श्रेणी के लोगों के सिर पर ही लात मार रहा हो, कहा – “जरूर इन लोगों को गिराकर रखना होगा।”
अगस्टिन बोला – “जब ये अत्याचार-पीड़ित निम्न श्रेणी के लोग उठ खड़े होंगे, तब देश को मिट्टी में मिला देंगे। रईसों और बड़े आदमियों का प्रभुत्व जड़ से उखाड़ देंगे। तुम्हें क्या सेंट डोमिंगो की हकीकत मालूम नहीं है?”
अल्फ्रेड ने कहा – “ओफ, कहाँ की बात करते हो! हम लोग यहाँ सब ठीक कर लेंगे। इन ‘जन-साधारण की शिक्षा’, ‘मजदूरों की शिक्षा’ के नारों पर ध्यान न देने से यहाँ विप्लव की कोई संभावना न रहेगी। इन सबको शिक्षा न देने से फिर कोई अड़चन नहीं होने की।”
अगस्टिन बोला – “अब वे दिन गए। अब शिक्षा का प्रवाह किसी के रोके भी नहीं रुक सकता। तुम लोगों को उचित है कि उन्हें शिक्षा देकर उनका नैतिक जीवन ऊँचा कर दो।”
अल्फ्रेड ने कहा – “रहने दो, अपना यह ऊँचा नैतिक जीवन! ये लोग सदा इसी हालत में रहेंगे।”
अगस्टिन बोला – “यह ठीक है, पर इन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी तो ये कभी-न-कभी उत्तेजित होकर खून की नदी बहा देंगे। क्या तुम नहीं जानते कि सोलहवें लुई की हत्या के बाद फ्रांस की क्या हालत हुई? अल्फ्रेड, मैं कहे देता हूँ कि वह समय अब दूर नहीं, जब ये निम्न श्रेणी के लोग खड़े होकर संसार को अराजकता से भर देंगे। रईसों और बड़े लोगों को अपने रक्त द्वारा जगत् में हो रहे अत्याचारों और उत्पीड़न का प्रायश्चित करना पड़ेगा।”
अल्फ्रेड ने हँसते हुए कहा – “अगस्टिन, तुम तो अच्छे-खासे वक्ता हो गए। मैं कहता हूँ, तुम जगह-जगह घूमकर इस विषय पर व्याख्यान देना शुरू कर दो। इससे पैंगबर की तरह लोग तुम्हें पूजेंगे। लेकिन लगता है कि तुम्हारे इस कल्पित स्वर्ग-राज्य के आने के पहले ही मैं मर जाऊँगा। मुझे यह सब देखना नसीब न होगा।”
अगस्टिन बोला – “फ्रांस के रईस लोग निम्न-श्रेणीवालों से बड़ी घृणा करते थे। पर अंत में उन्हीं निम्न श्रेणीवालों ने उन लोगों पर आधिपत्य जमाया था। जरा खयाल करो। अभी उस दिन हाइटी में क्या हो गया था!”
अल्फ्रेड ने कहा – “हाइटीवालों का क्या जिक्र कर रहे हो! वे भी क्या अंग्रेज हैं? वे अंग्रेज होते तो भला उनकी ऐसी दुर्दशा हो सकती थी? संसार में सब तरफ अंग्रेजों का दबदबा रहेगा। अंग्रेज सब लोगों पर हुकूमत करेंगे। भला हम लोगों (अंग्रेजों) के साथ किसी जाति की तुलना हो सकती है?”
अगस्टिन ने तेज होकर कहा – “बहुत ‘अंग्रेज-अंग्रेज’ करके मत कूदो। एक बार इन काले हब्शियों की आँख खुलने दो। देखना, तुम लोगों को अपने अत्याचारों का प्रायश्चित करना पड़ता है या नहीं। तब फिर लाचार होकर तुम लोगों को यहाँ से दुब दबाकर भागना पड़ेगा। यहाँ छिपने को तुम्हें जगह न मिलेगी।”
अल्फ्रेड बोल – “तुम्हारी ये सब पागलपन की बातें हैं।”
अगस्टिन ने कहा – “पागलपन की बातें! क्या बाइबिल की बात का तुम्हें स्मरण नहीं है? लिखा है, ‘मनुष्य स्वप्न में भी विपदा का खयाल न करता था, पर अकस्मात् एक दिन बाढ़ आई और इन लोगों को बहाकर मृत्यु के मुँह में डाल दिया।’ मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ कि बाइबिल की इस बात को सदा याद रखना!”
अल्फ्रेड ने हँसते हुए कहा – “अगस्टिन, तुम पैगंबरी का जामा पहनकर जगह-जगह व्याख्यान देते फिरो तो अच्छा होगा। हम लोगों की फिक्र मत करो। हममें बहुत सामर्थ्य है। हम अपनी रक्षा आप कर लेंगे। इन निम्न श्रेणी के लोगों को सदा इस गिरी हुई हालत में ही रहना पड़ेगा। ये लोग सदा हमारे पैरों-तले ही रहेंगे। हममें इन पर शासन करने के लिए पूरी शक्ति है।”
अगस्टिन बोला – “क्यों नहीं, तुम्हारा लड़का इसी शक्ति की शिक्षा पा रहा है। पर तुम लोगों की शक्ति तो क्रोध के साथ काफूर होकर उड़ जाती है। तुम नहीं जानते कि ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है। जो अपने को नहीं सम्हाल सकता, वह दूसरों पर शासन क्या करेगा?”
अल्फ्रेड ने कहा – “मैं मानता हूँ कि शिक्षा-प्रणाली कुछ बुरी है। लड़कपन से ही हमारी संतानें इन काले दासों पर शासन करना सीख जाती हैं। दूसरों को भी कोई अधिकार है, यह समझने का मौका ही नहीं मिलता। पर किसी-किसी विषय में हमारे यहाँ की शिक्षा बहुत अच्छी भी होती है। बच्चे बचपन से ही खूब साहसी और तेजस्वी होते हैं। क्रीत-दासों के बहुत से ऐब उनको छू नहीं पाते। हृदय में भरा हुआ प्रभुत्व का भाव उन्हें अनेक दोषों से दूर रखता है।”
अगस्टिन ने व्यंगोक्ति के भाव से पूछा – “इस प्रकार प्रभुत्व करने की इच्छा क्या ईसाई धर्म के अनुकूल है?”
अल्फ्रेड बोला – “अनुकूल है या प्रतिकूल, इस बारे में मैं बहस नहीं करना चाहता। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे देश की सामाजिक अवस्था लोगों को साहसी और तेजस्वी बना देती है।”
अगस्टिन ने कहा – “यह हो सकता है।”
अल्फ्रेड बोला – “अगस्टिन, ये सब फिजूल की बातें हैं, इनसे नतीजा कुछ नहीं निकलता। कम-से-कम हम लोग पाँच सौ बार तो इस पुराने विषय पर तर्क-वितर्क कर चुके होंगे। चलो, बैठकर शतरंज खेलें।”
दोनों भाई बरामदे में आकर बैठ गए और शतरंज खेलना आरंभ कर दिया। खेलते समय अल्फ्रेड ने कहा – “मैं तुमसे कहता हूँ अगस्टिन, यदि तुम्हारे जैसे विचार मेरे होते तो मैं अपने विचारों के प्रचार के लिए कुछ प्रयत्न अवश्य करता।”
अगस्टिन ने कहा – “हाँ, मैं कह सकता हूँ कि तुम करते। तुम काम-काजी आदमी हो, लेकिन मैं?”
अल्फ्रेड चुटकी लेकर बोला – “अपने दास-दासियों ही की दशा क्यों नहीं सुधारते?”
अगस्टिन ने कहा – “क्या यह भी संभव है? एक बड़ा भारी पहाड़ उनके सिर पर रख दो तो भी उनका सीधे खड़े रहना संभव है, पर हम लोगों के समाज में फैली हुई बुरी शिक्षा, असदाचरण और अत्याचारों के नीचे रहकर उनका सुधरना कभी संभव नहीं। समाज में फैले हुए पापों और बुराइयों से नैतिक वायु दूषित हो जाती है। इसलिए जब तक नैतिक वायु शुद्ध न हो, तब तक किसी एक आदमी के किए-धरे लोगों का सुधार नहीं हो सकता। कितनी ही विजित जातियों को उच्च शिक्षा मिलती है, पर उस शिक्षा से क्या पराजित जाति कभी उन्नत हो सकती है?”
अल्फ्रेड बोला – “तुम देश-सुधार का व्रत ले लो।”
इसके बाद दोनों खेल में तल्लीन हो गए। कुछ देर बाद हेनरिक और इवा घोड़ों पर लौटे। घोड़ों के तेज आने के कारण इवा कुछ थक-सी गई थी, पर उसके क्लांत मुख-कमल पर अनुपम सौंदर्य विकसित हो रहा था। ऋतु बदलने पर जिस प्रकार प्रकृति नए रूप में सज-धजकर मनुष्यों के हृदय में नए-नए भाव उत्पन्न करती है, उसी राग-द्वेष और हिंसा से रहित तथा धार्मिक पवित्रता से पूर्ण निर्मल चरित्रवाली रमणियों के मुख-कमल से एक-एक अवस्था में एक-एक प्रकार के अलौकिक सौंदर्य का भाव विकसित होता है। इवा के इस थके मुखमंडल से शांति और प्रेम का भाव टपक रहा था।
अल्फ्रेड ने उसे इस भाव में देखते ही विमोहित होकर कहा – “क्या अपूर्व रूप-माधुरी है! अगस्टिन, तुम्हारी इवा के सौंदर्य पर संसार रीझ उठेगा।”
लेकिन अगस्टिन ने निराश हृदय से कहा – “हाँ, वह सर्वगुण-संपन्न है, पर कौन जाने, ईश्वर के मन में क्या है? यह कहते हुए उसने दो-चार कदम आगे बढ़कर इवा को घोड़े से गोदी में उतारकर पूछा – “बेटी इवा, तुम बहुत थक तो नहीं गई?”
बालिका ने कहा – “नहीं बाबा!” पर उसके जोर से साँस लेने से उसके पिता को खटका हुआ। उसने कहा – “बेटी, तुम घोड़ा इतना तेज क्यों चलाती हो? तुम जानती हो कि यह तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए हानिकर है।”
यह कहकर उसने उसे एक कोच पर लिटा दिया।
सेंटक्लेयर ने कहा – “हेनरिक, तुम इवा को देखना। देखो, जब इवा तुम्हारे साथ हुआ करे, तब घोड़ा इतना तेज मत दौड़ाया करो।”
हेनरिक ने इवा के पास बैठकर अपने हाथ में उसका हाथ लेते हुए कहा – “मैं फिर कभी ऐसी भूल नहीं करूँगा।”
इवा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई। उसके पिता और चाचा इन दोनों बच्चों को छोड़कर खेल में लग गए। हेनरिक ने कहा – “इवा, मुझे बड़ा खेद है कि बाबा बस अब यहाँ दो ही दिन ठहरेंगे, फिर हम लोग चले जाएँगे। तुमसे न मालूम फिर कब भेंट होगी। यदि मैं तुम्हारे पास रहता तो भला बनने का प्रयास करता और डडो को कभी न मारता। मैं डडो से बुरा बर्ताव नहीं करता। उसे कभी-कभी पैसे भी दे देता हूँ। तुम देखती हो कि वह अच्छे कपड़े पहनता है। मैं समझता हूँ, कुल मिलाकर डडो बड़े मजे में है।”
इवा ने कहा – “तुम्हें केवल खाना-कपड़ा और पैसे दिए जाएँ, पर संसार में कोई तुम्हें स्नेह करनेवाला न हो, तो क्या तुम अपने को सुखी समझोगे?”
“नहीं।”
“तो तुम देखते हो कि तुम डडो को उसके सारे आत्मीयों से अलग करके ले आए हो और अब उसे कोई भी प्यार करनेवाला नहीं है। ऐसी दशा में पड़कर तो कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता।”
हेनरिक ने कहा – “इसमें हम क्या कर सकते हैं? मैं उसकी माँ को तो ला नहीं सकता, और न मैं स्वयं ही उसे प्यार कर सकता हूँ।”
इवा बोली – “तुम प्यार क्यों नहीं कर सकते?”
खिलखिलाकर हँसते हुए हेनरिक ने कहा – “डडो को प्यार! उस पर मैं थोड़ी दया करूँ, यही काफी है। तुम क्या अपने नौकरों को प्यार करती हो?”
इवा बोली – “जी हाँ, मैं करती हूँ।”
“कैसी अनोखी बात है!”
“क्या बाइबिल हम लोगों को यह नहीं बताती कि हमें हर एक आदमी को प्यार करना चाहिए?”
हेनरिक ने खिन्नभाव से कहा – “बाइबिल की बात क्या कहती हो! बाइबिल में तो ऐसी-ऐसी कितनी ही बातें लिखी पड़ी हैं; लेकिन कोई उन्हें करने का विचार भी करता है? तुम जानती हो इवा, कोई आदमी बाइबिल का कहा नहीं करता।”
इवा कुछ देर तक बोली नहीं। उसकी आँखें स्थिर और चिंतायुक्त हो गईं। फिर वह बोली – “प्यारे भाई, मेरी एक बात मानो। जैसे भी हो, तुम गरीब डडो को प्यार करना, उस पर दया करना।”
हेनरिक ने कहा – “प्यारी बहन, तुम्हारे अनुरोध से मैं किसी भी चीज को प्यार कर सकता हूँ। तुम सरीखी प्रेममय, शांत और मधुर बालिका मैंने नहीं देखी। मैं अब कभी डडो को नहीं मारूँगा।”
इवा को उसकी इस बात से शांति मिली। उसने कहा – “मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि तुम ऐसा अनुभव करते हो। प्यारे हेनरिक, मैं आशा करती हूँ कि तुम्हें अपनी बात याद रहेगी।”
तभी भोजन की घंटी हुई और सब लोग भोजन के लिए उठ गए।
27. मृत्यु के पूर्व-लक्षण
दो दिन के बाद अल्फ्रेड पुत्र सहित सेंटक्लेयर से बिदा होकर अपने घर गया। जब तक अल्फ्रेड वहाँ था, तब तक सब लोग हँसी-खुशी में भूले हुए थे। इस बीच में इवान्जेलिन के स्वास्थ्य की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। एक तो वह पहले ही से अस्वस्थ थी, इधर हेनरिक के साथ खेल-कूद में उस पर बहुत अधिक श्रम पड़ने के कारण वह और भी थक गई। उसका शरीर इतना निर्बल हो गया कि उसमें चलने-फिरने की शक्ति न रही। अब तक तो सेंटक्लेयर ने मिस अफिलिया की बातों पर ध्यान न दिया था, पर अब उसने डाक्टर को बुलाकर इवा को दिखलाया और उसके हृदय में भी भाँति-भाँति की आशंकाएँ उठने लगीं।
सेंटक्लेयर की स्त्री, मेरी, कभी भूल से भी अपनी लड़की के स्वास्थ्य के संबंध में कुछ न पूछती थी। इधर उसने मुहल्ले की स्त्रियों से दो-तीन नए रोगों की चर्चा सुनी थी। बस, अब वह उन्हीं नए रोगों के सब लक्षण अपने शरीर में देखने लगी। वह इन अपने ही कल्पित रोगों में इतनी अधिक उलझी रहती थी कि उसे किसी और के अच्छे या बीमार होने की खोज करने की फुर्सत ही नहीं थी। उसे कन्या की खबर लेने का भी तनिक अवकाश न था। वह तो अपने ही रोगों की चिंता में लगी रहती थी कि कैसे उनसे पिंड छूटेगा। साथ ही एक और बात थी, वह समझती थी कि संसार में किसी भी व्यक्ति को उसके जितनी पीड़ा नहीं हो सकती और रोग जितने होते हैं, उसी के होते हैं दूसरे किसी के रोगों को तो वह एक काम न करने का बहाना और आलस्य भर समझती थी। उसका ख्याल था कि असल रोग उसी को होते हैं।
मिस अफिलिया ने इवा के रोगों के संबंध में कई बार मेरी की आँखें खोलने की चेष्टा की, पर सब व्यर्थ गई। वह कहती थी – “मेरी समझ में तो उसे कुछ नहीं हुआ है। वह मजे से खेलती-कूदती है।”
“तुम उसकी खाँसी नहीं देखती हो?”
“खाँसी के संबंध में आपके कहने की आवश्यकता नहीं है। मैं खुद उस विषय में बहुत जानती हूँ। मैं जब इवा के बराबर थी, तब मेरे घरवाले समझते थे कि मुझे तपेदिक हो गया है। रात-रात भर मामी मेरे पास बैठी रहती थी। इवा की खाँसी मेरी खाँसी के मुकाबले कुछ भी नहीं है।”
अफिलिया कहती – “लेकिन वह दिन-प्रति-दिन कमजोर होती जा रही है।”
“मैं वर्षों ऐसी कमजोर थी। वह कोई खास बात नहीं है।”
“रात को रोज उसका शरीर गरम हो जाता है उसे रात को बराबर बुखार चढ़ता है।”
“वैसा तो मुझे दस साल तक था। बुखार के मारे रात को इतना पसीना आता था कि सारे कपड़े तरबतर हो जाते थे। सवेरे घंटों बैठकर मामी उन्हें सुखाती थी। इवा को कोई वैसा बुखार नहीं है।”
अफिलिया ने इसके बाद मेरी से इवा के संबंध में कुछ भी कहना बंद कर दिया, पर जब इवा इतनी कमजोर हो गई कि चारपाई से भी नहीं उठ सकती और उसके लिए डॉक्टर बुलाया गया, तब एकाएक मेरी का अपनी बच्ची के लिए प्रेम उमड़ पड़ा।
मेरी कहने लगी – “मैं तो पहले ही जानती थी कि सेंटक्लेयर की उदासीनता का यह फल मुझे भोगना पड़ेगा। मुझे संतान-शोक देखना पड़ेगा। एक तो मैं अपने ही रोगों के मारे मर रही हूँ, उस पर यह संतान-शोक! आदमी के इससे ज्यादा और क्या फूटे भाग्य होंगे! न सात न पाँच, मेरे यह एक बच्ची है और उसका यह हाल हुआ।”
ये बातें कहकर वह दास-दासियों पर अपने दिल का गुबार निकालने लगी। मामी ने इवा की देखभाल में लापरवाही की है, यह कहकर उसे खूब कोसा। फिर अभिमान से मुँह फुलाकर मेरी सेंटक्लेयर के सामने रोने लगी। सेंटक्लेयर ने कहा – “प्यारी मेरी, ऐसी बातें मुँह से न निकालो। इवा को अवश्य आराम हो जाएगा। उसे ऐसा क्या हुआ है?”
मेरी बोली – “सेंटक्लेयर, तुम्हें माँ की ममता का क्या पता? तुम मेरा हृदय कभी नहीं समझ सके। अब भी तुम नहीं जान सकते कि अपनी संतान के लिए मेरा जी कितना छटपटा रहा है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “पर ऐसी बातें मत करो, इस तरह छटपटानेवाली कोई बात नहीं है।”
मेरी बोली – “यह दशा देख-सुनकर मेरा जी तो तुम्हारी तरह नहीं मान सकता। सब बातों में तुम जैसे पत्थर दिल के हो, मैं तो वैसी नहीं हूँ। संतान के नाम से यही एक लड़की है, इसकी बीमारी देखकर क्या मैं बरदाश्त कर सकती हूँ?”
“घबराओ मत! इवा का शरीर बड़ा कोमल है, इसी से अधिक गर्मी और हेनरिक के साथ खेल-कूद में अधिक श्रम पड़ने के कारण उसकी तबीयत खराब हो गई है। डाक्टर साहब कहते हैं कि वह शीघ्र ही अच्छी हो जाएगी।”
मेरी ने कहा – “मेरा यह हृदय इस बात को जानकर भी नहीं समझना चाहता। मैं भी चाहती हूँ कि तुम्हारी तरह बिना घबराए सुख से रह सकती तो अच्छा था, पर क्या करूँ, यह जी तो नहीं मानता।”
दो-तीन हफ्ते तक इवा को कुछ आराम लगा। वह उठकर फिर चलने-फिरने लगी। कभी-कभी पहले की भाँति बाग में जाकर टॉम के साथ बैठती थी। उसके पिता को यह देखकर बड़ा आनंद हुआ। पर मिस अफिलिया और चिकित्सक की दृष्टि में बीमारी कुछ भी न घटी थी। इवा स्वयं भी मन-ही-मन समझती कि इस पाप और अत्याचारपूर्ण संसार को उसे शीघ्र ही छोड़ना पड़ेगा।
मनुष्य के हृदय में मृत्यु का संवाद कौन पहुँचाता है? मरणासन्न के कान में कौन कह जाता है कि अब इस संसार में तुम्हारी घडियाँ पूरी हो चुकी हैं? इवा को किसने कहा कि अब शीघ्र ही उसे यह संसार छोड़ना पड़ेगा? यदि कहिए कि मनुष्य के अंदर बैठा हुआ अनंत सुख का अभिलाषी, ईश्वर-सामीप्य का प्रयासी, अमृत का अधिकारी, अविनाशी आत्मा पहले ही से मृत्यु का आगमन जान जाता है, तो फिर सब लोग क्यों नहीं जान लेते? कोई जानता है, बहुत-से नहीं जानते, इसका क्या कारण है? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि विषयासक्त सांसारिक जीवों के कान विषय-कोलाहल के बहरे हुए रहते हैं। उनकी आँखें मोहांधकार से ढकी रहती हैं। इस पाप से भरे संसार में रहने की उत्कट इच्छा मृत्यु-चिंता को उनके हृदय में प्रवेश नहीं करने देती; इसी से विषयासक्त जीव पहले से मृत्यु का आगमन नहीं जान सकते। मृत्यु के आगमन की ध्वनि उन्हें कभी नहीं सुनाई देती। किंतु पर-दु:ख-कातर, पवित्र-हृदया इवान्जेलिन के कान सांसारिक कोलाहल से बहरे नहीं हुए थे, अपने सुख की इच्छा कभी उसके हृदय में स्थान नहीं पाती थी। यह संसार उसे दु:खमय जान पड़ता था, इसी से उसे परम पिता जगदीश्वर का, उसके दु:ख-निवारण करने के लिए अपने धाम को बुलाने का संदेशा साफ सुनाई पड़ा। उसे इसका तनिक भी खेद न हुआ कि यह संसार छोड़ना पड़ेगा। उसके हृदय को कुछ आघात पहुँचानेवाली बात थी तो इतनी ही कि उसे अपने स्नेहमय पिता को छोड़ना होगा, और उसकी मृत्यु से उसके पिता शोक में पागल हो जाएँगे।
एक दिन टॉम को बाइबिल सुनाते हुए इवा ने कहा – “टॉम काका, मैं जान गई कि ईसा ने क्यों हम लोगों के लिए प्राण दिए हैं।”
टॉम ने पूछा – “कैसे?”
“ऐसे कि मेरे हृदय में भी उस भाव का अनुभव होता है।”
“वह अनुभव क्या और कैसा है, मिस इवा? यह बात ठीक से मेरी समझ में नहीं आई।”
“मैं तुम्हें समझाकर नहीं बता सकती, लेकिन मैंने जब उस जहाज में तुम्हें तथा जंजीर से जकड़े हुए दूसरे दास-दासियों को, जिनमें कोई अपने बच्चों से, कोई अपने पतियों से, और कोई अपनी माताओं से बिछुड़ने के कारण विलाप कर रहे थे, देखा और जब मैंने बेचारी प्रू की बात सुनी… ओफ, वह कैसा भयंकर कांड था, तब और अन्य बहुत-से अवसरों पर मैंने इस बात का अनुभव किया कि यदि मेरे मरने से ये सब दु:ख-दर्द से छूट सकें तो मैं आनंद से मर जाऊँ।”
इवा ने अपना दुबला-पतला हाथ टॉम पर रखते हुए भावावेश में कहा – “टॉम काका, यदि मेरे मरने से इनका दु:ख दूर हो जाए, तो मैं खुशी से मर जाऊँगी।”
टॉम विस्मित होकर उसका मुख निहारने लगा। पर अपने पिता के पाँवों की आहट पाकर इवा उठकर बरामदे में चली गई।
थोड़ी देर के बाद टॉम जब मामी से मिला तो उसने कहा – “मामी, अब इवा को इस संसार में रखने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। उसके भाल पर विधना का लेख है।”
मामी ने अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए कहा – “हाँ-हाँ, यह तो मैं हमेशा से कहती आई हूँ। वह लड़की बचनेवाली नहीं है। ऐसे होनहार बच्चे बहुत दिन नहीं जीते। वह हम सब लोगों को अनाथ कर जाएगी।”
इवा अपने पिता के पास आई। उसके पिता ने उसे स्नेहपूर्वक हृदय से लगाकर कहा – “इवा बेटी, आजकल तो तुम अच्छी हो न!”
इवा ने आकस्मिक दृढ़ता से कहा – “बाबा, बहुत दिनों से मैं तुमसे कुछ कहना चाहती थी। अब अधिक निर्बल होने से पहले ही मैं उन बातों को कह डालना ठीक समझती हूँ।”
सेंटक्लेयर का हृदय काँप उठा। इवा ने पिता की गोद में बैठकर कहा – “बाबा, अब मेरे यहाँ रहने के सब उपाय व्यर्थ हैं। तुम्हें छोड़ जाने का समय अब बहुत निकट आ रहा है। मैं वहाँ जा रही हूँ, जहाँ से फिर कभी नहीं लौटा जाता।” कहकर उसने ठंडी साँस ली।
इवा की ये बातें सेंटक्लेयर के हृदय में बरछी की तरह पार हो गईं पर ऊपर से उसने प्रसन्नता का भाव रखकर कहा – “इवा बेटी, तुम्हें झूठा संदेह हो गया है। इन चिंताओं को छोड़ो! यह देखो, मैं तुम्हारे लिए कैसा अच्छा खिलौना लाया हूँ।”
इवा ने खिलौने को हाथ में रखकर कहा – “बाबा, तुम अपने को धोखे में मत रखो। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मैं ठीक नहीं होऊँगी। बाबा, मुझे यह संसार छोड़ने में जरा भी कष्ट नहीं जान पड़ता। बस, तुम्हारी और घर के दूसरे लोगों की बात सोचकर बुरा लगता है, नहीं तो मैं यहाँ से जाने में बड़ी खुश हूँ। बहुत दिनों से मैं इस दुनिया को छोड़ने की इच्छा कर रही हूँ।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “प्यारी बच्ची, तेरे इस छोटे से मन में इतनी उदासीनता क्यों भरी हुई है? अपनी प्रसन्नता के लिए तुझे जो चाहिए, वह सब हमारे घर में है और वह तुझे मिल सकता है।”
“बाबा, मैं स्वर्ग में ही जाकर रहना चाहती हूँ। बाबा, यहाँ ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जो मेरे जी को दुखाती हैं, जो मुझे बड़ी भयंकर जान पड़ती हैं।”
सेंटक्लेयर ने पूछा – “वे कौन-सी बातें हैं, जो तुझे दु:ख देती हैं और भयंकर लगती हैं?”
इवा ने कहा – “बाबा, नित्य ही तो वे बातें होती हैं। मुझे अपने इन दास-दासियों के लिए बड़ा कष्ट होता है। ये मुझे बड़ा प्यार करते हैं, मुझे बहुत चाहते हैं। मैं चाहती हूँ कि ये सब आजाद हो जाएँ।”
सेंटक्लेयर बोला – “क्या तुम समझती हो कि वे हमारे यहाँ आराम से नहीं हैं?”
“हाँ, बाबा, पर तुम्हें कुछ हो जाए तो उनका क्या होगा? बाबा, तुम्हारे सरीखे आदमी दुनिया में कम होते हैं। अल्फ्रेड चाचा तुम्हारे जैसे नहीं है। माँ तुम्हारे जैसी नहीं है। बेचारी प्रू के मालिक की बात सोचो। ओफ, लोग अपने दास-दासियों पर कितना अत्याचार करते हैं, और कर सकते हैं।” इतना कहते-कहते इवा थरथराने लगी।
सेंटक्लेयर ने कहा – “बेटी, तुम्हारा हृदय कोमल है। दूसरों के दु:ख देखकर तुम्हारे दिल को बड़ी चोट लगती है। मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें ऐसी बातें सुनने दीं।”
इवा बोली – “ओफ बाबा, तुम्हारी इस बात से मेरा कलेजा फटा जाता है। संसार में दूसरे लोग जब केवल कष्ट और दु:ख सह-सहकर ही जी रहे हैं तब तुम मुझे सुखी बनाकर जीवित रखना चाहते हो? ऐसे कष्ट से बचाना चाहते हो कि किसी के कष्ट की कहानी भी नहीं सुनने देना चाहते! यह तो बड़ी भारी खुदगरजी है कि न तो मुझे ऐसी बातें जाननी चाहिए और न ही अनुभव करनी चाहिए कि जो मेरे हृदय में चुभ जाती हैं। इन बातों के बारे में मैंने बहुत सोचा है। बाबा, क्या इन सब दासों को आजाद कर देने का कोई उपाय नहीं है?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “बेटी, यह बड़ा कठिन प्रश्न है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह प्रथा बहुत बुरी है। बहुत-से लोग इसे बुरी-से-बुरी प्रथा समझते हैं। मैं स्वयं इसे बहुत बुरा मानता हूँ। हृदय से चाहता हूँ कि इस पृथ्वी पर एक भी मनुष्य गुलाम न रहे। सब स्वतंत्रता का सुख भोगें पर इसका कोई सरल उपाय मेरी समझ में नहीं आता।”
“बाबा, क्या लोगों के घर घूम-घूमकर सबको नहीं समझा सकते कि यह प्रथा बड़ी घृणित है, इसे तुरंत उठा देना चाहिए? बाबा, मैं जब मर जाऊँगी, तब तुम मेरा खयाल करके मेरे लिए इसे करोगे? मुझसे यह होता तो मैं ही करती।”
इवा की बात सुनकर सेंटक्लेयर ने कहा – “इवा, तुम मरोगी! बेटी, तुम मुझसे ऐसी बातें मत कहो। तुम्हारे सिवा इस संसार में मेरा और है ही क्या?”
इवा बोली – “बाबा, उस बेचारी प्रू के पास उस लड़के के सिवा और क्या था? संतान के शोक में वह पागल हो गई थी। उसके मरने के बाद भी वह उसका रोना सुनती थी। बाबा, तुम मुझे जितना प्यार करते हो, उतना ही ये गुलाम भी अपने बच्चों से करते हैं। ओफ, उनके लिए कुछ करो। हमारे यहाँ मामी है, वह अपने बच्चों को प्यार करती है। जब वह उनकी चर्चा करती है तब मैंने उसकी आँखों से आँसू झरते देखे हैं। और टॉम भी अपने बच्चों को प्यार करता है। बाबा, ये बड़ी भयंकर बातें हैं और मुझसे सहन नहीं होतीं।”
सेंटक्लेयर ने अत्यंत दु:खित होकर कहा – “इवा बेटी, तुम रो-रोकर अपने जी को परेशान मत करो। मरने की बात मुँह से न निकालो। तुम जो चाहती हो, सो मैं करूँगा।”
इवा ने तत्काल कहा – “बाबा, तुम मुझसे प्रतिज्ञा करो कि टॉम को मेरी मृत्यु होते ही मुक्त कर दोगे।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “बेटी, जो कुछ तुम कहोगी वह मैं अवश्य कर दूँगा।”
सेंटक्लेयर इवा को छाती से चिपटाए चुपचाप बैठा रहा। देखते-देखते संध्या का आगमन हुआ। चारों ओर से इवा की प्रशांत मूर्ति और विशाल नेत्रों पर घोर अंधकार छा गया। उसका चेहरा अब सेंटक्लेयर को नहीं दिखाई दे रहा था। पर उसकी सुरीली मधुर वाणी देववाणी की भाँति उसके कर्ण-कुहरों में गूँज रही थी। उसे अपने विगत जीवन की संपूर्ण बातें स्मरण हो आईं, अपनी माता की प्रार्थना याद आई। अपने बाल्य जीवन की बातें, संसार में प्रवेश करने के बाद जगत के हित-साधन की इच्छा के जड़ से उखड़ जाने की बातें, एक-एक करके याद आने लगीं। यों ही देर तक बैठे-बैठे सेंटक्लेयर बहुत-सी बातें याद करता और सोचता रहा, पर मुँह से कुछ न बोला।
अंत में जब बहुत अँधेरा हो गया तब इवा को गोद में उठाकर अपने सोने के कमरे में ले गया। उसे अपने ही साथ लिटाकर उस समय तक गीत गाकर सुनाता रहा, जब तक कि नींद ने उसे आ नहीं घेरा।
28. प्रेम का चमत्काकर
रविवार का दिन था। दोपहर बीत चुका था। सेंटक्लेयर अपने घर के बरामदे में बैठा सिगरेट पी रहा था। बरामदे के सामनेवाले कमरे में उसकी स्त्री मेरी एक गद्दीदार कुर्सी पर बैठी हुई थी। मेरी के हाथ में एक बड़ी सुंदर भजनों की जिल्ददार पुस्तक थी। मेरी का खयाल है कि रविवार के दिन धर्म-पुस्तक पढ़ी न जा सके तो कम-से-कम हाथ ही में रहे। खुली हुई पुस्तक सामने थी। उस समय मेरी उसे पढ़ नहीं रही थी। केवल कभी-कभी आँख उठाकर देख लेती थी।
इवा को साथ लेकर मिस अफिलिया मेथीडिस्टों के किसी गिरजे में गई थी, अत: अगस्टिन और मेरी के सिवा वहाँ और कोई न था। कुछ देर बाद मेरी ने कहा – “अगस्टिन, मुझे हृदयरोग-सा हो गया जान पड़ता है। मैं समझती हूँ अपने उस पुराने डाक्टर पोसी साहब को बुलवाने से ही काम चलेगा।”
अगस्टिन ने कहा – “उसको बुलाने की क्या जरूरत है? जो डाक्टर इवा की दवा करता है, वह भी तो बड़ा अच्छा जान पड़ता है।”
मेरी बोली – “मैं ऐसी नाजुक बीमारी में नए डाक्टर पर विश्वास नहीं कर सकती। मैं देखती हूँ, रोग दिन-दिन बढ़ता जा रहा है। दिन भर बदन दर्द किया करता है, और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।”
“यह तुम्हारा खाली संदेह ही है, मेरी समझ में तुम्हें ऐसा कोई रोग नहीं है।”
मेरी झुँझलाकर बोली – “यह तो मुझे पहले से ही पता था कि तुम्हारी समझ में कुछ नहीं होगा। इवा को जरा-सी खाँसी या मामूली-सा रोग हो जाता है तो तुम घबरा जाते हो, पर मेरा तुम्हें कभी खयाल तक नहीं होता।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “यदि तुम चाहकर हृदय-रोग को बुलाना चाहती हो तो मैं उसमें बाधा नहीं डालूँगा। तुम्हारी निगाह में अगर यह रोग बड़े आदर की चीज है तो ठीक है, मेरा इसमें क्या नुकसान है?”
मेरी बोली – “तुम्हें विश्वास हो या न हो, मैं पक्के तौर पर कहती हूँ कि इधर कई दिनों तक इवा की बीमारी की झंझट में पड़े रहने के कारण मेरा यह रोग बहुत बढ़ गया है।”
सेंटक्लेयर कुछ नहीं बोला। वह चुरुट में दम लगाने लगा और मन-ही-मन कहने लगा – “तुम इवा की बीमारी के झंझट में पड़े रहने की कहती हो? कभी एक दिन भूल से भी तो उसकी खबर नहीं ली!”
इसके कुछ देर बाद मिस अफिलिया इवा को साथ लेकर घर लौटी। वह गाड़ी से उतरते ही सीधी अपने कमरे में चली गई। इवा अपने पिता की गोद में जाकर बैठ गई और गिरजे के उपदेश की चर्चा करने लगी।
तभी मिस अफिलिया के कमरे से बड़ा शोर सुनाई दिया।
सेंटक्लेयर ने कहा – “टप्सी ने न जाने आज कौन-सा नया उत्पात कर दिया। बहन बहुत बिगड़ रही है।”
मिस अफिलिया बड़ी गुस्से में भरी टप्सी का गला पकड़कर घसीटती हुई लाई।
सेंटक्लेयर ने पूछा – “कहो, आज क्या मामला है?”
अफिलिया ने कहा – “यह है कि अब मैं इस आफत से अधिक परेशान नहीं होना चाहती, इसे बरदाश्त करना मेरे बूते से बाहर है। कहीं खेलने भाग जाएगी, यह सोचकर इसे भजनों की पुस्तक देकर दरवाजे में ताला लगा गई थी, लेकिन मेरे जाने के बाद इसने मेरी चाबी निकाल ली और मेरे बक्स से रेशमी कपड़े निकालकर उन्हें कूट-कूटकर गुडियों के कपड़े बना डाले। मैंने जिंदगी में ऐसी पाजी लड़की नहीं देखी।”
फिर सेंटक्लेयर की ओर तिरस्कृत दृष्टि से देखकर बोली – “अगर मेरा वश चलता तो मैं इसे बाहर निकलवाकर इतने कोड़े लगवाती कि इसको छठी का दूध याद आ जाता।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मुझे जरा भी संदेह नहीं है। वास्तव में स्त्रियों का शासन बड़ा ही प्रेम-पूर्ण और मृदुल होता है। मैं अपने इस देश में ऐसी दस स्त्रियाँ भी नहीं देखता कि उनका वश चले तो वे एक घोड़े या एक गुलाम को अधमरा न कर डालें। पुरुषों की मैं क्या कहूँ!”
मेरी बोली – “सेंटक्लेयर, तुम्हारी इस बेढंगी प्रणाली से नौकरों को शिक्षा देने का कोई फल न होगा। दीदी बुद्धिमान स्त्री हैं और वह समझती हैं कि मैंने जो कहा, सो ठीक है या नहीं।”
दूसरी स्त्रियों की भाँति अफिलिया को भी कभी-कभी गुस्सा आ जाता था, विशेषत: टप्सी उसे जितना हैरान करती थी, उससे क्रोध आना स्वाभाविक ही था। पर मेरी जब उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करने लगी तब उसे लज्जा मालूम हुई और उसका क्रोध कम हो गया। उसने कहा – “नहीं, इस लड़की के साथ ऐसा कठोर बर्ताव करने की मेरी कभी इच्छा नहीं होगी। पर अगस्टिन, मेरी अक्ल काम नहीं करती। इस लड़की का क्या करूँ? मैंने इसे बहुतेरा सिखाया-पढ़ाया, समझाते-समझाते हार गई। हर तरह से सजा देकर भी देख चुकी, पर यह जैसी-की-तैसी बनी हुई है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “टप्सी, इधर आ!”
टप्सी उसके सामने आकर, काली-काली आँखें निकालकर, टुकुर-टुकुर ताकने लगी। उसकी आँखों से भय और धूर्तता टपकती थी।
सेंटक्लेयर ने कहा – “क्यों री टप्सी, तू इतना पाजीपन क्यों करती है?”
टप्सी बोली – “जान पड़ता है, मेरा मन बड़ा खराब है। मिस फीली तो यही कहती हैं।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “तू नहीं देखती कि मिस अफिलिया ने तेरे लिए कितनी परेशानी उठाई है? वह कहती है कि वह जो कर सकती थी, सब-कुछ करके देख लिया।”
“जी हाँ, पुरानी मालकिन भी यही कहा करती थीं। वह मुझे बहुत कोड़े लगाती थीं, मेरे बाल नोच लेती थीं, दरवाजे से मेरा सिर टकरा देती थीं, पर उससे मैं जरा भी नहीं सुधरी। मैं समझती हूँ, अगर मेरे सिर का बाल-बाल नोच लिया जाए तो भी मेरा कुछ सुधार न होगा। मैं बड़ी पाजी हूँ। मैं हब्शी के सिवा और कुछ नहीं हूँ। कोई उपाय नहीं है।”
अफिलिया ने उत्तेजित होकर कहा – “अब मैं इसे सुधारने की आशा छोड़े देती हूँ। जितना सह चुकी हूँ वही बहुत है। अब और क्लेश नहीं सह सकती।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “अच्छा, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ।”
“क्या?”
“यही कि जब तुम्हारे धर्मशास्त्र में इतनी भी ताकत नहीं कि अपने पास रखकर एक अज्ञानी बालिका का उद्धार कर सको, तब ऐसे-ऐसे हजारों अज्ञानियों के उद्धार के लिए बेचारे दो-एक पादरियों के इधर-उधर भेजने से क्या मतलब सिद्ध होता है?”
मिस अफिलिया ने तत्काल इसका उत्तर नहीं दिया। इवा ने, जो वहाँ चुपचाप खड़ी हुई सब बातें सुन रही थी, टप्सी को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। फिर वे दोनों पास ही के उस शीशे के कमरे में चली गईं, जिसमें बैठकर सेंटक्लेयर पढ़ा करते थे।
उन दोनों के आँख से ओझल हो जाने पर सेंटक्लेयर ने कहा – “देखना चाहिए, इवा क्या करती है।”
यह कहकर वह आगे बढ़ा और शीशे पर जो पर्दा पड़ा हुआ था, उसका एक कोना उठाकर झाँकने लगा। एक क्षण के बाद उसने अपने होठों पर अंगुली रखकर इशारे से मिस अफिलिया को भी बुलाया। वे दोनों बालिकाएँ फर्श पर आमने-सामने बैठी हुई थीं। टप्सी के चेहरे पर उसकी स्वाभाविक बेपरवाही और अन्यमनस्कता का भाव दिखाई दे रहा है, पर इवा की आँखें आँसुओं से भरी थीं।
इवा बोली – “टप्सी, तेरा स्वभाव क्यों इतना खराब हो गया? तू सुधरने की कोशिश क्यों नहीं करती? टप्सी, क्या तू किसी आदमी को प्यार नहीं करती?”
टप्सी ने कहा – “मुझे नहीं मालूम, प्यार किस चीज को कहते हैं। मैं चीनी को प्यार करती हूँ और ऐसी ही चीजों को, जो मीठी होती हैं।”
“तू अपने बाप-माँ को प्यार करती है?”
“मेरा कोई नहीं है।”
“क्या तुम्हारा कोई नहीं है – भाई, बहन, चाचा, चाची या…”
“नहीं-नहीं, कोई नहीं। मेरा कभी कोई हुआ ही नहीं।”
“पर टप्सी, यदि तू सुधरने की कोशिश करे तो सुधर सकती है।”
“मैं हब्शी के सिवा और कुछ नहीं हो सकती। अगर मेरी यह काली चमड़ी उतरकर सफेद आ जाए तो मैं सुधरने की कोशिश करूँ।”
“टप्सी, काली होने से क्या हुआ, लोग तुझे अब भी प्यार कर सकते हैं। अगर तू अच्छी बन जाए तो मिस अफिलिया तुझे बहुत चाहेंगी।”
यह बात सुनकर टप्सी ने स्वाभाविक रीति से मुँह फाड़ दिया। इसके माने यह थे कि तुम्हारी इस बात पर विश्वास नहीं होता।
इवा ने पूछा – “क्या तू इस बात पर विश्वास नहीं करती?”
“नहीं मुझे देखकर ही उन्हें घृणा आती है, क्योंकि मैं हब्शी हूँ। मुझे छूने से वह ऐसा चौंकती हैं, जैसे उनपर कोई मेंढक गिर पड़ा है। कोई भी ऐसा नहीं है, जो हब्शियों को प्यार कर सके, और हब्शी भी कुछ हो नहीं सकते, ऐसे-के-ऐसे ही रहेंगे वे। (सीटी बजाना आरंभ करके) उसने कहा: मैं परवा नहीं करती।”
इवा का हृदय द्रवित हो उठा। उसने अपना दुबला सफेद हाथ टप्सी के कंधे पर रखकर कहा – “टप्सी-अभागी टप्सी, मैं तुझे प्यार करती हूँ। मैं तुझे इसलिए प्यार करती हूँ कि तू अनाथ है, तेरे माता-पिता नहीं हैं, न भाई-बहन हैं। मैं तुझे इसलिए प्यार करती हूँ कि तू बड़ी ही दु:खी और सताई हुई है। मैं तुझे प्यार करती हूँ और चाहती हूँ कि तू भली बन जा। टप्सी, मेरी तबियत बड़ी खराब है। मैं अब अधिक दिन नहीं रहूँगी। तेरा यह हाल देखकर मेरा जी बहुत ही दुखता है। मैं अब बहुत थोड़े ही दिनों की मेहमान हूँ। मैं चाहती हूँ कि और न सही, मेरा खयाल करके ही तू सुधरने की कोशिश कर!”
बालिका की आँखें आँसुओं से भर आईं और इवा के हाथ पर टप-टप बड़ी-बड़ी बूँदें गिरने लगीं। उसी क्षण सत्य विश्वास की एक किरण स्वर्गीय प्रेम की एक किरण, उस अज्ञानी अविश्वासपूर्ण बालिका की आत्मा में प्रविष्ट हुई। टप्सी दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर रो रही थी और वह लावण्यमयी बालिका झुककर स्नेह-भरे नेत्रों से उसे देख रही थी। मानो कोई ज्योतिर्मय देवदूत झुककर किसी पापात्मा का पाप-पंक से उद्धार कर रहा हो।
इवा ने कहा – “टप्सी, क्या तू नहीं जानती कि ईश्वर हम सबको एक बराबर प्यार करते हैं? वह जितना मुझे प्यार करते हैं, उतना ही तुझे भी। वह ठीक वैसे ही तुझे प्यार करते हैं, जैसे मैं करती हूँ, बल्कि मुझसे अधिक, क्योंकि वे मुझसे बढ़कर हैं। वे सुधरने में तेरी मदद करेंगे। अंत में तू स्वर्ग में पहुँच सकती है और सदा के लिए देवदूत हो सकती है। तेरी काली चमड़ी इसमें बाधा नहीं डालेगी। सफेद चमड़ीवालों के लिए जैसे ये सब बातें हैं, वैसे ही तेरे लिए हैं। टप्सी, इन बातों को सोच! टॉम काका जिन ऊँची आत्माओं के भजन गाता है, तू भी उन आत्माओं की भाँति एक आत्मा हो सकेगी।”
टप्सी ने भरे कंठ से कहा – “मिस इवा, प्यारी इवा, मैं कोशिश करूँगी। मैंने पहले कभी इसकी परवा नहीं की थी।”
सेंटक्लेयर ने पर्दा छोड़कर मिस अफिलिया से कहा – “यह दृश्य देखकर इस समय मुझे अपनी माता की याद आती है। उन्होंने मुझसे ठीक ही कहा था – अगर हम अंधे को आँख देना चाहते हैं तो हमें ईसा के रास्ते पर चलना पड़ेगा। उन्हें अपने पास बुला लो और अपने हाथ उनपर रखो।”
मिस अफिलिया ने कहा – “हब्शियों से मुझे सदा से एक प्रकार की घृणा-सी है, और यह सच्ची बात है कि मैं कभी इस बालिका से अपना शरीर छुआने के लिए तैयार नहीं हो सकती। पर मैंने नहीं सोचा था कि वह मेरे मन के भाव को ताड़ती है।”
सेंटक्लेयर बोला – “ये बच्चे बड़ी जल्दी मन की बात जान लेते हैं। उनसे मन के भाव छिपाना कठिन है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी बालक को यदि तुम मन से घृणा करती हो तो ऊपर से उसके उपकार की चाहे कितनी कोशिश क्यों न करो, उसकी चाहे कितनी भलाई क्यों न करो, वास्तव में जब तक उस पर तुम्हारा स्नेह-भाव न होगा, तब तक वह तुम्हारा रत्ती भर भी कृतज्ञ न होगा।”
अफिलिया ने कहा – “समझ में नहीं आता कि मैं इस भाव को कैसे दूर करूँ। ये हब्शी मुझे अच्छे नहीं लगते, और खासकर यह लड़की।”
सेंटक्लेयर बोला – “मालूम होता है, इवा ने इस भाव को दूर कर दिया है।”
अफिलिया ने गदगद होकर कहा – “हाँ, वह कैसी प्रेममयी है, मानो प्रेम का अवतार ही है। उसने ईसा की-सी प्रकृति पाई है। मेरी इच्छा होती है कि मैं भी उसकी जैसी होती। इवा से मैं बहुत-कुछ सीख सकती हूँ।”
सेंटक्लेयर बोला – “हाँ, बड़े हो जाने से ही आदमी सब बातों का पंडित नहीं बन जाता। बच्चों से भी उसे बहुतेरी बातें सीखने को रह जाती हैं।”
29. इवा की मृत्यु
इस संसार में सच्चा वीर कौन है? जिसने अपनी दृढ़ भुजाओं के प्रताप से अनेक राजाओं का गर्व चूर किया है, सहस्रों नर-नारियों पर आधिपत्य जमाया है, क्या वह सच्चा वीर है? जिसके बल से निर्बल सदा थरथराते, काँपते रहते हैं, जिसकी निर्दयता को स्मरणकर रोमांच हो आता है, क्या वह सच्चा वीर है? नहीं, कभी नहीं! वीर वह है, जो मौत से जरा भी नहीं डरता, सदा सुख-शांति से मरने को तैयार रहता है। वीर वह है, जो संसार की भलाई के निमित्त, जन-साधारण के हितार्थ, अपने जीवन का बलिदान करने में जरा भी संकोच नहीं करता। सच्चा वीर तो वही है, जो कभी किसी को सताता नहीं, और जगत में प्रेम का प्रवाह बहाकर मनुष्यों के अदम्य हृदयों को अपने वश में कर सकता है।
इस छोटी नन्हीं बालिका को देखिए। यह अपने रोग की यंत्रणा से अत्यंत पीड़ित है, पर इसे अपना दु:ख नहीं है। दूसरों का दु:ख देखकर आँसू बहा रही है; दूसरों के दु:ख के ध्यान में अपनी पीड़ा भूल गई है। क्या इसके जीवन में सच्ची वीरता के लक्षण नहीं दिखाई देते?
तीसरे पहर का समय है। इवा अपनी चारपाई पर पड़ी हुई है। सामने उसकी छोटी बाइबिल रखी है। उसे कभी खोलती है, कभी बंद करती है, कभी थोड़ी देर तक पढ़ती है। इसी समय एकाएक उसे बरामदे से अपनी माता की कर्कश आवाज सुनाई देती है:
“क्यों री लड़की, यहाँ खड़ी क्या उत्पात मचा रही है? बता, तूने फूल क्यों तोड़े?” इसी के बाद इवा को एक जोर के तमाचे की आवाज सुनाई दी। फिर उसने टप्सी को बोलते हुए सुना – “मेम साहब, ये सब मिस इवा के लिए…”
बीच में ही उसे रोकती हुई वह बोली – “मिस इवा का नाम लेकर कैसा बहाना बनाती है! तू समझती है, वह तेरे फूल चाहती है। तू किसी काम की नहीं है, हब्शिन भाग, यहाँ से!”
शक्ति के न रहने पर भी क्षण भर में इवा अपनी खाट से उठकर बरामदे में आ पहुँची। बोली – “आह, माँ, उसे मत भगाओ! मुझे फूल बड़े अच्छे लगते हैं। ये सब मुझे दे दो। मैं फूल चाहती हूँ।”
मेरी ने कहा – “क्यों इवा, तेरा कमरा तो इस समय फूलों से भरा पड़ा है?”
“मुझे और भी चाहिए। टप्सी, वे सब फूल यहाँ ले आ।”
टप्सी अब तक हाथ से सिर पकड़े खड़ी थी। इवा की बात सुनकर उसने धीरे-धीरे जाकर बड़े संकोच से फूल इवा के हाथ में दिए। उसके चेहरे पर अब पहले का-सा निस्संकोच, बेलाग और बेपरवाही का भाव दिखाई नहीं देता था।
इवा ने उन फूलों को देखकर कहा – “बड़ा सुंदर गुलदस्ता बनाया है।”
वास्तव में टप्सी ने बड़े जतन से भाँति-भाँति के फूल और पत्तियाँ चुनकर वह गुलदस्ता बनाया था। इवा की बात सुनकर उसका मुख प्रफुल्लित हो उठा।
इवा ने कहा – “टप्सी, तू बड़ी अच्छी तरह से फूल सजाती है। मेरा एक खाली फूलदान पड़ा है। मैं चाहती हूँ कि तू इसके लिए फूलों का एक गुलदस्ता रोज बना दिया करे।”
मेरी ने तुनककर कहा – “बड़ी अनोखी बात है! वह क्या गुलदस्ता बनाएगी?”
इवा बोली – “माँ, तुम्हारा इसमें क्या बिगड़ता है? जैसा टप्सी का जी चाहेगा, बना लेगी। तुम उसे रोको मत।”
टप्सी सिर झुकाकर खड़ी रही। फिर जब वह जाने लगी तो इवा ने देखा, उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।
इवा ने अपनी माँ से कहा – “माँ, बेचारी टप्सी मेरे लिए कुछ करना चाहती है।”
“करना-धरना क्या चाहती है, वह खाली उत्पात करना चाहती है। वह जानती है कि फूल तोड़ने की मनाही है, इसी से वह तोड़ती है। पर तुम्हें यदि उसका फूल तोड़ना अच्छा लगता है, तो ठीक है।”
“माँ, मेरी समझ में टप्सी में पहले से अब बहुत फर्क है, वह सुधरने की बड़ी कोशिश कर रही है।”
मेरी ने उदासीनता से हँसकर कहा – “अभी उसे सुधरने में बहुत देर लगेगी। कोशिश करने से यदि सुधारा जा सकता है तो अभी उसे बहुत दिनों तक सिर खपाना पड़ेगा।”
इवा बोली – “माँ, तुम जानती हो कि हर एक चीज हमेशा उसके खिलाफ रही है।”
“नहीं, यहाँ आने के बाद तो उसके लिए सब-कुछ अनुकूल है। उसे कितना समझाया गया, कितने सदुपदेश दिए गए। आदमी किसी के लिए जहाँ तक कर सकता है, किया गया, फिर भी वह जैसी थी वैसी ही है, और वैसी ही रहेगी; तुम उसे सुधार नहीं सकती हो।”
इवा बोली – “माँ, हम लोग बड़े स्नेह और यत्न से पलते हैं। हमारे माता-पिता, भाई-बंधु हम सबको प्यार करते हैं, इसी से हमें भले बनने का मौका रहता है; पर उस बेचारी को बचपन से ही कोई प्यार करनेवाला नहीं था। फिर वह कैसे सुधरती?”
मेरी ने जम्हाई लेते हुए कहा – “यही होगा। जाने दो। देखो, आज कैसी गर्मी है?”
इवा ने कहा – “माँ, क्या तुम्हें विश्वास नहीं होता कि टप्सी भी कभी भली बनकर स्वर्गीय प्रकृति प्राप्त कर सकती है?”
मेरी हँसकर बोली – “स्वर्गीय प्रकृति! तुम्हारे सिवा और कोई इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता।”
“पर माँ, क्या ईश्वर ने उसे नहीं रचा है? हम लोगों की भाँति टप्सी भी क्या ईश्वर की संतान नहीं है?”
“हाँ, यह हो सकता है। मैं मानती हूँ कि ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को बनाया है। अच्छा, मेरी सूँघनेवाली शीशी कहाँ है?”
माँ के मुँह से ऐसी बात सुनकर इवा ने अर्ध-स्फुट स्वर से कहा – “ओफ, कैसे दु:ख की बात है!”
मेरी ने सुन लिया। बोली – “दु:ख की क्या बात है?”
“माँ, ये हब्शी भी अच्छी शिक्षा मिलने से, प्यार का व्यवहार पाने से स्वर्गीय प्रकृति प्राप्त कर सकते हैं। पर ये लोग बाल-बच्चों सहित नरक की ओर जा रहे हैं। नित्य इनका पतन हो रहा है। कोई इनकी सहायता करनेवाला नहीं है।”
“हम लोग इनकी सहायता नहीं कर सकते। इनकी चिंता करके मरना बेकार है। मैं नहीं जानती कि इनके प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? हमें अपने सुख-वैभव के लिए ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए। नाहक औरों की चिंता करना व्यर्थ है।”
इवा ने बड़े दु:खी स्वर में कहा – “मैं तो अपने सुख से संतुष्ट नहीं रह सकती। मुझे इन दीन-दुखियों की दशा देखकर बड़ी पीड़ा होती है।”
मेरी व्यंग्य से बोली – “तुम्हारी यह बड़ी अनोखी पीड़ा है। मेरा विश्वास है कि अपने धर्म के अनुसार यही ठीक है कि हम अपने सुख के लिए ईश्वर का उपकार मानें।”
जान पड़ता है, मेरी ने ऐंग्लो-इंडियन संहिता से क्रिश्चियन धर्म की शिक्षा पाई थी, इसी से उसने बाइबिल की दस आज्ञाओं (टेन कमांडमेंट्स) पर एकदम हरताल फेर दी थी।
इवा ने अपनी माता से कहा – “माँ, मैं अपने सिर के कुछ बाल कटवाना चाहती हूँ।”
मेरी ने पूछा “क्यों?”
“मैं अपने प्रेमियों को इनमें से कुछ बाल अपने हाथ से दे जाना चाहती हूँ। क्या तुम बुआ को बुलाकर मेरे बाल नहीं कटवा दोगी?”
मेरी ने दूसरे कमरे से मिस अफिलिया को पुकारकर बुलाया।
अफिलिया के आने पर इवा ने अपने घुँघराले बालों को हाथ में लेकर उन्हें हिलाते हुए कहा – “बुआ, आओ, भेड़ को मूंड़ दो।”
सेंटक्लेयर उसी समय इवा के निमित्त कुछ फल लिए हुए कमरे में आया और बोला – “यह क्या हो रहा है?”
इवा ने कहा – “बाबा, मैं बुआ से अपने सिर के बाल कटवा रही हूँ – बहुत बढ़ गए हैं। इससे मेरे सिर में गर्मी बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त मैं कुछ बाल बाँट भी जाना चाहती हूँ।”
मिस अफिलिया अपनी कैंची लेकर आई।
सेंटक्लेयर ने कहा – “देखना जीजी, बड़ी होशियारी से बाल काटना, बालों की शोभा मत बिगाड़ देना। नीचे-नीचे के जो दिखाई नहीं पड़ते हैं, सो काट दो। इवा के घुँघराले बालों पर मुझे अभिमान है।”
इवा ने उदासी से कहा – “यह क्यों?”
सेंटक्लेयर बोला – “हाँ, तुम्हारे बाल उस समय सुंदर रहने चाहिए, जब मैं तुम्हें अपने साथ लेकर तुम्हारे चाचा के खेत पर हेनरिक को देखने चलूँगा।”
इवा ने कहा – “वहाँ मैं कभी नहीं जाऊँगी। बाबा, मैं उससे अच्छे देश को जा रही हूँ। तुम मेरी बात का विश्वास करो। बाबा, तुम क्या देखते नहीं हो कि मैं दिन-प्रति-दिन थकती जा रही हूँ।”
सेंटक्लेयर ने दु:ख-भरे स्वर में कहा – “इवा, मुझे दबाकर ऐसी भयंकर बात पर क्यों विश्वास दिलाना चाहती हो?”
इवा बोली – “केवल इसलिए कि यह बात सत्य है, बाबा! यदि तुम इस पर विश्वास कर लोगे, तो शायद इसके संबंध में मेरी तरह ही अनुभव करोगे।”
सेंटक्लेयर चुप होकर व्यथित-हृदय से कटे हुए सुंदर बालों की ओर देखने लगा। बालों का एक-एक गुच्छा उठाकर इवा भी उत्सुकता से देख रही थी और उन्हें अँगुलियों के चारों ओर लपेट रही थी। बीच-बीच में शंकित होकर पिता के मुख की ओर भी देख लेती थी।
मेरी ने कहा – “मुझे जिसका खटका था, अंत में वही हुआ। जिस सोच में दिन-दिन मेरा शरीर गिरता जाता है, मेरी उम्र कम होती जाती है, वही हुआ। मेरे दु:ख-दर्द का कोई साथी नहीं है। सेंटक्लेयर, बहुत जल्दी तुम देखोगे कि मैं ठीक कहती थी।”
सेंटक्लेयर ने बड़े तीखे और रूखेपन से कहा – “निस्संदेह तुम्हें शांति मिलेगी।”
मेरी रूमाल से आँखें ढककर लेट गई।
इवा की नीली चमकीली आँखें एक बार पिता पर और फिर माता पर पड़ने लगीं। यह दृष्टि शांत दृष्टि थी। जीवनमुक्त आत्मा की गूढ़दर्शी दृष्टि थी। आज उसे अपने पिता और माता की प्रकृति का पूर्ण अनुभव हुआ। उसने हाथ के इशारे से पिता को अपने पास बुलाया। वह आकर उसके पास बैठ गया।
इवा ने कहा – “बाबा, मेरी शक्ति दिन-पर-दिन कम होती जा रही है, और मैं जानती हूँ कि मुझे शीघ्र ही इस संसार को छोड़ना पड़ेगा। कुछ बातें ऐसी हैं, जिन्हें मैं तुमसे कहना चाहती हूँ और कुछ काम ऐसे हैं, जिन्हें करना मेरा कर्तव्य है। उन्हें करने के लिए भी मैं तुमसे प्रार्थना करनेवाली हूँ। तुम इस बात से ऐसे नाराज हो कि मुझे एक शब्द भी मुँह से नहीं निकालने देते। पर मेरे जी को ये बातें बहुत खलती हैं। मैं कहे बिना नहीं रह सकती। तुम अब प्रसन्नता से मुझे कहने की आज्ञा दो।”
सेंटक्लेयर ने एक हाथ से अपनी आँखें पोंछते हुए और दूसरे से इवा का हाथ पकड़ते हुए कहा – “मेरी प्यारी बच्ची, जो कहना हो, कहो।”
इवा बोली – “अच्छा बाबा, यदि तुम मेरी बात मानते हो, तो मैं अपने सब नौकरों को अपने पास इकट्ठा देखना चाहती हूँ। मुझे उनसे कुछ बातें कहनी हैं।”
सेंटक्लेयर ने बड़ी सहिष्णुता से कहा – “अच्छा।”
मिस अफिलिया ने सब दास-दासियों को बुला भेजा। थोड़ी देर में सारे दास-दासी उस कमरे में आकर इकट्ठे हो गए।
इवा तकिए के सहारे लेटी हुई थी। उसके खुले बाल मुँह के चारों ओर बिखरे हुए थे। दोनों आँखों में कुछ ललाई आ जाने से दुर्बल शरीर और भी पीला दिखाई दे रहा था। नेत्रों से मानो आत्मा की उज्ज्वल ज्योति निकल रही थी। बालिका एकाग्रता से प्रत्येक दास-दासी का मुख देख रही थी।
दास-दासियों का जी सहसा उमड़ पड़ा। वह ममतापूर्ण कांतिमय मुख, पास पड़े कतरे हुए लंबे बाल, सेंटक्लेयर का शोक-संतप्त मुख, मेरी की आह- ये सब बातें उनके कोमल हृदय में घुस गईं। वे सब घोर विषाद से ठंडी साँस लेने लगे। थोड़ी देर के लिए वहाँ शमशान जैसा सन्नाटा छा गया।
इवा ने अपना सिर उठाया और घुमाकर बड़े आग्रह से एक नजर सब पर डाली। सबके मुँह पर उदासीनता और भय की रेखाएँ थी। दासियाँ कपड़ों से मुँह ढाँक-ढाँककर सिसकने लगीं।
इवा ने कहा – “मेरे प्यारे भाइयो, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, इसी लिए मैंने तुम सबको यहाँ बुलवाया है। तुम सबको मैं हृदय से चाहती हूँ। आज मुझे तुम लोगों से कुछ बातें कहनी हैं… मैं चाहती हूँ कि तुम लोग सदा उन्हें याद रखो, क्योंकि मैं तुम्हें छोड़ रही हूँ। अब मैं बहुत ही थोड़े दिनों की मेहमान हूँ।”
इतना कहने के बाद सेवकों-सेविकाओं के सुबकने और सर्द आहें भरने से वह कमरा इस तरह भर गया कि उस बालिका की कमजोर आवाज सुनने की संभावना न रही। वह कुछ देर चुप रही, फिर ऐसे स्थिर कंठ से बोली कि वे सब शांत-मौन हो गए। वह कहने लगी:
“यदि तुम लोगों का मुझपर हार्दिक प्रेम है तो तुम्हें मेरे बोलने में विघ्न नहीं डालना चाहिए। मेरी बातें ध्यान से सुनो। मैं तुमसे तुम्हारी आत्माओं के संबंध में कुछ कहना चाहती हूँ। मुझे दु:ख है कि तुममें से बहुतेरे बड़े लापरवाह हैं। तुम लोग केवल इस जगत् की बातें सोचते रहते हो। मैं चाहती हूँ कि तुम लोग इस बात को भी ध्यान में रखो कि इस जगत् के अलावा एक और सुंदर जगत् है, जहाँ ईसा रहते हैं। मैं वहाँ जाती हूँ, तुम्हें भी वहाँ जाने का अधिकार है। पर यदि तुम वहाँ जाना चाहते हो तो तुम्हें अपना आज के जैसा व्यर्थ निरुद्देश्य और आदर्शहीन जीवन नहीं बिताना चाहिए। तुम्हें अपने जीवन में अब कुछ सुधार करना चाहिए। तुम्हें याद रखना चाहिए कि तुममें से प्रत्येक व्यक्ति दिव्य जीवन का सुख प्राप्त कर सकता है। तुम भले बनने की कोशिश करोगे तो ईश्वर तुम्हारी सहायता करेंगे। ईश्वर सदा भले कामों का सहायक होता है। तुम्हें ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए और तुम्हें पढ़ना चाहिए।”
इतना कहने के बाद बालिका कुछ देर को रुकी। वह उन्हें करुण दृष्टि से देखती रही। फिर दु:खित हृदय से बोली – “हाय प्यारे भाइयों, कितने दु:ख की बात है कि तुम पढ़ना नहीं जानते! और इससे तुम्हें कितना दु:ख है!”
उसका गला भर आया, उसने तकिए में मुँह छिपा लिया और सिसकने लगी। जिन्हें सुनाकर इवा ये बातें कह रही थी, वे उसे चारों ओर से घेरे खड़े थे। उसको बिलखते देखकर वे सब-के-सब भी रो पड़े।
उन लोगों को इस प्रकार रोते देख इवा ने अपने को सँभाला और अपना अश्रुपूर्ण मुख उठाकर उज्ज्वल, मृदुल मुस्कान से बोली – “कोई चिंता नहीं… मैंने सदा तुम लोगों के लिए दयालु प्रभु से प्रार्थना की है, और मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पढ़ना न जानने पर भी तुम्हारा सुधार करने में ईश्वर तुम लोगों की सहायता करेंगे। तुम उस ईश्वर से सहायता माँगो, और अपने सुधार की चेष्ट करो! तुमसे जब भी बन सके, धर्म-पुस्तक पढ़ो। मुझे आशा है कि मैं तुम सबों को स्वर्ग में देखूँगी।”
इवा की बात समाप्त होने पर टॉम, मामी और कुछ पुराने सेवकों ने धीरे-धीरे कहा – “परम पिता की इच्छा पूर्ण हो!”
इनमें जो बहुत छोटी उम्र के और चिंताहीन थे, उनका हृदय भी इस समय दु:ख से भर गया। वे घुटनों में सिर रखकर सिसकने लगे।
इवा ने कहा – “मैं जानती हूँ, तुम सब मुझे प्यार करते हो।”
इसके बाद उन सभी के लिए उसने अपनी शुभकामना भेंट की।
इवा बोली – “हाँ, मैं जानती हूँ, खूब जानती हूँ, कि तुम सब मुझे प्यार करते हो। तुममें से एक भी ऐसा नहीं, जिसने मुझे अपना हार्दिक स्नेह न दिया हो। मैं चाहती हूँ कि तुम्हें कोई ऐसी चीज दे जाऊँ कि उसे जब तुम देखो, तभी मुझे याद करो। मैं तुम सबको अपने बालों की एक-एक लट देती हूँ। और जब तुम इसे देखो, तो सोचना कि मैं तुम लोगों से प्यार करती थी, मैं स्वर्ग में चली गई हूँ और मैं चाहती हूँ कि तुम सब को वहाँ देखूँ।”
रोते और सिसकते हुए सब सेवक-सेविकाओं ने उस नन्हीं बालिका के कोमल हाथों से उसके निर्मल प्यार की वह यादगार बड़ी श्रद्धा के साथ अपने हाथों में सँभाल ली। उस हृदय-द्रावक दृश्य को कैसे बताया जाए! कोई रोता हुआ जमीन पर औंधे मुँह पड़ा था, कोई मन-ही-मन दयालु ईश्वर से बालिका के मंगल की प्रार्थना कर रहा था, और कोई उसके कपड़ों का सिरा चूम रहा था। जिसके मन में जैसे आता था, बालिका के लिए अपना शोक और प्रेम दिखलाता था।
जब वे सब लोग प्यार की भेंट-स्वरूप बालों की लटें पा चुके, तब मिस अफिलिया ने यह समझकर कि भीड़ रहने से रोगी को बेचैनी होगी, उन सबको संकेत से बाहर जाने को कहा। सब चले गए। केवल टॉम और मामी दो रह गए।
इवा ने कहा – “टॉम काका, यह एक सुंदर गुच्छा मैंने तुम्हारे लिए रख छोड़ा है। यह सोचकर बड़ा ही हर्ष होता है कि मैं तुम्हें स्वर्ग में देखूँगी। मुझे इसका पूर्ण विश्वास है।” फिर स्नेह के साथ अपनी बूढ़ी धाय मामी से लिपटकर वह बोली – “मामी, तुम बड़ी सीधी और दयालु हो। मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम भी स्वर्ग में पहुँचोगी।”
मामी ने जोर से रोते हुए कहा – “मेरी प्यारी बच्ची, तेरे बिना मैं कैसे जीऊँगी? तुझे छाती से लगाकर मैं अपनी संतान का दु:ख भूले हुए थी।”
मिस अफिलिया ने मामी और टॉम को धीरे-धीरे वहाँ से बाहर कर दिया। सोचा कि सब चले गए; पर जैसे ही वह घूमी, उसने देखा कि टप्सी वहाँ खड़ी थी। मिस अफिलिया ने एकाएक कहा – “तू किधर से आ टपकी?”
टप्सी ने आँखों से आँसू पोंछते हुए कहा – “मैं यहाँ ही तो थी। मिस इवा, मैं सदा से बुरी लड़की हूँ; पर क्या आप मुझे भी अपने बालों की एक लट नहीं देंगी?”
इवा बोली – “हाँ, टप्सी, तुझे जरूर दूँगी। यह ले, तू जब-जब भी इन बालों को देखना, तब-तब अपने मन में यही सोचना कि मैं भी तुझे बहुत चाहती थी और मेरी इच्छा थी कि तू भली लड़की बन जाए।”
टप्सी ने रुद्ध कंठ से कहा – “मिस इवा, मैं भली बनने की बराबर कोशिश कर रही हूँ। पर भला बनना बड़ा कठिन काम है। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं इसमें किसकी मदद लूँ।”
इवा ने कहा – “इसे ईश्वर जानते हैं, टप्सी, वे तुझे प्यार करते हैं, वे ही तेरी सहायता करेंगे।”
टप्सी रोते-रोते चुपचाप वहाँ से चली गई! बालों के गुच्छे को उसने अपनी छाती में आदर से छिपा लिया।
सबके चले जाने पर मिस अफिलिया ने किवाड़ बंद कर लिए। जब ये सारी बातें हो रही थीं, तब मिस अफिलिया की आँखों से भी लगातार आँसुओं की धारा बह रही थी, पर वह बुद्धिमानी रमणी अपने शोक को रोककर रोगी को आराम पहुँचाने की चिंता कर रही थी और चारों ओर से इस शोक-प्रदर्शन से कहीं रोगी का कष्ट बढ़ न जाए, इस डर से वह स्वयं चुप बैठी थी।
सेंटक्लेयर भी एक हाथ से आँखें ढाँपे चुपचाप लड़की के पास बैठा था। सबके चले जाने पर भी वह उसी तरह बैठा रहा।
इवा के पिता के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा – “बाबा!”
सेंटक्लेयर सहसा चौंक उठा। उसका सारा शरीर रोमांचित हो गया, लेकिन वह कुछ बोला नहीं।
इवा ने फिर पुकारा – “बाबा!”
सेंटक्लेयर ने तीव्र यंत्रणा से छटपटाते हुए कहा – “अब नहीं सहा जाता – विधाता मुझपर बड़ा निर्दयी है।…”
मिस अफिलिया ने कहा – “वह ईश्वर की चीज है – उसकी इच्छा है कि इसका जो चाहे, करे।”
“शायद ऐसा ही हो, लेकिन इससे कष्ट सहना कुछ सहज तो नहीं होता।” बड़े सूखे और भारी स्वर से सेंटक्लेयर ने यह बात कहकर मुँह फेर लिया। उसकी आँखों से आँसू भरे हुए थे। इवा ने उठकर पिता की गोद में अपना सिर रखते हुए कहा – “बाबा, तुम्हारी बातें सुनकर मेरा हृदय फटा जाता है। तुम इतना दु:ख मत करो।” और वह फफक उठी।
इवा को रोते देखकर पिता को बड़ा भय हुआ। उसकी चिंता-धारा दूसरी ही ओर बह चली।
सेंटक्लेयर ने कहा – “मेरी बेटी इवा, अब शांत हो जा। मुझे भ्रांति हो गई थी, मैंने अन्याय किया है। तुम जो सोचने या करने को कहोगी, मैं वहीं सोचूँगा और वही करूँगा। तुम मेरे लिए दु:ख मत करो। मैं ईश्वर को आत्म-समर्पण करूँगा। ईश्वर को दोष देकर मैंने बड़ा अन्याय किया है। अब फिर ऐसी बात मुँह से नहीं निकालूँगा।”
इवा बहुत थकी-सी होकर अपने पिता की गोद में पड़ी रही और वह उसे प्यारे-प्यारे शब्दों से सांत्वना देने लगा।
मेरी वहाँ से उठकर अपने सोने के कमरे में चली गई। वहाँ उसे बार-बार मूर्च्छा आने लगी।
इवा के पिता ने विषाद से मुस्कराकर कहा – “इवा बेटी, मुझे तो तुमने अपने बालों की एक भी लट नहीं दी।”
इवा ने हँसकर कहा – “बाबा, तुम्हारे तो सभी हैं। तुम्हारे और माँ के ही हैं। हाँ, बुआ जितनी लटें चाहें, उन्हें तुम दे देना। मैंने तो बस अपने दास-दासियों को अपने हाथ से दिए हैं, क्योंकि बाबा, तुम जानते हो, मेरे चले जाने के बाद उन्हें शायद कोई न देता… और मुझे आशा है कि इन बालों को देखकर वे मेरी याद जरूर करेंगे।…”
“बाबा, तुम क्रिश्चियन हो या नहीं?” इवा ने कुछ संदेह से पूछा।
सेंटक्लेयर ने जवाब दिया – “तुम ऐसा क्यों पूछती हो?”
इवा ने कहा – “तुम ऐसे भलेमानस होकर भी क्रिश्चियन नहीं हो, इस पर मुझे आश्चर्य है।”
सेंटक्लेयर ने पूछा – “क्रिश्चियन के क्या गुण होते हैं, इवा?”
इवा बोली – “जो क्राइस्ट को सब चीजों से अधिक प्यार करे।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “क्या तुम ऐसा करती हो, बेटी?”
इवा बोली “नि:संदेह!”
सेंटक्लेयर ने कहा – “तुमने तो कभी उसे देखा भी नहीं…।”
इवा ने उत्तर दिया – “नहीं, देखने से क्या बनता-बिगड़ता है! मेरा उस पर विश्वास है, और कुछ दिनों में मैं उसे देख लूँगी।”
यह कहते-कहते इवा का मुख एक दिव्य आनंद से खिल उठा। सेंटक्लेयर ने फिर कुछ नहीं कहा। यह भाव उसने पहले अपनी माता में देखा था, पर स्वयं उसके हृदय में कोई ऐसा भाव नहीं था।
इसके बाद इवा का रोग दिन-दिन बढ़ता ही गया। अब उसके जीने की कोई आशा न रही।
मिस अफिलिया दिन-रात सिरहाने बैठी उसकी सेवा-शुश्रूषा करती थी। इस विपत्ति के समय उसकी असाधारण धीरता, बुद्धिमत्ता और शुश्रूषा में तत्परता को देखकर कोई भी उसे मन-ही-मन सराहे बिना नहीं रह सकता था।
टॉम अधिकतर इवा के कमरे में रहता था। वह कभी इवा को गोद में उठाकर बरामदे में टहलाता, कभी सवेरे की साफ ताजा हवा में घुमाने के लिए उसे बाग में ले जाता और कभी किसी पेड़ की छाया में बैठकर पहले की तरह इवा को उत्तम भक्ति के भजन सुनाता।
इवा का पिता भी प्राय: उसे गोद में लेकर घुमाता था, पर उसका शरीर विशेष सबल न होने के कारण वह जल्दी थक जाता था। तब इवा कहती – “बाबा मुझे टॉम की गोद में दे दो। वह मुझे गोद में लेना चाहता है, मेरे लिए कुछ भी करने में वह बड़ा प्रसन्न होता है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “बेटी ऐसा ही मैं भी अनुभव करता हूँ।”
इवा की सेवा करने की इच्छा केवल टॉम ही को नहीं रहती थी, बल्कि घर के सभी सेवक उसके लिए हृदय से कुछ करना चाहते थे और उन बेचारों से जो-कुछ हो सकता था, करते भी थे।
इवा की सेवा करने के लिए मामी बहुत छटपटाती थी, पर उसे कोई अवसर ही नहीं मिलता था, क्योंकि दिन-रात मेरी उसे अपनी ही टहल-चाकरी से फुर्सत नहीं होने देती थी। मेरी कहती कि कन्या की पीड़ा के कारण उसका मन बड़ा बेचैन हो गया है। उसकी यंत्रणा के मारे कोई चैन नहीं लेने पाता था। रात को भी मामी को कम-से-कम बीस बार जगाकर तंग करती थी – कभी पैर दबवाती, कभी सिर पर पानी डलवाती; कभी रूमाल ढुढ़वाती। कभी कहती – जा, देखकर आ, इवा के कमरे में कैसा शोर हो रहा है। कभी कहती – रोशनी आ रही है, परदा डाल दे। कभी कहती – अँधेरा है, परदा उठा दे! वह दिन में भी मामी को, इवा के कमरे के अलावा इधर-उधर चारों ओर दौड़ाती ही रहती थी। इससे मामी कभी-कभी छिपकर पल भर के लिए इवा को देख आती थी।
एक दिन मेरी ने कहा – “इस समय अपने शरीर के विषय में विशेष सावधान रहना मैं अपना कर्तव्य समझती हूँ। एक तो यों ही कमजोर हूँ, उस पर इवा की सेवा-शुश्रूषा ओर भार-सँभालने का सारा बोझ मुझपर है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “अच्छा, क्या सचमुच ऐसा है? मैं तो समझता था कि बहन ने तुम्हें इससे छुट्टी दे रखी है।”
मेरी बोली – “ठीक है, तुम मर्द हो, अत: मर्दों की-सी बातें करते हो। तुम्हें पता ही नहीं कि संतान की पीड़ा माता के मन पर कैसा असर डालती है। भला ऐसी दशा में माँ का मन कैसे बेफिक्र हो सकता है? हाय, मेरे मन की दशा कोई नहीं समझता। सेंटक्लेयर, मैं तुम्हारी तरह बेपरवाह बनकर नहीं रह सकती।”
सेंटक्लेयर को मेरी की बात पर हँसी आ गई। इस दु:ख के अवसर पर भी हँसी आने से सेंटक्लेयर को निर्दयी न समझा जाए। ऐसी उज्ज्वल शक्ति की लहरों में उसकी आत्मा की परलोक-यात्रा आरंभ हुई थी। ऐसी शीतल-मंद-सुगंध वायु के झोंके खाती हुई वह जीवन की क्षुद्र नौका स्वर्ग की ओर जा रही थी कि इस बात का ध्यान तक न आता था कि यह सब उसकी मौत के समान है। बालिका को कोई विशेष शारीरिक यंत्रणा न थी। अदृष्ट रीति से शनै:-शनै: उसकी निर्बलता बढ़ती जाती थी। शांति और पवित्रता की एक मधुर लहर बालिका के चारों ओर उछालें ले रही थी। उसके मुख की वह सात्त्विक ज्योति, हृदय की वह गंभीर स्नेह-राशि, आत्मा का वह जीवित विश्वास और प्राणों की वह स्थिर प्रफुल्लता देखकर किसी के भी हृदय में एक अद्भुत और नवीन शांति का विकास हो सकता था। यह शांति ईश्वर -निर्भरता के भाव से उत्पन्न शांति न थी, तो क्या आशा थी? असंभव! यह भूत-भविष्य से सर्वथा निराली, वर्तमान की एक शांतिमय अवस्था थी, यह शांति सेंटक्लेयर के मन को ऐसी सांत्वना देती कि अब उसे भयावह भविष्य को सोचने की इच्छा ही न होती।
अपनी आसन्न मृत्यु के संबंध में इवा के हृदय में जो पूर्वाभास था, उसे उसके विश्वासी परिचारक टॉम के सिवा और कोई न जानता था। पिता का हृदय दुखने के डर से इवा उससे अपनी दशा छिपाती ही थी, पर टॉम से वह अपनी कोई बात कहने में संकोच नहीं करती थी। मृत्यु के कुछ ही पूर्व जब शरीर से आत्मा का बंधन ढीला पड़ने लगता है तब हृदय को आप-ही-आप मौत के पैरों की आहट मिल जाती है। इवा ने जब यह जान लिया कि मृत्यु बहुत निकट आ गई है तब उसने टॉम को यह बात बताई। उसी दिन से टॉम ने अपनी कोठरी में सोना छोड़ दिया। अब वह इवा के कमरे से लगे बरामदे में लेटा रहता था, जिससे कोई जरूरी काम हो तो वह तुरंत वहाँ पहुँच सके।
मिस अफिलिया ने एक दिन उससे कहा – “टॉम, तुम कुत्ते की तरह इधर-उधर क्यों पड़े रहते हो? मैं तो समझती थी कि तुम सभ्य आदमी की भाँति अपनी कोठरी में सोते होगे।”
टॉम बोला – “हाँ, मैं हमेशा अपने कमरे में ही सोया करता हूँ, पर अब…”
अफिलिया ने कहा – “अब क्या?”
टॉम ने उत्तर दिया – “जी, जरा धीरे बोलिए, कहीं सेंटक्लेयर साहब न सुन लें। आप जानती हैं कि दुलहे की खबर रखने के लिए किसी को जागना चाहिए।”
अफिलिया ने कहा – “तुम्हारे कहने का क्या मतलब है?”
टॉम बोला – “आप जानती हैं, बाइबिल में लिखा है, आधी रात के समय वहाँ बड़ा शोर-गुल हुआ – देखो, दुलहा आ पहुँचा। मिस फीली, मैं हर रात को उसी की बाट देखा करता हूँ। मैं यहाँ से हटकर नहीं सो सकता।”
अफिलिया ने कहा – “क्यों टॉम काका, तुम ऐसा क्यों सोचते हो?”
टॉम ने जवाब दिया – “मिस इवा मुझसे बहुत-सी बातें कहती हैं। आत्मा के पास परमात्मा अपना दूत भेजते हैं। मिस फीली, यह पवित्र बालिका जब स्वर्ग में जाने लगेगी तब स्वर्ग के द्वार खुल जाएँगे, हम सब लोग स्वर्ग की उज्ज्वल प्रभा का दर्शन पाकर कृतार्थ होंगे। मैं उस समय उसके पास ही रहना चाहता हूँ।”
अफिलिया बोली – “टॉम काका, क्या मिस इवा ने तुमसे कहा है कि और दिनों के बजाय आज उसे अधिक तकलीफ है?”
टॉम ने कहा – “नहीं, पर आज सवेरे उन्होंने मुझसे यह कहा कि मैं परलोक के बहुत पास पहुँच गई हूँ, देवदूत उन्हें संदेशा सुना गए हैं।”
रात के कोई दस बजे होंगे। उस समय मिस अफिलिया और टॉम के बीच ये बातें हुईं। मिस अफिलिया बाहर का दरवाजा बंद करने आई थी।
मिस अफिलिया घबरानेवाली स्त्री न थी। सहज में उनका मन अधीर होनेवाला न था। पर टॉम की गंभीर विश्वासपूर्ण बात सुनकर वह बड़ी घबराई। और दिनों के बजाय उस दिन शाम से ही इवा अधिक प्रसन्न और स्वस्थ दीख पड़ती थी। वह बिछौने पर बैठी सोच रही थी कि अपने गहने किसे देगी तथा अपनी पसंद की और-और चीजें किसे देगी। उस दिन बहुत दिनों के बाद इवा के शरीर में थोड़ी-सी फुर्ती दीख रही थी।
उस दिन शाम को कमरे में आने पर सेंटक्लेयर ने उसे और दिनों से स्वस्थ और सबल देखकर कहा – “इवा, आज बहुत अच्छी जान पड़ती है। बीमारी के बाद ऐसी प्रसन्न वह किसी दिन नहीं दिखाई दी थी।”
फिर रात को सोने के लिए जाते समय सेंटक्लेयर ने मिस अफिलिया से कहा – “बहन, ईश्वर की कृपा से आज इवा और दिनों से काफी अच्छी जान पड़ती है। आशा है, जल्दी ही ठीक हो जाएगी।” इतना कहकर सेंटक्लेयर अपने कमरे में जाकर बेफिक्री की नींद सो गया।
आधी रात हुई। सब सो रहे थे, पर अफिलिया की आँखों में नींद का नाम न था। वह बड़ी एकाग्रता से इवा के मुँह को निहार रही थी। पल-पल बदलते मुख के भाव देख रही थी। एकाएक इवा के चेहरे का भाव ऐसा बदला, मानो उसे लेने को स्वर्ग-दूत आ पहुँचे हों। यह अवस्था देखते ही मिस अफिलिया तत्काल दरवाजा खोलकर बाहर आई। टॉम बाहर बैठा था। रात को उसने पल भर के लिए भी आँखें बंद नहीं की थीं। अफिलिया ने उसे देखते ही कहा – “टॉम, जल्दी से डाक्टर को लाओ।”
टॉम उधर डाक्टर के यहाँ गया, इधर मिस अफिलिया ने आकर सेंटक्लेयर के दरवाजे की कुंडी हिलाई।
उसने कहा – “भैया, जल्दी बाहर आओ।”
इन शब्दों के कान में पड़ते ही सेंटक्लेयर को अपना दिल बैठता-सा मालूम हुआ। उसने समझ लिया कि सर्वनाश की घड़ी आ पहुँची। वह झटपट इवान्जेलिन के कमरे में पहुँचा। वहाँ जाकर देखा तो इवान्जेलिन के मुँह पर दु:ख की कोई रेखा नहीं थी। सदा का-सा एकाग्र तथा मधुर भाव बालिका के मुख पर विराज रहा था। तब क्यों ऐसा लगा कि आज इवा की घड़ियाँ पूरी हो गई हैं? उसके शरीर में एकदम सुस्ती दौड़ गई थी, हाथ-पैर बर्फ के जैसे ठंडे हो गए थे। बस मुख-कमल, आध्यात्मिक ज्योति के कारण, ज्यों-का-त्यों खिला हुआ था, तनिक भी नहीं मुरझाया था।
टॉम जल्दी ही डाक्टर को लेकर पहुँच गया। डाक्टर ने मिस अफिलिया से पूछा – “यह हालत कब से है?”
अफिलिया ने जवाब दिया – “आधी रात के बाद से।”
सारे घर में शोर मच गया। सब लोग जाग उठे। बरामदे में भीड़ लग गई। घर में दौड़-धूप की आवाजें सुनाई देने लगीं, परंतु सेंटक्लेयर ने किसी से न कुछ कहा, न सुना। वह चुपचाप एकटक निद्रित बालिका के मुँह की ओर ही ताकता रहा।
थोड़ी देर के बाद आप-ही-आप बोला – “बेटी एक बार जाग पड़ती… मैं एक बार और इस मुख की मधुर वाणी सुन लेता…”
यह कहकर उसने इवा के कान के पास मुँह ले जाकर कहा – “बेटी इवा!”
ये शब्द सुनकर उन दोनों सुधावर्षी सुदीर्घ नेत्रों का पर्दा हट गया। उसने सिर उठाकर बोलने की चेष्टा की, पर शरीर बेदम था।
सेंटक्लेयर ने कहा – “इवा, तू मुझे पहचानती है?”
बालिका ने अस्फुट स्वर में कहा – “बाबा।”
बड़े कष्ट से उसने अपनी छोटी-छोटी भुजाएँ उठाकर पिता के गले में डाल दीं। देखते-ही-देखते वे दोनों कोमल हाथ लटक गए। पल भर के लिए उसके चेहरे का भाव बदला। बस, यह अंतिम घड़ी थी। आत्मा देह को छोड़कर जाने की तैयारी में थी।… इवा के मुख-कमल पर पल भर के लिए यंत्रणा के चिह्न देखकर सेंटक्लेयर का धीरज जाता रहा। उसे कष्ट से साँस लेते देखकर बोल उठा – “अरे टॉम, यह सब सहा नहीं जाता… मेरे प्राण इवा का कोई भी दु:ख नहीं सह सकते!… मेरी जान गई… तुम प्रार्थना करो, जिससे यह घड़ी टल जाए।”
टॉम की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। अपने मालिक की यह दयनीय दशा देखकर वह आकाश की ओर मुँह करके परमेश्वर से प्रार्थना करने लगा। विश्वास और भक्ति में भी कैसी अद्भुत शक्ति होती है! टॉम की प्रार्थना सुनी गई, पल भर में इवा की वह यंत्रणा दूर हो गई। टॉम बोल उठा – “धन्य भगवन्! धन्य पिता! सारी यंत्रणाओं के अंत का समय आ गया है!”
बालिका के वे दोनों सुदीर्घ नेत्र स्वर्ग की ओर देख रहे थे, मानो वह विशाल और स्थिर दृष्टि से पुकारकर कह रही थी – “संसार के सारे दु:ख दूर हो गए।”
सेंटक्लेयर ने धीरे से कहा – “इवा!”
किंतु उसने नहीं सुना।
फिर उसके पिता ने कहा – “बेटी, तुम क्या देख रही हो?”
वह मुख कमल मधुर हास्य से जैसे खिल उठा। बालिका ने अस्फुट स्वर से कहा – “अहा, प्रेम-आनंद-शांति!” और उसके बाद देह जीवन-शून्य हो गई। आत्मा ने मृत्यु को पार करके अमरत्व प्राप्त कर लिया। निर्मल-प्रकृति देव-बाला ने पाप और अत्याचारपूर्ण संसार से कूचकर भगवान की गोद में सहारा ले लिया।
30. मृत्यु के उपरांत
इवान्जेलिन की निर्मल आत्मा मंगलमय के मंगल-धाम को चली गई। जीवन से शून्य शरीर घर में पड़ा हुआ है। उसके शयनागार में रखी पत्थर की मूर्तियों और चित्र आदि को सफेद वस्त्रों से ढक दिया जाता है। घर में गहरा सन्नाटा है। बीच-बीच में पैरों की मंद-मंद आहट सुनाई पड़ जाती है। बंद खिड़कियों से बाहर की धुँधली रोशनी अंदर आकर घर के सन्नाटे को और भी बढ़ा रही है।
बिस्तर सफेद चादर से ढका पड़ा है और उसी पर वह नन्हीं सोयी हुई है – ऐसी नींद में, जो कभी खुलने की नहीं।
बालिका की देह लतिका पहले की तरह श्वेत वस्त्रों में लिपटी हुई है। उषा की किरणें यवनिका को पार करके मृत्यु के पंजे में पड़े, शीत से जड़ शरीर पर प्रभा बिखेर रही हैं। सिर एक ओर को झुका हुआ है, मानो बालिका सचमुच सो रही हो। समग्र आनंद-व्यापिनी शोभा, आनंद और शांति की अपूर्व सम्मिलन-श्री देखने से ही पता लगता है कि यह नींद क्षणिक नहीं है। यह लंबी नींद आत्मा का अनंत-पवित्र विश्राम है।
इवा, तुम-सरीखी देवियों की मृत्यु नहीं होती, न मृत्यु की छाया है और न अंधकार। जिस प्रकार प्रात:काल के प्रकाश में शुक्र तारा छिप जाता है, उसी प्रकार तुम लोगों की आँखों से ओझल हो गई हो। बिना युद्ध किए ही तुमने गढ़ जीत लिया है, बिना विरोध के राजमुकुट प्राप्त कर लिया है।
सेंटक्लेयर शय्या के पास खड़ा हुआ एकटक उसकी ओर देख रहा है, मानो वह किसी विचार में मग्न होकर कुछ सोच रहा हो, पर कौन जाने, क्या सोच रहा है… उसे चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार दिखाई दे रहा है।
रोडाल्फ और रोजा, दोनों मृत बालिका के कमरे और शय्या को भाँति-भाँति के फूलों से सजा रहे हैं। उनकी आँखों से आँसुओं की धार बह रही है।
कमरे में अब भी पहले दिन के फूलों के ढेर पड़े हैं। इवा की मेज पर यत्नपूर्वक सजाए गुलदस्ते में केवल एक गुलाब की कली है। तभी रोजा एक डलिया भर फूल लेकर घर में आई, किंतु सेंटक्लेयर को सामने देखकर सम्मान से पीछे हट गई। सेंटक्लेयर ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, यह देखकर वह फिर आगे बढ़ी और मृत देह के चारों ओर फूलों को बड़ी सुघड़ता से सजा दिया। बालिका के सुंदर हाथ में एक सुगंधित पुष्प देकर वह चली गई। सेंटक्लेयर ऐसे देखता रहा, मानो कोई स्वप्न देख रहा हो।
इतने में टप्सी अपने अंचल में एक फूल छिपाए हुए वहाँ आई। रोते-रोते उसकी दोनों आँखें सूज गई थी। उसे देखते ही रोजा ने चुपके से कहा – “भाग-भाग, यहाँ तेरा क्या काम?”
टप्सी ने अंचल से एक अधखिला गुलाब का फूल निकालकर कातरता से कहा – “देखो, मैं यह कैसा सुंदर फूल लाई हूँ!… मुझे जाने दो… मैं इसे वहाँ रखूँगी।”
रोजा ने दृढ़ता से कहा – “भाग जा!”
सहसा सेंटक्लेयर ने टोककर कहा – “उसे मत रोको, आने दो!”
रोजा पीछे हट गई। टप्सी ने धीरे-धीरे बिस्तर के पास आकर वह फूल उसके पैरों पर रख दिया और धरती पर लोटकर जोर-जोर से रोने-चीखने लगी। मिस अफिलिया वहाँ गई और उसे उठाकर समझाने की चेष्टा करने लगी, पर उसको सफलता न मिली। टप्सी रो-रो कहती थी – “मिस इवा, मिस इवा, मैं भी तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ।… मुझे भी ले चलो।”
बालिका का मर्म-भेदी क्रंदन सुनकर सेंटक्लेयर का पथराया हुआ सफेद चेहरा एकदम सुर्ख हो गया। इवा की मृत्यु के बाद अब उसकी आँखों से आँसू गिरे।
मिस अफिलिया ने बड़े स्नेह से कहा – “टप्सी, रो मत। मिस इवा स्वर्ग में गई है।”
टप्सी ने सिसकते हुए कहा – “मुझे तो वह नहीं दिखाई पड़ती हैं।… अब मुझे वह कभी नहीं दिखाई पड़ेंगी।”
पल भर के लिए सब चुप हो गए।
टप्सी ने फिर कहा – “मिस इवा मुझे प्यार करती थीं। उन्होंने स्वयं कहा था कि वह मुझे प्यार करती हैं। हाय, अब तो मेरा कोई भी नहीं रहा! अब मुझे कौन प्यार करेगा?”
सेंटक्लेयर ने ठंडी साँस लेकर मिस अफिलिया से कहा – “बहन, इवा टप्सी को सचमुच प्यार करती थी। तुम इस बेचारी बालिका को समझाकर शांत करो।”
मिस अफिलिया अश्रु-पूर्ण नेत्रों से टप्सी को घर से बाहर ले गई और उससे कहने लगी – “टप्सी, तू दु:खी मत हो, मैं तुझसे प्यार करूँगी। इवा ने मुझे प्यार करना सिखाया है। मैं उसके जैसे दिल की तो नहीं हूँ, तो भी तुझे प्यार करूँगी, तुझे प्यार की निगाह से देखूँगी, अच्छी सीख दूँगी और अच्छे रास्ते पर लाने की चेष्टा करूँगी।”
मिस अफिलिया को सरलता और स्नेह से यों बोलते देखकर आज टप्सी का हृदय उसकी ओर खिंच गया। वास्तव में स्नेह की पहचान बहुत जल्दी हो जाती है। निश्छल प्रेम और सहज स्नेह के प्रभाव से पत्थर का हृदय भी मोम हो जाता है। टप्सी का परिवर्तन देखकर सेंटक्लेयर अपने-आप कहने लगा – “हाय, मेरी इवा! इस संसार में बहुत थोड़े दिन ही रहकर तूने कितना अच्छा काम कर दिखाया! पत्थर-से दिल को कोमल बना दिया। पर मैंने अपनी इतनी बड़ी जिंदगी बेकार ही गँवाई, कुछ भी नहीं किया! मैं ईश्वर के सामने ऐसे जीवन के लिए क्या जवाब दूँगा?”
दिन अच्छी तरह चढ़ आया। चारों ओर से आत्मीय जन आए, पड़ोसी आए, सारा घर भर गया। मधुर प्रतिमा इवान्जेलिन की देह को ताबूत में रखकर उसका मुँह बंद किया गया। बगीचे में जहाँ बैठकर इवा और टॉम बाइबिल पढ़ा करते थे, वहाँ उस ताबूत को दफन कर दिया गया। सेंटक्लेयर खड़ा होकर देखने लगा। वह सोचता था, यह स्वप्न है या सच्ची घटना! क्या सचमुच आज मेरी प्राणाधार इवा धरती में समा गई! नहीं, वह देवकन्या धरती में नहीं समाई। यह तो उसकी काया…, पुराना कपड़ा था। आज इवा ने पुराना चोला त्यागकर नए चोले में स्वर्ग को कूच किया है। कौन है, जो उसका अमरत्व मिटा सके? इवा मर नहीं सकती। अंतिम क्रिया पूरी हुई।
इवा की जननी मेरी विलाप करने लगी। घर के सारे दास-दासियों को असह्य शोक हुआ था, पर उन्हें अपने शोक में रोने-पीटने की फुरसत ही नहीं मिलती थी। मेरी सबका नाकों दम किए रहती थी। शायद वह समझती थी कि संसार में दु:ख, शोक तथा प्यार और किसी के हृदय में प्रवेश नहीं कर सकता। यह सब केवल उसी की बपौती है। जब-तब मेरी कहा करती थी कि उसके स्वामी की आँखों से एक बूँद आँसू तक तो गिरा ही नहीं। वह एक बार भी उसे धीरज बँधाने नहीं आया। उसने एक बार भी उसके इस शोक में सहानुभूति प्रकट नहीं की, उसके स्वामी-जैसा कठोर हृदय आदमी इस संसार में दूसरा नहीं है।
कभी-कभी ये आँखें और कान मनुष्य को बड़ा धोखा देते हैं। ये दोनों इंद्रियाँ केवल बाहरी चीजों को देखती हैं। अंत:करण का गूढ़ भाव नहीं देख पातीं। इसलिए जो लोग केवल बाहरी बातों पर दृष्टि डालकर भले-बुरे का फैसला कर लेते हैं, वे सहज में धोखा खा जाते हैं। मेरी का यह बाहरी रुदन सुनकर टॉम और अफिलिया के सिवा सेंटक्लेयर के घर के कई दास-दासी समझते थे कि इवा की मृत्यु का मेरी को ही सबसे अधिक दु:ख है। सेंटक्लेयर के हृदय के गहरे शोक को टॉम सहज में जान गया। इसी से वह इवा की मृत्यु के उपरांत कभी अपने मालिक का साथ नहीं छोड़ता था। कभी-कभी वह बड़े उदास भाव से इवा के कमरे में बैठता, उसकी छोटी बाइबिल को उठाकर खोलता और फिर बंद करता। यद्यपि उसमें से वह कुछ भी पढ़ता नहीं था, तथापि उस समय उसके हृदय में जैसी विकट यंत्रणा होती थी, इसे टॉम के सिवा और कोई नहीं समझ सकता था। ऐसे नि:शब्द आंतरिक शोक से हृदय जितना जलता था, उसका शतांश भी मेरी की बाहरी चिल्लाहट से नहीं जलता था।
कुछ दिनों बाद सेंटक्लेयर अपने बागवाले घर को छोड़कर परिवार सहित नगरवाले मकान में आ गया। अपने हृदय की असह्य शोक-यंत्रणा को घटाने के लिए वह हर समय किसी-न-किसी काम में लगा रहता। वह पहले की भाँति सब से हँसता-बोलता था। यदि वह शोक-चिह्न धारण न किए होता तो कोई जान भी नहीं सकता था कि उसकी संतान की मृत्यु हो गई है।
एक दिन मिस अफिलिया से मेरी ने शिकायत के ढंग से कहा – “बहन, सेंटक्लेयर भी क्या अजीब आदमी है! मैं समझा करती थी कि संसार में यदि सेंटक्लेयर किसी को सबसे अधिक प्यार करते हैं तो बस इवा को; पर वह उसे भी बड़ी जल्दी भूल गए जान पड़ते हैं। कभी भूलकर भी उसका नाम नहीं लेते। मैंने सोचा था कि उन्हें इसका बहुत दु:ख होगा, पर मेरा यह खयाल गलत निकला।”
अफिलिया बोली – “बात यह है कि अथाह जल अंदर-ही-अंदर जोरों से बहा करता है।”
मेरी ने प्रतिवाद किया – “मैं इन बातों को नहीं मानती। ये सब कोरी बातें-ही-बातें हैं। यदि मनुष्य के मन में दु:ख होगा तो वह उसे अवश्य प्रकट करेगा। बिना प्रकट किए रहा ही नहीं जाएगा। पर मनुष्य के मन में किसी बात के लिए दु:ख होना दुर्भाग्य की निशानी है। भगवान ने यदि मुझे भी सेंटक्लेयर की भाँति निर्दयी बनाया होता तो मैं क्यों दु:ख सहती। मुझमें थोड़ी ममता है, यही मेरी जान लिए लेती है।”
मामी ने कहा – “मेम साहब, आप यह क्या कहती हैं! बेचारे साहब दिन-ब-दिन शोक में सूखे जा रहे हैं। इवा की मृत्यु के उपरांत किसी दिन पेट भर भोजन नहीं किया।” फिर उसने आँसू बहाते हुए कहा – “मैं जानती हूँ कि साहब मिस इवा को कभी भूल नहीं सकते; साहब ही क्या, उस नन्हीं प्यारी बालिका को कोई भी नहीं भूल सकता।”
मेरी बोली – “यह सब होने पर भी वह मेरा कभी खयाल नहीं करते। उन्होंने मुझसे कभी सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं कहा। वह यह बात नहीं जानते कि पिता की अपेक्षा माँ को संतान का कितना अधिक दु:ख होता है!”
मिस अफिलिया ने गंभीरता से कहा – “हर एक का हृदय ही अपने-अपने दु:ख हो जानता है। दूसरे के दु:ख को और कोई क्या समझेगा?”
मेरी बोली – “मैं भी यही समझती हूँ। मुझे जितना दु:ख है, उसे दूसरा कौन समझेगा? इवा समझती थी, सो चली गई।” इतना कहकर वह अपने पलंग पर लेट गई और बड़ी बेसब्री से सिसकने लगी।
इधर ये बातें हो रही थीं, उधर सेंटक्लेयर की लाइब्रेरी के कमरे में और चर्चा चल रही थी। पहले कहा जा चुका है कि इवा की मृत्यु के बाद टॉम सदा अपने मालिक के पीछे-पीछे लगा रहता था। आज सेंटक्लेयर अपनी लाइब्रेरीवाले कमरे में गया। टॉम बाहर बैठा बाट देखता रहा। जब देर होने पर भी वह बाहर न निकला तब टॉम धीरे-धीरे कमरे के अंदर गया। वहाँ जा कर देखा कि मालिक इवा की नन्हीं बाइबिल को मुख पर रखे हुए पड़े हैं। टॉम चुपचाप उनकी आराम-कुर्सी के पास जाकर खड़ा हो गया। सेंटक्लेयर उसे देखते ही उठ बैठा। टॉम के मुख की ओर आँखें फेरते ही दयालु सेंटक्लेयर का हृदय भर आया। सरलता और साधुता से परिपूर्ण टॉम का मुख-मंडल स्वामी के दु:ख से एकदम मलिन पड़ गया। उस मुँह से कोई वाक्य नहीं निकला, पर मुख की कातरता और करुणा का भाव प्रभु के दु:ख में स्पष्ट रूप से सहानुभूति प्रकट कर रहा था।
कुछ देर बाद सेंटक्लेयर ने कहा – “टॉम, इस संसार में सब-कुछ असार है।”
टॉम बोला – “मैं जानता हूँ प्रभु, सब-कुछ असार है, पर स्वर्ग की ओर, जहाँ इस समय हम लोगों की इवा है, ईश्वर की ओर निगाह रखने से कल्याण होगा।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “टॉम, मैं स्वर्ग की ओर निगाह डालता हूँ और ईश्वर की ओर देखने की चेष्टा करता हूँ, पर मुझे कुछ नहीं दिखाई देता। यदि कुछ दीख पड़ता तो मन को संतोष दिला सकता।”
टॉम ने एक दीर्घ नि:श्वास छोड़ा।
सेंटक्लेयर ने फिर कहा – “टॉम, मैं समझता हूँ कि निर्मल चरित्र शिशुओं को और तुम-सरीखे सरस और साधु-प्रकृति के लोगों को ही ईश्वर दिव्य दृष्टि देता है, हम-जैसों को नहीं; इसी से तुम लोग स्वर्ग की बातें जान सकते हो।”
टॉम बोला – “प्रभु, बाइबिल का मत है कि जो ज्ञान का अभिमान करते हैं और कानून की दुहाई देते हैं उन्हें ईश्वर के दर्शन नहीं होते। जिनका चित्त बालक की भाँति सरल है, उन्हीं को भगवान के दर्शन मिलते हैं।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “टॉम, बाइबिल पर मेरा विश्वास नहीं है। अपनी शंकालु प्रकृति के कारण किसी बात पर मेरा विश्वास नहीं जमता। मैं चाहता तो हूँ कि बाइबिल पर मेरा विश्वास जम जाए, पर ऐसा होता नहीं।”
टॉम ने कहा – “प्रभु, आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि हे भगवान! मेरे मन के संदेहों को दूर कर दो।”
टॉम की यह बात सुनकर सेंटक्लेयर स्वप्न में पड़े हुए मनुष्य की भाँति बोला – “कोई बात समझ में नहीं आती। क्या संसार का यह प्रेम, विश्वास और भक्ति सभी निरर्थक हैं? क्या मृत्यु के साथ-साथ इन सबका नाश हो जाता है? क्या मेरी इवा नहीं? क्या स्वर्ग नहीं है? क्या ईश्वर नहीं? क्या कुछ नहीं है?”
टॉम ने घुटने टेककर कहा – “प्रभु, सब-कुछ है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि सब कुछ है। आप इन सब पर विश्वास करने की चेष्टा कीजिए, चेष्टा कीजिए।”
सेंटक्लेयर बोला – “तुमने कैसे जाना कि ईश्वर है? तुमने तो कभी ईश्वर को देखा नहीं।”
टॉम ने कहा – “मैंने अपनी आत्मा के अंदर उसे जाना है। इस समय भी वह मेरे अंदर है। प्रभु, जब मैं अपने बाल-बच्चों से अलग करके बेच डाला गया, उस समय एकदम निराश हो गया था। मेरे मन में तनिक भी बल न रहा और तब मैंने निराश होकर ईश्वर को पुकारा। इससे अकस्मात् मेरे मन में शक्ति पैदा हो गई और मेरे अंदर से आवाज आई कि ‘टॉम, डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।’ इससे मेरे सारे दु:ख दूर हो गए और हृदय में आशा जाग उठी। प्रभु, क्या अपने-आप मन में ऐसा भाव आ सकता है? अंदर बैठे हुए परमात्मा ने ही मेरे मन को बल दिया था।”
ये बातें कहते समय टॉम का हृदय भक्ति और प्रेम से भर गया। उसकी आँखों से पानी की गंगा-यमुना बहने लगीं। सेंटक्लेयर ने उसके कंधे पर सिर रखकर और उसके काले हाथ पकड़कर कहा – “टॉम, तुम मुझे प्यार करते हो?”
टॉम बोला – “प्रभु, यदि मेरे प्राण देने से भी ईश्वर में आपकी भक्ति और विश्वास हो जाए, तो यह दास अभी खुशी-खुशी अपने प्राण देने को तैयार है।”
सेंटक्लेयर ने द्रवित होकर कहा – “मेरे भोले भाई, मेरे लिए प्राण दोगे? मैं तो तुम्हारे-जैसे साधु और सहृदय मनुष्य के स्नेह के योग्य भी नहीं हूँ।”
टॉम बोला – “प्रभु, मेरी अपेक्षा ईश्वर आपको हजार गुना ज्यादा प्यार करते हैं।”
सेंटक्लेयर ने पूछा – “टॉम, यह तुम कैसे जानते हो?”
टॉम ने कहा – “मेरी आत्मा में इसका अनुभव होता है। प्रभु, मिस इवा मुझे बड़ी अच्छी तरह बाइबिल पढ़कर सुनाया करती थी। उसके बाद किसी ने नहीं सुनाई। आप थोड़ा-सा पढ़कर सुनाइए।”
सेंटक्लेयर ने बाइबिल में से लाजरस के उद्धार का वृत्तांत पढ़ा। टॉम भक्ति-भाव से हाथ जोड़कर उसे सुन रहा था। समाप्त होने पर सेंटक्लेयर ने पूछा – “टॉम, क्या तुम्हें ये सब बातें सच्ची जान पड़ती हैं?”
टॉम बोला – “प्रभु, मुझे ये सब बातें साफ दिखाई पड़ रही हैं।”
सेंटक्लेयर ने विभोर होकर कहा – “टॉम, मुझे तुम्हारी आँखें मिल जातीं तो अच्छा होता।”
टॉम ने बड़ी विनम्रता से जवाब दिया – “ईश्वर आप पर अवश्य दया करेंगे।”
“लेकिन टॉम, तुम जानते हो कि तुमसे मेरा ज्ञान कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ा है। मैं यदि तुमसे कहूँ कि मैं इस बाइबिल पर विश्वास नहीं करता तो इससे क्या तुम्हारे हार्दिक विश्वास को कुछ ठेस पहुँचेगी?”
“रत्ती भर भी नहीं।” टॉम ने कहा।
सेंटक्लेयर बोला – “क्यों टॉम, तुम तो जानते हो कि मैं तुमसे अधिक पढ़ा-लिखा हूँ।”
टॉम बोला – “प्रभु, अभी आप ही ने तो कहा है कि ईश्वर को वे लोग नहीं देख सकते, जिन्हें अपने ज्ञान का अभिमान है। बालकों-जैसे विश्वासियों को ही भगवान के दर्शन मिलते हैं। जान पड़ता है, आप मेरे हृदय की परीक्षा ले रहे हैं। ये आपके हृदय के सच्चे भाव नहीं हैं।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “हाँ, मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए ही ऐसा कहा था। मैं बाइबिल पर अविश्वास नहीं करता। इसमें शक नहीं कि धर्म-शास्त्र युक्ति-संगत है। पर खेद है कि मेरा स्वभाव बिगड़ा हुआ है।”
“प्रभु, प्रार्थना से सुधर जाएगा।” टॉम ने धीमे स्वर में कहा।
“टॉम, तुम कैसे जानते हो कि मैं प्रार्थना नहीं करता?” सेंटक्लेयर ने पूछा।
टॉम बोला – “प्रभु, क्या आप प्रार्थना करते हैं?”
“मैं अवश्य करता, पर किसके सामने करूँ, कुछ भी तो नहीं दिखाई देता। किंतु टॉम, तुम इस समय प्रार्थना करो, मैं सुनता हूँ।” सेंटक्लेयर ने एक साँस में कहा।
टॉम बड़े भक्ति-भाव से ईश्वर की प्रार्थना करने लगा। उसकी सरल प्रार्थना से सेंटक्लेयर का हृदय भर आया। प्रार्थना की धारा में उसका मन स्वर्ग की ओर बह चला। उसने प्रत्यक्ष ही अनुभव किया कि इवा अमृतमय की अमृत-गोद में विराज रही है।
टॉम की प्रार्थना समाप्त होने पर सेंटक्लेयर ने कहा – “टॉम, तुम जब-तब मेरे सामने ऐसे ही प्रार्थना किया करो। परंतु इस समय तुम मुझे थोड़ी देर एकांत में रहने की छुट्टी दो। मैं और किसी समय तुमसे अधिक बातें करूँगा।”
टॉम चुपचाप उस कमरे से चला गया।
31. पिता-पुत्री का पुनर्मिलन
समय किसी की बाट नहीं देखता। हफ्तों-पर-हफ्ते, महीनों-पर-महीने और वर्षों-पर-वर्ष निकले जा रहे हैं। संसार भर के नर-नारियों को अपनी छाती पर लादकर काल का प्रवाह अनंत-सागर की ओर दौड़ा जा रहा है। इवा की नन्हीं-सी जीवन-नौका भी अनंत-सागर में समा गई। दो-चार दिन घर-बाहर सभी ने शोक मनाया और आँसू बहाए, पर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, लोग अपने दु:ख को भूलते गए। सब अपने-अपने धंधों में लग गए। गाना-बजाना, खाना-पीना, सभी ज्यों-के-त्यों होने लगे। पर देखना यह है कि क्या सभी एक-से हैं? क्या सेंटक्लेयर के जीवन की गाड़ी भी उसी चाल से चल रही है?
इस संसार में केवल इवा ही सेंटक्लेयर के जीवन की सर्वस्व थी। इवा के लिए ही उसका जीना, इवा के लिए ही धन-संग्रह करना, इवा के लिए ही काम-काज, और इवा ही के लिए उसका सब-कुछ था। इवा के चले जाने से सेंटक्लेयर का जीवन लक्ष्य-शून्य हो गया। अब वह संसार में किसके लिए जिए और दुनिया के झंझटों में किसके लिए फँसे?
आशाएँ टूट जाने पर मनुष्य संसार में क्या सचमुच उद्देश्यहीन हो जाता है? क्या सांसारिक तुच्छ आशाओं के अतिरिक्त मानव-जीवन का अन्य कोई महान उद्देश्य नहीं है? नहीं यह बात नहीं। इन्हीं उद्देश्यों से आगे भी बहुत-कुछ है।
मानव-जीवन के महान उद्देश्य से सेंटक्लेयर अनभिज्ञ न था। इसी से उसका जीवन सर्वथा लक्ष्य-हीन नहीं हुआ, विशेषकर इवा के अंतिम शब्द हर घड़ी उसके कानों में गूँजते थे। सोते-जागते, उठते-बैठते, हर घड़ी इवा का वह सुमधुर वाक्य उसे याद आता। उसे हर समय यही दिखाई पड़ता, मानो इवा अपने नन्हें-नन्हें हाथों की अँगुलियों के इशारे से उसे जीवन-मार्ग का स्वर्गपथ दिखा रही है। पर उसका चिर-सहचर आलस्य और उसका वर्तमान शोक उसे कर्तव्य-मार्ग के स्वर्ग की ओर अग्रसर होने में बाधा डालता था। उसमें इन सब विघ्न-बाधाओं को पार करके जीवन के महान उद्देश्य की पूर्ति करने की शक्ति थी। यद्यपि वह देश में प्रचलित किसी प्रकार की धर्मोपासना में योग न देता था, तथापि वह बचपन से ही बड़ा सूक्ष्मदर्शी और भावुक था। उसके मन में सदा नए-नए भाव उठते रहते थे। वास्तव में इस संसार में कभी-कभी ऐसा होता है कि जो लोग लोक और परलोक की तनिक भी परवाह नहीं करते, बल्कि काम पड़ने पर उनके माननेवालों की निंदा तक करने से नहीं चूकते, उन्हीं के मुख से कभी-कभी धर्म के ऐसे गूढ़-तत्व सुनने में आते हैं कि दंग रह जाना पड़ता है। मूर, बायरन और गेटे जन्म भर धर्म पर अपनी अनास्था ही दिखलाते रहे, पर उन्होंने धर्म के कई ऐसे जटिल तत्वों की, जिन्हें बहुत से धर्म-गुरुओं ने भी नहीं समझा, ऐसी सुंदर व्याख्या की कि देखते ही बनती है।
धर्म से सेंटक्लेयर को कभी द्वेष न था। पर वह जानता था कि धर्म-पालन खांडे की धार पर चलने के समान है। दुर्बल मन के मनुष्यों के लिए वह सर्वथा असाध्य है। धर्म को ग्रहण करके उसका पालन न करने की अपेक्षा तो यही अच्छा है कि धर्म के पचड़े में ही न पड़ा जाए। यही सोचकर वह सदा इन धर्म-चर्चाओं से अलग रहता था। पर अब उस धर्म के अनुसरण के सिवा उसके जीवन का और लक्ष्य ही क्या रह गया? अब वह इवा की छोटी बाइबिल को बड़े प्रेम से पढ़ने लगा। और दास-दासियों के विषय में अपने कर्तव्य की बात भी सोचने लगा। उसने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया कि इवा का कहना बिल्कुल सच था कि इन दास-दासियों को गुलामी की जंजीर से मुक्त कर देना ही ठीक है। अपने नगरवाले मकान में आते ही उसने सबसे पहले टॉम को दासत्व से मुक्त करने का पक्का निश्चय किया। इसके लिए उसने अपने वकील से मुक्तिपत्र का मसविदा बनाने को कहा। टॉम आजकल हर समय उसी के साथ लगा रहता था। टॉम इवा को बड़ा प्यारा था, इसलिए उसे देखकर जितनी जल्दी सेंटक्लेयर को इवा का स्मरण होता था, उतना और किसी को देखने से नहीं। इसी से टॉम को इवा के स्मृति-चिह्न की भाँति सेंटक्लेयर हर घड़ी अपने साथ रखता था।
एक दिन सेंटक्लेयर ने कहा – “टॉम, मैं तुम्हें दासता की बेड़ी से मुक्त कर दूँगा। तुम केंटाकी के लिए तैयार रहना। अपना सामान ठीककर रखना।”
यह बात सुनते ही टॉम का चेहरा प्रफुल्लित हो गया। वह हाथ उठाकर बोला – “भगवान आपका भला करें!”
पर टॉम की इस प्रसन्नता के भाव से सेंटक्लेयर मन-ही-मन दु:खी हुआ। उसने यह नहीं सोचा था कि टॉम उसे छोड़कर जाने के लिए इतनी खुशी दिखाएगा।
उसने शुष्क स्वर में कहा – “टॉम, तुम्हें तो हमारे यहाँ कभी कोई तकलीफ नहीं हुई, फिर हमारा घर छोड़कर जाने की बात पर इतने खुश क्यों हुए?”
टॉम ने गंभीर होकर कहा – “प्रभु, यह आप का घर छोड़कर जाने की प्रसन्नता नहीं है। यह प्रसन्नता इस बात की है कि मैं स्वाधीन हो जाऊँगा।”
सेंटक्लेयर बोला – “स्वाधीन हो जाने की अपेक्षा क्या इस समय तुम यहाँ अधिक सुखी नहीं हो?”
टॉम ने कहा – “कभी नहीं!”
“टॉम,” सेंटक्लेयर बोला – “जैसा अच्छा तुम यहाँ खाते-पीते हो और जिस आराम से रहते हो, उतने आराम से रहने के लिए तुम स्वाधीन होकर कमाई नहीं कर सकोगे।”
टॉम ने कहा – “स्वामी, किंतु स्वाधीनता स्वाधीनता ही है।… स्वाधीनता में मोटा-महीन, बुरा-भला जो कुछ मिले, सब अच्छा है। पराधीनता की मेवा-मिठाई भी किस काम की! इसी से कहा है, ‘पराधीन सपनेहु सुख नाही।’ यह मनुष्य का स्वाभाविक भाव है।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैं मानता हूँ, यही बात होगी; पर तुम्हें अभी यहाँ एक महीना और ठहरना होगा।”
“स्वामी, मैं आपको कष्ट में छोड़कर नहीं जाऊँगा। आप जब तक रखना चाहें, यह दास आपकी सेवा में रहेगा। यदि मेरा यह शरीर आपके किसी काम आ जाए, तो इससे अधिक सौभाग्य की बात मेरे लिए और क्या होगी?”
सेंटक्लेयर ने उदासीनता से बाहर की ओर नजर डालते हुए कहा – “टॉम, तुम मेरे इस कष्ट के दूर होने पर जाना। मेरा यह कष्ट कब मिटेगा?”
“जब ईश्वर में आपकी भक्ति होगी और धर्म में मन लगेगा।”
“तब तक तुम यहाँ ठहरना चाहते हो? नहीं-नहीं, मैं तब तक तुम्हें यहाँ नहीं रोकूँगा। तुम्हें शीघ्र ही छुट्टी दे दूँगा। तुम अपने घर पहुँचकर बाल-बच्चों से मिलना और उन्हें मेरा आशीर्वाद कहना।”
टॉम ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा – “स्वामी, मेरा अटल विश्वास है कि वह दिन शीघ्र ही आएगा और आप के हाथ से ईश्वर अपना कोई काम कराएगा।”
सेंटक्लेयर ने गद्गद होकर कहा – “मुझसे, ईश्वर का काम! अच्छा टॉम, बताओ, तुम्हारी समझ में वह कौन-सा काम है?”
“स्वामी, मैं तो निपट मूर्ख हूँ, किंतु परमेश्वर ने मुझे भी अपना काम करने को सौंपा है। फिर आप तो बहुत होशियार हैं, ऐश्वर्यवान हैं, बंधु-बांधवोंवाले हैं – चाहें तो ईश्वर के कितने ही प्रिय कार्य कर सकते हैं।” टॉम ने बड़ी भावना से कहा।
सेंटक्लेयर मुस्कराते हुए बोला – “टॉम, तुम्हारी समझ में क्या ईश्वर को अपने कुछ काम मनुष्य से कराने की जरूरत पड़ा करती है?”
“जरूर। हम जब किसी मनुष्य के लिए कुछ करते हैं तब वह ईश्वर के लिए ही करते हैं, क्योंकि सभी मनुष्य उसी प्रभु की संतान हैं।”
सेंटक्लेयर यह सुनकर अभिभूत हो उठा। बोला – “टॉम, तुम्हारा यह धर्म-शास्त्र हमारे यहाँ के पादरियों के मत से कहीं अच्छा जान पड़ता है।”
तभी कुछ लोग सेंटक्लेयर से मिलने आ गए। इससे उसकी और टॉम की बातें यहीं रुक गईं।
इवा के शोक में मेरी बड़ी ही अधीर हो गई थी। पर उसमें एक बहुत बड़ी बुराई थी कि जब वह किसी शोक के कारण दु:ख से स्वयं अधीर होती थी, तब दास-दासियों को उससे सौगुना अधीर कर देती थी। इवा जीते-जी इस अत्याचार से दास-दासियों की रक्षा करने की चेष्टा किया करती थी; पर अब इन बेचारे निस्सहायों की रक्षा कौन करेगा? इसी से इवा के लिए दास-दासी बहुत दु:खित होते थे, विशेषकर मामी अपने बाल-बच्चों से अलग पड़े रहने के दु:ख को इवा के कारण भूली हुई थी। अब इवा की मृत्यु के बाद वह दिन-रात चुपचाप रोया करती थी। इस दशा में उससे कभी-कभी मेरी की टहल में कुछ चूक हो जाती तो उसके लिए मेरी उसे सदा डाँटा करती थी।
मिस अफिलिया को इवा की मृत्यु बहुत दु:ख दे रही थी; पर वह चुपचाप गंभीर-भाव से उस दु:ख को सहन कर रही थी। वह पहले की भाँति सदा काम में लगी रहती थी। वह पहले की अपेक्षा अब अधिक यत्न से टप्सी को पढ़ाने-लिखाने लगी। वह अब टप्सी को अपनी कन्या की भाँति प्यार करती है, हब्शी जानकर उससे घृणा नहीं करती। टप्सी का चरित्र भी धीरे-धीरे सुधरने लगा। यह नहीं कि वह एक ही दिन में भली बन गई हो। हाँ, इवा के आचरण से उसका मन बहुत-कुछ पलट गया था। पहले उसकी मानसिक जड़ता इस प्रकार की थी कि उस पर कोई उपदेश असर ही नहीं करता था, पर अब यह भाव दूर हो गया।
एक दिन, जब वह तेजी से अपने कपड़ों में कोई चीज छिपाए चली आ रही थी, रोजा ने तत्काल उसे पकड़कर कहा – “बोल इसमें क्या है? लगता है, तूने कोई चीज चुराई है! कपड़ों में जल्दी-जल्दी क्या छिपा रही थी?”
टप्सी अपनी छिपाई हुई चीज को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़े हुए थी। हाथ छुड़ाने के लिए रोजा जोर से उसे खींचने लगी, पर टप्सी ने हाथ नहीं छोड़ा। वह जमीन पर लोटकर चिल्लाने लगी और साथ ही रोजा को एक लात जमा दी। टप्सी की चीख सुनकर अफिलिया और सेंटक्लेयर दोनों नीचे आए तो रोजा ने बताया कि इसने कुछ चुराया है। टप्सी ने सिसकते हुए कहा – “मैंने कुछ भी नहीं चुराया।”
मिस अफिलिया ने दृढ़ता से कहा – “तेरे हाथों में जो कुछ है, मुझे दे दे।”
पहले तो टप्सी ने देने में आनाकानी की, पर दुबारा माँगने पर उसने अपने कपड़ों में से एक फटे हुए मोजों की पोटली निकालकर उसके हाथ में पकड़ा दी। उसमें इवा की दी हुई एक छोटी-सी पुस्तक और इवा के बालों की एक लट निकली। ये चीजें देखकर सेंटक्लेयर की आँखें भर आई।
टप्सी रो-रोकर कहने लगी – “मेरी ये चीजें मुझसे मत छीनिए!”
सेंटक्लेयर की आँखों से आँसू बहने लगे। वह टप्सी को सांत्वना देकर बोला – “तेरी ये चीजें कोई नहीं लेगा।” इतना कहकर और वे चीजें उसे लौटाकर अफिलिया सहित वह तेजी से चला गया।
उसने अफिलिया से कहा – “बहन, मुझे जान पड़ता है कि अब तुम टप्सी का चरित्र सुधारने में सफल होवोगी। जिस हृदय में शोक और आघात लगता है, उसे सहज ही अच्छे रास्ते पर लाया जा सकता है। तुम्हें अब इसके साथ खूब कोशिश करनी चाहिए।”
अफिलिया ने कहा – “पहले से टप्सी बहुत सुधर गई है। मुझे अब इसके विषय में पूरी आशा हो गई है, पर मैं तुमसे एक बात पूछती हूँ कि यह है किसकी? तुम्हारी या मेरी?”
“क्यों? मैं तो इसे तुम्हें सौंप चुका हूँ!” विस्मय से सेंटक्लेयर ने कहा।
अफिलिया बोली – “नहीं, कानूनन वह मेरी नहीं है। मैं कानूनन उसे अपना बनाना चाहती हूँ।”
“बहन, तुम इसे कानूनन लेना तो चाहती हो, पर तुम्हारे यहाँ का दास-प्रथा विरोधी दल इसके लिए तुम्हारी निंदा करेगा।”
“इसमें क्या है, मैं वहाँ जाकर इसे स्वाधीन कर दूँगी। मैं इसके लिए इतना परिश्रम कर रही हूँ, यदि इसे अपने साथ न ले जा सकी तो मेरी सारी मेहनत बेकार चली जाएगी।”
“बहन, बाद को अच्छा नतीजा हासिल करने के लिए पहले एक बुरा काम करने का मैं तो अनुमोदन नहीं कर सकता।” सेंटक्लेयर ने विनोद भाव से कहा।
अफिलिया बोली – “हँसी-मजाक छोड़कर जरा सोचो! यदि उसे गुलामी से छुटकारा न दिया जा सके तो सारी धर्म-शिक्षा देना व्यर्थ है। तुम अगर इसे सचमुच मुझे देना चाहते हो तो एकदम पक्की लिखा-पढ़ी कर दो।”
सेंटक्लेयर ने कहा – “अच्छा-अच्छा, कर दूँगा।” यह कहकर उसने समाचार-पत्र पढ़ना आरंभ कर दिया।
अफिलिया बोली – “मैं चाहती हँ, यह काम अभी हो जाए।”
“तुम्हें इतनी जल्दी क्या है?”
“जो काम करना है, उसके लिए यही उचित समय है। उसमें फिर देर का क्या काम? कहा भी है – ‘काल्हि करै सो आजकर आज करै सो अब। पल में परलय होवेगी, बहुरि करेगा कब?’ यह लो कलम-दवात और लिखना है सो अभी लिख दो।”
सेंटक्लेयर का स्वभाव आलसी था। उसने कुछ आना-कानी की, पर अफिलिया के सामने उसकी एक न चली। उसने तुरंत एक दान-पत्र लिखा और मिस अफिलिया को सौंपकर कहा – “लो, कहो, अब तो कुछ करना बाकी नहीं रहा?”
पर, इस पर किसी की गवाही भी तो होनी चाहिए।
“ओफ, मुसीबत का पार नहीं।” इतना कहकर सेंटक्लेयर ने दरवाजा खोलकर पुकारा – “मेरी, बहन तुम्हें गवाह बनाना चाहती है। जरा यहाँ आकर इस कागज पर दस्तखत तो कर देना।”
मेरी ने उस कागज को पढ़कर कहा – “यह कैसी मजाक की बात है! इसकी भी लिखा-पढ़ी! लेकिन मैं समझती थी कि दीदी अपनी धर्मभीरुता के कारण दास रखने जैसा बुरा काम नहीं करेंगी। पर खैर, अगर इसके लिए इनकी इच्छा है तो हम लोग बड़ी प्रसन्नता से इनके मन की बात पूरी करेंगे।”
इतना कहकर मेरी ने कागज पर हस्ताक्षर कर दिए और चली गई।
सेंटक्लेयर ने वह कागज अफिलिया को सौंपते हुए कहा – “आज से टप्सी के शरीर और आत्मा पर तुम्हारी मिलकियत हुई।”
अफिलिया बोली – “वह तो जैसी तब थी वैसी ही अब भी है। ईश्वर के सिवा और किसी की क्षमता नहीं कि उसे मुझे दे सके, पर अब मैंने उसकी रक्षा करने का अधिकार हासिल कर लिया है।”
“खैर, अब वह बनावटी कानून के अनुसार तुम्हारी चीज हुई।” यह कहकर सेंटक्लेयर अपने कमरे में चला गया। मिस अफिलिया उस कागज को यत्न से अपने संदूक में बंद करके सेंटक्लेयर के कमरे में चली गई। उसे मेरी के साथ देर तक बैठकर बातचीत करना अच्छा नहीं लगता था।
वहाँ जाकर मिस अफिलिया बुनने का सामान लेकर बैठ गई। उसने सहसा सेंटक्लेयर से कहा – “अगस्टिन, तुम्हारे बाद तुम्हारे गुलामों की क्या स्थिति होगी, इसका भी तुमने कोई बंदोबस्त किया है?”
“नहीं।”
“तब तुम्हारा उन्हें इस समय यह सब आराम देना व्यर्थ है, उल्टा यह उनके साथ बदसलूकी करना है।”
सेंटक्लेयर प्राय: इस विषय को स्वयं सोचा करता था; पर अभी तक उसने कोई बंदोबस्त नहीं किया था। उसने कहा – “मैं, इन लोगों के लिए कोई प्रबंध करूँगा।”
“कब?”
“इसी बीच में किसी दिन।”
“मान लो, यदि पहले ही तुम चल बसो तो?”
सेंटक्लेयर ने अपने हाथ का अखबार रखकर उसकी ओर देखते हुए कहा – “बहन, आखिर ऐसा क्या हुआ है? मेरे शरीर में क्या तुम्हें हैजे या प्लेग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जो तुम मेरे बिल्कुल अंतिम समय का बंदोबस्त किए जा रही हो?”
सेंटक्लेयर उठा और अखबार को किनारे रखकर धीरे-धीरे बरामदे की ओर चला गया। उसे ऐसी बातें अच्छी नहीं लगती थीं। इसी से वह उठ गया था। लेकिन आप-ही-आप यंत्र की भाँति उसके मुँह से ‘मृत्यु’ शब्द निकलने लगा। वह सोचने लगा कि जगत में कोई ऐसा आदमी नहीं, जिसकी मृत्यु न होगी। यह एक साधारण बात है फिर भी हम मृत्यु को भूले हुए हैं, यह बड़े आश्चर्य का विषय है। आज मनुष्य बड़ी-बड़ी आशाओं के पुल बाँध रहा है, घमंड से पागल हुआ जा रहा है। कल ही उसे मौत ने आ दबोचा, तो सदा के लिए छुट्टी। सारे विचार यों ही रखे रह जाएँगे।…
यह सब सोचते हुए जाते-जाते उसने बरामदे के दूसरी ओर टॉम को देखा। अपने सामने बाइबिल रखे हुए टॉम बड़े ध्यान से उसका एक-एक शब्द पढ़ रहा था। सेंटक्लेयर ने अलमस्त की तरह टॉम के पास बैठकर कहा – “टॉम, कहो तो मैं तुम्हें बाइबिल पढ़कर सुनाऊँ?”
टॉम ने कहा – “यदि प्रभु कृपा करके पढ़ें तो बहुत अच्छी बात है। आपके पढ़ने से बहुत साफ-साफ समझ में आएगी।”
सेंटक्लेयर ने पुस्तक उठा ली और उस स्थल को पढ़ने लगा, जहाँ टॉम ने बड़े-बड़े निशान लगा रखे थे। विषय था: “सारे देवदूतों से घिरे हुए ईश्वर-पुत्र जब सिंहासन पर बैठकर विचार करने लगेंगे, उस समय सब जातियाँ उनके सामने इकट्ठी होंगी। तब वह पुण्यात्माओं में से पापियों को छाँटेंगे। फिर उन पापियों को समुचित दंड लेकर कहेंगे, ‘मुझसे दूर हो जाओ। मुझे प्यास लगने पर तुमने पानी नहीं दिया, भूखे होने पर अन्न नहीं दिया, नंगे होने पर वस्त्र नहीं दिया और जेल में पड़े रहने पर मेरी सुध नहीं ली।’ यह सुनकर पापी लोग कहेंगे, ‘भगवान, हमने कब आपको भूखे, प्यासे, नंगे और जेल में पड़े देखकर आपकी सुध नहीं ली?’ यह सुनकर वह कहेंगे, ‘हमारे इन अत्यंत दीन-हीन भाइयों पर तुम लोगों ने जो अत्याचार किए हैं, सख्तियाँ की हैं, वे सब मुझपर ही हुई हैं।”
बाइबिल से ये बातें पढ़ते हुए सेंटक्लेयर का मन द्रवित हो उठा। उसने इन पंक्तियों को मन-ही-मन पढ़ा और एकाग्रता से सोचने लगा। फिर बोला – “टॉम, मेरे ही जैसे आनंद और सुख के जीवन बितानेवाले लोग, जो स्वयं मौज में हैं, मस्त हैं और भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर मरनेवाले अपने दीन बंधुओं की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते, वही तो ईश्वर के विचार से दंड पाएँगे?”
टॉम ने इसका उत्तर नहीं दिया।
सेंटक्लेयर चिंता में डूबा हुआ बरामदे में इधर-उधर टहलने लगा। वह विचारों में इतना खो गया कि उसे चाय की घंटी की आवाज भी सुनाई नहीं दी। टॉम ने दो बार घंटी की याद दिलाई, तब जाकर वह चाय पीने गया। चाय पीने के समय भी वह चिंता-मग्न था। चाय के बाद वह, उसकी स्त्री और मिस अफिलिया चुपचाप बैठक में आए।
आते ही मेरी पलंग पर लेट गई और देखते-देखते सो गई। अफिलिया बुनने में लग गई। सेंटक्लेयर पियानो के पास जाकर धीरे-धीरे एक करुण धुन बजाने लगा। वह उस समय भी चिंता-शून्य न था। उसे देखकर जान पड़ता था, मानो वह बाजे के अंदर बैठकर स्वयं बोल रहा है। कुछ देर बाद उसने दराज से एक पुरानी पुस्तक निकाली और उसके पन्ने उलटते-उलटते मिस अफिलिया से बोला – “इधर आओ, यह मेरी माँ की पुस्तक है। यह देखो, मेरी माताजी के हस्ताक्षर हैं।”
अफिलिया उठकर उसके निकट आई।
सेंटक्लेयर ने कहा – “माँ यह गीत प्राय: गाया करती थी। ऐसा जान पड़ता है, मानो इस समय मैं माँ का गीत सुन रहा हूँ।” इतना कहकर सेंटक्लेयर ने एक पुराना, बड़ा गंभीर, लैटिन गीत गाया।
टॉम बरामदे में बैठा था। गाना सुनकर वह दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया। गाने का अर्थ कुछ भी उसकी समझ में नहीं आया, पर गाने और बजाने की धुन पर उसका हृदय रीझ उठा, विशेषत: उस समय जब सेंटक्लेयर उस गीत का करुण अंश गाने लगा। फिर तो वह एकदम मोहित हो गया।
गीत समाप्त होने पर सेंटक्लेयर सिर पर हाथ रखकर स्थिर चित्त से कुछ सोचने लगा। कुछ देर बाद उठकर घर में टहलने लगा। फिर मिस अफिलिया के पास आकर बोला – “बहन, परलोक-संबंधी विश्वास मनुष्य के हृदय में कैसी अनोखी शांति ला देता है। केवल शांति ही नहीं, यह विश्वास मनुष्य को संसार के अत्याचार, अन्याय और सब प्रकार के कष्ट सहने में समर्थ बनाता है। इस विश्वास के बल पर आशा लगी रहती है कि कभी तो एक दिन आएगा जब सारे दु:खों का अंत होगा।”
अफिलिया ने कहा – “पर, हम लोगों-जैसे पापियों के लिए यह भयंकर वस्तु है।”
सेंटक्लेयर बोला – “हाँ, मेरे लिए तो सचमुच ही भयंकर है। मैं आज टॉम को बाइबिल से परलोक के विचार के संबंध में पढ़कर सुना रहा था। पढ़ते-पढ़ते मेरा कलेजा थर्रा उठा। मेरा खयाल था कि बुरा काम करना ही पाप है, और बहुत बुरे कामों के फल से ही लोग स्वर्ग से वंचित रहते हैं, पर बाइबिल का यह मत नहीं है। वास्तव में अच्छे काम न करना ही घोर पाप है, इसी पाप के लिए परलोक में दंड भोगना पड़ता है।”
अफिलिया ने कहा – “मैं समझती हूँ कि जो अच्छा काम नहीं करता, उसे बुरा काम करना ही पड़ेगा। सत् और असत्-दो ही मार्ग ठहरे, तीसरा कोई मार्ग ही नहीं है। इच्छा हो, सन्मार्ग से जाओ, नहीं तो असन्मार्ग से जाना ही पड़ेगा।”
सेंटक्लेयर व्याकुल-चित्त से आप-ही-आप कहने लगा – “तो-तो जिस आदमी ने समाज के अभावों को जानने और जोरों से उनका बखान करते हुए भी अपने मन और अपनी उच्च शिक्षा को समाज की भलाई में नहीं लगाया, जिसने बिल्कुल उदासीन दर्शक की भाँति सैकड़ों मनुष्यों की यंत्रणा और दुर्दशा देखकर भी कार्य-क्षेत्र में पैर नहीं रखा, और जो स्वप्न-सागर में बह रहा है, उसके संबंध में क्या कहा जाएगा?”
अफिलिया ने कहा – “मैं तो कहती हूँ कि उसे अपनी पिछली बातों को भूलकर इसी क्षण कर्म में लग जाना चाहिए।”
सेंटक्लेयर ने मुस्कराकर फिर कहा – “बहन, तुम ठीक-ठिकाने पर असल काम की बात को कहती हो। तुम मुझे सोचने-विचारने का जरा भी समय नहीं देना चाहती। तुम मेरी भावी चिंता के प्रवाह को घुमा-फिराकर वर्तमान की ओर ले आती हो, तुम्हारी आँखों के सामने एक विराट वर्तमान पड़ा हुआ है।”
अफिलिया बोली – “मेरा तो यह मत है कि जो कुछ करना हो, वह अभी कर डालना चाहिए। जो घड़ी सामने है, उसके सिवा और किसी घड़ी पर मनुष्य का अधिकार नहीं है।”
सेंटक्लेयर ने धीरे से कहा – “उस प्यारी नन्हीं इवा ने, मुझे काम में लगाने के लिए, मेरी भलाई के लिए, जी जान से यत्न किया था।”
इवा की मृत्यु के संबंध में सेंटक्लेयर ने कभी अधिक चर्चा नहीं की थी; पर आज अत्यंत गहरे शोक को बलपूर्वक दबाकर ये बातें कह ही डालीं। फिर कहा – “धर्म के विषय में मेरा यह मत है कि कोई मनुष्य उस समय तक धर्मात्मा कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता, जब तक कि वह सब प्रकार के सामाजिक और राजनैतिक अत्याचारों, दु:खों और कष्टों को दूर करने के लिए अपना उत्सर्ग नहीं करता, जब तक देश में प्रचलित सारी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने का यत्न नहीं करता और संसार का दु:ख-दारिद्रय दूर करने की चेष्टा नहीं करता। मनुष्य तभी धर्मात्मा कहा जा सकता है, जब वह संसार के समस्त नर-नारियों को समान अधिकार दिलाने के संग्राम के लिए कमर कस ले और उस संग्राम में जीवन की मोह-ममता छोड़कर प्राण-विसर्जन करने को तैयार हो जाए। पर यहाँ तो जो धर्म-प्रचारक कहलाते हैं, जिन्होंने लोगों को धर्मात्मा बना देने का बीड़ा उठा रखा है, वे निर्बलों पर सबलों के अत्याचारों एवं अन्यायों की तथा सारी सामाजिक बुराइयों की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि समझदारों को उनके कार्यों पर आस्था नहीं रहती।”
मिस अफिलिया बोली – “यदि तुम यह सब जानते-बूझते हो, तो फिर तुम्हीं ये सब काम क्यों नहीं करते?”
सेंटक्लेयर ने कहा – “मैं जानता-बूझता सब हूँ, पर मेरी सहृदयता यहीं तक है कि मैं स्वयं कुछ करूँगा-धरूँगा नहीं। दूध से सफेद बिस्तर पर पड़ा रहूँगा और पादरियों की, चाहे वे सब-के-सब धर्मवीर ही क्यों न हों, चाहे वे सत्य के लिए प्राण ही देनेवाले क्यों न हों, निंदा करता रहूँगा और उनपर वाक्य-बाण बरसाता रहूँगा। दूसरों को कर्तव्य के पीछे, धर्म के पीछे, प्राण तक दे डालने चाहिए, इसे मैं खूब समझता हूँ; और जो अपना कर्तव्य-पालन नहीं करते, उनकी निंदा भी खूब करना जानता हूँ। पर कुछ भी कहो, मुझसे वह नहीं होने का।”
अफिलिया ने कहा – “अब आगे से क्या तुम्हारे जीवन का दूसरा ढंग होगा?”
सेंटक्लेयर बोला – “आगे की भगवान जाने! हाँ, पहले से अब साहस बढ़ गया है, क्योंकि अब सोने-खाने को कुछ रहा नहीं, सब कुछ हार चुका और जिसका हाथ खाली है उसे विपत्ति का क्या डर?”
“तो तुम क्या करना चाहते हो?”
“मैं अपने दास-दासियों को दासता से मुक्त करके उनकी उन्नति की चेष्टा करूँगा। फिर धीरे-धीरे ऐसा उपाय सोचूँगा जिसमें देश भर से यह बुरी प्रथा उठ जाए।”
“क्या तुम सोचते हो कि पूरा देश अपनी इच्छा से इस प्रथा को छोड़ देगा?”
“यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन हाँ, आजकल स्वेच्छा से त्याग और नि:स्वार्थ प्रेम के दृष्टांत बहुत जगह देखे जाते हैं। उस दिन यूरोप में हंगरी के जमींदारों ने लाखों की हानि सहकर प्रजा का कर माफ कर दिया। उनकी प्रजा बिल्कुल पराधीन थी। उसे स्वाधीनता दे दी गई। क्या हमारे देश में ऐसे दो-चार सहृदय मनुष्य नहीं मिलेंगे, जो जातीय गौरव और न्याय के लिए अर्थ की हानि को सहर्ष सहन कर लें?”
मिस अफिलिया ने गंभीर होकर कहा – “मुझे विश्वास नहीं होता। अंग्रेज जाति बड़ी अर्थ-पिशाच होती है, बल्कि फ्रेंच इनसे अधिक सहृदय होते हैं।”
सेंटक्लेयर बोला – “न मालूम क्यों, मुझे बार-बार अपनी माता की याद आ रही है। ऐसा लग रहा है, मानो वह मेरे बहुत पास है।”
यह कहकर वह कुछ देर घर में टहला, फिर हाथ में टोपी लेकर यह कहता बाहर निकल गया – “जरा बाहर घूम आऊँ और आज की खबरें भी सुनता आऊँ।”
टॉम तुरंत उसके पीछे-पीछे हो लिया। सेंटक्लेयर ने उसे देखकर कहा – “तुम्हारे साथ जाने की जरूरत नहीं है। मैं जल्दी ही लौटूँगा।”
टॉम बरामदे में आकर बैठ गया। उस समय रात के नौ बजे थे। चांद की शीतल चांदनी धरती पर चारों ओर छिटकी हुई थी। टॉम वहीं बैठा-बैठा सोचने लगा – अब उसकी गुलामी की बेड़ी टूटने में ज्यादा देर नहीं है। वह दस-पाँच दिनों में ही घर चला जाएगा। सोचते-सोचते उसे अपने स्त्री-पुत्रों की याद हो आई, मन में नई-नई आशाएँ उठने लगीं। सोचने लगा कि अपने शरीर की मेहनत से धन कमाकर वह अपने पत्नी और बच्चों को भी गुलामी से छुड़ा लेगा। इस विचार के आते ही उसके हृदय में आनंद की लहरें उठने लगीं। फिर अपने मालिक सेंटक्लेयर की सहृदयता का स्मरण करके उसका हृदय कृतज्ञता से भर गया। इसके कुछ देर बाद उसे इवा की याद आई। जान पड़ा, मानो स्वर्ग की देव-बालाओं से घिरी हुई इवा उसके सामने खड़ी है। यों ही सोचते-विचारते टॉम को नींद ने आ घेरा। स्वप्न में उसे दिखाई पड़ने लगा कि नाना प्रकार की पुष्प-मालाएँ धारण किए इवा उसके पास आ रही है। उसका मुख-कमल चमक रहा है, उसकी दोनों आँखों से अमृत की वर्षा हो रही है, पर ज्योंहि उसने उसके मुख की ओर देखा, वह स्वर्ग की ओर उड़ी, उसके कपोलों पर लालिमा छा गई। उसकी आँखों से दैवी ज्योति निकलने लगी और पल भर में वह अंतध्यान हो गई।
तभी उसकी आँख खुल गई। जागते ही उसने घर के द्वार पर बहुत से लोगों का शोरगुल सुना। उसने सपाटे से जाकर दरवाजा खोला। देखा, कुछ लोग कपड़ों से ढकी हुई एक लाश लिए खड़े हैं। मृत व्यक्ति के मुख की ओर दृष्टि जाते ही टॉम निराशा और दु:ख के मारे चीख उठा। जो लोग उस व्यक्ति को कंधे पर लादकर लाए थे, उन्होंने घर में जाकर, जहाँ अफिलिया बैठी थी, वहाँ से उतारकर लिटा दिया।
संध्या के समाचार-पत्र पढ़ने के लिए सेंटक्लेयर किसी चाय-खाने में गया था। वहाँ बैठकर जब वह पत्र पढ़ रहा था तो उसने देखा कि दो भलेमानस शराब के नशे में मतवाले हुए आपस में मार-पीट कर रहे हैं। सेंटक्लेयर तथा और दो-एक अन्य व्यक्ति उन्हें छुड़ाने की चेष्टा करने लगे। इनमें से एक के हाथ में तेज छुरा था। वह छुरा एकाएक सेंटक्लेयर की बगल में घुस गया। वह तत्काल मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। कुछ लोगों ने उसे कंधे पर उठाकर उसके घर पहुँचा दिया।
सेंटक्लेयर की यह दशा देखकर घर के सारे दास-दासी रोने-चीखने लगे। सबकी बुद्धि चकरा गई। कोई जमीन पर लोट-लोटकर रोने लगा। कोई पागल की तरह चीखता हुआ इधर-से-उधर दौड़ने लगा। केवल मिस अफिलिया और टॉम मन को साधकर सेंटक्लेयर को होश में लाने के लिए भाँति-भाँति के उपाय करने लगे। अफिलिया के कहने से टॉम ने तत्काल बिस्तर बिछा दिया और सेंटक्लेयर को उस पर लिटाकर दवा दे दी। कुछ देर के बाद सेंटक्लेयर को चेत हुआ। वह आँखें मलकर एक-एक करके सबको देखने लगा। अंत में कमरे में टँगी अपनी माता की तस्वीर पर जाकर उसकी दृष्टि अटक गई। वह एकटक उसी की ओर देखने लगा।
शीघ्र ही डॉक्टर आया और घावों की जाँच करने लगा। डाक्टर के चिंतित चेहरे को देखकर लोगों ने समझ लिया कि उसके जीने की कोई आशा नहीं है। डाक्टर घावों पर पट्टी बाँधने लगा। टॉम और मिस अफिलिया दोनों बड़े धीरज से सेंटक्लेयर की सहायता करने लगे। सब दास-दासी वहीं बैठे-बैठे रोते रहे। डाक्टर ने कहा कि बीमार के पास शोरगुल नहीं होना चाहिए। इन दास-दासियों को कमरे से बाहर करके इसको एकांत में रखना चाहिए।
इसी समय सेंटक्लेयर ने फिर आँखें खोलीं। जिन दास-दासियों को डाक्टर और अफिलिया ने बाहर चले जाने को कहा था, उनके चेहरों की ओर देखते हुए ठंडी साँस लेकर उसने कहा – “अभागे गुलामों!”
ये शब्द मुँह से निकलते समय ऐसा जान पड़ता था, मानो उसके हृदय में आत्मग्लानि की आग धधक रही है। एडाल्फ नाम का दास वहाँ से किसी तरह जाने को राजी न हुआ, वहीं धरती पर लोट गया। दूसरे दास-दासियों को जब मिस अफिलिया ने बहुत समझाया, तब वे अनिच्छापूर्वक वहाँ से हटे।
सेंटक्लेयर की बोली एकदम रुक गई। वह आँखें बंद किए पड़ा रहा। उसके चेहरे से मालूम हो रहा था, मानो दु:सह अनुताप की आग में उसका हृदय जल रहा है। टॉम उसकी बगल में घुटने टेककर बैठा हुआ था। सेंटक्लेयर ने कुछ देर बाद टॉम के हाथ पर हाथ रखकर कहा – “टॉम! दु:खी टॉम!”
टॉम ने बड़ी व्याकुलता से कहा – “स्वामी, क्या चाहते हैं?”
सेंटक्लेयर ने उसका हाथ दबाते हुए कहा – “मेरे जाने का समय आ गया है। प्रार्थना करो।”
यह सुनकर डाक्टर ने कहा – “किसी पादरी को क्यों न बुला लिया जाए?”
सेंटक्लेयर ने सिर हिलाकर असहमति प्रकट की और टॉम से फिर कहा – “टॉम, प्रार्थना करो।”
परलोकगामी आत्मा के कल्याण के लिए टॉम भारी हृदय से बड़ी व्याकुलतापूर्वक प्रार्थना करने लगा। टॉम की प्रार्थना समाप्त होने पर भी सेंटक्लेयर उसका हाथ पकड़े हुए उसकी ओर देखता रहा, पर कुछ बोल न सका। धीरे-धीरे उसकी आँखें मुँदने लगीं, लेकिन टॉम का हाथ वह थामे ही रहा। अंतिम साँस तक स्नेह के साथ वह काले हाथ को पकड़े रहा।
उसका शरीर एकदम निस्तेज हो गया, मृत्यु की मलिन छाया ने उसके मुख-मंडल को ढक लिया, किंतु इस मलिन छाया के साथ-साथ उसके मुख पर मधुर कांति छा गई। ऐसा जान पड़ा मानो स्वर्ग से किसी दयालु आत्मा ने अकस्मात् उतरकर शांति की मृदुल प्रभा से उसके मुख-मंडल को अनुरंजित कर दिया है।
अंतिम समय सेंटक्लेयर के मुँह से कोई बात नहीं निकली। बस ‘माँ’ कहते ही उसके प्राण निकल गए। लगा, जैसे अपनी माता को सामने देखकर दुधमुँहा बच्चा उसकी गोद में कूद पड़ा।
32. मेरी की क्रूरता
गुलामों के मालिक के मर जाने पर या कर्जदार हो जाने पर गुलामों पर बड़ी विपत्ति आया करती है। इस दशा में पहले मालिक के उत्तराधिकारी या उनके महाजन इन अभागे, असहाय तथा अनाथ गुलामों को प्राय: नीलाम कर डालते हैं। उस समय माता की गोद से बालक को और स्वामी के पास से स्त्री को अलग होना पड़ता है।
जिस बच्चे के माँ-बाप मर जाते हैं और उनका पालन-पोषण उसके आत्मीय जन करते हैं, उसे देशप्रचलित कानून के अनुसार, मनुष्य के अधिकारों से वंचित नहीं होना पड़ता। पर क्रीत दासों को किसी प्रकार के मानवीय स्वत्व प्राप्त नहीं है। घर की दूसरी वस्तुओं की भाँति इनका भी क्रय-विक्रय होता है।
सेंटक्लेयर की मृत्यु से उसके दास-दासी बहुत सोच में पड़ गए। सभी के मन में चिंता होने लगी कि आगे न जाने कैसे निर्दयी के हाथ में पड़ना पड़ेगा। सेंटक्लेयर का-सा दयालु मालिक दास-प्रथा के चलन के इस देश में मिलना एकदम मुश्किल है। ऐसे सहृदय मालिक को खोकर दास-दासियों को कितना शोक हुआ होगा, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।
मेरी सेंटक्लेयर ने अपने को छूट दे-देकर शरीर और मन को बिल्कुल निकम्मा कर लिया था। अत: स्वामी की मृत्यु के समय धीर चित्त से उसकी परिचर्या करना तो दूर, उसके सामने खड़ी भी न हो सकी। भय के कारण वह बार-बार बेहोश होने लगी। जिसके साथ मेरी पवित्र बंधन में बँधी थी, वह पत्नी से कुछ कहे बिना ही सदा के लिए बिदा हो गया।
मिस अफिलिया ने अंतिम समय तक तन-मन से सेंटक्लेयर की सेवा-शुश्रूषा की। अफिलिया के सिवा इन बेचारे गुलामों पर और कोई करुणा की दृष्टि डालनेवाला न था। इसी से सब-के-सब अब व्याकुल-चित्त से मिस अफिलिया की ओर देखते थे।
जिस समय सेंटक्लेयर की लाश कब्र में दफनाई जाने लगी, उस समय उसकी छाती पर एक स्त्री का छोटा-सा चित्र और उसी के पीछे एक गुच्छा बालों का लगा हुआ मिला। गाड़ने के समय वह सैकड़ों आशाओं का, स्वप्नमय तरुण जीवन का, स्मृति-चिह्न उसके निष्प्राण वक्षस्थल पर ही रख दिया गया।
टॉम का मन परलोक की चिंता में डूब गया। एक बार भी उसके मन में यह बात न आई कि सेंटक्लेयर की आकस्मिक मृत्यु के कारण अब उसे जन्म भर के लिए दासता की बेड़ियों में ही जकड़े रहना पड़ेगा। उसने मालिक की मृत्यु के समय बड़े भक्ति-भाव और विश्वास के साथ परमात्मा की प्रार्थना की। उसे इस बात का विश्वास हो गया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इससे उसे अंदर-ही-अंदर बड़ी शांति प्राप्त हुई।
काले वस्त्रों के आडंबर, पादरियों की अभ्यस्त प्रार्थना और बाह्य गंभीरता के साथ सेंटक्लेयर की अंत्येष्टि-क्रिया समाप्त हुई। फिर सदा से जो होता आया है, वही प्रश्न सबके सामने आया – इसके बाद क्या करना होगा?
उदास दास-दासियों से घिरे, शोकसूचक काले वस्त्रों के नमूने देखते हुए, मेरी के मन में यही सवाल पैदा हुआ। मिस अफिलिया के मन में यह बात उठी तो उसने उत्तर में अपने पिता के घर लौट जाने की ठानी। पर उन अनाथ गुलामों के मन में यह प्रश्न उठते ही उनकी जान सूख गई। अब जिसके हाथ में उनकी लगाम आई थी, उसकी कठोरता किसी से छिपी न थी। वे खूब जानते थे कि अब तक वह सेंटक्लेयर के कारण ही उनपर अत्याचार नहीं करने पाती थी, पर अब जान बचने की कोई सूरत न रही।
सेंटक्लेयर की अंत्येष्टि-क्रिया के पंद्रह दिन बाद की बात है। एक दिन मिस अफिलिया अपने कमरे में बैठी हुई कुछ काम कर रही थी, इतने में किसी ने धीरे-से उसका दरवाजा खटखटाया। उसने दरवाजा खोल कर देखा कि बाहर वर्ण-संकर सुंदरी युवती रोजा खड़ी है। उसके बाल बिखरे हुए थे और रोते-रोते उसकी आँखें सूज गई थीं।
रोजा मिस अफिलिया के पैरों पर गिर पड़ी और उसके कपड़े का कोना पकड़कर रोते-रोते कहने लगी – “मिस फीली, मेरी तरफ से मेरी मालकिन को कुछ कहिए, मेरी जान बचाइए। वह बेंत लगवाने के लिए मुझे दंड-गृह भेज रही हैं। यह देखिए!” इतना कहकर उसने मिस अफिलिया के हाथ में एक कागज थमा दिया। इस कागज में दंड-गृह के अध्यक्ष को लिखा गया था कि रोजा को पंद्रह कोड़े लगाए जाएँ।
मिस अफिलिया ने कहा – “बात क्या थी?”
रोजा बोली – “मिस फीली, आप जानती हैं, मेरा मिजाज बड़ा खराब है। मुझे जरा सी बात में गुस्सा आ जाता है। मैं मालकिन का कपड़ा अपने बदन पर पहन कर देख रही थी। इस पर उन्होंने मेरे गाल पर एक थप्पड़ जमा दिया। इससे मुझे गुस्सा आ गया। बिना सोचे-विचारे जो भला-बुरा मेरे मुँह से निकला, मैं बक गई। इस पर मालकिन ने कहा, ‘देख, अब तेरा सिर चढ़ना कैसे उतारती हूँ। तब तू समझेगी कि मैं कौन हूँ। तेरा यह घमंड अधिक दिन तक नहीं टिकेगा’।”
कागज हाथ में लिए हुए खड़ी मिस अफिलिया सोचने लगी।
रोजा ने कहा – “मिस फीली, देखिए, मैं मार से नहीं डरती। यदि मालकिन या आप घर बिठाकर पचास बेंत लगावें तो कोई शर्म नहीं। पर मर्द के पास भेजना, और वह भी ऐसे भयंकर नीच के पास – कैसी शर्म की बात है!”
मिस अफिलिया ने पहले भी यह सुन रखा था कि गुलामी की प्रथावाले प्रदेशों में, दासों के मालिक युवती दासियों को बड़ी नीच प्रकृतिवाले पुरुषों के पास दंड देने को भेजते हैं। इन अभागिनों को इस तरह दंड मिलने में लज्जा, शील और यहाँ तक कि मनुष्यता को भी तिलांजलि दे देनी पड़ती थी। पर इस प्रकार दंड मिलने से स्त्रियों को कैसा भयंकर कष्ट होता था, यह बात कानों से सुनकर भी हृदय में बैठी नहीं थी। आज भय और दु:ख से थर-थर काँपती हुई रोजा को देखकर सब बातें हृदय में अंकित हो गईं।
घृणा से मिस अफिलिया का चेहरा लाल हो गया। किंतु उसने कागज को मजबूती से अपने हाथ में थाम रख रोजा से कहा – “बच्ची, तुम यहाँ बैठो। मैं तुम्हारी मालकिन के पास जाती हूँ।”
अफिलिया ने मेरी के पास जाकर देखा, वह कुर्सी पर बैठी हुई है, उसकी आँखें अधखुली हैं। मामी पीछे खड़ी उसके बाल झाड़ रही है और जेन जमीन पर बैठी उसके पैर दबा रही है।
मिस अफिलिया ने उससे पूछा – “कहिए, आज आपकी तबीयत कैसी है?”
सुनते ही मेरी ने ठंडी साँस लेकर आँखें बंद करते हुए कहा – “जैसी हमेशा रहती हूँ वैसी ही हूँ।” यह कहकर उसने एक बढ़िया रूमाल से आँखें पोंछीं।
मिस अफिलिया ने इस ढंग से, जैसे कोई मुश्किल बात कहता हो, सूखे गले से कहा – “मैं रोजा के बारे में तुमसे कुछ कहने आई हूँ।”
अब मेरी की आँखें खुल गईं, मुँह लाल हो गया। कर्कश स्वर में बोली – “रोजा के बारे में क्या कहना है?”
“वह अपने अपराध के लिए बहुत पछता रही है।”
“पछता रही है! पछता रही है? इसका क्या माने! अभी उसे बहुत पछताना पड़ेगा। मैं थोड़े में छोड़नेवाली नहीं हूँ। मैंने बहुत दिनों तक इस छोकरी की धृष्टता सही है। अब मैं इसे दुरुस्त करूँगी, धूल में मिला दूँगी।”
“क्या तुम उसे और किसी प्रकार की सजा नहीं दे सकती हो, जो इससे कम लज्जाजनक हो?”
“मेरा तो मतलब ही उसे शर्म दिलाने से है।… यही तो मैं चाहती हूँ। यह छोकरी जन्म से ही शेखी के मारे ऐंठकर अपनी असलियत को भूल गई है। अब मैं इसकी सारी शेखी और अकड़ निकाल दूँगी।”
“पर बहन, सोचकर देखने की बात है। किसी जवान लड़की की लज्जा नष्ट करना, उसके पतित होने के मार्ग को साफ कर देना है।”
घृणा के साथ हँसकर मेरी ने कहा – “लज्जा! मैं उसे बताऊँगी कि फटे कपड़े पहनकर राह में जो स्त्रियाँ ठोकरें खाती फिरती हैं, उनसे वह किसी तरह अच्छी नहीं है… मेरे सामने उसकी अब शेखी नहीं चलेगी।”
मिस अफिलिया ने जोर के साथ कहा – “इस निर्दयता के लिए तुम्हें ईश्वर के यहाँ जवाब देना पड़ेगा।”
“निर्दयता? मुझे बताओ, इसमें क्या निर्दयता है? मैंने तो बस पंद्रह कोड़े लगाने को लिखा है, सो भी हल्के-हल्के। मैं इसमें कुछ भी निर्दयता नहीं देखती।”
मिस अफिलिया ने कहा – “निर्दयता नहीं है? मेरा विश्वास है कि इस दंड की अपेक्षा स्त्रियाँ मृत्यु को कहीं अच्छा समझेंगी।”
मेरी बोली – “तुम्हारे जैसा दिल जिसका है, उसमें ऐसा भाव आ सकता है, पर इन दासियों को ऐसा दंड भोगने का अभ्यास है। उनकी अक्ल को ठिकाने रखने का यही एकमात्र उपाय है। एक बार माफ कर देने से तो ये सिर पर चढ़ जाते हैं। मैं अब तक इन्हें छोड़ती रही हूँ, इसी से ये बिगड़ गए। मैं अब इन्हें ठीक करूँगी। जो कसूर करेगा, उसे तुरंत दंड-गृह में कोड़े लगवाने भेज दूँगी।”
जेन, जो मेरी के पैर दबा रही थी, यह बात सुनकर एकदम चौंक उठी। उसने सोचा, यह अंतिम बात उसी को सुनाकर कही गई है। शायद रोजा के बाद उसी की बारी आए।
मिस अफिलिया को मेरी की बात पर बड़ा क्रोध आया। उसका शरीर काँपने लगा। पर उसने सोचा, उसके साथ झगड़ा करने का कोई नतीजा न होगा। वह वहाँ से उठकर अपने कमरे में चली गई। रोजा के दु:ख से वह इतनी दुखी हुई कि लौटकर रोजा से यह बात नहीं कह सकी कि मेरी ने उसकी बात नहीं मानी।
कुछ देर के बाद एक काला गुलाम मेरी की आज्ञा से रोजा को पकड़कर दंड-गृह में ले गया। रोजा रोई-चिल्लाई, पर मेरी का वज्र-हृदय न पसीजा।
एडाल्फ पर मेरी खार खाए हुई थी। परंतु सेंटक्लेयर की वजह से किसी दास-दासी पर उसका बस न चलता था, इसी से अब तक एडाल्फ को किसी प्रकार का दंड न दे सकी थी। सेंटक्लेयर की मृत्यु से एडाल्फ एकदम निराशा के सागर में डूब गया। अब वह हरदम मेरी के डर से काँपा करता था। मेरी ने सेंटक्लेयर के भाई अल्फ्रेड और अपने वकील से सलाह करके निश्चय किया कि वह सेंटक्लेयर के मकान और सब गुलामों को बेच डालेगी। बस उन गुलामों को जो उसके निजी हैं, अपने साथ लेकर पिता के घर जा कर रहेगी। एडाल्फ ने यह बात सुन ली। इसलिए एक दिन टॉम से जाकर कहा – “टॉम, क्या तुम्हें मालूम है कि मालकिन हम लोगों को बेच डालेंगी?”
टॉम ने पूछा – “तुमने किससे सुना?”
एडाल्फ बोला – “मेरी जब वकील से बातें कर रही थी, तब मैंने पर्दे की ओट से सब बातें सुनी थीं। टॉम, अब कुछ ही दिनों में हम लोग नीलामघर भेज दिए जाएँगे।”
टॉम ने ठंडी साँस लेकर कहा – “जो ईश्वर की मर्जी होगी।”
एडाल्फ बोला – “अब ऐसा दयालु मालिक नहीं मिलेगा। लेकिन इस मालकिन के पास रहने से तो दूसरे के हाथ बिकना ही अच्छा है।”
टॉम घूमकर खड़ा हो गया। उसका हृदय विषाद से भरा हुआ था। कहाँ तो वह स्वाधीन होने की खुशियाँ मना रहा था, और शीघ्र ही अपने बाल-बच्चों से मिलने की आशा में फूले न समाता था और कहाँ यह एकाएक विपत्ति का पहाड़ उस पर टूट पड़ा! नाव किनारे लगते-लगते डूब गई! आजाद होने की जो आशाएँ उसने सँजो रखी थीं, वे धूल में मिल गईं। टॉम स्वाधीनता को बड़ा मूल्यवान समझता था, फिर भी ईश्वर के भरोसे उसने धीरज न छोड़ा। उसने ऊपर को सिर उठाया और हाथ जोड़कर कहने लगा – “प्रभो, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो!” पर यह वाक्य कहते समय उसका हृदय विदीर्ण होने लगा।
कुछ देर बाद वह मिस अफिलिया के कमरे में गया। इवा की मृत्यु के उपरांत मिस अफिलिया टॉम पर विशेष स्नेह रखती थी।
टॉम ने कहा – “मिस फीली! मालिक सेंटक्लेयर ने मुझे गुलामी से मुक्त कर देने का वचन दिया था। वकील से इस मामले में उन्होंने मसविदा बनाने को भी कह दिया था। अब आप मालकिन से कहें तो वह मालिक के वचनों को पूरा कर सकती हैं।”
मिस अफिलिया बोली – “टॉम, मैं तुम्हारे लिए कहूँगी, भरसक प्रयत्न करूँगी, पर मुझे आशा नहीं कि मेरी कुछ करेंगी। कोशिश बेकार ही होगी।”
टॉम को विदा करके मिस अफिलिया सोचने लगी कि शायद रोजा के लिए अनुरोध करते समय मेरे मुँह से कुछ कठोर बातें निकल गई थीं। इसी से उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। आज मैं उसे मीठी-मीठी बातों से राजी करूँगी। शायद इस तरह वह टॉम को छोड़ने पर राजी हो जाए। यह सोचकर वह मेरी के कमरे में गई।
मेरी खाट पर लेटी हुई थी और जेन उसे तरह-तरह के काले कपड़ों के नमूने दिखा रही थी। मेरी ने उन नमूनों में से एक चुनकर कहा – “यह ठीक है, लेकिन मैं कह नहीं सकती कि यह पूरी तरह शोकसूचक होगा या नहीं।”
जेन ने कहा – “आप क्या कहती हैं? अभी उस दिन जनरल डरबन के मरने पर उनकी मेम ने यही कपड़ा पहना था। पहनने पर साहब यह बहुत जोरदार लगता है। इससे दर्शकों का मन खिंच उठता है।”
मेरी ने मिस अफिलिया से कहा – “आपकी समझ में यह कपड़ा कैसा है?”
मिस अफिलिया बोली – “यह अपने-अपने यहाँ की रीति पर निर्भर है। मेरी अपेक्षा तुम इस बात को अच्छी तरह जानती हो।”
मेरी ने कहा – “असल में मेरे लायक एक भी पोशाक नहीं है, पर अगले ही हफ्ते मैं जानेवाली हूँ। इससे कोई एक पसंद कर लेना है।”
मिस अफिलिया ने कहा – “तुम इतनी जल्दी जाओगी?”
मेरी बोली – “हाँ, अल्फ्रेड और वकील की राय है कि घर का माल-असबाब तथा दास-दासी सबको नीलाम कर डालना ही ठीक है।”
मिस अफिलिया ने गंभीर स्वर में कहा – “मैं तुमसे एक बात कहनेवाली थी। अगस्टिन ने टॉम को आजाद कर देने का वचन दिया था, यहाँ तक कि उसके लिए मसविदा बनवाने की भी बातचीत हो गई थी। मैं आशा करती हूँ कि तुम वकील से जल्दी ही आजादी की सनद लिखवा लोगी।”
“नहीं, मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी। टॉम के पूरे दाम आएँगे। वह इस तरह कैसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। फिर उसे आजादी की ऐसी जरूरत ही क्या है? आजाद होने पर वह मौजूदा हालत से अच्छा तो रह न सकेगा।”
“पर आजाद होने की उसकी बड़ी इच्छा है, और उसके मालिक ने उसे आजाद कर देने का वचन दिया था।”
“हाँ, टॉम की यह इच्छा हो सकती है। ये लोग तो जन्म भर असंतुष्ट ही बने रहते हैं। जो इन्हें नहीं मिलता, उसकी ये बराबर इच्छा किया करते हैं। मैं सदा से गुलामी को खत्म करने के खिलाफ हूँ। जब तक ये हब्शी किसी मालिक की अधीनता में रहते हैं तब तक अच्छे रहते हैं। लेकिन आजादी मिलते ही ये आलसी हो जाते हैं। शराब पीना आरंभ कर देते हैं। नीचे गिरते चले जाते हैं। मैंने सैकड़ों बार यही बात देखी है। इन्हें आजाद करने में इनका भला नहीं, उल्टे इनका बिगाड़ करना है।”
मिस अफिलिया बोली – “पर टॉम तो भलामानस, मेहनती और धार्मिक है।”
“ओह, मुझे तुम्हारे समझाने की जरूरत नहीं है। मैंने ऐसे सैकड़ों देख डाले हैं। सौ बात की एक बात यह है कि वे गुलामी में ही अच्छे रहते हैं।”
“पर खयाल करो, जब तुम इसे नीलाम करोगी तब हो सकता है कि कोई बेरहम आदमी इसे खरीद ले जाए।”
“ये सब फिजूल की बातें है। नौकर अच्छा हो तो सैकड़ों में एक भी मालिक बुरा नहीं मिलता। मालिकों की लोग नाहक झूठी शिकायत करते हैं। मैं जन्म से इसी दक्षिणी क्षेत्र में हूँ। पर अब तक ऐसा एक भी मालिक नहीं देखा, जो अपने दासों के साथ अच्छा व्यवहार न करता हो। मैं इस पर विश्वास नहीं करती कि टॉम का होनेवाला मालिक उससे बेरहमी का बर्ताव करेगा।”
अफिलिया ने कहा – “खैर, मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पति की अंतिम इच्छा टॉम को मुक्त कर देने की थी। उसने इवा की मृत्यु के समय उससे भी इस बात की प्रतिज्ञा की थी कि टॉम को बहुत शीघ्र आजाद कर दिया जाएगा। कोई कारण नहीं कि तुम अपने स्वामी और कन्या की इच्छा को इस तरह ठुकरा दो।”
मेरी ने रूमाल से अपना चेहरा ढक लिया और सिसक-सिसककर रोने लगी। बेहोशी के डर से बार-बार एमोनिया की शीशी सूँघते-सूँघते भरे हुए गले से कहने लगी – “जो आता है, मुझसे ही लड़ने चला आता है। कोई मेरे दु:ख का खयाल नहीं करता। मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम मुझे शोक की याद दिलाकर कटे पर नमक छिड़कने आओगी। तुम्हें भी मुझे ही सताने की सूझी। तुम्हें मेरा जी दुखाने में तनिक भी दया नहीं आई! पर मेरी सोचता कौन है? मेरी दशा को समझता कौन है? सबको अपने-अपने सुख की पड़ी है। मेरी एक लड़की थी, उसे भी भगवान ने उठा लिया। उसके बाद मेरे पति चल बसे। तुम्हारे मन में जरा भी मोह-माया नहीं है। इसी से तुमने भी मेरी बेटी और स्वामी की मौत की बात कहकर मेरे दु:ख की आग में घी डाल दिया।”
मेरी और जोर-जोर से रोने लगी। बेहोशी के लक्षण दिखाई देने लगे। वह मामी से कहने लगी – “अरे खिड़की खोल दे! कपूर की शीशी ला! मेरे सिर पर पानी डाल। मेरे कपड़े ढीले कर दे।”
चारों ओर बड़ा शोर मचा। इसी बीच मिस अफिलिया किसी तरह जान बचाकर अपने कमरे की ओर भागी।
मिस अफिलिया ने देखा कि मेरी से बहस करना फिजूल है। बेहोशी बुलाने की उसमें अदभुत क्षमता है। इसके बाद जब कभी दास-दासियों के संबंध में सेंटक्लेयर और इवा की इच्छा की चर्चा की जाती, वह बखेड़ा कर देती थी। मिस अफिलिया ने टॉम के छुटकारे का कोई उपाय न देखकर मिसेज शेल्वी को टॉम के दु:ख की सारी बातें साफ-साफ लिख दीं और उसे शीघ्र छुड़ा ले जाने का विशेष अनुरोध किया।
इसके दूसरे ही दिन, टॉम, एडाल्फ तथा दूसरे छ: दास नीलाम करने के लिए नीलाम-घर भेज दिए गए।
33. गुलामों की बिक्री के हृदय-विदारक दृश्य
“गुलामों के बेचने की आढ़त?” शायद यह नाम सुनकर ही लगे कि यह बड़ा विकट स्थान होगा और माल गोदामों की तरह न मालूम कितना अंधकार से भरा और मैला-कुचैला होगा। पर नहीं, यह बात नहीं है। सभ्यता की उन्नति के साथ-साथ लोग सभ्य प्रणाली और चतुराई से बुरे काम करना सीखते हैं। दासों का व्यापार करनेवाले इस बात की बड़ी फिक्र रखते थे कि मानव-संपदा, अर्थात जीवात्मा-रूपी माल के दाम बाजार में किसी प्रकार कम न आएँ। वे लोग बिकने के पहले गुलामों को अच्छा खाने और अच्छा पहनने को देते थे। उन्हें कोई रोग न होने पाए, इस ओर भी उनका पूरा ध्यान रहता था। इसी से गुलामी का धंधा करनेवाले आढ़तिए अपने स्थानों को बड़ा साफ-सुथरा रखते थे। इन आढ़तघरों के सामने सजे-सजाए खुले बरामदे होते थे। वहाँ गुलामों को एक कतार में खड़ा किया जाता था। बाहरी आदमी देखते ही समझ लेता था कि इस घर में नर-नारियों का सौदा होता है। खरीदारों को आढ़तिए बड़ी आव-भगत से बुलाकर गुलामों को दिखाते थे। पर अंदर जाकर लोग देखते थे कि स्वामी, स्त्री, पिता, माता, बालक – ये एक-दूसरे से सदा के लिए बिछुड़ जाने की बात सोच-सोचकर बिलख रहे हैं। पति के कंधे पर सिर रखकर स्त्री कह रही है – “हे ईश्वर अब जन्म भर के लिए हम लोगों का बिछोह हो जाएगा। ईश्वर करे, हम दोनों को एक ही आदमी खरीद ले।” कहीं स्त्री का कंधा पकड़कर पति कह रहा है – “मेरा यह जीवन वृथा है। मैंने क्यों यह नर-तन पाया?” बच्चे को हृदय से चिपकाकर माँ बार-बार उसका मुख चूमती है और सिर पीटकर कहती है – “हे भगवान, तूने मुझे संतान क्यों दी? मृत्यु, तू कहाँ छिप गई है?” बच्चे मजबूती से अपनी माताओं के कपड़े पकड़े हुए हैं। सोचते हैं, बस, वे कपड़े पकड़े रहेंगे तो उन्हें कोई अलग नहीं कर सकेगा। इन दृश्यों को देखकर पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता है। पर उन अर्थलोलुप नर-पिशाच अंग्रेज बनियों के हृदय की कठोरता की कोई हद नहीं है।
जो मानव-आत्मा अमृत की अधिकारी है, विश्वपति की अमृतगोद जिसके लिए खुली हुई है, धन के लोभ से आज उन्हीं आत्माओं के सौदे हो रहे हैं। यह घृणित सौदा करनेवाली वही गोरी जाति है, जो सभ्यता की लंबी-लंबी डींगें हाँकती है और दूसरी जातियों को ठग बताकर स्वयं बड़ी शहंशाह बनती है।
टॉम और एडाल्फ के सिवा सेंटक्लेयर के और भी आधे दर्जन दास-दासी स्केग नामक आढ़तिए के यहाँ पहुँचाए गए। वहाँ और भी बहुतेरे दास-दासी आए हुए थे। इन सबको हर समय खुश रखने के लिए आढ़त के मालिकों की बड़ी चेष्टा रहती थी। उदास मुख देखने से कहीं ग्राहक कम दाम न लगाएँ, इसी लिए भाँति-भाँति के उपायों से इन्हें हँसाने का यत्न किया जाता था। चारों ओर हँसी-मजाक तथा तमाशे हो रहे थे। पर क्या टॉम-जैसे आदमी को इस दशा में हँसी आ सकती थी? एक तो इवा और सेंटक्लेयर का शोक ही उसके हृदय को साल रहा था, उस पर उसकी यह दुर्दशा हो रही थी! कोई भी, जिसमें आत्मा है, इस दशा में हँस नहीं सकता था।
टॉम दूसरे दास-दासियों से कुछ दूर घर के एक कोने में, अपने संदूक का सहारा लेकर बैठ गया। वह बहुत ही उदास था, पर आढ़तवाले किसी को उदास बैठने देनेवाले न थे। वे इन्हें खुश रखने के लिए बजाने को बाजा देते और नाचने-गाने का हुक्म देते थे। इनमें जो दु:ख के कारण हँसी-खुशी मनाने में असमर्थ होते, वे ‘बदमाश’ गिने जाते थे। इन सब बदमाशों को नाना प्रकार का दंड भोगना पड़ता था। खरीदारों के सामने जो हँसते हुए खड़े न होते, उनकी जान मुसीबत में कर दी जाती थी।
स्केग की आढ़त का सहकारी कार्याध्यक्ष सांबो नामक एक हब्शी था। यह सदा सबको खुश करने की फिक्र में रहता था और जिनको उदास बैठे पाता, उनपर कोड़े फटकारता था। पूछा जा सकता है कि हब्शी होकर वह यह अपने स्वजातीयों पर इतना अत्याचार क्यों करता था? बात यह है कि संसार में जो जाति पराधीन और पराजित होती है, उस जाति के लोगों का पतन हो जाता है। वे परम स्वार्थी और नीच हो जाते हैं। स्वयं कोई पद या अधिकार पा जाने से वे भिन्न जातीय मालिक को खुश करने के लिए खुशामद के मारे अपने ही भाइयों को अकारण सताने में अपनी शान और बड़प्पन समझते हैं। इसी से यहाँ सांबो अपने ही भाइयों पर जो अत्याचार करता था, उसके लिए हम उसे अपराधी नहीं समझते।
सांबो ने जब देखा कि टॉम अलग एक कोने में उदास बैठा है, तो वह फौरन उसके पास पहुँचकर बोला – “तुम क्या कर रहे हो?”
टॉम ने शांति से कहा – “कल मेरी नीलामी होगा।”
उसको हँसाने के लिए सांबो खिलखिलाकर हँसते हुए बोला – “हमारी भी कल नीलामी होगा।”
सांबो ने समझा कि उसने एक बड़े मजाक की बात कही है और टॉम इस पर जरूर हँस पड़ेगा। इसके बाद सांबो एडाल्फ के कंधे पर हाथ रखकर बोला – “इन सब लोगों की कल नीलामी होगी।”
एडाल्फ ने छिटककर कहा – “मेहरबानी करके मुझसे अलग रहो।”
इस पर सांबो बोला – “बाप रे बाप! यह तो गोरा हब्शी है। इसे तो तमाखूवाले के यहाँ तमाखू बेचने बैठा दिया जाए, तो बड़ा अच्छा रहे।”
एडाल्फ ने गुस्से में भरकर कहा – “तुमसे कहता हूँ कि हट जाओ। क्या नहीं हटोगे?”
“हमारे गोरा हब्शी लोगों को बड़ा जल्दी गुस्सा आता है।” यह कहकर वह हाथ नचा-नचाकर एडाल्फ की नकल करने लगा और व्यंग्य से बोला – “मालूम होता है, यह किसी बड़े आदमी के यहाँ था।”
“हाँ, मैं जिसके यहाँ था, वह तेरे जैसे छप्पन गुलाम खरीद सकता था।”
“बाबा, तब तो वह कोई बहुत ही बड़ा आदमी होगा।”
एडाल्फ ने अभिमान के साथ कहा – “मैं सेंटक्लेयर के परिवार में था।”
सांबो ने मजाक में कहा – “हाँ, बड़े आदमी न होते तो उस घर की ये टूटी-फूटी चायदानियाँ यहाँ क्यों बिकने आती!”
इस मजाक से एडाल्फ को बड़ा क्रोध आया। वह सांबो पर तेजी से झपटा। दूसरे लोग यह देखकर तालियाँ बजाने लगे, इससे बड़ा शोर-गुल मचा। शोर सुनकर आढ़त का प्रधान अध्यक्ष हाथ में चाबुक लिए वहाँ पहुँचा। उसे देखकर सब अपनी-अपनी जगह पर जा हटे। सांबो ने उसे देखकर कहा – “सरकार, पहलेवाले लोगों में कोई गुल-गपाड़ा नहीं करता। हमने सबको सीधा कर दिया। ये जो नए गुलाम आए हैं, बड़ा उत्पात करते हैं।”
इस पर अध्यक्ष साहब बिना पूछताछ के टॉम और एडाल्फ को दो चार लात-घूंसे जमाकर चलता बना। जाते-जाते कह गया कि सब चुपचाप सो जाओ, शोर मत मचाना।
दासों के घर का दृश्य देखने के बाद अब दासियों की दशा जानने का कौतूहल हो सकता है। आइए, हमारे साथ इस घर में चलिए। यहाँ आपको बहुत-सी दासियाँ दिखाई देंगी। इनमें बूढ़ी भी हैं, जवान भी; अधेड़ भी हैं, लड़कियाँ भी। सभी तरह की हैं। अस्सी बरस की बुढ़िया से लेकर तीन वर्ष की लड़कियाँ तक यहाँ देखिए, यह एक दस बरस की लड़की किस तरह बिलख-बिलखकर रो रही है। कल इसकी माता नीलामकर दी गई है, आज कोई इसकी ओर आँख उठाकर भी देखनेवाला नहीं। बालिका ‘माँ-माँ’ कहकर चिल्ला रही है, पर कोई उसे पूछनेवाला नहीं।
और देखिए, यह अस्सी पार किए, कठोर मेहनत के कारण वातरोग से पीड़ित, बुढ़िया बैठी हुई चुपचाप रो रही है। तीन बार इसकी डाक बोली गई, लेकिन बेकाम समझकर किसी ने इसे नहीं खरीदा। इसके पाँच-छह लड़के-लड़कियों को लोग खरीद ले गए हैं। शोक से व्याकुल जननी उन्हीं के लिए आँसू बहा रही है।
और देखिएगा? चलिए, देखते चलिए। अभी आपने देखा ही क्या है? इधर देखिए, दो स्त्रियाँ साधारण स्त्रियों से कुछ दूर बैठी हैं। ये कपड़े-लत्ते से भलीमानस-सी जान पड़ती है। रंग भी इनका करीब-करीब अंग्रेजों-जैसा है। इनमें एक की उम्र 45 साल की होगी, इसके अंग खूब गठीले हैं। इसके पासवाली दूसरी युवती की उम्र पंद्रह बरस की होगी। इन दोनों के चेहरों से जान पड़ता है कि दूसरी पहली की बेटी है। पहली स्त्री अंग्रेज पिता और हब्शी माता से है। लड़की भी अंग्रेज से ही पैदा हुई जान पड़ती है। इनके कपड़ों के रंग-ढंग तथा हाथों की कोमलता पर ध्यान देने से पता चलता है कि इन्होंने कभी परेशानी नहीं उठाई है। कल इन दोनों की नीलामी होगा।
न्यूयार्क-निवासी क्रिश्चियन-चर्च के एक धर्मात्मा मेंबर साहब की ओर से ये नीलामी के लिए आई हैं। इनके दाम के हकदार वही धर्मात्मा मेंबर साहब होंगे। पर वह साहब जैसे धार्मिक क्रिश्चियन हैं, उससे इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि इन रुपयों में से वह कुछ तो गिर्जाघर बनाने के लिए और कुछ लार्ड बिशप साहब के खर्च के लिए अवश्य देंगे।
उन दोनों स्त्रियों में माता का नाम सूसन और कन्या का एमेलिन है। ये न्यू अर्लिंस की एक सहृदय और संभ्रांत महिला की दासियाँ थीं। उसने इन्हें बड़ी लगन से लिखाया-पढ़ाया था। पर फिजूल-खर्ची के कारण उसका इकलौता लड़का न्यूयार्क की बी.एंड-कंपनी का कर्जदार हो गया। उस कंपनी ने नालिश करके उस पर डिग्री करा ली। डिग्री में अचल संपत्ति की कुरकी और नीलामी में बड़ा खर्चा और परेशानी की बात बताकर कंपनी के वकील ने चल संपत्ति कुर्क कराकर नीलाम कराने की सलाह दी। चल संपत्ति में दास-दासी ही सबसे ज्यादा कीमती होते हैं। पर एक बड़ी अड़चन थी। कंपनी के साहब उत्तरी प्रदेश के और एक खास तरह के क्रिश्चियन हैं। वह भला नर-नारियों का सौदा करने की प्रथा का सहारा कैसे लें! इस मामले को लेकर बड़ी लिखा-पढ़ी होने लगी। चल संपत्ति बेचे बिना तीस हजार रुपयों के जल्दी उतरने की संभावना नहीं थी। एक ओर तीस हजार की रकम और दूसरी ओर क्रिश्चियन धर्म; दोनों की होड़ लगी थी। अंत में तीस हजार की ही जीत रही। कंपनी के साहब ने वकील को चल संपत्ति कुर्क कराकर नीलाम कराने का पत्र लिखा। पत्र पाते ही वकील से सूसन और उसकी कन्या एमेलिन को कुर्क करके नीलामी में भेज दिया। उन्हीं दोनों माँ-बेटियों को आप यहाँ गोदाम में बैठी बिलखती देख रहे हैं।
एमेलिन कहती है – “माँ, तुम जंघे पर सिर रखकर थोड़ा आराम कर लो।”
“नहीं, बेटी, मुझे नींद नहीं आएगी। जान पड़ता है, हम लोगों के मिलन का यह आखिरी दिन है।” सूसन ने सिसकते हुए कहा।
एमेलिन ने धीरज से कहा – “माँ, तुम ऐसा क्यों कहती हो? शायद हम दोनों को कोई एक ही आदमी खरीद ले।”
सूसन आँसू पोंछते हुए बोली – “नहीं बेटी, इसकी कोई उम्मीद नहीं। मैं झूठी उम्मीद दिलाकर मन को भुलाना नहीं चाहती।”
“क्यों वह नीलामवाला तो कहता था कि हम दोनों एक ही-सी हैं। इससे दोनों की एक ही डाक कर देगा।”
सूसन की उम्र अधिक होने के कारण उसका अनुभव भी बहुत था। वह आदमियों को देखकर ताड़ जाती थी कि कौन कैसा है। उस आदमी के चेहरे का रंग-ढंग देखकर, उसकी बातें सुनकर, सूसन के होश उड़ गए। उस गोदाम का रक्षक जब एमेलिन का हाथ पकड़कर और उसके सुंदर बालों को हिला-डुला कर देखते हुए कहने लगा कि “यह माल बड़ा बढ़िया है, इसके खूब दाम आएँगे,” तभी सूसन की जान निकल गई। सूसन का हृदय बहुत ही धार्मिक था। इससे यह सोचकर उसका हृदय दहकने लगा कि उसके गर्भ से जन्मी हुई कन्या को कोई लंपट पिशाच अंग्रेज खरीदकर उपपत्नी बनाएगा।
एमेलिन ने फिर कहा – “माँ, तुम रसोई बहुत अच्छी बनाना जानती हो। किसी भले घर में तुम्हें रसोईदारिन का और मुझे दरजिन का काम मिल जाए, तो हम लोगों के दिन बड़े मजे में कटेंगे।”
सूसन ने कहा – “बेटी, मैं चाहती हूँ कि तेरे सिर के सब बाल पीछे की ओर सीधे-सीधे कर दूँ।”
एमेलिन ने पूछा – “क्यों माँ, ऐसा करने से तो मैं अच्छी नहीं लगूँगी। क्या कोई भला आदमी ऐसे बाल देखकर खरीदेगा?”
सूसन ने कहा – “हाँ, खरीद सकता है।”
“कैसे?”
“भले आदमी साफ और सीधे-सादे लोगों को अधिक पसंद करते हैं, बनाव-शृंगार और ठाट-बाट उन्हें नहीं रुचता। ठाट-बाट देखकर तो लंपट ही रीझकर खरीदते हैं। बेटी, ये सब बातें मैं तुझसे ज्यादा जानती हूँ। मैं तुझसे कहती हूँ कि अगर हम लोग अलग-अलग बिके तो तू जहाँ रहे, अपने धर्म से रहना। मेरी इस बात को याद रखना कि प्राण दे देना, पर धर्म न खोना। अगर कोई गोरा तेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुल जाए तो आत्म-हत्या करके अपने धर्म की रक्षा करना। मेम साहब के उपदेशों को मत भूलना। अपनी बाइबिल और भजनों की पुस्तक हमेशा साथ रखना। ईश्वर को मत भूलना, वह सदा तेरी रक्षा करेगा।”
सूसन बड़े निराश-हृदय से कन्या को उपदेश दे रही थी। वह सोचती थी कि कल उसकी परम-सुंदरी पवित्र-हृदया कन्या को वही नीच अंग्रेज खरीद लेगा, जिसके पास धन होगा। वह बार-बार कहने लगी – “मेरी आँखों की पुतली एमेलिन आज यदि सुंदर न होकर कुरूप होती और शिक्षित न होकर मूर्ख होती तो अच्छा था।”
ऐसे समय में ईश्वर की प्रार्थना करने और उस पर भरोसा रखने के सिवा और किसी तरह धीरज नहीं आ सकता। पर आज-तक इस गोदाम में से न मालूम ईश्वर से ऐसी कितनी ही जीवित प्रार्थनाएँ और पुकारें हुई हैं, जिनका कोई ठिकाना नहीं? क्या ईश्वर इनकी प्रार्थनाएँ नहीं सुनता? क्या वह इन्हें भूल गया? कदापि नहीं। वह परम न्यायी, परम करुणामय, दीनदयाल भगवान किसी छोटी-से-छोटी आत्मा तक को एक पल के लिए नहीं भूलता। अरे पाखंडी, निर्मोही, अर्थपिशाच गोरे बनियों, तुम सबको निश्चय ही इस पाप का फल भोगना पड़ेगा। तुम नहीं तो तुम्हारी संतानें अपने रक्त से इस पाप का प्रायश्चित करेंगी। जिस बाइबिल को तुम लोग अपना धर्मशास्त्र कहते हो, उसी बाइबिल में लिखा है, ‘गले में पत्थर बाँधकर समुद्र में डूब जाने से जो हानि होती है, उससे भी अधिक हानि उन लोगों को उठानी पड़ेगी, जो एक छोटी-से-छोटी आत्मा का भी अपमान करते हैं।’
देखते-देखते रात गहरी हो चली। सूसन और उसकी कन्या हृदय के पट खोलकर ईश्वर को पुकारने लगीं। नाना प्रकार के भजन गाने लगीं।
ओ सूसन, ओ एमेलिन, तुम जन्म भर के लिए एक-दूसरे से बिदा माँग लो। आज की रात समाप्ति के साथ-साथ तुम्हारे भाग्य का सूर्य भी सदा के लिए अस्त हो जाएगा।
सवेरा हुआ। सब लोग अपने-अपने काम में लग गए। स्केग नाम का साहब आज की नीलामी का प्रबंध करने लगा। बिकने के लिए आए हुए दास-दासियों को वह तरतीब से खड़ा करने लगा। नीलामी बोलने से पहले खरीदारों के अंतिम दिखावे के लिए उसने सबको एक पंक्ति में खड़ा किया।
स्केग साहब एक हाथ में चुरुट और दूसरे में नीलाम की पुस्तक लिए हुए इधर-से-उधर टहलकर देखने लगा। देखते-देखते सूसन और एमेलिन के पास जाकर बोला – “तेरे वे घुँघराले बाल क्या हुए?”
एमेलिन ने सकपकाकर उसकी ओर देखा। उसकी माता ने कहा – “मैंने इसे बाल साफ करके जूड़ा बाँधने को कहा था। बिखरे और बलखाए हुए बाल उड़-उड़कर मुँह पर पड़ते थे। जूड़ा उससे साफ और अच्छा दीखता है।”
स्केग ने चाबुक सँभालकर उसे धमकाते हुए कहा – “जा जल्दी! जैसे बाल थे, वैसे करके ला।” फिर उसकी माता से कहा – “तू जाकर ठीक करा दे। घुँघराले बाल रहने से सौ रुपए ज्यादा मिलेंगे।”
धीरे-धीरे नीलाम-घर भर गया। खरीदार आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे। एक खरीदार एडाल्फ का बदन जाँच कर देख रहा था। तब तक किसी ने कहा – “ओहो, अल्फ्रेड! कहो, तुम कहाँ चले?”
अल्फ्रेड ने कहा – “भाई, मुझे एक अरदली की जरूरत है। मैंने सुना कि सेंटक्लेयर के गुलाम बिक रहे हैं। इससे यहाँ खरीदने आया हूँ।”
उस आदमी ने कहा – “सेंटक्लेयर के गुलाम खरीदोगे? मैं तो कभी ऐसा नहीं कर सकता।” सेंटक्लेयर के यहाँ के गुलाम आदर पा-पाकर, बिगड़कर, दो कौड़ी के हो गए हैं।
अल्फ्रेड बोला – “इसका मुझे डर नहीं। मेरे हाथ में पड़ते ही इनका बाबूपन हवा हो जाएगा। दो दिन में समझ जाएँगे कि मैं सेंटक्लेयर नहीं हूँ। यह आदमी शक्ल-सूरत का अच्छा है, इसी को लूँगा।”
उस आदमी ने कहा – “यह बड़ा फिजूल खर्च है।”
अल्फ्रेड ने जवाब दिया – “हमारे यहाँ इसकी दाल नहीं गलेगी। दो बार दंडगृह की हवा खिलाई कि इसके होश ठिकाने आ जाएँगे।”
टॉम बड़ी विन्रम दीनता से हर एक खरीदार का मुँह देखने लगा। वह देखना चाहता था कि इनमें कोई दयालु खरीदार भी है या नहीं। पर जितने आदमियों को उसने देखा, उनमें कोई अच्छा नहीं जान पड़ा। किसी के चेहरे पर क्रोध झलक रहा था, तो कोई देखने में बड़ा निर्दयी मालूम पड़ता था, कोई कामी दिखाई देता। यों ही सैंकड़ों मुख देखे, पर सेंटक्लेयर की-सी मधुर और शांत मूर्ति कहीं न दिखाई दी।
नीलामी आरंभ होने ही को थी कि एक मजबूत-सा नाटा आदमी आया और गुलामों को टो-टोकर, बदन में हाथ लगा-लगा कर देखने लगा। इसके चेहरे से मालूम होता था, मानो नरक का द्वारपाल हो। इसे देखते ही टॉम का हृदय भयभीत हुआ और बड़ी घृणा पैदा हुई। इस आदमी ने एक-एक करके सब दास-दासियों को परखा और अंत में टॉम के पास पहुँचकर तथा उसके मुँह में उंगली डाल कर देखने लगा, फिर पैरो की ताकत देखने के लिए उसे कुदवाया। परीक्षा समाप्त होने पर टॉम से बोला – “सबसे पहले तू कहाँ के दास-व्यापारी के यहाँ था?”
टॉम ने कहा – “केंटाकी में, साहब!”
“क्या क्या करता था?”
“अपने मालिक के खेत का काम देखता था।”
“ठीक है।”
टॉम से हटकर वह एडाल्फ के पास पहुँचा, पर घृणा से उसके मुख की ओर देखकर वहाँ जा पहुँचा, जहाँ सूसन और एमेलिन खड़ी थीं। उसने अपना व्रज-सा कठोर हाथ फैलाकर एमेलिन को अपने निकट खींच लिया। एमेलिन भय से काँप उठी। उसने एमेलिन के कंधे, छाती और भुजाओं पर हाथ लगाकर उसकी शारीरिक दशा देखी, फिर सतृष्ण नयनों से बारंबार उसकी ओर ताकने लगा। इसके बाद उसे उसकी माता की ओर धकेलकर चलता बना।
जिस समय वह नर-पिशाच जैसा खरीदार एमेलिन को देख रहा था, उस समय उसकी माता का हृदय भय और शंका से काँप रहा था। एमेलिन स्वयं भी उसका मुख देखकर बहुत डर गई और रोने लगी। उसका रोना देखकर नीलामवाले बहुत बिगड़े और बोले – “यहाँ रोना-झींकना मचाएगी तो डंडे पड़ेंगे।”
अब नीलाम आरंभ हुआ। नीलाम की चौक पर पहले एडाल्फ खड़ा किया गया। दो-चार डाक बोलने के बाद उसे अल्फ्रेड ने खरीद लिया। यों एक-एक करके सेंटक्लेयर के सब दास-दासियों को भिन्न-भिन्न लोगों ने खरीद लिया। अंत में टॉम की बारी आई।
नीलाम की चौकी पर खड़ा होकर टॉम इधर-उधर देखने लगा। पाँच-छह डाक होने के बाद वह भी बिक गया। जिस नाटे-से आदमी को देखकर टॉम को भय और घृणा हुई थी, उसी ने उसे खरीदा। दाम चुकाकर उसे नीचे उतारा और गला पकड़कर एक किनारे थोडी दूर बिठा दिया।
इसके बाद सूसन का नीलाम हुआ। पर नीलाम की चौकी से उतरते समय वह सतृष्ण नयनों से पीछे घूमकर अपनी कन्या की ओर देखने लगी। उसकी कन्या ने उसकी ओर हाथ फैलाया। सूसन ने अपने खरीदार से बड़ी दीनतापूर्वक कहा – “स्वामी, कृपा करके मेरी कन्या को भी आप ही खरीद लीजिए।”
उसका खरीदार औरों की निस्बत सहृदय जान पड़ता था। उसने कहा – “कोशिश करूँगा। पर इसके दाम ऊँचे जाएँगे। मुझे उम्मीद नहीं कि मैं उतने दाम दे सकूँगा।”
एमेलिन नीलाम की चौकी पर खड़ी की गई। उसका वह सरलतापूर्ण मुख-कमल डर से पीला पड़ गया, किंतु उसके सौंदर्य में कुछ कमी नहीं आई थी, उलटे एक अनुपम नवीन सौंदर्य का भाव उसके मुख पर छा गया। यह देखकर उसकी माता मन-ही-मन, पछताकर कहने लगी, इससे तो अच्छा था कि यह कुरूप होती। एमेलिन को खरीदने की इच्छा से बहुत लोगों ने डाकें बोलीं। एमेलिन की माँ का खरीदार भी दोन-तीन डाक बढ़ा, पर देखते-ही-देखते डाक इतनी बढ़ी कि उसने अपनी हिम्मत के बाहर दाम बढ़े देखकर मौन साध लिया। यों ही धीरे-धीरे कई खरीदार चुप हो गए। अंत में केवल दो आदमियों की बोली रह गई। इनमें एक वही टॉम का खरीदार था और दूसरा था इस प्रदेश का एक धनी और कुलीन पुरुष। अंत में आखिरी डाक में टॉम के खरीदार ने ही एमेलिन को खरीदा। नर-पिशाच साइमन लेग्री ही उस सरल-हृदय सच्चरित्र पंचदश-वर्षीया बालिका के जीवन का मालिक हुआ। इस दुरात्मा के हाथ से एमेलिन की रक्षा करनेवाला दीनबंधु भगवान के सिवा और कोई नहीं था।
एमेलिन सावधान! अपनी माता का अंतिम उपदेश सदा याद रखना! प्राण देना, पर धर्म मत खोना।
एमेलिन के इस प्रकार बिक जाने पर उसकी माता बिलख-बिलखकर रोने लगी। उसकी माता का खरीदार कुछ सहृदय था। इससे वह मन-ही-मन में कुछ दु:खित हुआ। पर ऐसे दृश्य आठ पहर चौंसठ-घड़ी इन लोगों की आँखों के सामने फिरा करते थे। इससे इनका कलेजा पक जाता था।
अत: वह आनंदपूर्वक अपनी खरीदी हुई संपत्ति सूसन को लेकर अपने घर ओर रवाना हुआ।
इस नीलाम के दो-तीन दिन बाद क्रिश्चियन फर्म बी.एंड. के वकील ने सूसन और एमेलिन की बिक्री के रुपयों में से अपना कमीशन और नीलाम खर्च काटकर बाकी रुपए उस कंपनी के क्रिश्चियन मालिक को भेज दिए।
34. नाव में
रेड नदी में एक छोटी-सी नाव पाल डाले दक्षिण की ओर बढ़ी चली जा रही है। नाव में कई दास-दासियों के रोने और सिसकने की आवाजें आ रही हैं। टॉम इन्हीं के बीच बैठा है। उसके हाथ-पैर जंजीर से जकड़े हुए हैं, पर उसका हृदय जिस दु:ख से दबा जा रहा है, उस दु:ख का बोझ हथकड़ी-बेड़ियों से भी अधिक है। उसकी सारी आशा-आकांक्षाओं पर पानी फिर गया है। पीछे छूटते हुए नदी-तट के वृक्षों की भाँति उसके सामने जो कुछ था, वह एक-एक करके पीछे छूट गया। अब वे नहीं दीख पड़ेंगे, अब वे नहीं लौटेंगे। केंटाकी का घर, स्त्री, पुत्र, कन्या और उस उदार स्वामी का परिवार आज कहाँ है? सेंटक्लेयर का घर। उस घर की वह विपुल शोभा-समृद्धि, इवा का वह देवोपम मुखचंद्र। वह उन्नतचेता सुंदर प्रफुल्लमूर्ति, कोमल-प्राण सेंटक्लेयर, वह परिश्रम-रहित जीवन, वह सुख के विश्राम दिवस – सब एक-एक करके जाते रहे, अब उनकी जगह रह गई है स्वप्न की-सी स्मृति।
टॉम ने नए खरीदार लेग्री साहब ने न्यू अर्लिंस की कई आढ़तों से आठ दास-दासी खरीदे थे। इनमें दो-दो को एक बंधन में जकड़ रखा था। लेग्री साहब कुछ दूर नाव पर चलने के बाद, राह में नदी के मुहाने पर, सबको साथ लेकर ‘पॉट्रेस्ट’ नामक जहाज पर सवार हुआ। सब दास-दासियों को सवार करा लेने के बाद वह टॉम के पास आया। सेंटक्लेयर के यहाँ टॉम सदा अच्छे कपड़े पहना करता था। बेचने के पहले आढ़तवालों ने टॉम को अपना सबसे बढ़िया कपड़ा पहनने का हुक्म दिया था। उस समय का पहना बढ़िया कपड़ा अभी तक उसके बदन पर था। लेग्री ने आकर उससे कहा – “खड़ा हो!”
टॉम खड़ा हो गया।
अब लेग्री ने उससे वह बढ़िया कपड़ा उतार देने को कहा। टॉम उतारने लगा। पर हाथ जंजर में जकड़े होने से वह झटपट उतार न सका। इस पर लेग्री ने स्वयं जोर से उसके कपड़े खींचकर उतारे। फिर वह सेंटक्लेयर के दिए हुए उसके बक्से की ओर घूमा। इसे उसने पहले ही खोल कर देख लिया था। उसमें से पुराना कोट और पतलून निकालकर टॉम को पहनने को दिया। टॉम इस पतलून को घूड़साल में काम करने के वक्त के सिवा और कभी न पहनता था। इस समय लेग्री की आज्ञानुसार वह फटीपुरानी पतलून उसे पहननी पड़ी। फिर लेग्री ने उसके बूट उतरवाकर एक जोड़ी फटा जूता पहनने को दिया। वह भी उसने पहन लिया।
इस जल्दी में भी, कपड़ों की अदला-बदली में, टॉम ने अपने कोट की पॉकेट से बाइबिल निकाल ली, नहीं तो उसे इससे भी हाथ धोना पड़ता। कपड़े उतारते ही लेग्री उसकी जेबें टटोलने लगा कि उनमें क्या रखा है। कोट की पाकेट से इवा का दिया हुआ एक रेशमी रूमाल निकला। उसे तुरंत उसने अपनी जेब के हवाले किया। फिर दूसरी जेब से एक प्रार्थना-पुस्तक निकाली। टॉम जल्दी में इसे निकालना भूल गया था। इस पुस्तक को देखते ही लेग्री क्रोध से जल उठा। बोला – “क्यों रे, तेरा गिर्जे से ताल्लुक रहता है?”
टॉम ने दृढ़ता से कहा – “जी सरकार!”
लेग्री ने आग-बबूला होकर कहा – “मैं तेरे यह सब पाखंड जल्दी ही निकाल दूँगा। मैं अपने खेत के कुली-कुबाड़ियों को भजन या उपासना नहीं करने देता। इसे अच्छी तरह समझ ले। अब तू अपने मन में जान ले कि मैं ही तेरा गिर्जा और मैं ही तेरा सब-कुछ हूँ। जो मैं कहूँगा, वही तुझे करना पड़ेगा।”
लेग्री ने बड़ी लाल-पीली आँखें करके टॉम से ये बातें कहीं। उस समय टॉम चुप था, पर उसकी अंतरात्मा कह रही थी – नहीं, कभी नहीं, न तू मेरा गिर्जा है, न कुछ है। इस समय बाइबिल का वह वाक्य, जो सदा इवा उसके सामने पढ़ा करती थी, उसे याद आया – जान पड़ा, मानो उसे धीरज दिलाने के लिए कहीं से आवाज आ रही है – “डरना मत; क्योंकि मैंने तेरा उद्धार किया है।… मैंने तुझे अपना नाम दिया है। तू मेरा ही होगा!”
पर लेग्री के कानों में यह ध्वनि नहीं पड़ी। पाप-पूर्ण कर्णों में यह ध्वनि प्रवेश नहीं कर सकती थी। टॉम के नीचे किए हुए चेहरे की ओर जरा देर लेग्री देखता रहा, फिर दूसरी ओर को चल दिया। सेंटक्लेयर ने टॉम को कुछ कीमती कपड़े दिए थे। अर्थपिशाच लेग्री ने लोभ में पड़कर टॉम का सब-कुछ नीलाम कर डाला, यहाँ तक कि संदूक भी बेच दिया और जो कुछ मिला, सब हड़प गया। कानून से दासों का किसी चीज पर अधिकार नहीं है। इसी से जब टॉम को लेग्री खरीद चुका तो उसके सारे माल-असबाब का भी वही मालिक हो गया। इस नीलाम के समय टॉम पर क्या बीती, यह वही जानता था।
माल-असबाब को नीलामकर चुकने पर लेग्री फिर टॉम के पास पहुँचकर बोला – “टॉम, तेरा जो कुछ असबाब का झंझट था, सब मैंने नीलाम में पार कर दिया। अब जो कपड़े तेरे पास हैं, उन्हें सँभालकर रखना। एक बरस के पहले मेरे यहाँ दूसरे कपड़े नहीं मिलेंगे। मैं अपने यहाँ के हब्शियों को साल में बस एक बार कपड़े देता हूँ।”
इसके बाद जहाँ एमेलिन दूसरी स्त्री के साथ जंजीर में बँधी बैठी थी, वहाँ लेग्री पहुँचा। उसने एमेलिन की ठोड़ी पकड़कर कहा – “मेरी प्यारी, उदासी को छोड़ो!”
वह सच्चरित्र बालिका भय और घृणा से उसकी ओर देखने लगी। यह देखकर उसने कहा – “इस तरह मुँह बनाने से काम नहीं चलेगा। यह सब छोड़ो। मेरे सामने सदा खुश रहना पड़ेगा। सुनती है न?”
फिर एमेलिन के साथ जंजीर से बँधी हुई दूसरी स्त्री को धक्का देकर बोला – “अरी बुढ़िया, यह हांडी-सा मुँह बनाए क्या पड़ी है? तुझसे कहता हूँ, जरा हँसकर बोल। यह मुँह बनाना छोड़ दे।”
दो-चार कदम पीछे हटकर और फिर आगे बढ़कर वह बोला – “मैं तुम सभी से कहता हूँ, मुँह इधर करके एक बार मेरी ओर देखो, ठीक मेरी आँखों की ओर ताको। (जोर से पृथ्वी पर पैट पटककर) एक बार, एक नजर मेरी ओर देखो।”
मारे डर के सबकी आँखें उसकी ओर लग गईं। फिर वह लोहे का मुग्दर-सा अपना मुक्का दिखाकर कहने लगा – “जरा इस मुक्के की ओर देखो। यह मुक्का लोहे से भी सख्त है। हब्शियों को ठोकते-ठोकते ही हाथ ऐसा कड़ा हो गया है।”
इतना कहते-कहते अपना वह मुक्का बँधा हुआ हाथ टॉम के मुँह के पास ले गया। टॉम डरकर पीछे सरक गया। फिर लेग्री कहने लगा – “मैं तुम सबको समझाए देता हूँ, मैं खेत में रखवाला नहीं रखता, सब काम खुद ही देखता-सुनता हूँ। तुम सभी को अच्छी तरह काम करना पड़ेगा। जब जो बात बोलूँगा, उसकी तामील तुरंत करनी पड़ेगी। इसी ढंग से मैं काम लेता हूँ। मेरे यहाँ दया-माया से कोई सरोकार नहीं। इसे तुम लोग खूब समझ लो। मुझे वह सब दया-माया दिखलाना पसंद नहीं है।”
उसकी बातें सुनकर दास-दासियों की जान सूख गई और सब ठंडी साँसें लेने लगे। कुछ देर बाद वह शराब पीने के लिए जहाज के दूसरे कमरे में जाने लगा। उसके पास ही कोई भलामानस आदमी खड़ा था। उससे वह कहने लगा – “मैं अपने हब्शियों के साथ इसी तरह का बर्ताव आरंभ करता हूँ। मेरी यह चाल है कि खरीदकर लाते ही मैं इन्हें सब समझा देता हूँ कि किस तरह से इन्हें मेरे साथ रहना होगा।”
उस अपरिचित भलेमानस ने बड़े गौर से उसकी ओर इस तरह देखा, मानो कोई पंडित किसी नई वस्तु की जाँच कर रहा हो। फिर कहा – “बेशक!”
लेग्री ने और आगे कहा – “हाँ, मैं ऐसे नाजुक-नाजुक हाथोंवाला खेतिहर नहीं हूँ कि कुलियों को कोड़े लगाने का काम रखवाले को सौंपूँ। यह देखिए, मेरी मुट्ठी और अंगुलियाँ एकदम फौलाद की मानिंद है। इस जगह का हाथ का मांस पत्थर-सा कड़ा हो गया है। और कोई बात नहीं, यह हब्शियों को ठोकते-ठोकते ऐसा हो गया है।”
उस अपरिचित ने लेग्री का हाथ देखकर कहा – “बेशक, बहुत कड़ा हो गया है; पर मैं समझता हूँ कि इस अभ्यास से तुम्हारा हृदय इससे भी ज्यादा सख्त हो गया है।”
लेग्री ने हँसते हुए कहा – “हाँ, क्यों नहीं, यह तो ठीक ही है। मैं काम में दया-माया के चक्कर में नहीं पड़ता।”
“तुमने बहुत अच्छे दास-दासी खरीदे हैं।”
“हाँ, अच्छे ही हैं। यह जो टॉम दीख पड़ता है, इसकी सब लोगों ने तारीफ की थी। इसके लिए मुझे कुछ ज्यादा देना पड़ा, पर इससे काम भी खूब लूँगा। लेकिन इसने कुछ बुरी बातें सीख रखी हैं। धर्म की ओर इसका बड़ा झुकाव है, पर यह सब मैं जल्दी ही निकाल बाहर करूँगा। यह अधेड़ दासी खूब सस्ते में हाथ लगी। मैं समझता हूँ, इसे कोई बीमारी होगी। सोचता हूँ, दो बरस तो चलेगी, और दो बरस में मैं खूब मेहनत लेकर अपनी कीमत वसूल कर लूँगा। बहुत-से खेतिहर, बीमार पड़ जाने पर मर जाने के डर से, कुलियों से अधिक काम नहीं लेते। पर मेरा वैसा हिसाब नहीं है। बीमार हो या अच्छा, बँधा हुआ काम करना ही पड़ेगा। थोड़ा काम करके चार बरस जीने से जो नतीजा निकला है, ज्यादा मेहनत करके दो बरस जीने से भी वही नतीजा निकलता है। एक हब्शी से थोड़ा काम लेकर ज्यादा दिन जिलाने से कोई फायदा नहीं होता। ज्यादा मेहनत लेने से जल्दी मर जाए तो फिर उसके बदले में एक और नया गुलाम खरीद लेने से अधिक नफे की उम्मीद रहती है।”
अपरिचित ने पूछा – “तुम्हारे खेत में गुलाम साधारणत: कितने वर्ष जीते हैं?”
लेग्री ने जवाब दिया – “इसका कोई हिसाब नहीं। कोई कुछ कम, कोई कुछ ज्यादा! लेकिन मामूली तौर से जवान हो तो छ:-सात बरस और चालीस के पार हो तो दो-तीन बरस से ज्यादा नहीं टिकते। पहले बीमार पड़ने पर मैं भी हब्शियों को दवा दिया करता था और कंबल देता था। लेकिन आखिर में नतीजा कुछ नहीं निकला, नाहक में चीजों की बरबादी होती थी। अब इन अड़ंगों से मैं दूर रहता हूँ। बीमारी में भी काम लेता हूँ। मर जाने पर और नए खरीद लेता हूँ। इससे हर तरह की सहूलियत रहती है।”
वह अपरिचित आदमी लेग्री के पास से हटकर थोड़ी दूर पर बैठे हुए एक युवक के निकट जाकर बैठ गया। वह देर से इन लोगों की सारी बातें सुन रहा था।
उस पहले आदमी ने इस युवक से कहा – “दक्षिण प्रदेश के सभी खेतिहर इस आदमी की भाँति सख्त नहीं हैं।”
युवक ने कहा – “ऐसा न होना ही अच्छा है।”
पहला आदमी बोला – “यह आदमी तो महानीच और बदमाश है। इसका बर्ताव तो सचमुच ही पशुओं-जैसा है।”
युवक ने कहा – “पर आपके देश के कानून की यह खूबी है कि वह ऐसे ही निष्ठुर और नीच आदमियों को अनगिनत नर-नारियों के जीवन का अधिकारी बनने का अवसर देता है। ऐसा कोई कानून आपके यहाँ नहीं है, जिसकी रू से ऐसे निष्ठुर आदमियों के अत्याचार से इन बेचारे गुलामों की रक्षा हो सके। खेतवालों में अधिकांश ऐसे ही हृदयहीन होते हैं।”
पहला आदमी बोला – “खेतवालों में जहाँ बुरे बहुत हैं, वहाँ कुछ भले भी हैं।”
युवक ने कहा – “दलील के लिए मान भी लिया जाए कि आपके खेतवालों में भले भी हैं, तो भी मैं कहता हूँ कि अत्याचार और निष्ठुरता के लिए वही पूरी तरह दोषी हैं, क्योंकि ऐसे ही दो-चार भलेमानसों के कारण यह घृणित प्रथा अब तक दूर नहीं हुई। यदि सभी खेतवाले लेग्री-सरीखे होते, तो क्या फिर भी यह प्रथा बनी रहती?”
इधर जब इन दोनों में ये बातें हो रही थीं, उधर जहाज में दूसरे स्थान पर एक जंजीर में जकड़ी हुई एमेलिन और लूसी भी आपस में बातें कर रही थीं।
एमेलिन ने कहा – “तुम किसके यहाँ रही थी?”
लूसी बोली – “एलिस साहब के यहाँ थी। तुमने शायद उन्हें देखा हो।”
“क्या वह तुम्हारे साथ अच्छा बर्ताव करते थे?”
“बीमार पड़ने के पहले तो वह बहुत ही अच्छा बर्ताव करते थे पर बीमार होने के बाद उनका स्वभाव बहुत चिड़चिड़ा हो गया, और सबसे रूखा व्यवहार करने लगे। मुझे रात-रात भर उनकी टहल के लिए जागना पड़ता था। पर एक दिन मुझे नींद आ गई, इस पर उन्होंने गुस्सा करके कहा कि तुझे किसी खूब सख्त आदमी के हाथ बेचूँगा।”
“तुम्हारे दु:ख-दर्द का कोई साथी है?”
“मेरा पति है। वह लुहार का काम करता है। मालिक ने उसे एक दूसरी जगह किराए पर दे रखा है। मेरे चार लड़के हैं, लेकिन मुझे ऐसी जल्दी में नीलाम-घर में भेज दिया कि मैं अपने स्वामी या लड़कों से एक बार भी नहीं मिल पाई।”
यह कहते-कहते लूसी रोने लगी। किसी का दु:ख देखकर मनुष्य के मन में स्वभावत: उसे धीरज देने की इच्छा होती है। लूसी की दु:खगाथा सुनकर एमेलिन उसे कुछ धीरज दिलानेवाली बात कहना चाहती थी, पर उसकी समझ में न आया कि क्या कहे। इस भयंकर मालिक के डर से वे दोनों इतनी डरी हुई थीं कि हृदय से कोई बात ही न उठती थी।
घोर संकट के समय मनुष्य को धार्मिक विश्वास बड़ी सांत्वना देता है। लूसी अपढ़ होने पर भी धर्म में बड़ा विश्वास रखती थी। एमेलिन ने भी धर्म के विषय में नियमित शिक्षा पाई थी और उसका हृदय धर्म की भावना से भरा था। पर ये ऐसी दुर्दशा में पड़ गई थीं, ऐसे राक्षस-प्रकृति लंपट अंग्रेज के हाथ में पड़ी थीं कि इस दशा में धार्मिक मनुष्य भी ईश्वर पर भरोसा रखकर सांत्वना प्राप्त कर सकता है या नहीं, इसमे संदेह है।
जहाज धीरे-धीरे बढ़ने लगा। अंत में एक छोटे कस्बे के पास आकर उसने लंगर डाला। लेग्री अपने दास-दासियों को साथ लेकर वहीं उतर गया।