गडोलना – हंसराज रहबर (कहानी)

गडोलना – हंसराज रहबर  (कहानी)

गडोलना – हंसराज रहबर (कहानी) गडोलना चौखट के करीब खूंटी पर लटक रहा था और विजय इधर-उधर दौड़ता फिरता था । उसकी दृष्टि गडोलने पर जा पड़ी और वह उसे उतारने के लिए जिद करने लगा । एक महीने पहले जब उसने गडोलना छोड़ कर बिना किसी सहारे के अपने आप आगे डग भरा था, … Read more

सुनहरा अखरोट -हंसराज रहबर (परी कथा)

सुनहरा अखरोट -हंसराज रहबर (परी कथा)

सुनहरा अखरोट -हंसराज रहबर (परी कथा) बहुत दिनों की बात है। किसी गाँव में एक लोहार और उसकी पत्नी रहते थे। उन्हें धन-दौलत किसी चीज की कमी नहीं थी। दुख सिर्फ यह था कि इनके कोई सन्तान नहीं थी। एक रात लोहार की पत्नी ने सपना देखा। उसे एक घने जंगल में एक पेड़ दिखाई … Read more

हवा बंद क्यूँ है?- हसन मंज़र (कहानी)

हवा बंद क्यूँ है?-  हसन मंज़र (कहानी)

हवा बंद क्यूँ है?- हसन मंज़र (कहानी) पहली बार जब पहरे वाला सिपाही सलाख़ों के बाहर से गुज़रा तो अहमद को वो ख़याल आया। दूसरी दफ़ा वो उसे आवाज़ देने को हुआ और होंट खोल कर रह गया। उसके बाद सिपाही ने मुतवातिर कई फेरे किए, लेकिन अहमद किसी फ़ैसले पर न पहुंच सका। बिलआख़िर … Read more

सवाब का रिश्ता – हसन मंज़र (कहानी)

सवाब का रिश्ता –  हसन मंज़र  (कहानी)

सवाब का रिश्ता – हसन मंज़र (कहानी) “कभी-कभी मैं सोचती हूँ अजीब नाम है तुम्हारा।” लड़की ने कहा। “वह कैसे?” “तलत तो लड़कियों का नाम होता है!” दोनों हँस पड़े। फिर अचानक संजीदा होते हुए नौजवान ने कहा, “और तुम्हारा कौन-सा लड़कियों जैसा है?” लड़की ने भी एकदम संजीदा होते हुए कहा, “वह कैसे?” “वह … Read more

चाँद की दूसरी तरफ़ – हाजरा मसरूर (कहानी)

चाँद की दूसरी तरफ़ – हाजरा मसरूर (कहानी)

चाँद की दूसरी तरफ़ – हाजरा मसरूर (कहानी) ताजमहल होटल के सामने से पहले भी कभी.कभार गुज़रा हूँ। लकड़ी के भद्दे से केबिन और सीमेंट के ठड़े वाली चाय की दुकान पर “ताज-महल होटल” का बोर्ड देखकर मुस्कुराया भी हूँ। लेकिन पिछले दो महीने से ये होटल मेरी ज़िंदगी के नए रास्ते का एक अहम … Read more

फ़ासले- हाजरा मसरूर (कहानी)

फ़ासले- हाजरा मसरूर  (कहानी)

फ़ासले- हाजरा मसरूर (कहानी) नानी को ऐ’न वक़्त पर नानीपने की सूझ रही थी… “भला चक़माक़ पत्थर में रगड़ लगे और चिंगारी न गिरे?”, नानी दरवाज़े के पास अड़ कर बोलीं और सितारा का जी चाहा कि अपना सर पीट ले। “चक़माक़! चक़माक़ यहाँ कहाँ से टपक पड़ा?”, सितारा ने बड़े ज़ब्त के साथ सवाल … Read more

कनीज़ – हाजरा मसरूर (कहानी)

कनीज़ – हाजरा मसरूर (कहानी)

कनीज़ – हाजरा मसरूर (कहानी) सिविल लाईन्ज़ की सबसे कुशादा और सबसे ख़ूबसूरत सड़क पर मील डेढ़ मील की मुसाफ़त से थकी हुई कनीज़ और उनकी दादी सटर-पटर जूतियाँ घिसटती चली आ रही थीं। दादी की चादर लू में फड़फड़ा रही थी। कनीज़ का पुराना काला बुर्क़ा तो हवा के ज़ोर से कई बार सर … Read more

बन्दर का घाव – हाजरा मसरूर (कहानी)

बन्दर का घाव – हाजरा मसरूर (कहानी)

बन्दर का घाव – हाजरा मसरूर (कहानी) वो बरामदे में झिलंगी खाट पर नई दुल्हन की तरह गठरी बनी पड़ी थी। गर्मी की भरी दोपहर, उस पर ठैरा हुआ बुख़ार… जी बौलाया जा रहा था। कमरे में घर के सब अफ़राद दरवाज़े बंद किए आराम से हँस बोल रहे थे। कई बार उसका जी चाहा … Read more

भालू – हाजरा मसरूर (कहानी)

भालू – हाजरा मसरूर (कहानी)

भालू – हाजरा मसरूर (कहानी) आज जुमेरात थी। अभी चराग़ भी न जले थे। अल्लाह रखी गुलाबी छींट का लहँगा और महीन मलमल का कुरता पहने और सर पर हरा दुपट्टा हज्जनों की तरह लपेटे, आज भी स्लीपरें घसीटती दरगाह में हाज़िरी देने निकली लेकिन ऐसी बेताबी से कि अनवरी उसकी तेज़ी का साथ न … Read more

कमीनी – हाजरा मसरूर (कहानी)

कमीनी – हाजरा मसरूर (कहानी)

कमीनी – हाजरा मसरूर (कहानी) शाम के बढ़ते हुए अंधेरे में… “निकल हरामज़ादी… निकल तू कमीनी…” भारी और करारी आवाज़ों के साथ साथ शर्म-ओ-हया के बोझ से दबी हुई महीन महीन आवाज़ें इसी एक जुमले को ऊंचे-नीचे सुरों में रटते रटते भयानक हो गईं। घर के अंदर से इस जुमले के अलावा धमक धय्या का … Read more