एक खिड़की- हारुकी मुराकामी ( जापानी कहानी)

एक खिड़की- हारुकी मुराकामी ( जापानी कहानी)

एक खिड़की- हारुकी मुराकामी ( जापानी कहानी) ‘शुभकामनाएं, शीतऋतु की ठंड हर बीत रहे दिन के साथ कम होती जा रही है, और अब सूर्य की रोशनी वसंत की कोमल सुगंध का संकेत देने लगी है। मुझे विश्वास है कि तुम ठीक होगी। हाल में मिला तुम्हारा पत्र पढ़ना आनंद का विषय था। हैमबर्गर स्टेक … Read more

आइना -जापानी कहानी- हारुकी मुराकामी

आइना -जापानी कहानी- हारुकी मुराकामी

आइना -जापानी कहानी- हारुकी मुराकामी आज रात आप सब जो कहानियाँ सुना रहे हैं, उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक तो वे कहानियाँ हैं जिन में एक ओर जीवित लोगों की दुनिया है, दूसरी ओर मृत्यु की दुनिया है, और कोई शक्ति है जो एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आना-जाना सम्भव … Read more

रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी

रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी

रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी   आँधियारा सीलन भरा छोटा कमरा। कच्ची मिट्टी की जगह उखड़ी हुई फर्श। उसी से पुती मटियाली दीवारें, जिन पर गांधी और नेताजी के चित्रों के अवशेष लटक रहे थे। छत धुएँ से एकदम स्याह काली। एक छोटा सा दीवार पर खिड़कीनुमा छेद, जिस पर टँगे पुराने तिरंगे … Read more

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी खिड़कियों से घिरे काठ के कमरे में एक अजीब दुर्गंध फैल रही है। छोटे—छोटे थैलों की तरह बच्चों का अंबार लगा है। इधर-उधर, ऊपर-नीचे बच्चे ही बच्चे बिखरे पड़े हैं—गहरी नींद में डूबे। सामने ऊँघते झबरैले फीखी (कुत्ते) की बगल में एक बौना बालक बार-बार करवट बदल रहा है। … Read more

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी “मन्नू देख!” उँगली नचाती हुई शम्मी बोली। “मैं भी तो मेले गया था शम्मी। मैं भी तो लाया। देख, मेरी मैमनियाँ!” इठलाते हुए कहा। रुई की सफेद बड़ी मैमनियाँ, शम्मी की कागजी छोटी मुर्गी के सामने पहाड़-सी लगने लगी। उसे देखते ही उसकी भोली-भाली आकृति खिसिया आई। फिर भी … Read more

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी आज फिर दीये जले। इनके जलते ही न जाने क्यों रक्त जमने लगता है! साँस रुक-सी आती है। रोम-रोम काँप उठता है। आँखों के आगे अंधकार छा जाता है। फिर कुछ भी नहीं सूझता। कुछ भी नहीं दीखता। भगवान्! या तो ये दीये न जला या यह जीवन-दीप ही एक … Read more

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी हमेशा की तरह सुबह वह जागी। द्वार खोला। देखा—हिम पिघल चुका है अब। पाले की तह धरती पर बिछी है, सफेद झीनी चादर की तरह। बर्फ केवल दूर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों या आसपास की ठंडी घाटियों में ही शेष रह गई है। दिन अभी निकला नहीं। वह अपनी धोती … Read more

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी तुम्हारे इस शहर में सदियों से तंद्रा में डूब यानी जादुई शहर में जब-जब आता हूँ, आँखें कुछ खोजने सी क्यों लगती हैं? खोई-खोई सी उन आँखों में गहरी जिज्ञासा का सा भाव क्यों उभरता है? क्यों यहाँ की बयार में एक प्रकार की चाँदनी, सुगंध का सा अहसास होता … Read more

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी “हाँ,भूला भी। भटका भी। जानबूझकर। दूसरों को राह दिखलाने से पहले स्वयं भी तो पथहीन होना पड़ा।” एक गहरी निःश्वास निकली। देर तक उन दूर रखे सुरा के कुछ रीते, कुछ छलकते प्यालों पर दृ‌ष्टि गड़ी रही। अन्यमनस्क भाव से फिर कहा, “देखती हो गणिके, मदिरा के सागर और यौवन की आँधी में … Read more

संगीतकार जेनको -पोलिश कहानी-हेनरिक सेनकीविच

संगीतकार जेनको -पोलिश कहानी-हेनरिक सेनकीविच

संगीतकार जेनको -पोलिश कहानी-हेनरिक सेनकीविच दुनिया में वह पतला-दुबला आया था। चारपाई के इर्दगिर्द खड़े पड़ोसियों ने माँ और बच्चे को देखकर अपने सिर हिलाए। उन सबमें से अधिक अनुभवी—लोहार की पत्नी ने अपने ढंग से बीमार जच्चे को सांत्वना देनी शुरू कर दी। ‘‘तुम आराम से लेटी रहो,’’ उसने कहा, ‘‘और मैं पवित्र मोमबत्ती … Read more