रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी

रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी

रक्त, रेत और हरियाली -कहानी- हिमांशु जोशी   आँधियारा सीलन भरा छोटा कमरा। कच्ची मिट्टी की जगह उखड़ी हुई फर्श। उसी से पुती मटियाली दीवारें, जिन पर गांधी और नेताजी के चित्रों के अवशेष लटक रहे थे। छत धुएँ से एकदम स्याह काली। एक छोटा सा दीवार पर खिड़कीनुमा छेद, जिस पर टँगे पुराने तिरंगे … Read more

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी

परिव्राजक की प्रजा -कहानी- हिमांशु जोशी खिड़कियों से घिरे काठ के कमरे में एक अजीब दुर्गंध फैल रही है। छोटे—छोटे थैलों की तरह बच्चों का अंबार लगा है। इधर-उधर, ऊपर-नीचे बच्चे ही बच्चे बिखरे पड़े हैं—गहरी नींद में डूबे। सामने ऊँघते झबरैले फीखी (कुत्ते) की बगल में एक बौना बालक बार-बार करवट बदल रहा है। … Read more

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी

कागज के टुकड़े -कहानी- हिमांशु जोशी “मन्नू देख!” उँगली नचाती हुई शम्मी बोली। “मैं भी तो मेले गया था शम्मी। मैं भी तो लाया। देख, मेरी मैमनियाँ!” इठलाते हुए कहा। रुई की सफेद बड़ी मैमनियाँ, शम्मी की कागजी छोटी मुर्गी के सामने पहाड़-सी लगने लगी। उसे देखते ही उसकी भोली-भाली आकृति खिसिया आई। फिर भी … Read more

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी

गिरगिट के रंग-कहानी- हिमांशु जोशी आज फिर दीये जले। इनके जलते ही न जाने क्यों रक्त जमने लगता है! साँस रुक-सी आती है। रोम-रोम काँप उठता है। आँखों के आगे अंधकार छा जाता है। फिर कुछ भी नहीं सूझता। कुछ भी नहीं दीखता। भगवान्! या तो ये दीये न जला या यह जीवन-दीप ही एक … Read more

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी

आधा दिन : आधी रात -कहानी-हिमांशु जोशी हमेशा की तरह सुबह वह जागी। द्वार खोला। देखा—हिम पिघल चुका है अब। पाले की तह धरती पर बिछी है, सफेद झीनी चादर की तरह। बर्फ केवल दूर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों या आसपास की ठंडी घाटियों में ही शेष रह गई है। दिन अभी निकला नहीं। वह अपनी धोती … Read more

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी

तुम्हारे शहर में -कहानी-हिमांशु जोशी तुम्हारे इस शहर में सदियों से तंद्रा में डूब यानी जादुई शहर में जब-जब आता हूँ, आँखें कुछ खोजने सी क्यों लगती हैं? खोई-खोई सी उन आँखों में गहरी जिज्ञासा का सा भाव क्यों उभरता है? क्यों यहाँ की बयार में एक प्रकार की चाँदनी, सुगंध का सा अहसास होता … Read more

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी

समिधा-कहानी-हिमांशु जोशी “हाँ,भूला भी। भटका भी। जानबूझकर। दूसरों को राह दिखलाने से पहले स्वयं भी तो पथहीन होना पड़ा।” एक गहरी निःश्वास निकली। देर तक उन दूर रखे सुरा के कुछ रीते, कुछ छलकते प्यालों पर दृ‌ष्टि गड़ी रही। अन्यमनस्क भाव से फिर कहा, “देखती हो गणिके, मदिरा के सागर और यौवन की आँधी में … Read more