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टॉम काका की कुटिया-उपन्यास- हैरियट बीचर स्टो अनुवाद – हनुमान प्रसाद पोद्दार -4
35. नरक-स्थली
बड़े ही दुर्गम और बीहड़ रास्ते से एक गाड़ी चली आ रही है। उसके पीछे-पीछे टॉम और कई गुलाम बड़ी कठिनाई से मार्ग पार कर रहे हैं। गाड़ी के अंदर हजरत लेग्री साहब बैठे हुए हैं। पीछे की ओर माल-असबाब से सटी दो स्त्रियाँ बँधी हुई बैठी हैं। यह दल लेग्री साहब के खेत की ओर जा रहा है।
यह जन-शून्य मार्ग मुसाफिरों के लिए वैसे ही कष्टकर था; पर स्त्री, पुत्र और पिता-माता से बिछुड़े हुए गुलामों के लिए तो यह और भी दु:खदायक था। इस दल में अकेला लेग्री ही ऐसा था, जो मस्त चला जा रहा था। बीच-बीच में वह ब्रांडी का एकाध घूँट लेता जाता था। कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसको नशा चढ़ आया। उससे उत्तेजित होकर अपने गुलामों को गाने का हुक्म दिया। भला उन दु:खी हृदयों से कहीं संगीत की ध्वनि निकल सकती थी? वे सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। लेकिन लेग्री ने उनपर चाबुक फटकारते हुए कहा – “गाओ सूअरो, देर क्यों करते हो।”
तब टॉम ने गाना आरंभ किया :
मेरे यरूशलम सुख-धाम,
कितना मधुर तुम्हारा नाम।
नाश जब होगा दु:ख का फंद,
लूँगा तब दर्शन-आनंद!
लेग्री को टॉम का गाना बिल्कुल पसंद नहीं आया, उल्टा वह गुस्से से उस पर चाबुक चलाकर बोला – “रहने दे अपने भजन-वजन! मैं नहीं सुनना चाहता। मैं एक मजेदार गीत सुनना चाहता हूँ।” अब लेग्री के साथ उसका जो एक पुराना नौकर था, वह गाने लगा-
तुमको कहता कौन मनुज, बाबा, तुम राक्षस-अवतार।
हरते हृदय-हारिणी निज पत्नी की गर्दन मार ।।बाबा.।।
कपि-स्वभाव हनुमत के चेले, ये सब हैं तब पापड़ बेले।
स्वाँग सभ्यता के वश खेले, केवल सभा-मंझार ।।बाबा.।।
ईसा मूसा का सिर खाया, और सकल उपदेश भुलाया।
इब्राहीम दास दल भाया, थे जो कई हजार ।।बाबा.।।
उस हब्शी गुलाम के इस तरह गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने पर लेग्री ऐसा मस्त हुआ कि खुद भी उसी के सुर-में-सुर मिलाकर चीखने लगा। रास्ते भर मालिक और नौकर दोनों यों ही गाते हुए चले जाते थे।
थोड़ी देर बाद लेग्री ने एमेलिन की ओर घूम-घूमकर उसके कंधे पर हाथ धरते हुए कहा – “प्यारी जान, अब हमारा घर आ पहुँचा।”
लेग्री ने जब एमेलिन का तिरस्कार किया था, तब वह बहुत ही डरी थी। पर अब, जब इस नीच ने, प्यारी जान कहकर उसके कंधे पर हाथ रखा, तब उसने सोचा कि इस मधुर व्यवहार की अपेक्षा लेग्री यदि उसे ठोकर मारता तो कहीं अच्छा था। लेग्री की आँखों का भाव देखते ही एमेलिन की छाती धड़कने लगी। लेग्री के छूने से वह और पीछे हट गई और पूर्वोक्त रमणी के साथ सटकर उसकी ओर ऐसी कातर दृष्टि से देखने लगी जैसे संकट के समय बच्चा माँ की ओर देखता है।
फिर लेग्री ने उसके कान छूकर कहा – “तुमने कभी झुमका नहीं पहना?”
“जी नहीं! डरत हुए एमेलिन बोली।”
“तुम यदि मेरी बात सुनो और मानो तो मैं घर चलकर तुम्हें एक जोड़ा झुमका दूँगा। तुम्हें इतना डरने की जरूरत नहीं। मैं तुमसे कोई बहुत मेहनत का काम नहीं लूँगा। तुम मेरे साथ मौज में रहोगी, बड़े आदमियों की तरह रहोगी – सिर्फ मेरी बात माननी पड़ेगी।”
यों ही बातें होते-होते गाड़ी लेग्री के खेत के पास जा पहुँची। पहले इस खेत का मालिक एक अंग्रेज था। वह लेग्री-जैसा नीच नहीं था। उस समय यह जगह भी देखने में आज-जैसी बेडौल न थी। लेकिन उसका दिवाला निकल जाने पर लेग्री ने बड़े सस्ते दामों में यह खेत खरीद लिया था। इस समय यह जगह बिल्कुल नरक के समान दिखाई पड़ती थी।
गाड़ी जब घर के फाटक पर पहुँची, तब तीन-चार दासों के साथ शिकारी कुत्ते खड़खड़ाहट सुनकर भौंकते हुए बाहर निकले। पीछे से यदि वहाँ का एक हब्शी गुलाम इन कुत्तों को न डाँटता और लेग्री उतरकर इन्हें न पुकारता, तो जरूर ये कुत्ते टॉम और नए आए दासों को नोच डालते।
लेग्री ने टॉम तथा दूसरे गुलामों की ओर घूमकर कहा – “देखते हो, कैसे बेढब कुत्ते हैं। अगर किसी ने यहाँ से भागने की कोशिश की, तो ये कुत्ते बोटी-बोटी नोच डालेंगे।”
फिर लेग्री ने पुकारा “सांबो!”
एक नर-पिशाच-सा हब्शी सामने आकर खड़ा हो गया।
लेग्री ने पूछा – “काम-काज तो खैरियत से चल रहा है?”
“जी हुजूर, बड़ी खैरियत से।”
फिर “कुइंबो” कहते ही एक और नर-पिशाच वहाँ आ पहुँचा। वह अब तक एक किनारे खड़ा अपने मालिक का मन अपनी ओर खींचने की चेष्टा कर रहा था।
लेग्री ने पूछा – “उस दिन तुझसे जो काम करने को बताया था, वह सब हुआ?”
“जी हाँ, सब हो गया।”
ये दो काले पिशाच लेग्री के खेत के प्रधान कार्याध्यक्ष थे। बहुत दिनों से निर्दयी आचरण करते-करते अब ये ऐसे नृशंस हो गए थे कि कोई भी नीच-से-नीच काम करने में नहीं हिचकते थे। लेग्री ने इन्हें शिकारी कुत्तों से भी बढ़कर खूंखार बना दिया था। गुलामी की प्रथा के देश में ये हब्शी अंग्रेजों से भी अधिक अत्याचार करने लगे थे। और कोई कारण नहीं, केवल इन हब्शियों की आत्मा का बेहद पतन हो गया था। संसार में चाहे जिधर नजर उठा कर देखिए, अत्याचार-पीड़ित या चिर-पराजित जाति के लोगों के मन में किसी प्रकार का वीरोचित भाव नहीं जमने पाता। ऐसी जाति के हृदय में नीचता, ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा आदि अनेक प्रकार के दोष अपना घर कर लेते हैं।
अपने खेत का काम खूबी से चलाने के लिए लेग्री ने एक बड़ी चाल खेल रखी थी। वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि अत्याचार-पीड़ित जाति के लोगों में परस्पर किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं होती। कुइंबो सांबो से खार खाता था और जलता था और सांबो कुइंबो से। मौका मिलने पर कोई किसी की बुराई करने से न चूकता था और खेत के और गुलाम इन दोनों से द्वेष रखते थे। लेग्री सांबो का कुसूर कुइंबो से और कुइंबो का सांबो से जान लेता था।
लेग्री के सामने उसके दोनों पार्षद सांबो और कुइंबो के खड़े होने पर ऐसा जान पड़ता था, मानो तीन भयानक दानव खड़े हैं। जंगल के खूंखार पशुओं से भी इनकी प्रकृति निकृष्ट थी। उनकी वे भयावनी शक्लें, डरावनी आँखें और कर्कश आवाज सर्वथा इस स्थान के उपयुक्त जान पड़ती थीं।
लेग्री ने कहा – “सांबो, इन सबको ठिकाने पर ले जा। यह औरत तेरे लिए लाया हूँ। मैंने तुझसे वादा किया था कि अबकी बार तेरे लिए एक गोरी मेम लाऊँगा। इसे ले जा।” इतना कहकर एमेलिन की जंजीर से बँधी हुई लूसी को खोलकर सांबो की ओर ढकेल दिया।
लूसी चौंककर पीछे हटी और बोली – “सरकार, नव अर्लिंस में मेरा बूढ़ा पति है।”
लेग्री ने कहा – “तो इससे क्या हुआ? यहाँ तुझे एक पति नहीं चाहिए? मैं वे सब बातें नहीं सुनता। (चाबुक उठाकर) जा, चुपचाप सांबो के साथ हो ले।”
फिर एमेलिन से बोला – “प्यारी, आओ, तुम मेरे साथ अंदर चलो!”
लेग्री ने आँगन में खड़े होकर जब एमेलिन को ‘प्यारी’ कहा, तब घर के झरोखे में से एक स्त्री का चेहरा बाहर झाँकते हुए दिखाई दिया। दरवाजा खोलकर लेग्री के अंदर जाते ही उस स्त्री ने गुस्से से दो-चार बातें सुनाई। इस पर लेग्री ने कहा – “तेरा साझा, चुप रह! जो मेरे जी में आएगा, करूँगा। एक छोड़कर तीन लाऊँगा।”
टॉम अश्रुपूर्ण नेत्रों से एमेलिन की ओर देख रहा था। उसने लेग्री की सब बातें सुनी थीं, पर आगे न सुन सका, क्योंकि वह शीघ्र ही सांबो के साथ चला गया।
लेग्री के दासों के रहने का स्थान बड़ी ही मैला-कुचैला और गंदा था। घुड़साल की तरह फूस की छोटी-छोटी झोपडियाँ थी। उन सब गंदी झोपड़ियों को देखकर टॉम की जान सूख गई। वह पहले खुद ही एक झोपड़ी में इधर-उधर घूमकर अपनी बाइबिल रखने के लिए कोई जगह ढूँढ़ने लगा। फिर सांबो से बोला – “इनमें से मुझे कौन-सी झोपड़ी मिलेगी?”
सांबो ने कहा – “अभी तो मालूम नहीं, सारी झोपड़ियाँ बंद पड़ी हैं। तुमको कहाँ रखा जाएगा, सो मैं नहीं जानता।”
बड़ी देर के बाद टॉम को एक जगह मिली, पर वह ऐसी जगह थी, जिसके बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।
शाम को सब दास-दासी खेत से अपनी-अपनी झोपड़ी को लौटे। इनमें से हर एक के बदन पर फटे-पुराने कपड़े थे, शरीर धूल से लथपथ और मुँह बिल्कुल पिचके हुए। अकाल-पीड़ित लोगों की भाँति भूख-प्यास से घबराकर वे झोपड़ियों में घुसे। सुबह से शाम तक ये खेत में काम पर पिसे, बीच-बीच में कितनी ही बार कारिंदे की लातें और चाबुकों की मार खाई। अब इस वक्त यहाँ आकर इन्हें खाने के लिए एक-एक पाव गेहूँ दिया गया। उसी गेहूँ को पीसकर इन्हें रोटियाँ पकानी पड़ेंगी। अपना साथी होने लायक कोई आदमी ढूढ़ने की गरज से टॉम हर एक पुरुष और स्त्री का मुँह ध्यान से देखने लगा, पर यहाँ उसे एक बालक तक में मनुष्यात्मा की गंध न मिली। पुरुष पशुओं की तरह खूँखार, खुदगर्ज और बेरहम थे; स्त्रियाँ बहुत सताई गई और कमजोर थीं। उनमें दूसरी जो कुछ सबल थीं वे निर्बलों को धकेलकर अपना काम बनाती चली जा रही थी। किसी के मुख पर दया का नामोनिशान तक न था। हर एक दूसरे को वैर-भाव से घूर रहा था। सबको अपने-अपने पेट की चिंता पड़ी थी। वास्तव में घोर अत्याचार सहते-सहते उनका कलेजा पत्थर जैसा कठोर हो गया था। भूख-प्यास के सिवा मानव-प्रकृति की अन्य सब प्रकार की आकांक्षाएँ मिट गई थीं। संध्या-समय हर एक को जो गेहूँ मिलता, उसे सब अलग-अलग पीसते। दासों की संख्या के हिसाब से चक्कियों की संख्या बहुत कम थी। इससे बड़ी रात तक चक्कियों की घरघराहट चला करती। जो बलवान थे वे सबसे पहले अपना काम बना लेते, और निर्बलों की भोजन बनाने की बारी सबके अंत में आती।
लेग्री ने सांबो को जो अधिक अवस्थावाली स्त्री सौंपी थी, उसकी ओर सांबो ने एक थैली गेहूँ फेंककर पूछा – “तेरा नाम क्या है?”
स्त्री ने कहा – “लूसी।”
“अच्छा, लूसी, आज से तुम मेरी औरत हो। यह गेहूँ ले जाकर मेरे और अपने खाने के लिए रोटियाँ पका लो।”
“मैं तुम्हारी स्त्री नहीं हूँ, कभी होने की भी नहीं। तुम यहाँ से जाओ।”
“फिर ऐसा कहेगी तो डंडे से सिर फोड़ दूँगा।”
“तेर खुशी! अभी मार डाल! जितनी जल्दी मौत आए उतना ही अच्छा। अब तक मर गई होती तो अच्छा था।”
सांबो जब उसे मारने चला तब कुइंबो ने, जो कई स्त्रियों को धकेलकर अपना गेहूँ पीस रहा था, कहा – “खबरदार सांबो, आदमी मारकर तुम काम का नुकसान करते हो। मैं मालिक से कह दूँगा।”
इस पर सांबो ने कहा – “मैं मालिक से कह दूँगा कि तू चार स्त्रियों को धकेलकर अपना गेहूँ पीस रहा था।”
टॉम को सारे दिन पैदल चलना पड़ा था, इससे वह थककर चूर हो गया था। भूख से तबियत परेशान थी, पर ठिकाना नहीं था कि कब खाना नसीब होगा। कुइंबो ने उसके हाथ में एक थैली गेहूँ थमाकर कहा – “ले यह गेहूँ, जा रोटी बना-खा। यह एक हफ्ते की खुराक है।”
करीब आधी रात तक टॉम देखता रहा, पर उसकी गेहूँ पीसने की बारी न आई। रात के एक बजे जब चक्की खाली हुई तो उसने देखा कि दो रोगी स्त्रियाँ चक्की के पास बैठी हुई हैं। वे बहुत थकी हुई थीं, उनके शरीर में ताकत नहीं थी। यहाँ बहुत पहले आने पर भी अब तक उन्हें किसी ने गेहूँ नहीं पीसने दिया।
टॉम ने उठकर पहले उनके गेहूँ खुद पीस दिए और फिर अपने पीसे। यह पहला मौका था। इसके पहले कभी किसी ने दया नहीं दिखाई थी। यहाँ के लिए यह एक अलौकिक बात थी। बहुत मामूली दया का काम होने पर भी टॉम का यह आचरण देखकर उन दोनों स्त्रियों का हृदय कृतज्ञता से भर गया। उनका श्रम-खिन्न कठोर मुँह स्त्री-सुलभ ममता के भाव से चमक उठा। बदले में उन्होंने टॉम की रोटियाँ बना दीं। जब वे दोनों रोटियाँ बना रही थी, टॉम ने चूल्हे के पास बैठकर अपनी बाइबिल निकाली। उसके हाथ में पुस्तक देखकर एक स्त्री ने कहा – “तुम्हारे हाथ में यह क्या है?”
टॉम ने कहा – “बाइबिल।”
“दीनबंधु, केंटाकी छोड़ने के बाद अब तक बाइबिल के दर्शन नहीं हुए थे।”
टॉम ने चाव से कहा – “तुम क्या पहले केंटाकी में थी?”
“हाँ, वहीं थी, और अच्छी थी। कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसी दुर्दशा में पड़ना होगा।”
दूसरी स्त्री ने कहा – “वह कौन-सी पुस्तक बताई?”
टॉम बोला – “बाइबिल।”
दूसरी स्त्री ने कहा – “बाइबिल क्या होती है?”
पहली स्त्री बोली – “तुमने क्या कभी इस पुस्तक का नाम नहीं सुना? केंटाकी में मेरी मालकिन कभी-कभी यह पुस्तक पढ़ा करती थी। तब मैं भी सुना करती थी। यहाँ तो केवल गाली-गलौज सुनने में आती है। अच्छा, तुम पढ़ो, जरा मैं भी सुनूँ।”
टॉम बाइबिल में से पढ़ने लगा- “थके मांदे, भार से दबे हुए मनुष्यों, तुम मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”
पहली स्त्री ने कहा – “वहा, ये तो बड़ी बढ़िया बात है। ये बातें कौन कहता है?”
टॉम बोला – “ईश्वर!”
पहली स्त्री ने पूछा – “ईश्वर कहाँ मिलेंगे? पता लग जाता तो मैं उनके पास जाती। उनके पास गए बिना मुझे विश्राम नहीं मिलेगा। मेरा शरीर बहुत थक गया है। इस पर सांबो मुझे नित्य धमकाता और कोड़े लगाता है। कोई दिन ऐसा नहीं होता कि आधी रात के पहले खाना नसीब हो जाए। खाकर जरा आँख झपकी कि सवेरा हुआ ही दीखता है और चट से खेत में जाने का घंटा बज जाता है। अगर परमेश्वर का पता मालूम हो जाता तो उनसे ये सब बातें जाकर कहती। हाय भगवान, अब तो यह कष्ट नहीं सहा जाता।”
टॉम ने कहा – “ईश्वर यहाँ भी है, और सब जगह है।”
स्त्री बोली – “तुम्हारी बात पर मेरा विश्वास नहीं जमता, ऐसी बातें बहुत बार सुनी हैं कि ईश्वर यहाँ है, वहाँ है; पर न मालूम कहाँ है कि हम लोगों का दु:ख देखकर भी वह क्यों कुछ नहीं करता। मैं अब झोपड़ी में लेटकर सोती हूँ, यहाँ ईश्वर हर्गिज नहीं है।”
यह कहकर वह स्त्री चली गई। टॉम अकेला बैठा प्रार्थना करने लगा।
नीले आकाश में जैसे यह चंद्रमा उदय होकर चुपचाप, गंभीरतापूर्वक जगत का निरीक्षण कर रहा है, उसी प्रकार परमात्मा चुपचाप गंभीर भाव से जगत् के पाप, ताप और अत्याचारों को देख रहा था। जिस समय यह काला गुलाम हाथ में बाइबिल लिए हुए असहाय दशा में उसको पुकार रहा था, उस समय उसकी हर बात उस परमात्मा के कानों तक पहुँच रही थी। वह घट-घट व्यापी अंतर्यामी है। पर ईश्वर यहाँ मौजूद है, इसका विश्वास उस अनपढ़ स्त्री को कोई कैसे कराए? भला इस अत्याचार और यंत्रणा में पड़ी हुई ऐसी स्त्री के लिए ईश्वर पर विश्वास करना कब संभव हो सकता था?
टॉम के मन को आज उपासना के अंत में पूरी शांति नहीं मिली। वह बड़े अशांत चित्त से सोने गया। किंतु झोपड़ी की गंदी हवा और दुर्गंध के मारे उसकी वहाँ ठहरने की इच्छा न होती थी, लेकिन करता क्या? बेतरह थका हुआ था, जाड़ा भी सता रहा था, लाचार जाकर पड़ रहा। सोते ही आँख लग गई, स्वप्न आया, मानो झील के किनारे बाग में वह चबूतरे पर बैठा हुआ है और इवा बड़ी गंभीरता से उसके सामने बाइबिल पढ़ रही है।
“जब तुम जल पर से पैदल जाओगे तब मैं तुम्हारे साथ रहूँगा और जल तुम्हें डुबा न सकेगा। जब तुम अग्नि में कूदोगे, तब भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, इससे अग्नि तुम्हें जला न सकेगी। मैं तुम्हारा एकमात्र विधाता और परमेश्वर हूँ।”
ये शब्द मधुर संगीत की भाँति टॉम के कानों में गूँजने लगे, मानो इवा सोने के रथ पर चढ़ी हुई बार-बार स्नेह-दृष्टि से उसकी ओर देखती हुई आकाश में उड़ रही थी और रथ में से उस पर फूलों की वर्षा कर रही थी।
टॉम की आँख खुल गई। लेकिन यह कैसा स्वप्न है? अविश्वासी इसे स्वप्न समझकर झूठा मान सकता है, पर जिस दयालु बालिका ने जीते-जी सदा, दूसरों के दु:ख पर आँसू बहाए, क्या वह मृत्यु के बाद दु:खी को धीरज देने नहीं आ सकती? क्या यह संभव है? कदापि नहीं!
36. अत्याचारों की पराकाष्ठा
टॉम ने थोड़े ही समय में लेग्री के खेत के काम ढंग और यहाँ का रवैया समझ लिया। कार्य में वह बड़ा चतुर था, और अपने पुराने अभ्यास तथा चरित्र की साधुता के कारण किसी कार्य में भूल अथवा लापरवाही न करता था। उसका स्वभाव भी शांत था, इससे उसने मन-ही-मन सोचा कि यदि मेहनत करने में हीला-हवाला न किया जाए तो कदाचित कोड़ों की मार न सहनी पड़े। यहाँ के भयानक अत्याचार और उत्पीड़न देखकर उसकी छाती दहल गई। पर वह ईश्वर को आत्म-समर्पण करके धीरज के साथ काम करने लगा। उसका मन कभी एकदम निराश न होता था। उसका दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर सदा उसकी रक्षा करेगा। किसी-न-किसी तरह वह मंगलमय पिता मेरा बेड़ा अवश्य पार लगाएगा।
लेग्री साहब टॉम का काम-काज विशेष ध्यान देकर देखने लगा। उसने शीघ्र ही समझ लिया कि काम में टॉम बड़ा चतुर है, पर टॉम के प्रति उसका जो विद्वेष-भाव था, वह किसी तरह न टला। इसका मूल तत्व क्या था, यह लेग्री-सरीखे मनुष्य की समझ के बाहर था। झूठे का सच्चे पर, पापी का पुण्यात्मा पर और अधर्मी का धर्मात्मा पर एक प्रकार का सहज द्वेष-भाव होता है। यही कारण है कि संसार में परम धार्मिक देश सुधारक अपने ही देशवालों की दृष्टि में खटकते हैं। जिनके लिए वे अपनी जान न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं, वही लोग उनकी जान के ग्राहक बन जाते हैं।
लेग्री इस बात को भली भाँति समझ गया था कि वह गुलामों के साथ जो कठोर बर्ताव और अत्याचार करता है, उसे टॉम बड़ी घृणा की दृष्टि से देखता है। पर संसार का नियम है कि भले-बुरे सभी प्रकार के लोग दूसरे की प्रशंसा के भूखे रहते हैं। जब तक दूसरे लोग उनके आचरण और मत का अनुमोदन न करें, तब तक उनके जी को संतोष नहीं होता। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक गुलाम तक का प्रतिकूल मत असह्य हो जाता है। इसके सिवा लेग्री ने यह भी देखा कि टॉम जब-जब दूसरे दास-दासियों पर दया प्रकट करता है, उनको कोई कष्ट होने पर स्वयं दु:खित होता है। लेग्री के खेत में दास-दासियों में परस्पर कभी सहानुभूति के चिह्न दिखाई नहीं पड़े थे। इससे टॉम का आचरण उसे असह्य हो गया। टॉम को परिदर्शक के काम पर नियुक्त करने के लिए ही लेग्री इतने अधिक दाम देकर उसे खरीदकर लाया था; लेकिन जिस आदमी की प्रकृति अत्यंत कठोर न हो वह परिदर्शक के काम के लिए नहीं चुना जा सकता। परिदर्शक को सदा कुलियों की पीठ पर कोड़े लगाने का काम करना पड़ता था। टॉम अन्य सब कामों में पक्का होने पर भी इस अत्यावश्यक गुण से सर्वथा वंचित था। इससे लेग्री साहब ने सोचा कि टॉम का हृदय कठिन और निष्ठुर बनाने के लिए शीघ्र ही उपाय करना होगा। हृदय को निष्ठुर बनाने की नवीन शिक्षा-प्रणाली का उपयोग अविलंब किया गया।
एक दिन प्रात: काल जब सब दास-दासी खेत पर जाने के लिए जुटे, उस समय टॉम ने इस दल में आश्चर्य के साथ एक नई स्त्री को देखा। टॉम का ध्यान उसकी ओर खिंच गया। स्त्री लंबी और कमनीय थी। उसके हाथ-पैर कोमल थे और उसके वस्त्र भलेमानसों के-से थे। उम्र चालीस-पैंतालीस के लगभग होगी। इसके मुख पर ऐसा भाव था कि जिसने एक बार देख लिया, वह सहज ही भूल नहीं सकता था। इसके भाव से ऐसा जान पड़ता था, मानो इसके जीवन का इतिहास अनेक कष्टकर और अदभुत घटनाओं से भरा हुआ है। इसका प्रशस्त ललाट, विशाल उज्ज्वल नेत्र, टेढ़ी और घनी भौंहें मुखमंडल को शोभायमान कर रही थीं। इसके अंगों के गठन से जान पड़ता था कि यह रमणी युवावस्था में बड़ी सुंदर रही होगी। लेकिन शोक और दु:ख के चिह्नों ने अब उस सौंदर्य को बिगाड़ दिया था। उसके चेहरे पर घोर विद्वेष, नैराश्य और अहंकारजन्य एक अद्भुत सहिष्णुता का भाव झलक रहा था। वह स्त्री कहाँ से आई और कौन है, टॉम को इसका कुछ भी पता न था। पर वह स्त्री खेत को जाते समय बराबर टॉम की बगल में चल रही थी। मालूम होता था कि खेत के अन्य दास-दासी इसे भली भाँति जानते थे, क्योंकि उन नीच-प्रकृति के जीर्ण-शीर्ण कपड़ों से ढके कुलियों में कोई उसे देखकर मुस्कराया, किसी ने मजाक उड़ाया, कोई उसे घूरने लगा और किसी-किसी ने बड़ा आनंद मनाया। एक ने कहा – “क्यों बीवी, अंत में आ न गई ठिकाने पर! मुझे बड़ी खुशी हुई।”
दूसरे ने कहा – “अब मालूम होगा, बीवी, कि यहाँ गुलछर्रें नहीं उड़ते हैं।”
तीसरा बोला – “देखना है, कैसा काम करती है। काम न करने पर इसकी भी कोड़ों से खबर ली जाएगी।”
चौथे ने कहा – “इसकी पीठ पर कोड़े लगें तो मैं बड़ा खुश होऊँगा।”
उस स्त्री ने इस सबकी कुछ भी परवा न की। वह अपनी उसी गंभीर चाल से चलती रही, मानो वह कुछ सुनती ही नहीं। टॉम सदा से सभ्यों में रहा था। स्त्री की चाल-ढाल से उसने समझ लिया कि जरूर यह कोई सभ्य स्त्री होगी। पर इसकी यह दुर्दशा क्यों हो रही है, इसका कुछ निर्णय न कर सका। स्त्री यद्यपि बराबर टॉम के पास चल रही थी, पर टॉम से एक शब्द भी न बोली।
टॉम शीघ्र ही खेत पर पहुँचकर काम में लग गया। वह स्त्री उससे बहुत दूर न थी। इससे वह बीच-बीच में आँख उठाकर उसके काम की ओर देखता जाता था। उसने देखा कि वह बड़ी फुर्ती से काम कर रही है। औरों की अपेक्षा वह बहुत शीघ्रता और आसानी से कपास चुनने लगी; पर जान पड़ता था कि वह बड़ी विरक्ति, घृणा और अभिमान के साथ यह काम कर रही है।
टॉम के बगल में ही, नीलामी में उसके साथ खरीदी हुई, लूसी नाम की दासी बैठी कपास बीन रही थी। यहाँ आने के बाद यह स्त्री बहुत ही कमजोर और बीमार हो गई। वह कपास बीनती जाती थी और क्षण-क्षण में मृत्यु को बुलाती जाती थी। कभी-कभी एकदम धरती पर पसर जाती थी। टॉम ने उसके पास सरककर चुपके से अपनी डलिया में से थोड़ी कपास निकालकर उसकी डलिया में डाल दी।
लूसी ने आश्चर्य के साथ देखते हुए कहा – “अरे, नहीं-नहीं, ऐसा मत करो। इसके लिए तुम आफत में पड़ जाओगे।”
ठीक इसी समय वहाँ सांबो आ पहुँचा। लूसी को एक ठोकर मारी। इससे लूसी बेहोश हो गई।
तब सांबो टॉम के पास जाकर उसके मुँह और पीठ पर चाबुक फटकारने लगा।
टाप चुपचाप अपना काम करता रहा। पर लूसी को अचेत हुई देखकर परिदर्शक का एक दूसरा साथी नौकर कहने लगा – “अभी इस हरामजादी को होश में लाता हूँ।”
इतना कहकर उसने जेब से एक आलपिन निकालकर उसके सिर में चुभो दी। इससे लूसी कराह उठी। परिचालक बोला – “उठ हरामजादी, मुझसे यह सब ढोंग नहीं चलेगा। मैं तेरी सब बदमाशी निकाल दूँगा।”
लूसी होश में आकर कुछ उत्तेजित-सी होकर तेजी के साथ कपास इकट्ठी करने लगी।
उस आदमी ने कहा – “देख, अगर इसी तरह जल्दी-जल्दी काम नहीं करेगी तो तुझे यमराज के घर पहुँचा दूँगा।”
टॉम ने सुना, लूसी ने कहा – “जल्दी भेज दो तो जान बचे!” फिर सुना – “हे भगवान, हे परमात्मन्, अब कितना सहना पड़ेगा! क्या इस दुनिया से मुझे नहीं उठा लोगे?”
टॉम जानता था कि यदि शाम तक लूसी डलिया भर कपास न दे सकी, तो इसकी जान की खैरियत नहीं। लेग्री मारे कोड़ों के इसकी चमड़ी उधेड़ देगा। अत: उसके लिए अपनी आफत की कुछ भी परवा न करके उसने अपनी सारी कपास उसकी डलिया में डाल दी।
लूसी ने कहा – “अरे, ऐसा मत करो।… तुम नहीं जानते कि इसके लिए वे तुम्हारी कितनी आफत करेंगे।”
“मैं तुम्हारी निस्बत अच्छी तरह सह सकता हूँ।” इतना कहकर टॉम फिर अपनी जगह पर जा डटा। यह एक क्षण भर की बात थी।
एकाएक पूर्वोक्त अपरिचित रमणी काम करते-करते टॉम के इतने निकट आ गई कि उसने टॉम के अंतिम शब्द सुने, और फिर पल भर अपनी बड़ी-बड़ी काली आँखें उन लोगों पर गड़ाकर देखने लगी। इसके बाद अपनी डलिया से थोड़ी-सी कपास लेकर टॉम की डलिया में डालकर बोली – “तुम अभी यहाँ का कायदा बिल्कुल नहीं जानते हो। यहाँ एक महीना तो बीतने दो, फिर दूसरे की सहायता करना तो दूर रहा, तुम्हें अपनी ही जान बचानी मुश्किल हो जाएगी।”
एक परिचालक थोड़ी दूर पर उस स्त्री की यह कार्रवाई देख रहा था। वह चाबुक लिए हुए वहाँ पहुँचा और विजय के स्वर में बोला – “हाँ हाँ, क्या करती हो? मैं तुम्हारी सारी हरकतें देखता हूँ। तुम इस समय मेरे वश में हो, यह सब चाल नहीं चलेगी।”
उस स्त्री ने बड़ी कड़ी नजर से परिचालक की ओर देखा। उसके ओंठ फड़कने लगे और आँखों से चिनगारियाँ बरसने लगीं। वह परिचालक को डाँटकर बोली – “सूअर, पाजी! आ तो एक बार मेरे पास। देखूँ तेरी हिम्मत! अब भी मुझमें इतनी क्षमता है कि शिकारी कुत्तों से तेरी बोटी-बोटी नुचवाकर जिंदा गड़वा दूँ। तू मेरे सामने रौब दिखाने आया है!”
उसकी बातों से सहमकर परिचालक बोला – “शैतान की बच्ची, तब तू यहाँ काम करने क्यों आई है? मिस कासी, तुम मेरा कोई नुकसान न करना।”
रमणी बोली – “तू, यहाँ से दूर हट!”
परिचालक वहाँ से हटकर दूसरी ओर कुलियों का काम देखने चला गया।
वह स्त्री फिर तेजी से अपने काम में लग गई। उसका गजब का फुर्तीलापन देखकर टॉम चौंधिया गया। दिन डूबने के पहले ही उसकी डलिया फिर भर गई और तारीफ यह कि बीच में उसने कई बार अपनी कपास टॉम की डलिया में भी डाल दी थी। संध्या के बाद अधिक अंधकार हो जाने पर सब कुली सिर पर अपनी डलिया रखे हुए कपास के गोदाम पर, जहाँ तौल होता था, पहुँचे। लेग्री वहाँ बैठा दो परिचालकों से घुल-घुलकर बातें कर रहा था।
लेग्री ने कहा – “इस काले गुलाम टॉम को ठीक करना चाहिए। यह जल्दी रास्ते पर नहीं आएगा, बड़ी मेहनत लेगा।”
हब्शी परिचालक खीसें निकालकर हँसने लगा। पर कुइंबो बोला – “हुजूर ही से यह ठीक होगा। आप जिस जोर से चाबुक लगाना जानते हैं, शैतान भी वैसा नहीं जानता।”
लेग्री बोला – “इसे सिखाने का सबसे अच्छा और सीधा उपाय यह होगा कि इसे दूसरी स्त्रियों को कोड़े लगाने का काम सौंपा जाए।”
कुइंबो ने कहा – “हाँ, सरकार, लेकिन यह बात वह कभी मंजूर नहीं करेगा। मार-पीट करने के लिए वह कभी तैयार न होगा। उसका वह धरमपना दूर करना सरल नहीं है।”
लेग्री बोला – “मैं आज ही उसका धरमपना निकाले देता हूँ।”
इतने में सांबो ने कहा – “यह देखिए, लूसी ने कोई काम नहीं किया। दिन भर बैठी रही, यह बड़ी बदजात है। कुलियों में ऐसा और पाजी नहीं है।”
कुइंबो बोला – “खबरदार सांबो, मैं जानता हूँ कि लूसी से तू क्यों खार खाता है।”
सांबो ने लेग्री की ओर देखकर कहा – “सरदार, आप ही ने तो उसे मेरी औरत बनाने को कहा था, पर वह आपकी बात नहीं मानती।”
लेग्री ने बहादुरी से कहा – “मैं मारते-मारते उसकी चमड़ी उधेड़ देता। लेकिन आज-कल काम की भीड़ है, इससे नुकसान होगा।”
“लूसी बड़ी बद है, कुछ नहीं करना चाहती। सिर्फ दिक करती है और यह टॉम उसकी मदद करता है।” कुइंबो ने कहा।
“टॉम ने इसकी मदद की है? अच्छा, तो टॉम ही इसको कोड़े भी लगावे। इससे टॉम खूब सीख जाएगा। यह शैतान यों ही अधमरी हो रही है। तुम लोगों की मार से तो मरने का भी डर है, पर टॉम उतने जोर से कोड़े नहीं लगावेगा, इससे वह भी डर नहीं है।”
यह बात सुनकर सांबो और कुइंबो खीसें निकालकर हँसने लगे।
परिचालकों ने कहा – “लेकिन सरकार, टॉम ने और मिस कासी ने लूसी की डलिया में बड़ी कपास डाली है।”
लेग्री बोला – “मैं अभी तौले लेता हूँ।” वे दोनों परिचालक फिर ठठाकर हँसे।
लेग्री ने पूछा – “मिस कासी ने अपना दिन भर का काम तो पूरा कर लिया है न?”
परिचालक ने जवाब दिया – “सरकार, काम तो वह शैतान की तरह करती है।”
लेग्री ने सबकी कपास तौलने की आज्ञा दी। कुली बहुत थक गए थे। इससे बड़े कष्ट से अपनी-अपनी डलिया उठाकर काँटे पर रखने लगे। लेग्री हाथ में स्लेट लेकर तौल और नाम लिखने लगा।
टॉम की टोकरी का तौल हुआ और उसका काम संतोषजनक पाया गया। अपनी टोकरी तुल जाने के बाद टॉम बड़ी उत्कंठा से लूसी की टोकरी की ओर देखने लगा।
लूसी ने डरते और काँपते हुए अपनी टोकरी लाकर रखी। तौल में वह पूरी थी, पर लेग्री ने उसे धमकाने की नीयत से बनावटी गुस्से से कहा – “यह हरामजादी बड़ी सुस्त है। आज भी कपास कम है। इसे किनारे खड़ा करो, अभी इसकी खबर ली जाती है।” लूसी ने निराशा से एक ठंडी साँस ली और एक तख्ते पर बैठ गई।
फिर उस कासी नाम की स्त्री ने बड़ी अवज्ञा और उद्धतता के साथ अपनी टोकरी लाकर रखी। लेग्री विद्रूप और कौतूहल से उसका मुख देखने लगा।
कासी आँखें गड़ाकर लेग्री की ओर घूरने लगी। उसके होठ फड़कने लगे। उसने फ्रेंच भाषा में लेग्री से कुछ कहा। बात किसी की समझ में न आई, पर लेग्री का चेहरा पिशाच-सा हो गया, और उसने कासी को मारने के लिए हाथ उठाया। रमणी घृणा दिखाती हुई निर्भीकतापूर्वक वहाँ से चल दी।
कुछ देर बात लेग्री ने टॉम को बुलाकर कहा – “टॉम, मैंने तुझे साधारण कुली का काम करने के लिए नहीं खरीदा है। मैं तुझे परिचालक का ओहदा दूँगा और ठीक काम करने पर तू तरक्की पाकर परिदर्शक भी हो सकेगा। कुलियों को किस तरह कोड़ों से पीटा जाता है, यह तूने इतने दिन देख-सुनकर खूब सीख लिया होगा। जा, इस लूसी को कोड़े लगा! यह हरामजादी बड़ी शरारती है।”
टॉम ने कहा – “मुझे माफ कीजिए। कृपा करके मुझे इस काम में मत लगाइए। यह मुझसे नहीं हो सकेगा। न मैंने कभी ऐसा काम किया है, न करूँगा।”
टॉम की बात सुनकर लेग्री क्रुद्ध होकर कहने लगा – “तू जरूर कर सकेगा।”
इतना कहकर और चमड़े का चाबुक लेकर वह टॉम को पीटने और उसके मुँह पर घूँसों की वर्षा करने लगा। करीब पंद्रह मिनट तक लात, घूँसे और कोड़े बरसाकर बोला – “बोल, अब भी इनकार करता है?”
टॉम की नाक से खून बहने लगा। उसे पोछते हुए उसने कहा – “सरकार, मैं दिन-रात काम करने को तैयार हूँ। इस शरीर में जितने दिन तक प्राण हैं, आपकी नौकरी बजाऊँगा; लेकिन इस काम को मैं अनुचित समझता हूँ। सरकार, यह मुझसे कभी नहीं होगा – मैं कभी नहीं करूँगा, कभी नहीं।”
टॉम बोलने में सदा से विनयी था। उसके बोलने का ढंग विशेष सम्मान-सूचक था। लेग्री ने सोचा कि टॉम डर गया है, शीघ्र ही वश में आ जाएगा। पर उसके अंतिम शब्द सुनकर कुली लोग चौंक पड़े। लूसी हाथ जोड़कर बोली – “हे भगवान!”
सब लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, सब शंकित मन से आनेवाली विपत्ति की प्रतीक्षा करने लगे।
लेग्री कुछ देर निस्तब्ध-सा और हतबुद्धि-सा रहा, लेकिन थोड़ी देर बाद गरजकर बोला – “क्यों रे हरामी के बच्चे, बोल, तू मेरी बात को अनुचित समझता है? तुझे उचित और अनुचित का विचार करने की क्या पड़ी है? क्यों बे, तू अपने को क्या समझता है? सूअर, तू अपने को बड़ा शरीफ का बच्चा समझता है कि अपने मालिक के सामने उचित-अनुचित करता है! इस छोकरी को कोड़े लगाने को तू अन्याय समझने का बहाना लगाता है।”
टॉम ने कहा – “सरकार, मैं इसे मारना अन्याय समझता हूँ। यह स्त्री रोगी और कमजोर है, इसे मारना निर्दयता है। मैं ऐसा काम नहीं करूँगा। सरकार, मुझे मारना चाहें तो मार डालें। मुझे मरना कबूल है, लेकिन इनमें से किसी को मारने के लिए मेरा हाथ नहीं उठेगा।”
टॉम ने धीमे स्वर में बातें कही थी; पर उसके वाक्यों से उसके हृदय की दृढ़ता और अटल प्रतिज्ञा का पता चलता था। लेग्री क्रोध से काँपने लगा। उसकी आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं, पर जैसे कुछ भयंकर जंतु अपने शिकार को एकदम न मारकर धीरे-धीरे खिला-खिलाकर मारते हैं, वैसे ही लेग्री ने भी टॉम को तत्काल कोई जबरदस्त सजा नहीं दी। क्रोध के वेग को तनिक रोककर वह उस पर तीव्र व्यंग्य-बाण छोड़ते हुए कहने लगा – “चलो, अंत में हम पापियों के दल में यह एक धर्मात्मा कुत्ता आ गया। यह किसी महात्मा और किसी सज्जन से कम नहीं। हम सब पाखंडी हैं। यह हम लोगों को यहाँ हमारे पापों की जानकारी कराने आया है। वाह, कैसा धर्मात्मा है! क्यों रे बदजात, तू धर्म का तो बड़ा ढोंग रचता है पर क्या तूने बाइबिल से यह बात नहीं सुनी – ‘अरे नौकरो, अपने मालिक के हुक्म की तामील करो।’ मैं क्या तेरा मालिक नहीं हूँ? तेरे इस काले शरीर के बारह सौ डालर नकद नहीं गिने? बोल, इस समय तेरी आत्मा और शरीर मेरा है या नहीं?” उसने टॉम को अपने डबल जूतों की जोर से ठोकर लगाते हुए कहा – “बोल, बोल, बता!”
इस भयंकर शारीरिक यंत्रणा में, इस घोर पाशविक अत्याचार से मुर्दार हुए रहने पर भी, टॉम के हृदय में लेग्री के इस प्रश्न से आनंद और जयोल्लास की धारा बह निकली। वह एकाएक सिर ऊँचा करके खड़ा हुआ। उसके घायल मुख से जो खून की धार बह रही थी, उस खून के साथ आँसुओं की धारा का मेल होने लगा। टॉम आँखें उठाकर विश्वासपूर्वक कहने लगा – “नहीं, नहीं, नहीं, सरकार, मेरी आत्मा आपकी कभी नहीं है। आपने इसे नहीं खरीदा है – तुम इसे नहीं खरीद सकते। यह उसी एक के हाथ बिकी हुई है, जो इसकी रक्षा करने में समर्थ है। कोई परवा नहीं, कोई परवा नहीं! इस शरीर को तुम जितना चाहो, उतना सता लो, आत्मा का तुम कुछ नहीं बिगाड़ सकते।”
लेग्री ने त्यौरी चढ़ाकर कहा – “मैं कुछ नहीं बिगाड़ सकता? देखता हूँ, देखता हूँ। अरे सांबो, कुइंबो, लो, इस सूअर को दुरुस्त करो। ऐसी मार मारो कि महीने भर खाट से सिर न उठा सके।”
दोनों यमदूत-सरीखे नर-पिशाच तत्काल टॉम को बाहर खींचकर ले गए और पीटने लगे। यह देखकर लूसी बार-बार चीखने लगी।
37. कासी की करुण कहानी
रात के दो पहर बीत चुके होंगे। चारों ओर घनघोर अँधियारी छाई हुई है। सड़ी-गली कपास और इधर-उधर फैली टूटी-फूटी चीजों से भरी हुई एक तंग कोठरी में टॉम अचेत पड़ा है। दिन भर अन्न-पानी नसीब नहीं हुआ। इससे उसके प्राण कंठ में आ लगे हैं। इस पर कोठरी में मच्छरों की भरमार। जरा आँखें बंद करने तक का आराम नहीं है।
टॉम जमीन पर पड़ा पुकार रहा है – “हे भगवान! दीनबंधु! एक बार दीन की ओर आँख उठा कर देखो! पाप और अत्याचार पर विजय पाने की शक्ति दो!”
तभी उसे अपनी कोठरी की ओर आते किसी के पैरों की आहट सुनाई पड़ी और लालटेन की मद्धिम रोशनी उसके मुँह पर पड़ी।
टॉम ने कहा – “कौन है? ईश्वर के लिए मुझे एक घूँट पानी पिला दो!”
कासी ने, जिसके पैरों की आहट सुनाई दी थी, लालटेन को जमीन पर रखकर, अपने साथ लाई हुई बोतल से थोड़ा पानी एक गिलास में निकाला और टॉम का सिर उठाकर उसे पिलाया। बुखार की तेजी के कारण टॉम ने और दो गिलास पानी पिया।
कासी ने कहा – “जितना चाहो, पानी पी लो। मैं काफी लाई हूँ। जानती थी कि ऐसी हालत में तुम्हें पानी की कितनी जरूरत होगी। तुम्हारी जैसी हालत होने पर मैं कुलियों को अक्सर पानी पिलाने जाती हूँ। आज तुम्हारे लिए पानी लेकर पहली बार नहीं आई हूँ।”
टॉम ने पानी पीकर कहा – “श्रीमतीजी, आपको बहुत धन्यवाद!”
कासी दु:खित स्वर में बोली – “मुझे ‘श्रीमतीजी’ मत कहो। मैं भी तुम्हारी तरह एक अभागिन गुलाम हूँ, बल्कि तुमसे भी गई-बीती हूँ।”
फिर कासी ने वह खाट और बिछौना भी टॉम के सामने रखा, जिन्हें वह अपने साथ लाई थी। उसने एक चादर को ठंडे जल से भिगोकर टॉम की चारपाई पर बिछाया और बोली – “मेरे अभागे साथी, किसी तरह हिम्मत करो और गिरते-पड़ते भी आकर इस खाट पर लेट जाओ।”
टॉम का सारा बदन लहू-लुहान था। उसमें हिलने-डुलने की तनिक भी शक्ति नहीं थी, परंतु बड़े कष्ट से जैसे-तैसे सरकते-सरकते वह उस ठंडे बिछौने पर जा लेटा। उस पर पहुँचते ही उसे कुछ आराम मालूम हुआ।
बहुत समय से इस नरक-जैसे अत्याचारपूर्ण स्थान में रहते-रहते कासी घावों की सफाई और उनकी परिचर्या के काम में अनुभवी हो गई थी। वह टॉम के घावों पर अपने हाथ से मलहम लगाने लगी। मलहम के लगते ही टॉम की पीड़ा और कम हो गई। इसके बाद उसने टॉम का सिर ऊँचा उठाकर उसके नीचे थोड़ी-सी रुई रख दी। फिर बोली – “तुम्हारे लिए मैं जो कुछ कर सकती थी, उतना करने की मैंने कोशिश की है।”
टॉम ने इसके उत्तर में अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट की। कासी अब जमीन पर बैठ गई और दोनों हाथ घुटनों पर लपेटकर तीव्र यंत्रणा व्यंजक भाव से एकटक सामने की ओर देखने लगी। उसके सिर का कपड़ा पीठ पर गिर गया, और उसके लंबे-लंबे काले बाल उदासी भरे मुँह के चारों ओर बिखर गए।
कुछ देर बाद कासी बोली – “इसका कोई नतीजा नहीं, अभागे साथी, तुम्हारी सारी कोशिशें बेकार हैं। तुमने आज बड़ा विलक्षण साहस दिखलाया है। न्याय भी तुम्हारी ही ओर था, पर यह लड़ाई व्यर्थ है। इसमें तुम्हारी जीत होगी, ऐसा नहीं लगता। तुम अबकी बार साक्षात् शैतान के पंजे में फँस गए हो। वह बहुत ही निर्दयी है। अंत में तुम्हें हारकर आत्म-समर्पण करना होगा-न्याय का पक्ष छोड़ना होगा।”
न्याय का पक्ष छोड़ना होगा। क्या मेरी मानसिक निर्बलता और शारीरिक यंत्रणा ने भी कुछ देर पहले चुपके से मेरे कानों में यही बात नहीं कही थी? टॉम काँप उठा। जिस प्रलोभन के साथ टॉम आज तक बराबर लड़ता चला आया था, विषाद-भरी कासी उसे उसी प्रलोभन की ‘जिंदा तस्वीर’ जान पड़ने लगी। टॉम आर्त होकर बोला – “हे भगवान! हे परम दयालु पिता! मैं न्याय का पक्ष कैसे छोड़ सकता हूँ?”
कासी ने स्थिर स्वर में कहा – “ईश्वर से पुकार करने का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। ईश्वर कुछ सुनता-सुनाता नहीं है। मेरा विश्वास है कि ईश्वर है ही नहीं, और यदि है तो वह हम-जैसे लोगों का विरोधी है। लोक और परलोक, सभी हम लोगों के विरोधी हैं। दुनिया की हर चीज हमें नरक की ओर धकेल रही है। फिर हम नरक में क्यों न जाएँ?”
टॉम ने आँखें मूंद ली। कासी के मुँह से ऐसी नास्तिकता-भरी बातें सुनकर उसका हृदय दहल उठा। कासी फिर कहने लगी – “देखो, यहाँ के बारे में तुम कुछ नहीं जानते, पर मैं यहाँ की हर चीज को जानती हूँ। मुझे यहाँ रहते पाँच बरस बीत गए हैं। मेरे शरीर और आत्मा सब इसी के पैरों के नीचे हैं, फिर भी इस नर-पशु को हृदय से घृणा करती हूँ। यहाँ पर अगर तुम जीवित ही गाड़ दिए जाओ, आग में डाल दिए जाओ, तुम्हारे शरीर की बोटी-बोटी कर दी जाए, तुम्हें कुत्तों से नुचवा डाला जाए, या पेड़ से लटकाकर कोड़ों से तुम्हारी जान तक ले ली जाए, तो भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। किसी अंग्रेज को गवाह बनाए बिना कोई अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता। और यहाँ पाँच-पाँच मील तक कोई अंग्रेज नहीं है। हो भी तो क्या? यह झूठी अंग्रेज कौम क्या किसी भी बुरे काम से परहेज करती है? वे क्या तुम्हारे-हमारे लिए अदालत में सच्ची बात कहेंगे? ईश्वर का या मनुष्य का बनाया ऐसा कोई कानून यहाँ नहीं है, जिससे हम लोगों का कुछ भला हो सके। और यह नराधम! संसार का ऐसा कोई पाप नहीं है, जिसे करने में संकोच करे। मैंने यहाँ आकर जो कुछ देखा है, उसे अगर मैं पूरा-पूरा कह सकूँ तो कोई भी आदमी मारे डर के पागल हो जाएगा। इस पाखंडी की इच्छा के विरुद्ध कोई भी काम करने का कुछ नतीजा नहीं निकलेगा। मैं क्या अपनी इच्छा से इस नीच के साथ रह रही हूँ? क्या यहाँ आने से पहले मैं एक सभ्य महिला नहीं थी? और यह – हे ईश्वर, यह व्यक्ति क्या था और क्या हो गया! फिर भी पाँच साल से इसके साथ हूँ। इन पाँच सालों में मैं दिन-रात हर घड़ी अपने भाग्य को कोसती रही हूँ। लेकिन अब यह पामर पशु मुझे छोड़कर, एक पंद्रह साल की कन्या को पत्नी बनाने को ले आया है। उसी के मुँह से मैंने सुना कि उसकी भलीमानस मालकिन ने उसे बाइबिल पढ़ना सिखाया है और वह अपनी बाइबिल यहाँ भी साथ लाई है – नरक में अपने साथ बाइबिल लेकर आई है!”
इतना कहते-कहते कासी पागल की तरह हँस पड़ी।
कासी की बातें सुनकर टॉम की आँखों के सामने अंधकार छा गया। वह हाथ जोड़कर बोल उठा – “हे नाथ, तुम कहाँ हो? क्या हम दीन-दुखियों की सुध एकदम ही बिसार दी? हे पिता, तुम्हारे सहायक हुए बिना निस्तार नहीं है।”
कासी फिर सूखेपन से कहने लगी – “और तुम्हें क्या पड़ी है जो तुम इन अभागे कुत्तों-जैसे नीच गुलामों के लिए इतना कष्ट सहते हो! इन्हें जरा-सा मौका मिलना चाहिए, फिर ये कभी तुम्हारी बुराई करने से नहीं चूकेंगे। तुम इनमें से किसी को बेंत लगाने के लिए राजी नहीं हो; पर इन्हें मालिक का इशारा मिल जाए तो ये तुरंत तुम्हें पीट डालेंगे। ये एक-दूसरे के लिए बड़े निर्दयी हैं। इनके लिए तुम्हारे कष्ट उठाने का कोई नतीजा नहीं होगा।”
टॉम बोला – “हाय! ये इतने निर्दयी कैसे हो गए? अगर मैं भी इन्हीं की तरह दूसरे साथियों को बेंत लगाने को तैयार हो जाऊँ, तो मैं भी धीरे-धीरे इन्हीं-जैसा हो जाऊँगा। नहीं-नहीं, मेम साहब, मैं सब कुछ खो चुका हूँ – पत्नी, पुत्र, कन्या, घर-द्वार सब जाता रहा। एक दयालु मालिक मिले थे, सो वे भी परलोक सिधार गए। यदि एक सप्ताह मौत उन्हें और छुट्टी दे देती तो मुझे वह गुलामी से मुक्त कर देते। इस संसार में मेरा अब कुछ नहीं रहा, कुछ नहीं रहा – मैं अपना सब-कुछ खो चुका हूँ। अब मैं अपना परलोक नहीं बिगाडूँगा। नहीं-नहीं, मैं कभी पाप नहीं कमाऊँगा।”
कासी ने कहा – “यह नहीं हो सकता कि इन पापों को ईश्वर हमारे हिसाब में दर्ज करे। जब हमें मजबूर करके पाप कराया जाता है तो इसके लिए वह हमें अपराधी नहीं ठहराएगा। वह उन्हीं के सिर पाप का बोझा लादेगा, जो हमें दबाकर पाप कराते हैं।”
टॉम ने कहा – “तुम्हारी बात ठीक है, लेकिन हाथों से पाप करते-करते हमारा हृदय कलुषित हो जाएगा। अगर मैं सांबो जैसा कठोर हृदय और दुराचारी हो जाऊँ – इससे क्या कि मैं वैसा कैसे हुआ हूँ – मेरा हृदय एक बार भी दुराचारी बना कि फिर दुराचारी ही बना रहेगा। तुम्हारे तर्क से हृदय का दुराचारी होना रोका नहीं जा सकता, मुझे सबसे बड़ा डर इसी का है।”
टॉम की बातें सुनकर कासी पागल की तरह उसकी ओर देखने लगी। लगा, जैसे सहसा किसी नए विचार ने उसके हृदय पर आघात किया हो। वह ठंडी साँस लेकर बोली – “हे भगवान, मैं भी कैसी पापिन हूँ! टॉम, तुमने सच्ची बात कही है। हाय-हाय-हाय!” … कहते-कहते गहरे मानसिक दुख से कातर होकर वह जमीन पर गिर पड़ी।
इसके बाद दोनों कुछ देर तक चुप रहे। अंत में टॉम ने क्षीण स्वर में कहा – “मेम साहब कृपा करके…”
कासी तुरंत उठ खड़ी हुई। उसका मुँह पहले-जैसा ही उदास था।
टॉम ने कहा – “मुझे पीटते समय उन लोगों ने मेरा कोट इस कोने में फेंक दिया था। उसकी जेब में मेरी बाइबिल है। आपकी बड़ी कृपा होगी, यदि आप उसे उठा दें।”
कासी कोने में गई और बाइबिल ले आई। टॉम ने बाइबिल को खोला और उसमें अपनी एक निशान-लगी हुई जगह दिखाते हुए कासी से कहा – “मेम साहब, यदि आप कृपा करके मुझे इसे पढ़कर सुना दें तो पानी पीकर मैं जितना सुखी हुआ हूँ, उससे अधिक सुखी होऊँगा।”
कासी ने सूखे हृदय और अश्रद्धा से बाइबिल को हाथ में लेकर टॉम द्वारा निशान लगाई हुई जगह से आगे पढ़ना शुरू किया। वह पढ़ना-लिखना खूब जानती थी, अत: ईसा को सूली पर चढ़ाए जाने का हाल बड़ी स्पष्टता तथा मधुरता से पढ़ने लगी। पढ़ते हुए बार-बार उसका दिल काँपने लगा। बीच-बीच में वह रुकने लगी। दो क्षण ठहरकर सँभल जाती और फिर आगे पढ़ने लगती। अंत में जब वह पढ़ते-पढ़ते “पिता, इन्हें क्षमा करना, क्योंकि ये नहीं जानते कि हम क्या कर रहे हैं।” – इस वाक्य पर पहुँची तो पुस्तक बंद करके रोने लगी। टॉम भी रो रहा था।
कुछ देर बाद टॉम ने कहा – “अगर हम लोग ईसा के दृष्टांत का अनुसरण कर सकते, तो क्या इस तरह दु:खों और कष्टों से हार मान लेते? ईसा का यह दृष्टांत तो हमें कठिनाइयों का सामना करना सिखलाता है। मेम साहब, मैं देखता हूँ कि आप खूब पढ़ी-लिखी हैं। हर बात में मुझसे बढ़-चढ़कर हैं, पर एक विषय में आपको इस गँवार टॉम से भी शिक्षा मिल सकती है। आपने कहा है कि ईश्वर गोरों के पक्ष में हम लोगों के विरुद्ध है, नहीं तो हमपर इतना अत्याचार होने पर भी वह इसका विचार क्यों नहीं करता? आपका यह संस्कार गलत बुनियाद पर टिका है। आप ध्यानपूर्वक देखें कि ईसा ने अपनी संतान के लिए कैसे-कैसे भारी कष्ट सहन किए। किस तरह ईसा ने दोनों की भाँति जीवन बिताया, और यहाँ तक कि पापियों ने अंत में उनके प्राण तक ले लिए। लेकिन क्या हममें से किसी की भी दशा उनकी-सी हुई है? निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि ईश्वर हम लोगों को भूले नहीं है। हमें यह नहीं सोच लेना चाहिए कि हमारे दु:ख और कष्ट में पड़े रहने से ईश्वर हमारा सहायक नहीं रहा। उस पर विश्वास रखकर यदि हम अपने को पापों से दूर रख सकें तो अंत में अवश्य हमें स्वर्ग मिलेगा। यह विपत्ति, यह दु:खों और कष्टों के पहाड़, हमें अग्नि में तपाए हुए सोने के समान शुद्ध करके, ईश्वर के साथ रहने योग्य बना रहे हैं।”
कासी ने कहा – “पर जिस दुर्दशा में पड़ने से हमारे लिए पाप के रास्ते से हटकर चलना मुश्किल हो जाता है, वैसी दुर्दशा में वह हमें क्यों डालता है?”
टॉम ने उत्तर दिया – “कैसा भी संकट क्यों न हो, मेरी समझ में, हम उसे पार कर सकते हैं। किसी भी दशा में पाप के मार्ग से हटकर चलना हमारे लिए असंभव नहीं है।”
कासी बोली – “सो तो तुम्हारे सामने आएगा। वे कल फिर तुम्हें सताएँगे, तब क्या करोगे? मैं यहाँ की सब बातें जानती हूँ। तुम्हें वे जैसी-जैसी तकलीफें देंगे, उनका विचार-मात्र करने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी तकलीफें दे-देकर अंत में वे तुम्हें पापकर्म करने पर मजबूर करेंगे।”
टॉम कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला – “हे भगवान! क्या तुम मेरी रक्षा नहीं करोगे? प्रभो, आप मेरे सहायक हो। देखना, तुम्हारा दास पीड़ा और अत्याचार के डर से कुमार्गी न होने पाए!”
कासी फिर बोली – “मैं यहाँ पहले ही क्रंदन और कितनी प्रार्थनाएँ सुन चुकी हूँ; पर अंत में होता यही है कि लोगों का संकल्प टूट जाता है। ये पापी उन्हें अपने वश में लाने में सफल हो जाते हैं। देखो न, उधर एमेलिन जी-जान से चेष्टा कर रही है और इधर तुम भी पूरी ताकत से अपनी कोशिश में लगे हो, पर इसका नतीजा क्या होगा- या तो तुम्हें इनकी बात माननी पड़ेगी या तुम कुत्तों से नुचवाए जाओगे।”
टॉम ने कहा – “अच्छा, तो मुझे मरना ही मंजूर है। उन्हें जी चाहे उतना सता लेने दो। एक-न-एक दिन मरना तो अवश्य ही है। उसे तो कोई टाल नहीं सकता। मार डालने के सिवा वे मेरा कुछ और बिगाड़ ही नहीं सकते। मरने पर इनके हाथों से मुक्त हो जाऊँगा। ईश्वर मेरे साथ है, वही मुझे इस परीक्षा में उत्तीर्ण करेगा।”
कासी ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वह अपनी आँखें गड़ाए पृथ्वी की ओर देखती रही।
कुछ देर बाद वह आप-ही-आप बुदबुदाने लगी – “यह हो सकता है! पर जो अत्याचार और उत्पीड़न से अधीर होकर आगे बढ़ चुके हैं, उनके लिए तो कोई आशा ही नहीं है, कुछ भी नहीं है। अपवित्रता में पड़े-पड़े हमारा यहाँ तक पतन हो जाता है कि हमें अपने-आप से ही घृणा हो जाती है। मरने की इच्छा होती है, पर आत्महत्या करने का साहस नहीं होता। कोई आशा नहीं है! हाय-हाय! कोई आशा नहीं है! यह बालिका एमेलिन… उस समय ठीक मेरी भी यही उम्र थी।”
बड़ी शीघ्रता से बोलते हुए, उसने टॉम से कहा – “तुम देखते हो, आज मैं क्या हो गई हूँ। मैं भी कभी ऐश्वर्य की गोद में पली थी। मुझे याद है कि मैं बचपन में गुड़िया की तरह सज-धजकर मौज से खेलती फिरती थी। सभी संगी-साथी और हमारे घर आनेवाले मेरे रूप की प्रशंसा किया करते थे। हमारे यहाँ एक बाग था। उसमें मैं अपने भाई-बहनों के साथ नारंगियों के पेड़ों के नीचे आँख-मिचौनी खेला करती थी। मुझे ग्यारह साल की उम्र में एक पाठशाला में भेजा गया। वहाँ मैंने गाना-बजाना, फ्रेंच भाषा तथा अन्य कितनी ही बातों की शिक्षा पाई। लेकिन पिता की मृत्यु के कारण, मुझे चौदह साल की उम्र में घर वापस आना पड़ा। उनकी मृत्यु अकस्मात् हो गई थी। उनके पीछे जब सारी संपत्ति का हिसाब लगा कर देखा गया, तब मालूम हुआ कि इतने से तो कर्ज भी मुश्किल से चुकेगा। लेनदारों ने जायदाद की सूची बनाते समय मेरा नाम भी उसमें चढ़ा दिया। मैं मोल ली हुई दासी के गर्भ से जन्मी थी, पर मेरे पिता सदा मुझे मन-ही-मन स्वतंत्र कर देने की इच्छा रखते थे। किंतु उन्होंने यह किया नहीं था, इससे मैं भी जायदाद की सूची में चढ़ाई गई। मैं सदा से जानती थी कि मैं कौन हूँ, पर इस संबंध में मैंने कभी अधिक नहीं सोचा। किसी को भी यह आशंका नहीं थी कि ऐसा हट्टा-कट्टा और तंदुरुस्त आदमी इतनी जल्दी मर जाएगा। मेरे पिता की देखते-देखते, हैजे से मृत्यु हो गई थी। उनकी अंत्येष्टि-क्रिया के दूसरे ही दिन उनकी विवाहिता स्त्री सब बाल-बच्चों को लेकर अपने पिता के घर चल दी और मुझे वहीं वकील के जिम्मे छोड़ दिया। उनके इस व्यवहार से मैं बड़ी चकित हुई, पर इसका कारण मेरी समझ में नहीं आया। जिस वकील को अन्य सब चीजों के साथ मुझे सौंपा गया था, वह हमारे घर के पास-पड़ोस में ही रहता था और नित्य ही एक बार घर आया करता था। मुझसे उसका व्यवहार बड़ी सज्जनता का था। एक दिन वह अपने साथ एक रूपवान युवक को लाया। वह युवक मुझे इतना सुंदर मालूम हुआ कि वैसा सुंदर आदमी मैंने इससे पहले नहीं देखा था। मैं उस संध्या को कभी नहीं भूलूँगी। मैं बाग में उसके साथ टहली थी। मैं रंज और दु:ख से अकेली मुर्दा-सी पड़ी रहती थी। उसने मेरे साथ ऐसी दया और सज्जनता का व्यवहार किया कि मैं क्या कहूँ! उसने मुझसे कहा कि मदरसे में जाने से पहले उसने मुझे देखा था और तभी से मुझपर उसका प्रेम हो गया था। अब वह मेरा बंधु और रक्षक बनना चाहता था। असल बात यह थी, यद्यपि उसने मुझसे कही नहीं थी कि उसने मुझे दो हजार डालर में खरीद लिया था, और मैं उसकी संपत्ति थी, फिर भी इच्छा से मैंने उसे आत्म-समर्पण कर दिया, क्योंकि मैं उससे प्रेम करती थी। हाय! मेरा उस पर कितना प्रेम था! अब मेरा उस पर कितना प्रेम है, और जब तक मेरी साँस है तब तक रहेगा भी। वह कितना सुंदर, कितना उदार और कितने महान दिल का था। उसने मुझे दास-दासी, घोड़ा-गाड़ी, बाग-बगीचे, कपड़े-जेवर तथा अन्य प्रकार की सामग्रियों से भरे, एक बहुत सजे हुए मकान में रखा था। धन से जो भी चीजें मिल सकती हैं वे सब उसने मुझे दीं। पर मैं उन चीजों की कुछ भी कदर नहीं करती थी – मैं तो केवल उसी को चाहती थी और उसकी जरा-सी इच्छा पर सर्वस्व वार सकती थी।
“मेरी केवल एक ही इच्छा थी – मैं चाहती थी कि वह मुझे शास्त्रविधि से ब्याह ले। मैं सोचती थी कि जब वह मुझसे इतना प्रेम करता है, तो विवाह करके वह मुझे अवश्य दासता की बेड़ियों से मुक्त कर देगा। पर जब भी मैं उसके सामने यह बात उठाती, वह कहता कि यह बात लोकाचार और देशाचार की दृष्टि में निषिद्ध होने के कारण असंभव है। वह मुझे समझाता – यदि हम दोनों एक-दूसरे से विश्वासघात न करें, तो, यहाँ न सही, ईश्वर के यहाँ हम दोनों विवाहित ही हैं। अगर यह सच है तो क्या मैं उसकी पत्नी न थी? क्या मैंने उससे कभी विश्वासघात किया था? क्या सात बरस तक मैं उसकी प्रकृति का अध्ययन नहीं करती रही? एक बार उसे मियादी बुखार हो गया था, उस समय लगातार इक्कीस दिन तक मैं उसकी सेवा करती रही। मैंने अकेले अपने हाथ से उसका सारा दवा-पानी और पथ्य आदि सब-कुछ किया। अच्छा होने पर वह मुझे अपनी मंगलकारिणी देवी कहा करता और कहता कि मैंने ही उसकी जान बचाई है। हमारी दो सुंदर संताने हुईं। पहला पुत्र था और पिता के नाम पर उसका नाम हेनरी रखा गया। उसकी सूरत-शक्ल ठीक अपने पिता-जैसी थी। सुंदर नेत्र, चौड़ा और खुला माथा, लटकते घुँघराले बाल सब उसके पिता-जैसे ही थे। रूप के साथ ही उसने अपने पिता का तेज और दूसरे गुण भी पाए थे। छोटी संतान एलिस नाम की कन्या थी, जिसे वह मुझसे मिलती हुई बताया करता था। उसे मुझपर और अपनी दोनों संतानों पर बड़ा गर्व था। वह मुझे और अपने दोनों बच्चों को कपड़ों और जेवरों से खूब सजा-सजाकर अपने साथ खुली गाड़ी पर हवा खिलाने ले जाता था। रास्ते में मिलनेवाले लोग मेरे और मेरी संतानों के रूप की जो प्रशंसा करते, उसे वह हवाखोरी से लौटकर मुझे रोज सुनाता था। वे कैसे सुख के दिन थे! मैं संसार में अपने को सबसे अधिक सुखी मानती थी। पर अचानक ही वह सुख मुझसे छिन गया। दु:ख की घड़ियाँ शुरू हो गईं। उसका एक चचेरा भाई, जिसे वह अपना बड़ा मित्र और संसार भर में एक ही मित्र समझता आया था, वहाँ आया। न जाने क्यों, उसे प्रथम बार देखते ही मुझे डर मालूम हुआ। मुझे मेरी आत्मा ने बताया कि यह हम लोगों पर मुसीबत ढाएगा। वह व्यक्ति हेनरी को रोज घुमाने ले जाता और घर लौटते प्राय: रात के दो-दो तीन बज जाते। इसके लिए मेरा एक शब्द कहने का साहस न होता, क्योंकि मैं जानती थी कि वह बड़ा अभिमानी है। इसी से मुझे बड़ा भय मालूम होता था। वह दुराचारी उसे जुओं के अड्डों की हवा खिलाने लगा और धीरे-धीरे उसे उसमें बिल्कुल लिप्त कर दिया। उसका तो स्वभाव था कि किसी चीज में फँस जाने के बाद उससे निकलना असंभव था। इसके बाद उसने उसका एक और अंग्रेज युवती से परिचय करा दिया। मैंने शीघ्र ही देख लिया कि उसका हृदय मेरे हाथ से निकल गया है। उसने मुझसे खुलकर कभी कहा तो नहीं, पर मैंने सब समझ-बूझ लिया। दिन-दिन मेरी छाती फटती जाती, पर मैं मुँह खोलकर कुछ न कह पाती। इधर जुए में हारते-हारते वह कर्जदार हो गया। तब उस पाजी ने उसे सलाह दी कि वह मुझे मेरी संतानों सहित बेचकर पहले ऋण चुकाए और बाद में उस अंग्रेज युवती से विवाह कर ले। और स्वयं आगे बढ़कर वह हम लोगों को खरीदने को तैयार हो गया। तब हेनरी ने दोनों संतोनों सहित मुझे उस सत्यानाशी के हाथ बेच डाला। एक दिन हेनरी ने मुझसे कहा कि किसी काम से दो-तीन हफ्तों के लिए उसे बाहर जाना है। उसने आज और दिनों की अपेक्षा अधिक प्रेम दिखाया और कहा कि मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा। पर मैं भुलावे में नहीं आई। मैंने समझ लिया कि सत्यनाश का समय आ पहुँचा है। मैं बोल न सकी, आँखों ने आँसू बहाए। उसने मुझे और बच्चों को बार-बार चूमा, फिर बाहर खड़े घोड़े पर सवार होकर चला गया। मैं एकटक उसकी ओर देखती रह गई। उसके आँखों से ओट होते ही मैं अचेत गिर पड़ी।”
“उसके दूसरे दिन वह पाखंडी बटलर मेरे पास आया और बोला कि मैंने तुम्हें तुम्हारी दोनों संतानों सहित खरीद लिया है। उसने मुझे लिखे हुए कागज भी दिखलाए। मैंने उसे बार-बार शाप देकर कहा कि मैं जीते-जी कभी तेरे साथ नहीं रहूँगी।”
“बटलर ने कहा, ठीक है! तुम्हारी जैसी इच्छा! पर देख लो। अगर नहीं मानती हो तो मैं तुम्हारी दोनों संतानों को ऐसी जगह बेच डालूँगा, जहाँ तुम फिर कभी उन्हें नहीं देख सकोगी।”
“उसने आगे कहा कि मुझे मोल लेने के अभिप्राय से ही उसने जाल रचकर हेनरी को कर्जदार बनाया और एक दूसरी स्त्री के साथ उसे लगाकर मुझे बेचने की सलाह दी। वह पाखंडी कहने लगा – “मैं दो-चार बूँद आँसुओं अथवा तिरस्कारों से हटनेवाला नहीं हूँ। तुम मेरी मुट्ठी में हो। मेरी बात न मानने में तुम्हारी भलाई नहीं है।”
मैंने देखा कि मेरे हाथ-पैर बँधे हैं – मेरी दोनों संतानें उसी के हाथ में थीं। मैं जब उसकी इच्छा के खिलाफ कुछ करती तो वह उन्हें बेच डालने की धमकी देता। संतानों की रक्षा के लिए मैं उसके वश में हो गई। पर वह कैसा घृणित जीवन था। हृदय में दिन-रात मर्मभेदी यंत्रणा की आग धधकती रहती थी। जिस नर-पशु को मैं रोम-रोम से घृणा करती और जिसे देखकर हर समय मेरी क्रोधाग्नि भभक उठती थी, उसी के पैरों में मुझे देह, आत्मा, और सर्वस्व की आहुति देनी पड़ी! हेनरी के सामने मैं सदा खुशी से पढ़ती, नाचती और गाती थी, पर इस व्यक्ति की खुशी के लिए मुझे जो कुछ करना पड़ता था वह मैं बड़े भय और अनिच्छा से करती थी। किंतु जिन दो संतानों के लिए मैं उस पापी के वश में हुई, उनसे वह बड़ा ही रूखा व्यवहार करने लगा। मेरी कन्या बड़ी भयभीत थी, वह उसके डर से सदा सशंक रहती। पर मेरा पुत्र अपने पिता की भाँति तेजस्वी और स्वाधीनता-प्रिय था। वह सदा उस नीच के साथ लड़ता-झगड़ता रहता था। यह देखकर मैं सदा डरा करती और अपनी दोनों संतानों को सदा उससे दूर रखती। पर मेरे सब कुछ करते रहने पर भी उस निर्दयी ने मेरी दोनों प्रिय संतानों को बेच डाला। कब और किसके हाथ बेचा, यह मुझे मालूम नहीं हो सका। एक दिन वह पापी मुझे साथ लेकर घूमने गया, परंतु फिर घर लौटने पर मुझे अपनी संतान का मुँह देखने को नहीं मिला। पूछते ही उस नर-पिशाच न बिना किसी हिचक-संकोच के कहा कि उन दोनों को बेच दिया गया है। उसने मुझे रुपए-उनके खून के दाग-दिखाए। संतान की बिक्री की बात सुनकर मैं पागल-सी हो गई। मेरा भले-बुरे का ज्ञान जाता रहा, मैं उसे ईश्वर के नाम पर शाप देने लगी और उस पर तरह-तरह की गालियों की वर्षा करने लगी। मेरी यह दशा देखकर वह पाखंडी कुछ भयभीत हुआ। पर जिन्होंने षड़यंत्र, धोखादेही, चालाकी और जालसाजी को ही अपना अस्त्र बना रखा है, उनका हृदय कभी नहीं हारता, कभी नहीं पसीजता। ये लोग ऐसे जाल फैला करके ही लोगों को फुसलाने की चेष्टा करते हैं। वह धूर्त फिर मुझे कौशल द्वारा वशीभूत करने के लिए कहने लगा कि यदि मैं उसकी आज्ञा में नहीं रहूँगी तो मेरी संतानों को और भी बड़ी तकलीफें सहन करनी पड़ेंगी; लेकिन यदि मैं उसके आदेशों को मानकर चलूँगी तो वह कभी-कभी संतानों को देखने का अवसर देगा और वह फिर से खरीदकर भी ला सकता है। किसी स्त्री की संतान को कब्जे में कर लेने के बाद फिर उस स्त्री से आप चाहे जो करा सकते हैं। उस पाखंडी ने इस प्रकार भय दिखाकर और आशा बँधाकर फिर वश में कर लिया। इस प्रकार दो-तीन सप्ताह एक प्रकार से निर्विरोध बीते। फिर एक दिन जब मैं दंड-गृह के पास होकर घूमने जा रही थी, वहाँ भीड़ देखकर तथा एक बालक की चीख-पुकार सुनकर मैं कुछ दूर पर खड़ी हो कर देखने लगी। तत्काल उस घर में से मेरा हेनरी तीन-चार आदमियों को धक्के देकर चिल्लाता हुआ निकला और दौड़कर उसने मेरा कपड़ा पकड़ लिया। वे तीनों-चारों आदमी बड़ी बुरी गालियाँ बकते हुए उसे पकड़ने के लिए दौड़े आए। उनमें एक नर पिशाच-सा अंग्रेज था। वह कहने लगा कि मैं हैनरी को दंड-गृह को ले जा रहा था कि वह हाथ छुड़ाकर भाग आया है और अब उसे चौगुनी सजा दी जाएगी। उस आदमी का चेहरा मुझे जीवन भर न भूलेगा। वह हृदय-हीनता का साक्षात् अवतार लगता था। मैं उस समय अत्यंत विनयपूर्वक उन लोगों से पुत्र हेनरी को छोड़ देने के लिए कहने लगी, पर मेरी कातरता देखकर उलटे वे सब हँसने लगे। हेनरी बड़ी निराश दृष्टि से मेरी ओर देखकर रोने लगा। उसने मजबूती से मेरा कपड़ा पकड़ लिया। दंड-गृह के वे निर्दयी मनुष्य उसे खींच ले जाने के लिए मेरे कपड़े का भी कुछ अंश फाड़कर ले गए। जब उसे जबर्दस्ती ले जाया जाने लगा तो वह ‘माँ! माँ’ कहकर चीखने लगा। मेरे पास एक भलामानस आदमी खड़ा था। मैंने उससे कहा, ‘मेरे पास जो कुछ रुपए हैं, उन्हें मैं तुम्हें देती हूँ। तुम कृपा करके किसी तरह मेरे पुत्र को बेंत की सजा से बचा लो।’ वह सिर हिलाकर बोला, ‘नहीं-नहीं, जो आदमी इसे यहाँ लाया है, वह किसी तरह इसे माफ नहीं करेगा। वह कहता है कि यह कैसे भी काबू में नहीं आता, कोड़े लगवाने के सिवाय और कोई उपाय इसे काबू में लाने का नहीं है।’ मैं दौड़ती-दौड़ती घर आई। पूरे रास्ते हेनरी का क्रंदन और उसकी चीख-पुकार मेरे कानों में आती रही। मैंने घर पहुँचते ही उस नराधम बटलर के कमरे में जाकर बहुत घिघियाते हुए, बड़ी विनय के साथ, हेनरी को इस संकट से बचाने के लिए कहा। वह पामर हँसते हुए बोला, ‘बहुत ठीक हुआ! हेनरी जैसी शरारतें करता है, वैसा ही नतीजा भी है। बिना कोड़ों के वह दुरुस्त होने का भी नहीं।’
उस निष्ठुर नीच का यह हृदयहीन व्यवहार देखकर और उसके मुँह से ऐसे मर्मबेधी वचन सुनकर मैं उन्मत्त-सी हो गई। मुझे लगा, मानो मेरे सिर पर वज्र गिरा हो। मेरा सिर घूम गया। मैंने भयंकर मूर्ति धारण की। इसके बाद क्या हुआ, सो मुझे याद नहीं। केवल इतना याद है कि सामने मेज पर पड़ी छुरी उठाकर मैं उसका सिर धड़ से जुदा कर देने को झपटी थी। इसके बाद मैं बेहोश हो गई और फिर कई दिन तक उसी दशा में पड़ी रही।
जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि एक अपरिचित सुंदर कमरे में पड़ी हुई हूँ। एक काली स्त्री मेरी सेवा-सुश्रूषा में लगी हुई है। एक डाक्टर मुझे रोज देखने आता है। मेरे लिए बड़ी सावधानी बरती जा रही है। थोड़ी देर बाद मुझे मालूम हुआ कि वह पापी मुझे यहाँ बेचने के लिए छोड़कर चला गया है और यही कारण है कि ये लोग मेरे लिए इतना कष्ट उठा रहे हैं।
अब मुझे जीने की कोई साध न थी। मैं हमेशा मौत को बुलाती थी, पर उसने मुझे अपनाया नहीं। अनिच्छा होते हुए भी मैं दिन-ब-दिन ठीक होने लगी और अंत में फिर पहले तरह चंगी हो गई।
इसके बाद वहाँवाले मुझे अच्छे और कीमती वस्त्र पहनने को देते। कई धनी लोग वहाँ आते, मेरे पास आकर बैठते, मेरे शरीर की जाँच करते, मेरे साथ तरह-तरह की बातें करते और वहाँवालों से मेरे मूल्य को लेकर मोल-तोल करते। पर मैं ऐसी उदासीन बनी बैठी रहती कि कोई मुझे खरीदने का आग्रह न करता। यह देखकर वहाँवाले मुझे कोड़े लगाने को तैयार होते और हँसी-खुशी से बातें करने को कहते। अंत में एक दिन कप्तान स्टुअर्ट नाम का एक साहब आया। वह कुछ सहृदय जान पड़ा। उसने समझ लिया कि किसी गहरे शोक के कारण मेरी यह दशा हो गई है। उसने अनेक बार अकेले में भेंट करके मुझसे अपनी दु:खों की कहानी सुनाने के लिए कहा। आखिर उसने मुझे खरीद लिया और वचन दिया कि जहाँ तक होगा, वह मेरी दोनों संतानों की तलाश करके खरीदने की चेष्टा करेगा। हेनरी की तलाश करने पर उसे पता चला कि वह पर्ल नदी के पार किसी खेतिहर के हाथ बेच दिया गया था। इस प्रकार हेनरी को फिर से खरीदे जाने की आशा समाप्त हो गई। पुत्र के संबंध में मैंने वही अंतिम बात सुनी थी, तब से आज अठारह वर्ष हो गए, कुछ नहीं सुना। फिर वह मेरी कन्या की खोज में गया और देखा कि एक वृद्ध स्त्री उसका पालन कर रही है। स्टुअर्ट ने एक बड़ी रकम देकर उसे खरीदना चाहा, किंतु नर-पिशाच दुष्टात्मा बटलर जान गया कि मेरे ही लिए स्टुअर्ट मेरी कन्या को खरीद रहा है, अत: मुझे कष्ट देने की इच्छा से उसे स्टुअर्ट के हाथ नहीं बेचा। कप्तान स्टुअर्ट बहुत ही नरम दिल का था। वह मुझे साथ लेकर अपने कपास के खेतवाले मकान में जाकर रहने लगा। मैं भी वहाँ उसके साथ ही रहने लगी। एक वर्ष के भीतर ही स्टुअर्ट से मेरा एक लड़का पैदा हुआ। ओह! कैसा सुंदर था वह। मैं उसे कितना प्यार करती थी। देखने में वह ठीक हेनरी-जैसा था। परंतु मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था कि संतान को पाल-पोसकर बड़ा नहीं करूँगी। पंद्रहवें दिन मैंने उस बालक को बार-बार चूमा, बार-बार उसकी ओर देखा, और तब उसे अफीम खिलाकर छाती से चिपटाकर सो गई। बालक चिरनिद्रा में डूब गया। दो ही घंटे बाद उसकी साँस बंद हो गई। सारी रात मैं उसे छाती से लगाए रही। फिर मैंने कई बार उसका मुँह चूमने के बाद कहा, ‘बेटा, मैंने तुझे इन पाखंडी गोरों के हाथों से मुक्त कर दिया। अब तुझे दासी के गर्भ से जन्म लेने के कारण कोई कष्ट न उठाना पड़ेगा।’ इस तरह अपने ही हाथों अपने पुत्र के मारे जाने से मुझे कोई कष्ट न हुआ, बल्कि उलटे इस खयाल से कि मैंने उसे अत्याचार और उत्पीड़न से बचा दिया, मुझे कुछ संतोष ही हुआ। और यह अच्छा ही हुआ। गुलाम अपनी संतान को मौत के सिवा अधिक सुखदायी और शांतिप्रद दूसरी क्या चीज दे सकते हैं? कुछ दिनों के बाद कप्तान को हैजे की बीमारी हुई और वह मर गया। संसार की कैसी उलटी गति है! जो लोग जीना चाहते हैं, वे मर जाते हैं और मुझ-जैसे अभागे, जो बार-बार मौत माँगते हैं, जीवित रहते हैं।
“स्टुअर्ट के मरने के बाद, उसके उत्तराधिकारियों ने मुझे बेच डाला। इस प्रकार मैं एक-एक करके कई आदमियों के हाथों में रही। उसके बाद यह नर-पिशाच मुझे खरीद लाया और पाँच बरस से मैं यहाँ हूँ।”
यह कहते-कहते कासी का कंठ सूख गया, वह और आगे नहीं बोल सकी। मालूम होता है, लेग्री का ख्याल आते ही उसके हृदय में एक विशेष प्रकार का शोक, दु:ख तथा विद्वेष का भाव जाग उठा था।
यह कहानी सुनाते समय कासी कभी टॉम को संबोधन करके कह रही थी और कभी अपने-आप ही, पागलों की तरह बोलती चली जा रही थी।
कासी की जीवन-कहानी सुनते-सुनते टॉम अपने शारीरिक दु:ख को एकदम भूल गया। वह अपनी आँखों से एकटक कासी को देखे जा रहा था। उसने अपने हाथों का सहारा लिया हुआ था।
कुछ देर ठहरने के बाद कासी ने फिर कहा – “टॉम तुम मुझसे कहते हो कि पृथ्वी पर परमेश्वर है और वह सब-कुछ देखता है। हो सकता है कि ईश्वर हो। मैं जब शिक्षाश्रम में थी, तब वहाँ की भगिनियाँ (सिस्टर्स) मुझसे कहा करती थीं कि एक दिन मनुष्यों के पाप और पुण्य का विचार होगा। पर क्या उस दिन गोरों को अपने पापों का नतीजा नहीं भोगना पड़ेगा? क्या वे अपने पापों के लिए दंड नहीं पाएँगे? उनकी समझ में हम लोगों को कोई कष्ट नहीं है। हम लोगों के दिलों में अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ दु:ख नहीं होता है। हम लोगों की संतानों को भी कोई कष्ट नहीं होता है किंतु मुझे मालूम होता है कि केवल मेरे हृदय में शोक की जो आग दबी हुई है, उससे ही यह सारा देश भस्म हो सकता है। मैं ईश्वर से यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझ सहित यह सारा देश पृथ्वी के गर्भ में समा जाए, पृथ्वी से आग निकले और यह पूरा देश जलकर खाक हो जाए। वह विचार का दिन शीघ्र आए। जिन अत्याचारी अंग्रेजों ने मेरा और मेरी संतान का सत्यानाश किया है, जिन्होंने न केवल हमारे शरीरों बल्कि आत्माओं तक का निर्मम विनाश किया है, उन लोगों के विरुद्ध मैं राजाधिराज ईश्वर के सामने खड़ी होकर अपील करूँगी, उनसे विनयूपर्वक न्याय करने की प्रार्थना करूँगी।”
“बचपन में धर्म पर मेरी विशेष भक्ति थी, ईश्वर पर मेरा प्रेम था और मैं उसकी उपासना करती थी। अब तो मेरे शरीर और आत्मा का बिल्कुल पतन हो गया है। शैतान सदा मेरे सिर पर सवार रहता है। वह मुझे अपने हाथ से अत्याचारों और कठोरताओं का प्रतिफल देने को उकसाता है। इसी बीच में किसी दिन इस अत्याचार का फल दूँगी। इस नर-पिशाच लेग्री को ठिकाने लगाऊँगी। किसी रात्रि को मौका मिलते ही अपना मनोरथ सिद्ध करूँगी।”
यह कहकर कासी अकस्मात खिल-खिलाकर हँस पड़ी, और तभी सहसा वह अचेत होकर गिर पड़ी। कुछ देर बाद वह होश में आई और सँभलकर उठ बैठी। फिर टॉम से बोली – “बोलो, तुम्हारे लिए और क्या करना होगा? और पानी दूँ?”
जब कासी के मुँह से दया की बात निकली, तब तो वह साक्षात दया की देवी जान पड़ती; पर जब वह प्रतिहिंसा से उत्तेजित होती तो ठीक राक्षसी-जैसा रूप धारण कर लेती। इस संसार में सभी मनुष्यों का यही हाल है। वे कभी देव और कभी दानव का स्वाँग करते रहते हैं। जब दया, प्रेम और भक्ति की लहर चढ़ी रहती है तब मनुष्य देवता जान पड़ता है; पर द्वेष और प्रतिहिंसा का भाव आते ही वह दानव की शक्ल में बदल जाता है।
टॉम ने पानी पिया और दयापूर्ण हृदय तथा व्याकुल नेत्रों से उसकी ओर देखकर कहा – “मेम साहब, मैं चाहता हूँ कि आप उस ईश्वर की शरण लें जो दु:खी, पापी, ज्ञानी, सबको बिना भेद-भाव के शांति का अमृत प्रदान करता है।”
कासी ने कहा – “टॉम, बताओ, वह ईश्वर कहाँ है? कौन है? मैं उसके पास जाना चाहती हूँ।”
टॉम बोला – “उसके संबंध में अभी आपने मेरे सामने पढ़ा है।”
कासी ने कहा – “बचपन में कभी मैंने उसका सिंहासन पर बैठे हुए चित्र देखा था, पर वह यहाँ नहीं है। यहाँ पाप और अत्याचार के सिवा और कुछ नहीं दीख पड़ता है।”
इतना कहकर कासी छाती पीटने लगी। टॉम ने फिर कुछ कहना चाहा, परंतु कासी ने उसे रोककर कहा – “बस, अब सो जाओ, बातें न करो!”
यह कहकर उसने पानी का पात्र उसके पास रखा और फिर उसके आराम का इंतजाम करके उस कोठरी से चली गई।
38. भभकती यंत्रणा
लेग्री अपने घर में बैठा ब्रांडी ढाल रहा है और गुस्से से आप-ही-आप भनभना रहा है – यह इसी सांबो की बदमाशी है।… इसी का उठाया हुआ सब बखेड़ा है। टॉम एक महीने में भी उठने-बैठने लायक होता नहीं दिखाई देता। इधर फसल का कपास चुनने का समय आ गया। कुलियों की कमी से बहुत नुकसान होगा, कारोबार ही बंद हो जाएगा। सांबो अगर शिकायत न करता तो यह बखेड़ा ही न उठता।
लेग्री की ये बातें समाप्त भी न होने पाई थीं कि पीछे से किसी ने कहा – “असल में यही बात है! इन बखेड़ों में हानि के सिवा कोई लाभ नहीं है।”
लेग्री ने पीछे को घूम कर देखा तो वहाँ कासी को खड़े पाया। लेग्री ने कहा – “क्यों री चुड़ैल, तू फिर आ पहुँची।”
कासी ने कहा – “हाँ, आ तो गई हूँ।”
लेग्री बोला – “तू बड़ी झूठी है, बड़ी कुलटा है। मैं कहता हूँ, मेरा कहना मान, शांति से रहा कर, नहीं तो मैं तुझसे कुली का काम कराऊँगा।”
कासी ने उत्तर दिया – “एक बार नहीं, हजार बार मैं कुली का काम करूँगी। मुझे कुलियों की तरह टूटी झोपड़ी में रहना मंजूर है, पर आगे से मैं तेरी छाया में नहीं रहना चाहती।”
लेग्री बोला – “तू मेरे पैरों-तले तो अब भी है। खैर, जाने दे, झगड़े की जरूरत नहीं (कासी की कमर में हाथ डालकर और उसकी कलाई पकड़कर) मेरी प्यारी, मेरी जान, इधर आ और मेरी जाँघ पर बैठ! सुन मैं तेरे फायदे की बात कहता हूँ।”
कासी ने कड़ककर कहा – “खबरदार! मुझे छूना मत। मुझपर शैतान सवार है।”
कासी की लाल-लाल आँखें और कड़कती आवाज सुनकर लेग्री थोड़ा सहम गया। वास्तव में लेग्री के डरने का कुछ विलक्षण कारण है। पर उसने डरने पर भी अपने मन का भाव छिपाते हुए पहले तो कासी को धमकाया – “जा, जा, चल यहाँ से!” फिर कुछ देर के बाद बोला – “कासी, तू ऐसा व्यवहार क्यों करती है? पहले जैसे तू मुझपर प्रेम किया करती थी, मित्रता का बर्ताव करती थी, वैसे अब क्यों नहीं करती?”
कासी ने रुखाई से कहा – “क्या कहा? मैं तुमसे प्रेम करती थी!” किंतु इतना कहते-कहते उसका गला रुक गया।
पशुओं-जैसा आचरण करनेवाले पुरुषों को उन्मत्त स्त्रियाँ सहज में दबा सकती हैं। कासी भी जब चाहती, लेग्री को दबा लेती। पर आजकल कासी के साथ लेग्री का झगड़ा हो रहा था। वह एमेलिन को उपपत्नी बनाने की गरज से लाया था, पर वह किसी तरह अपना धर्म छोड़ने को राजी नहीं होती थी। इससे दुराचारी लेग्री एमेलिन पर तरह-तरह के अत्याचार करता था, जब-तब उस पर आक्रमण करने की भी इच्छा करता था। एमेलिन की दुर्दशा देखकर कासी के हृदय की सहानुभूति जाग उठती थी। इससे वह एमेलिन का पक्ष लेकर तरह-तरह की चतुराइयों से उसे लेग्री के आक्रमणों से बचाती थी। इसी लिए कासी और लेग्री का विवाद बढ़ गया था। लेग्री ने कासी को तंग करने के लिए अन्य कुलियों के साथ खेत पर भेज दिया। उसने सोचा, इससे कासी की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। पर वह इससे भी उसके वश में न हुई और उसकी उपेक्षा करके खेत का काम करने को तैयार हो गई। यही कारण था कि इसके पहले दिन कासी कुलियों के साथ खेतों पर काम करने गई थी। कासी का यह आचरण देखकर लेग्री के मन में बड़ी बेचैनी पैदा हो गई। पहले दिन खेत में किए हुए काम की जाँच के समय लेग्री ने उसके साथ मेल करने की इच्छा से, कुछ सांत्वना-मिश्रित घृणा के भाव से, उससे बातें की थीं। पर कासी उससे मुँह फेरकर चली गई। आज फिर लेग्री कहने लगा – “कासी, तुम सीधी-सादी होकर रहो, उत्पात मत बढ़ाओ।”
कासी ने जवाब में कहा – “मुझी को क्यों कहते हो? तुम स्वयं क्या कर रहे हो? तुम सिर्फ दूसरों को कहना जानते हो। तुम्हें खुद तो जरा-सी भी अक्ल नहीं है। इन काम के दिनों में तुमने एक परिश्रमी और काम-काजी आदमी को अपनी सनक में आकर पीट-पाटकर निकम्मा बना दिया। इस काम में तुमने कौन-सी अक्लमंदी की?”
लेग्री बोला – “सचमुच मैंने बेवकूफी की है, लेकिन यह भी तो सोचो कि कोई आदमी जिद पकड़ ले तो उसे दुरुस्त भी तो करना चाहिए!”
कासी ने कहा – “मैं कहती हूँ, इस विषय में वह तुम्हारे किए कभी दुरुस्त नहीं होने का।”
लेग्री ने तब क्रोध से उठते हुए कहा – “मुझसे दुरुस्त नहीं होने का? मैं करके देखूँगा, होता है कि नहीं। ऐसा तो आज तक कोई गुलाम मुझे नहीं मिला, जो मेर हाथ से दुरुस्त न हुआ हो। मैं उसकी हड्डी-पसली चूरकर दूँगा!”
उसी समय कमरे का द्वार खोलकर सांबो अंदर आया। वह हाथ में एक काली-सी पोटली लटकाए हुए था। उसे देखकर लेग्री ने कहा – “क्यों बे सूअर, तेरे हाथ में क्या है?”
सांबो ने कहा – “सरकार जादू की पुड़िया!”
लेग्री बोला – “वह क्या होती है?”
सांबो ने उत्तर दिया – “हब्शी लोग जादू की पुड़िया पास रखते हैं। इसके पास रहने से कोड़ों की मार असर नहीं करती। टॉम ने काले डोरे से इसे गले में बाँध रखा था।”
ईश्वर-शून्य हृदय कायरता और कुसंस्कारों के पनपने के लिए उपयुक्त होता है। लेग्री को ईश्वर पर जरा भी विश्वास न था, इसी से उसका मन नाना प्रकार के कुसंस्कारों का घर बना हुआ था।
ज्योंहि उसने पोटली को हाथ में लेकर खोला, त्योंही उसमें से एक चांदी का सिक्का और लंबे-घुँघराले बालों का एक गुच्छा निकला। सुवर्ण की तरह चमकता हुआ वह बालों का गुच्छा, किसी जीवित पदार्थ की तरह, लेग्री की उँगलियों से चिपट गया। वह भय से चिल्लाकर बोल उठा – “चूल्हे में जाए!” उसका तात्कालिक भाव देखकर मालूम हुआ, मानो बालों के इस गुच्छे के छू जाने से उसका हाथ जल रहा है। वह जोर से जमीन पर लात पटककर, अँगुलियों से बालों को छुड़ाकर फेंकते हुए सांबो से बोला – “तुझे ये बाल कहाँ मिले? ले, अभी तुरंत ले जाकर जला डाल?” इतना कहकर सामने जलती हुई आग में उन बालों को फेंक दिया और सांबो से बोला – “खबरदार, जो ऐसी चीजें फिर कभी मेरे पास लाया!”
सांबो आश्चर्य से देखता खड़ा रह गया। कासी भी यह देखकर विस्मय से लेग्री का मुँह ताकने लगी। लेग्री ने कुछ स्थिर होकर सांबो को घूँसा दिखाते हुए कहा – “फिर कभी मेरे सामने यह जंजाल मत लाना!” लेग्री का ऐसा रुख देखकर सांबो वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गया। उसके चले जाने पर लेग्री यह सोचकर कि ऐसी छोटी-सी बात पर मुझे इतना गुस्सा नहीं करना चाहिए, कुछ लज्जित-सा हो गया और फिर गिलास में ब्रांडी ढालकर गले में उड़ेलने लगा। कासी बाहर आकर चुपके-से टॉम को कुछ दवा-पानी देने चली गई।
यहाँ यह जानने की उत्कंठा होगी कि बालों के इस गुच्छे को देखकर लेग्री का क्रोध इतना क्यों भड़क उठा। वह उन्हें देखकर इतना क्यों डर गया! इसका मूल कारण जानने के लिए लेग्री के पूर्व जीवन की दो-चार घटनाओं का उल्लेख करना आवश्यक है।
इस पापात्मा लेग्री की माता अत्यंत सच्चरित्र और स्नेहमयी थी। अत: कितनी ही बार उत्तम-उत्तम भजनों के शब्द और ईश्वर का नाम लेग्री के कानों में बचपन में पड़ता रहा था। किंतु माता जितनी धार्मिक थी, पिता उतना ही दुष्टात्मा था। लेग्री की उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसके स्वभाव पर उसके दुष्ट पिता के संस्कार गहरे होने लगे। लेग्री की माँ आयलैंड के एक किसान की बेटी थी। उस सहृदय रमणी का भाग्य दैवेच्छा से इस पाशविक प्रकृतिवाले हृदयहीन मनुष्य के साथ बँध गया। युवावस्था शुरू होने के पहले ही लेग्री ने नाना तरह के नीच कर्मों में हिस्सा लिया था और इस विषय में अपनी साध्वी माँ के रोने-झींकने की भी कोई चिंता नहीं की थी। धन कमाकर उसके द्वारा भोग-विलास करना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। सत्रह-अठारह वर्ष की उम्र में ही उसने घर छोड़कर अपने को जहाज के काम में लगाया। उस समय से वह जल-मार्ग से जानेवाली महिलाओं पर, समय-असमय घोर अत्याचार करता था। इसके बाद लेग्री केवल एक बार ही अपने घर गया था। उस समय उसकी माता ने उसे घर पर रहकर ही भले लोगों की तरह जीवन बिताने को कहा। माँ के रोने-धोने से लेग्री का मन क्षण भर के लिए पसीजा। उसकी जिंदगी में केवल यही क्षण उसके सुधार के लिए उपयुक्त था। यदि इस क्षण का उपयोग वह कर पाता तो शायद सुधर जाता। पर उसके हृदय पर पाप की ही विजय रही। उसने माँ के वचनों को नहीं माना। तब वह स्नेहमयी जननी बेटे के गले से लगकर रोने लगी, किंतु वह अपनी माँ को पैर से धकेलकर घर से चला आया। उसकी माँ बेहोश होकर जमीन पर पड़ी रही। विदेश जाकर फिर कभी उसने अपनी माँ की खोज-खबर नहीं ली।
एक दिन की बात है। वह अपने ही जैसे दुराचारी मित्रों के साथ बैठकर शराब पी रहा था और दो-तीन अनाथ कुली औरतों की अस्मत को जबरदस्ती बिगाड़ने की तैयारी कर रहा था कि इसी बीच एक नौकर ने आकर उसके हाथ में एक पत्र दिया। पत्र खोलते ही उसमें से बालों का एक गुच्छा निकला। वह बालों का गुच्छा उसकी अँगुलियों से लिपट गया। इस पत्र में उसकी माँ की मृत्यु की खबर थी और लिखा था कि मृत्यु के समय उसने पुत्र के सारे अपराधों को क्षमा करके ईश्वर से उसके कल्याण की प्रार्थना की थी। पत्र को पढ़कर लेग्री के मन में भय का संचार हुआ। अपनी माँ के वे सजल नेत्र उसे याद आए, जब वह उसे अंतिम बार पैर से धकेलकर चला आया था। माता द्वारा मृत्यु के समय की गई प्रार्थना का स्मरण करते ही उसका हृदय काँप उठा। परंतु ब्रांडी की बोतल और कुली युवतियाँ सामने बैठी थीं, यदि जल्दी ही जननी-संबंधी सारी स्मृति को हृदय से दूर नहीं किया तो सारा मजा ही किरकिरा हो जाएगा। उसने तुरंत अपनी जननी के बालों का गुच्छा और वह चिट्ठी आग में डाल दी। पर बालों के उस गुच्छे के जलते ही उसे फिर उसी भयंकर नरक की याद आई। उसका हृदय फिर काँप उठा, किंतु वह सामने रखी हुई बोतल से ब्रांडी ढाल-ढालकर पीने लगा, और किसी तरह इस भयानक चिंता से अपने को बचाने की फिक्र करने लगा। कुछ देर के लिए ब्रांडी ने उसके हृदय से वह स्मृति दूरकर दी। पर तब से प्राय: वह रात्रि के समय अपनी माँ को अपनी चारपाई के पास ही खड़ी देखा करता था। माँ का चेहरा उदास होता और उसकी आँखों में आँसू होते। माँ के वे बाल आकर उसकी अँगुलियों में लिपट जाते और वह भय तथा त्रास से काँप जाता। बाल जलाने के संबंध में लेग्री के जीवन में एक ऐसी ही घटना घट चुकी है, इसी से आज फिर बाल जलाने के समय उसे बड़ा डर लगा। इसी कारण वह सांबो पर इतना गुस्सा हुआ था। सांबो और कासी के चले जाने पर भी वह अपने मन को स्थिर नहीं कर सका। कुछ ही पलों के बाद बोला – “भाड़ में जाएँ ये सब बातें! इनको सोचकर क्या होगा!” वह फिर ब्रांडी के प्याले-पर-प्याले ढालने लगा। फिर मन-ही-मन सोचने लगा – “क्या बात है? वे बाल जैसे अँगुलियों से लिपट गए थे, वैसे ही ये बाल भी क्यों लिपट गए? क्या बालों में भी जान होती है? वे बाल क्या आग में जले नहीं?” वह फिर सोचने लगा – “मैं अब इन चिंताओं को मन में नहीं आने दूँगा। चलता हूँ एमेलिन के पास… बंदरिया मुझसे घिन करती है, पर मैं उसे हत्थे पर लाऊँगा। आज मैं उसे किसी भी तरह नहीं छोड़ने का!”
इतना कहकर लेग्री ऊपर के कमरे में एमेलिन के पास जाने लगा। सीढ़ी पर पाँव रखते ही उसके कानों ने एक गीत की कड़ी सुनी। गीत सुनकर वह ठिठक गया। केशों को जलाने से उसका मन अस्थिर हो गया था, अब गीत सुनकर वह और भी घबराया।
कोई अत्यंत करुण स्वर में गा रहा था :
हाय! कब छूटेगा संसार?
कब तक रोऊँगी अभाग्य पर, पड़कर नरक-मंझार।
शोक-निशा है ग्रसने वाली, हैं पीड़ा अपार।।
हाय! कब छूटेगा संसार?
गीता को सुनकर लेग्री का मन और भी उद्विग्न तथा अस्थिर हो गया। वह मन-ही-मन कहने लगा, भाड़ में जाए वह अभागी! मैं इसका गला घोंटकर मार डालूँगा। इसके बाद जल्दी-जल्दी पुकारने लगा – “एम!एम!” परंतु कहीं से कोई उत्तर न आया। केवल माँ! माँ! की प्रतिध्वनि ही उसे सुनाई पड़ रही थी। गीत अभी चल रहा था :
महाभयंकर वह दिन होगा, हा विधि! हा कर्तार!
जब पापानल में जल-भुनकर, होऊँगी मैं छार।।
हाय! कब छूटेगा संसार?
लेग्री फिर ठहरा। उसके सिर से पसीना निकलने लगा। उसका हृदय काँपने लगा। उसे मालूम होने लगा, मानो उसके सामने आँसू बहाती हुई उसकी माँ ही खड़ी है। तब वह मन में सोचने लगा – यह क्या हुआ? सचमुच ही यह टॉम जादू करना जानता है क्या? चलो, आगे उसे नहीं मारूँगा। लेकिन यह बालों का गुच्छा उसने कहाँ से पाया? क्या वे मेरी माँ के ही बाल थे? वे कैसे हो सकते हैं? उन्हें जलाए तो मुझे कई साल बीत गए! यह बालों का गुच्छा ठीक वैसा ही क्यों जान पड़ता था? अगर उन जले हुए बालों में जान आ गई, तो यह बड़ा मजाक होगा!
अरे ओ नराधम लेग्री! तू इन केशों की महिमा क्या जाने! तेरे-जैसे पापी इसे नहीं समझ सकता। इन केशों ने ही आज तेरे हाथ-पैरों में बंधन डाल दिए। ऐसा न होता तो इसी घड़ी तू उस निर्दोष निर्मल-चरित्र एमेलिन का जीवन-सर्वस्व हरण करके उसके परम पवित्र शरीर को अपवित्र कर देता। उसके निर्मल जीवन में कलंक की कालिमा लगा देता।
आज लेग्री के मन में भभकी हुई यंत्रणा की ज्वाला किसी भी उपाय से शांत नहीं हो रही है। अत: उसने मन-ही-मन निश्चय किया कि आज मैं अकेला नहीं रहूँगा। सांबो और कुइंबो को बुलाकर वह सारी रात उनके साथ शराब-कबाब उड़ाता रहा और हल्ला मचाता रहा। इनके शोरगुल के मारे दूसरे लोगों की नींद हराम हो रही थी। टॉम को पथ्य-पानी देकर कासी रात को एक बजे के बाद घर लौट रही थी। घर में घुसते ही उसे इनका शोर सुनाई पड़ा। उसने देखा कि शराब के नशे में चूर होकर लेग्री, सांबो और कुइंबो तीनों हाथापाई कर रहे हैं। कासी ने बरामदे में आकर, पर्दे को थोड़ा खिसकाकर इन लोगों की ओर देखा। उसकी आँखों में उस समय घोर द्वेष और घृणा के भाव दिखाई पड़े। वह मन-ही-मन सोचने लगी-क्या इस नर-पिशाच से मानव-समाज को मुक्त करने की कोई सूरत निकलेगी? यही सोचते हुए वह सीढ़ियाँ चढ़कर दुमंजिले पर पहुँची और धीरे-धीरे एमेलिन का दरवाजा खटखटाने लगी।
39. संवेदना का प्रभाव
कासी ने कमरे के अंदर पहुँच कर देखा कि एमेलिन एक कोने में दुबकी हुई भयभीत बैठी है। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ है। कासी के आने की आहट सुनकर वह चौंक उठी। पर उसने जब कासी को देखा तो दौड़कर उसकी बाँहें पकड़ लीं और बोली – “कासी! तुम हो? मैंने सोचा था, कोई और आ रहा है। बड़ा अच्छा हुआ जो तुम आ गई। मुझे डर बहुत ही सता रहा था। तुम नहीं जानती हो कि नीचे के कमरे में कितना भयंकर शोर हो रहा है।”
कासी ने कहा – “मैं सब जानती हूँ, बहुत दिनों से सुनती आई हूँ।”
एमेलिन बोली – “कासी, क्या यहाँ से हम लोगों के निकल चलने का कोई उपाय नहीं है? इस जंगल में साँपों और शेरों के बीच रहना अच्छा है, पर यहाँ नहीं।”
कासी ने कहा – “कब्र के लिए और कोई जगह नहीं है।”
दो क्षण ठहरकर एमेलिन बोली – “तुमने कभी चेष्टा की है?”
कासी ने उत्तर दिया – “मैंने खूब चेष्टा कर देखी है, पर कोई नतीजा नहीं।”
एमेलिन ने कहा – “मुझे वन में, दलदल में, पेड़ों के पत्ते खाकर रहना मंजूर है। मैं भयंकर साँपों से भी इतना नहीं डरती, जितना लेग्री- जैसे नर-पशुओं के निकट रहने से डरती हूँ।”
कासी बोली – “बहुतों ने तुम्हारी ही भाँति यहाँ से भाग निकलने की बात सोची, पर भागने से कहाँ छुटकारा है? वह तुम्हें दलदल में भी नहीं टिकने देगा। शिकारी कुत्तों से पता लगवा लेगा, पकड़वा, और-तब…”
एमेलिन ने पूछा – “और तब क्या करेगा?”
कासी बोली – “इसके बदले यह पूछो कि क्या नहीं करेगा। जलदस्युओं में रहकर यह अपने पेशे से क्रूर हो गया है। यदि मैं तुम्हें उसकी कभी-कभी मजाक में कही हुई बातें सुनाऊँ और यहाँ का अपना आँखों देखा हाल बताऊँ तो तुम्हें रात में नींद आना भी मुश्किल हो जाएगा। इस घर के पिछवाड़े एक अधजला पेड़ है। उस पेड़ के नीचे की जमीन काली राख से ढकी पड़ी है। यहाँ के किसी आदमी से पूछो कि यहाँ क्या हुआ है? देखो, फिर वह कहने की भी हिम्मत करता है या नहीं।”
एमेलिन ने जिज्ञासा से पूछा – “तुम्हारे कहने का मतलब मैं नहीं समझी।”
तब कासी ने बताया – “मैं तुमसे वह सब नहीं कहूँगी। मैं उन बातों को मन में लाना भी बुरा समझती हूँ। और मैं तुमसे कहती हूँ कि यदि कल भी टॉम अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने लेग्री की बात नहीं मानी, तो परमात्मा ही जानता है कि हमें कल कैसा भयानक दृश्य देखना पड़ेगा।”
एमेलिन भय से पीली पड़कर बोली – “ओफ! कितना भयंकर है। अरी कासी, मुझे रास्ता बता। मैं अब क्या करूँ?”
कासी ने समझाया – “जो मैंने किया है, और अंत में झख मारकर जो तुम्हें भी करना पड़ेगा, वही करो!”
एमेलिन ने अपनी व्यथा सुनाई – “वह मुझे अपनी घिनौनी ब्रांडी पिलाना चाहता है और मैं उससे हद से ज्यादा नफरत करती हूँ।”
कासी ने बताया – “ब्रांडी पीना अच्छा रहेगा। पहले मैं भी ब्रांडी से घृणा करती थी, लेकिन अब तो मैं उसके बिना जी नहीं सकती। यह सब-कुछ खाए-पिए बिना काम नहीं चलता। जब तुम पीने लगोगी, तब इतनी बुरी भी नहीं लगेगी।”
एमेलिन बोली – “माँ मुझे बराबर कहा करती थी कि ऐसी चीजों को छूना तक नहीं चाहिए।”
कासी ने कहा – “तुम्हारी माँ तुम्हें ऐसा कहती थी, यह अचरज की बात है। माँ की कही हुई इन बातों का क्या नतीजा होना है? जिसने हमें मोल लिया है, वह हमारे शरीर और आत्मा का मालिक है। उसकी कही बात हमें माननी होगी। मैं कहती हूँ तुम ब्रांडी पीओ! जितनी पी सको, उतनी पीओ! इससे तुम्हारी मानसिक पीड़ा बहुत-कुछ दूर हो जाएगी।”
एमेलिन ने प्रार्थना की – “कासी! कासी! मुझपर दया करो!”
कासी चौंककर बोली – “क्या मैं नहीं करती हूँ? तुम्हारी-जैसी एक मेरी भी बेटी थी। ईश्वर जाने, वह अब कहाँ है! कैसी है! संभव है, जिस रास्ते का उसकी माता ने सहारा लिया है, वह भी उसी पर चली हो, और उसकी संतानें भी उसी पर जाएँगी। हाय, इस बदकिस्मती का क्या ठिकाना है!”
एमेलिन ने अपने हाथों को ऐंठते हुए कहा – “मेरा जन्म ही न होता तो अच्छा था।”
कासी बोली – “मेरे लिए तो यह पुरानी इच्छा है। बहुत बार मैंने ऐसी इच्छा की है। मन में आता है कि जान दे दूँ, पर हिम्मत नहीं होती।”
एमेलिन ने कहा – “आत्महत्या करना पाप है।”
“मैं नहीं जानती कि आत्महत्या को क्यों पाप बताया जाता है?” कासी ने दुखी स्वर में कहा – “हम नित्य जिन पापों में लिप्त रहती हैं, उनसे भी बड़ा क्या कोई पाप है? पर जब मैं शिक्षाश्रम में थी, तब वहाँ की भगिनियों से मैंने इस विषय में जो बातें सुनी थीं, उन्हें याद करके आत्महत्या करने में डर लगता है। यदि आत्महत्या के साथ आत्मा का लोप हो जाता, तो फिर…”
एमेलिन ने यह सुनकर, पीछे हटकर, दोनों हाथों से मुँह ढँक लिया।
यहाँ जब ये बातें हो रही थीं, उस समय लेग्री शराब के गहरे नशे में मस्त होकर नीचे के कमरे में पड़ा नींद में खर्राटे भर रहा था।
नींद की दशा में वह स्वप्न देख रहा था कि सफेद कपड़े पहने हुए कोई मूर्ति उसके पास खड़ी है और बरफ जैसे ठंडे हाथों से उसके शरीर को छू रही है। यह मूर्ति उसे कुछ परिचित-सी जान पड़ी। डर के मारे उसका सारा शरीर जड़ हो गया। फिर उसे ऐसा लगा, जैसे वह बालों की लट आकर उसकी अँगुलियों के चारों ओर लिपट गई। देखते-देखते वह लट गले तक जा पहुँची और उसने गले को सब ओर से लपेटकर बाँध लिया। लेग्री की साँस रुक गई। तब वह श्वेत वस्त्रधारी मूर्ति उसके कान में कुछ कहने लगी। उसकी बात सुनकर लेग्री को लगा की उसके हृदय की गति रुकने लगी है। उसने फिर देखा कि वह किसी कुएँ के किनारे खड़ा हुआ है। कासी वहाँ हँसती हुई आई और उसे कुएँ में धकेल दिया। फिर उसने उसे श्वेत वस्त्रधारी मूर्ति को अपने सामने देखा। उस मूर्ति ने अपने मुँह पर से पड़ा पर्दा हटा लिया। लेग्री ने देखा, यह तो उसकी माँ है! उसे देखकर माँ वापस चली गई और वह एक बड़े गहरे खड्ड में जा गिरा। वहाँ चारों ओर शोरगुल, चिल्लाहट, आर्त्तनाद और भूत-प्रेतों की विकट हास्य-ध्वनि सुनकर लेग्री की नींद खुल गई।
इधर सवेरा हो गया था।
प्रतिदिन प्रात:कालीन सूर्य मानव-हृदय में नई-नई भावनाएँ जगाता है। प्रात:कालीन समीर मधुर स्वर में कहता है – “अरे मनुष्यों, अपने पापासक्त मन को सुमार्ग पर लाने के लिए, अपने हृदय का मैल धो डालने के लिए, ईश्वर ने तुम्हें फिर यह एक नया अवसर दिया है।” लेकिन न तो प्रात:कालीन सूर्य, और न प्रात:कालीन पवन, कोई भी, लेग्री सरीखे पाप-पंक में लिप्त व्यक्ति के मन में शुभ भावना जगा सका। लेग्री के मन में प्रभात-काल किसी प्रेरणा का उदय नहीं कर पाता था। वह बिस्तर से उठा नहीं कि शराब की बोतल हाथ में ले लेता था।
कासी को, जो उसी समय दूसरे दरवाजे से कमरे में आई थी, देखकर लेग्री बोला – “कासी, आज रात को मुझे बड़ी तकलीफ हुई।”
कासी ने रूखेपन से कहा – “आज ही क्या, अभी आगे-आगे और भी कष्ट भोगना होगा।”
लेग्री ने पूछा – “तुम्हारे ऐसा कहने का क्या मतलब है?”
कासी ने कहा – “अभी नहीं, बाद में समझोगे। लेग्री, मैं तुम्हारे भले के लिए एक सलाह देती हूँ।”
लेग्री बोला – “क्या?”
कासी बोली – “वह सलाह यही है कि अब तुम टॉम को सताना बंद कर दो।”
लेग्री गुर्राकर बोला – “इस बात से तुम्हारा क्या संबंध है?”
कासी ने धीरज से जवाब दिया – “मेरा इस बात से सीधा कोई संबंध नहीं है, लेकिन मैं तुम्हें जो समझाना चाहती हूँ वह यह है कि ये काम के दिन हैं, इस वक्त मारपीट करने से तुम्हारा ही नुकसान है। आखिर तुम बारह सौ डालर नकद गिनकर एक आदमी लाओ और उसे इस तरह बेकार ही मार डालो, तो सोचो, कितना नुकसान होगा। तुम्हारी हानि के खयाल से ही मैं उसे जल्दी चंगा करने की कोशिश करती हूँ।”
लेग्री ने क्रोध के साथ कहा – “तू उसे ठीक करने क्यों गई? मेरे मामले में तेरे टाँग अड़ाने का क्या मतलब है?”
कासी बोली – “सचमुच कुछ भी नहीं। पर मैंने इसी तरह कई बार तुम्हारा रुपया बचा दिया। अगर फसल अच्छी न हुई तो तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी।”
कपास की फसल के लिए लेग्री जी-जान से कोशिश करता था। इसी से कासी ने टॉम की मार टालने के खयाल से, बड़ी चतुराई से बात शुरू की थी।
लेग्री बोला – “खैर, मैं इस बार उसे छोड़ दूँगा। लेकिन शर्त यह है वह मुझसे क्षमा माँगे और भविष्य में मेरी बात पर चलने का वादा करे।”
कासी ने तुरंत कहा – “यह वह नहीं करेगा।”
लेग्री ने पूछा – “नहीं करेगा?”
कासी ने दृढ़ता से कहा – “नहीं करेगा।”
लेग्री बोला – “मुझे मालूम तो हो, कि क्यों नहीं करेगा?”
कासी ने समझाया – “उसका विश्वास है कि उसने जो कुछ किया है, ठीक ही किया है। वह कभी नहीं कहेगा कि उसने अनुचित किया है।”
लेग्री झुँझलाकर बोला – “हब्शी गुलामों का भी क्या कोई न्याय-अन्याय होता है? मैं जो कहूँगा, वही उसे करना होगा।”
कासी ने स्थिर स्वर में उत्तर दिया – “तब वह काम के समय खाट पर ही रहेगा और इस साल तुम्हारी फसल खराब होगी।”
लेग्री अकड़ से बोला – “लेकिन वह जरूर माफी माँगेगा, जरूर माँगेगा। मैं क्या इन हब्शी गुलामों को नहीं पहचानता?”
कासी ने उसे पुन: वही उत्तर दिया – “लेग्री, मेरी इस बात को गाँठ बाँध लो, वह कभी माफी नहीं माँगेगा। तुम उसे मामूली गुलाम मत समझना। तुम उसकी बोटी-बोटी काट डालोगे, तब भी वह अपनी बात से नहीं टलेगा।”
लेग्री बोला – “मैं उसे देखूँगा। वह इस समय कहाँ है?”
कासी ने बताया – “जिस कोठरी में सड़ी रुई और पुराना माल-असबाब पड़ा है, उसी में है।”
लेग्री ने कासी के सामने इस तरह हेकड़ी तो जाहिर की, किंतु उसके मन में भी शंका होने लगी कि टॉम क्षमा नहीं माँगेगा। उसने सोचा कि यदि वह टॉम से क्षमा नहीं मँगवा सका तो साथ रहनेवाले लोगों में उसकी हेठी होगी, रौब में फर्क पड़ेगा, इसलिए वह अकेला ही टॉम की कोठरी की ओर गया। उसने मन-ही-मन सोचा कि यदि टॉम क्षमा नहीं माँगेगा तो भी उसे इस वक्त नहीं मारूँगा, फसल का मौसम बीत जाने पर उसे दुरुस्त करूँगा।
हम पहले ही कह आए हैं कि सवेरे की हवा और सवेरे का सूर्य लोगों की भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुसार उनमें भिन्न-भिन्न प्रकार के भाव जगाता है। किंतु लेग्री जैसे भावहीन चिंताशून्य, अर्थलोलुप, इंद्रियासक्त पिशाच के हृदय में किसी प्रकार का भाव प्रवेश नहीं कर सकता। उसका ध्यान केवल कपास के खेत, पैसा इकट्ठा करना, शराब और कुली औरतों में लगा है। किंतु अपढ़ होने पर भी टॉम का मन भावों और चिंताओं से शून्य नहीं है। प्रभातकालीन सजीवता ने उसके हृदय में नवीन बल का संचार किया। उसे मालूम होने लगा-मानो शुक्र तारा आकाश से उतरकर उससे कह रहा है – “टॉम, डरना नहीं। ईश्वर तुम्हारे साथ है।” टॉम को मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता होने लगी। विशेषकर इस बात से कि लेग्री उसे जान से मार डालेगा। पहले उसे इस बात को नहीं सोचा था, परंतु कासी की पहले दिन की बातचीत के ढंग से वह समझ गया था कि अब उसकी मृत्यु बहुत निकट है। अत: इस मृत्यु-संवाद को पाकर उसकी आत्मा विमल आनंद से पूर्ण हो गई। वह सोचने लगा, मृत्यु के उपरांत वह ईश्वर के उस प्रेम-राज्य में जाकर विश्राम करेगा, जहाँ द्वेष, हिंसा और अत्याचार की गंध भी नहीं है। वहाँ प्राणों से प्रिय इवान्जेलिन का मुख-कमल देखेगा और यह भी देखेगा कि परम दयालु मालिक सेंटक्लेयर की नास्तिकता परलोक में जाकर दूर हो गई है। अहा, टॉम के लिए इससे बढ़कर सुख और संतोष की बात और क्या हो सकती है? वह अपने शारीरिक कष्टों को भूलकर आनंद से विह्वल हो गया। उसके मुखमंडल पर प्रसन्नता एवं किंचित हास्य का आभास दिखाई दे रहा था। इसी समय नर-पिशाच लेग्री ने वहाँ पहुँचकर उसे पुकारा और पैरों से ठुकराते हुए कहा – “कहो बच्चू, कैसे हो? मैंने तुझसे नहीं कहा था कि तुझे सिखा दूँगा? बोल, यह शिक्षा कैसी लगती है? अभी कुछ जिद बाकी है कि निकल गई? आज इस पापी को कुछ धर्म नहीं सिखाएगा।”
टॉम ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।
इस पर लेग्री ने उसे फिर ठोकर मारते हुए कहा – “उठ सूअर!”
पिछले दिन की मार से टॉम बहुत शक्तिहीन हो गया था, इससे बोला – “क्यों, तुझे क्या हो गया है? मालूम होता है, रात की ठंडी हवा से सर्दी खाकर अकड़ गया है।”
टॉम बड़े कष्ट से उस पापी उत्पीड़क के सामने निडर होकर खड़ा हो गया।
लेग्री कहने लगा – “अरे शैतान, मैं समझता हूँ कि अभी तुझे काफी सजा नहीं मिली है। मेरे सामने घुटने टेककर माफी माँग, नहीं तो और पीटता हूँ। जल्दी कर! माफी माँगता है कि नहीं?” इतना कहकर हाथ में लिए कोड़े से वह उसे सड़ासड़ पीटने लगा।
टॉम ने कहा – “सरकार, लेग्री साहब, यह मुझसे नहीं होगा। मैंने केवल वही किया है, जिसे मैंने उचित समझा है। आगे भी, काम पड़ने पर, मैं ऐसा ही करूँगा। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं किसी को मारने-पीटने का हृदयहीन काम कभी नहीं करूँगा।”
लेग्री बोला – “ठीक है। लेकिन हजरत, अभी आपको यह पता नहीं कि इसके बाद आपकी क्या दुर्गति होगी। तू समझता है कि कल जो कुछ हुआ, वह काफी हो गया पर मैं तुझे बताता हूँ कि वह तो बस बानगी था। जरा उस मजे का खयाल करके देख, जब तुझे पेड़ से बाँध दिया जाएगा और नीचे धीमी-धीमी आग जलाकर तुझे भूना जाएगा।”
टॉम ने कहा – “सरकार, मैं जानता हूँ कि आप भयंकर-से-भयंकर काम कर सकते हैं।”
इतना कहते-कहते उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह ऊपर को हाथ उठाकर कहने लगा – “किंतु इस शरीर का नाश कर डालने के बाद आप और कुछ अधिक नहीं कर सकेंगे – उसके बाद तो मैं अनंत में मिल जाऊँगा।”
अनंत! कैसा चमत्कारी शब्द है! प्रेम और आनंद, दोनों इस में समाए हुए हैं। काले टॉम के हृदय में इसने शांति और आनंद का स्रोत बहा दिया। और यही शब्द लेग्री को भीतर-ही-भीतर बिच्छू के डंक-जैसा लगा। इस पर वह दाँत किचकिचाने लगा।
टॉम फिर स्वाधीनतापूर्वक कहने लगा – “लेग्री साहब, तुमने मुझे खरीदा है, इससे मैं तुम्हारा दास हूँ। अवश्य ही मैं जी-जान से तुम्हारा काम करूँगा। मेरा शारीरिक बल और समय तुम्हारे काम के लिए है, परंतु अपनी आत्मा को मैं कभी तुम्हारे हाथ में अर्पण नहीं करूँगा। जान रहे या जाए, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाए, लेकिन मैं ईश्वर के आदेश का पालन अवश्य करूँगा। मेरी यह आत्मा उसी के चरणों में समर्पित है। मैं उसके आदेश का उल्लंघन करके कभी हृदयहीन व्यवहार नहीं करूँगा!- कभी नहीं! तुम्हारा जी चाहे, मुझे कोड़ो से मारो, लाठियों से मारो, आग में जलाकर बिल्कुल खत्म कर दो-कुछ भी करो, परंतु मैं धर्म को नहीं छोडूँगा। हर्गिज नहीं-हर्गिज नहीं!!”
लेग्री ने क्रोध से उबलते हुए कहा – “देखता जा, मैं तेरी सब बदमाशी निकाल दूँगा। जब तुझे ठिकाने से मार पड़ेगी, तब तू समझेगा।”
टॉम बोला – “मुझे मदद मिलेगी!”
लेग्री ने पूछा – “कौन तेरी मदद करेगा?”
टॉम ने कहा – “सर्वशक्तिमान ईश्वर मेरी मदद करेंगे।”
लेग्री ने एक घूँसा मारकर टॉम को जमीन पर धकेल दिया और कहा – “देखूँगा, तेरा ईश्वर कैसे तेरी मदद करता है।”
इसी समय पीछे से एक ठंडा और कोमल हाथ लेग्री के शरीर पर लगा। उसने फिर देखा, कासी है, परंतु ठंडे हाथ के स्पर्श से उसे पिछली रात के सपने की याद हो आई और वह कुछ भयभीत हो गया।
कासी ने फ्रेंच भाषा में कहा – “लेग्री, तुम भी कैसे अहमक हो! छोड़ो इसे। काम के वक्त तुम नाहक का टंटा लेकर खड़े हो गए हो। तुम्हें मैं कई बार समझा चुकी हूँ। मैं इसकी दवा-पानी करके देखती हूँ कि किसी तरह जल्दी अच्छा होकर खेत के काम लायक हो जाए।”
यह सही है कि मगर और गैंडे के चमड़े पर गोली असर नहीं करती, लेकिन उनके शरीर में भी एक ऐसा स्थान होता है, जिसे भेदकर गोली उनका काम तमाम कर सकती है। उसी भाँति नीच, लंपट, निर्दयी, अविश्वासियों और नास्तिकों को डराने का भी एक-न-एक रास्ता होता है। भ्रांत संस्कारों से पैदा हुआ भय सदा ही उनके मनों में घर किए रहता है। पिछली रात के सपने में देखी हुई अपनी माँ की दृष्टि का स्मरण आते ही लेग्री का हृदय काँप गया।
लेग्री ने कासी से कहा – “अच्छा इसे तुम्हीं सँभालो!”
फिर वह टॉम से बोला – “इस वक्त तो मैं तुझे छोड़ता हूँ, क्योंकि आजकल काम के दिन हैं। पर याद रखना, इसके बाद मैं तुझे समझूँगा। तुझे सीधा न किया तो मेरा नाम लेग्री नहीं!”
इतना कहकर वह चला गया।
कासी मन-ही-मन बोली – “अब तो तुम यहाँ से सरको, फिर देखा जाएगा। तुम्हारे भी तो दिन नजदीक ही आ रहे हैं।”
फिर कासी ने टॉम से पूछा – “कहो तुम्हारे, क्या हाल हैं?”
टॉम ने कहा – “इस समय ईश्वर ने अपना दूत भेजकर सिंह का मुँह बंद कर दिया है।”
कासी बोली – “हाँ, इस समय तो सचमुच मुँह बंद कर दिया। लेकिन अब वह तुमसे बुरी तरह मात खाकर गया है। धीरे-धीरे तुम्हारा खून चूस-चूसकर वह तुम्हारी जान लेगा। मैं इस पाजी को भली-भाँति जानती हूँ।”
40. स्वततंत्रता का नव-प्रभाव
टॉम लोकर एक वृद्ध क्वेकर रमणी के घर पर शारीरिक यंत्रणा से कराह रहा था। आपने साथी मार्क को गालियाँ दे रहा था और कभी फिर उसका साथ न देने के लिए सौ-सौ कसमें खा रहा था।
वह दयालु बुढ़िया लोकर के पास बैठी माता की तरह उसकी सेवा-टहल कर रही है। वृद्ध का नाम डार्कस है। सब लोग उसे ‘डार्कस मौसी’ कहकर पुकारते हैं। वृद्ध कद में जरा लंबी है। उसके मुँह पर दया, ममता, स्नेह और धर्म के चिह्न लक्षित होते हैं। उसके कपड़े भी एकदम सादे और सफेद हैं, वह दिन-रात बड़े ध्यान से लोकर के पथ्य-पानी की सार-सँभाल करती है।
लोकर बिछौने की चादर को इधर-उधर लपेटते हुए कह रहा है – “ओफ! कैसी गरमी है! यह कमबख्त चादर भी खाए जाती है।”
वृद्ध डार्कस मौसी ने उसे बिस्तर की सलवटों को ठीक करते हुए कहा – “टॉमस बाबा, तुम्हें ऐसी भाषा का व्यवहार नहीं करना चाहिए।”
लोकर ने कहा – “मौसी, मेरा शरीर जल रहा है, मुझसे सहा नहीं जाता।”
डार्कस ने समझाया – “गालियाँ बकना, सौगंध खाना और गंदे शब्दों का व्यवहार करना भले आदमियों का काम नहीं। इन गंदी आदतों को छोड़ने की चेष्टा करो!”
लोकर ने कहा – “यह कमबख्त मार्क बड़ा शैतान का बच्चा है। पहले वकालत करता था, इसी से इतना लालची है। ऐसा गुस्सा आता है कि बदमाश को फाँसी पर लटका दूँ।”
इतना कहकर लोकर ने फिर सारे बिछौने को सिकोड़-सिकोड़कर उलट-पुलट कर डाला।
क्षण भर के बाद फिर वह कहने लगा – “वे भगोड़े दास-दासी भी यहीं हैं क्या?”
डार्कस ने बताया – “यहीं हैं।”
लोकर ने कहा – “उनसे कह दो कि जितनी जल्दी झील के किनारे जाकर जहाज पर सवार हो जाएँ, उतना ही अच्छा है।”
डार्कस बोली – “शायद वे ऐसा ही करेंगे।”
लोकर ने सावधान किया – “उन्हें बड़ी होशियारी से जाने को कहना! सेनडस्की के जहाज के आफिस में हमारे आदमी लगे हैं। वे कड़ी पूछताछ करेंगे। मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि उस नामाकूल मार्क को कौड़ी भी हाथ न लगे।”
डार्कस ने कहा – “फिर तुम गंदे शब्द मुँह से निकालते हो!”
लोकर बोला – “डार्कस मौसी, मुझे इतना कसकर मत बाँधो। बहुत कसने से सब टूट जाएगा। मैं धीरे-धीरे अपने को सुधार लूँगा। लेकिन उन भगोड़ों की बाबत मैं जो कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। उस औरत से कह देना कि वह मर्दाना वेश बनाकर जहाज पर चढ़े और बालक को बालिका-जैसे कपड़े पहना दे। उन लोगों का हुलिया सेनडस्की भेजा जा चुका है।”
डार्कस ने कहा – “हम लोग सावधानी से काम करेंगे।”
टॉम लोकर तीन सप्ताह तक वहाँ बीमार पड़ा रहा। फिर नीरोग होकर घर चला गया। वहाँ पहुँचने के बाद उसने गुलामों को पकड़ने का धंधा एकदम छोड़ दिया और किसी अच्छे धंधे में लग गया। तीन सप्ताह तक क्वेकर परिवार के सत्संग में रहने के कारण उसके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन हो गया था। क्वेकर समुदायवालों को वह बड़ी भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखता था। डार्कस मौसी की तो वह अपनी माँ से भी अधिक भक्ति करने लगा था।
लोकर के मुँह से यह सुनकर कि सैनडस्की में उनका हुलिया पहुँच चुका है और वहाँ कड़ी जाँच होगी, उन्होंने विशेष सावधानी से काम लेने का निश्चय किया। साथ जाने से पकड़े जाने का खतरा देखकर जिम और उसकी माता दो दिन पहले चल पड़े। उसके बाद जार्ज और इलाइजा अपने बालक सहित रात को सैनडस्की पहुँचे।
रात बीच चली थी। स्वतंत्रता का सुख-सूर्य हृदयाकाश में उदित होने को ही था। स्वतंत्रता-आह, कैसा जादू-भरा शब्द है! इसका उच्चारण करते ही हृदय आनंद से नाच उठता है। देवि स्वतंत्रते! तुम साथ रहो तो खप्पर में माँगकर खाना और वृक्षों के नीचे जीवन बिताना भी सुखकर है; परंतु तुम्हारे बिना तो राज-भोग भी उच्छिष्ट-जैसा है। तुम्हें पाने के लिए अमेरिका के अंग्रेजों ने जान की बाजी लगा दी और अपने कितने ही वीरों की रण में आहुति दी। सारा संसार तुम्हारे लिए लालायित है। पर जहाँ वीरता और एकता है, वहीं तुम्हारा निवास होता है। भीरुता, कायरता, स्वार्थपरता तथा फूट के तो तुम पास भी नहीं फटकती हो। इनसे तुम्हें बड़ी नफरत है। इस संसार में निर्बल, भीरु और स्वार्थंध जातियाँ तुम्हारे मुख-दर्शन की आशा नहीं कर सकतीं, और जिस जाति से तुम दूर हो, उसमें जीवन कहाँ? संसार का कोई सुख पराधीन जाति को सुखी नहीं कर सकता। उसके लिए संसार की सब चीजें दुखदायी हैं। परंतु देवि! तुमसे नाता जोड़ते ही स्वार्थपरता का अंधकार और निर्बलता की मार देखते-ही-देखते काफूर हो जाती है। तब हताश और संकीर्ण मानव-हृदय में सार्वभौम प्रेम का चंद्रमा उदय होता है।
संसार में क्या कोई ऐसी वस्तु है, जिसे कोई जाति तो अत्यंत सुख और प्रिय समझती हो, किंतु कोई मनुष्य उसे प्रिय न समझता हो? स्वतंत्रता जितनी किसी जाति को प्रिय होती है, दूसरे मनुष्य को भी वह उतनी ही प्रिय होती है। जातीय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में भेद ही क्या है? अलग-अलग व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समूह को ही जातीय स्वतंत्रता कहते हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बिना जातिगत स्वतंत्रता भी कब संभव है? यह युवक जार्ज हेरिस, जो यहाँ मुँह लटकाए विषाद-मग्न बैठा है, किस तरह स्वतंत्रता के लिए व्याकुल है? यह व्यक्ति कैसा अधिकार चाहता है! केवल इतना ही अधिकार-कि वह अपनी स्त्री को अपनी समझ सके; दूसरों के अत्याचारों से उसकी रक्षा कर सके; अपनी संतान को अपनी समझकर अच्छी शिक्षा दे सके; अपनी मेहनत की कौड़ी को अपनी मशक्कत की कमाई को अपने लिए खर्च कर सके, और अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार काम कर सके। बस, इससे अधिक वह और कुछ नहीं चाहता।
स्वार्थी नर पिशाचो! क्या तुम उसे इतना भी अधिकार नहीं दोगे? क्या इन अधिकारों के बिना भी मनुष्य जीवित रह सकता है? मनुष्य के कुछ स्वभाव-सिद्ध अधिकारों को पाने के लिए आज जार्ज तुम्हारे देश से भागने का उद्योग कर रहा है। अपनी स्त्री का मर्दाना-वेश बना रहा है- उसके लंबे सुंदर बाल काट रहा है।
बाल कट जाने के बाद इलाइजा मुस्कराकर बोली – “कहो जार्ज, क्या अब मैं एक सुंदर युवक-सी नहीं दीख पड़ती?”
जार्ज ने कहा – “तुम किसी भी वेश में हो, मुझे हमेशा बहुत सुंदर लगती हो।”
इलाइजा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – “जार्ज, तुम इतने उदास क्यों हो रहे हो? अब तो कनाडा यहाँ से केवल चौबीस घंटों की दूरी पर है। सिर्फ एक दिन और एक रात का सफर बाकी है और उसके बाद, अहा! उसके बाद…”
जार्ज ने इलाइजा को अपनी ओर खींचकर धीरे-से कहा – “इलाइजा, मुझे बड़ा डर मालूम हो रहा है। कहीं इतनी दूर आए हुए पकड़े गए, तो सारी मेहनत और सारा किया-धरा मिट्टी में मिल जाएगा। किनारे लगकर भी नाव डूब जाएगी। ऐसा होने पर मैं जीवित नहीं रह सकूँगा।”
इलाइजा ने उसे धीरज बँधाया – “जार्ज, डरो मत। उस दयामय को यदि हम लोगों को पार न लगाना होता तो वह हमें हर्गिज इतनी दूर न लाता। जार्ज, मुझे लगता है कि वह हम लोगों के साथ है। फिर डरने की क्या बात है?”
जार्ज बोला – “इलाइजा, तुम देवी हो! तुम ईश्वर का साथ अनुभव करती हो। पर बोलो, क्या जन्म से सहते आए हमारे इन दु:खों का अंत हो जाएगा? क्या हम स्वतंत्र हो जाएँगे?”
इलाइजा ने कहा – “जार्ज, मुझे तो इसका निश्चय है। मुझे मालूम हो रहा है कि ईश्वर ही हम लोगों को स्वतंत्र करने के लिए यहाँ से जा रहा है।”
जार्ज बोला – “ठीक है, मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास हो रहा है।”
इसके बाद जार्ज ने इलाइजा को मर्दानी टोपी ओढ़ाकर कहा – “गाड़ी का समय हो चुका हो तो चलें। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि मिसेज स्मिथ हेरी को लेकर अब तक क्यों नहीं आईं।”
इतने ही में दरवाजा खुला और एक अधेड़ अवस्था की महिला बालक हेरी को बालिका के वेश में सजाए हुए, साथ लेकर अंदर आई।
इलाइजा ने उसे देखते ही क्या – “वाह, क्या खूबसूरत लड़की बनी है। अब हम लोग इसे हैरियट के नाम से पुकारेंगे। क्यों, ठीक होगा न!”
माता को मर्दाने कपड़ों में, बाल कटाए हुए देखकर, बालक हतबुद्धि हो गया। वह बार-बार ठंडी साँसें लेने लगा। इलाइजा ने उसकी ओर हाथ बढ़ाकर कहा – “क्यों हेरी, अपनी माँ को पहचानता है?”
बालक शर्माकर उस अधेड़ स्त्री से चिपक गया।
जार्ज ने कहा – “इलाइजा, जब तुम जानती हो कि उसे तुमसे अलग रखने की व्यवस्था की गई है, तो अब उसे नाहक क्यों अपने पास बुलाने की कोशिश करती हो?”
इलाइजा बोली – “मैं जानती हूँ। यह मेरी मूर्खता है। लेकिन इसे अलग रखने को मेरा जी नहीं मानता। खैर, लबादा कहाँ है?”
इसके बाद जब इलाइजा मर्दाना लबादा पहनकर तैयार हो गई तब जार्ज ने मिसेज स्मिथ से कहा – “अब से हम लोग आपको बुआ कहेंगे और लोगों पर यह प्रकट करना होगा कि हम लोग अपनी बुआ के साथ जा रहे हैं।”
मिसेज स्मिथ ने कहा – “मैंने सुना है कि जो लोग तुम्हें पकड़ने आए हैं, वे टिकटघर में बैठे बाट देख रहे हैं।”
जार्ज ने कहा – “वे लोग बैठे हैं! खैर, चलो, देखा जाएगा। अगर हम लोगों की उनसे भेंट हो गई तो हम उन्हें बता देंगे।”
इसके बाद ये लोग एक किराए की गाड़ी पर सवार होकर चले। जिस आदमी ने इन्हें अपने घर में शरण दी थी, वह गाड़ी तक इनके साथ आया और चलते समय उसने इनके उद्धार के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
इन सब लोगों का छद्म-वेश ऐसा बन गया था कि कोई इन्हें पहचान नहीं सकता था। असल में यह टॉम लोकर के साथ भलाई करने का नतीजा था। कभी-कभी भलाई का फल हाथों-हाथ मिलता है। यदि इन्होंने, वैर चुकाने की नीयत से, लोकर को जंगल में ही रहने दिया होता, उसे ये डार्कस के घर न उठा लाए होते, तो आज अपने सामान्य वेश में आने पर यहाँ जरूर पकड़े जाते। टॉम लोकर के साथ इन्होंने जो भलाई की, इन्हें उसका बहुत अच्छा फल मिला।
मिसेज स्मिथ कनाडा की एक प्रतिष्ठित महिला नागरिक थीं। वह कनाडा लौट रही थीं। इन लोगों की दुर्दशा देखकर उन्हें दया आ गई और उन्होंने इनकी सहायता करने की ठान ली। दो दिन पहले ही हेरी उनके जिम्मे कर दिया गया था। इन दो दिनों में मेवा-मिठाई और खिलौने वगैरह देकर उन्होंने हेरी को ऐसा मिला लिया था कि वह उनका साथ ही नहीं छोड़ता था।
इनकी गाड़ी जहाज-घाट के किनारे जा लगी। जार्ज उतरकर टिकट लेने गया, तो उसने दो आदमियों को अपने संबंध में आपस में बातें करते सुना। उनमें से एक दूसरे से कह रहा था – “भाई, मैंने एक-एक करके सब मुसाफिरों को देख लिया, तुम्हारे भगोड़े इनमें नहीं है।” फिर जार्ज ने देखा कि इनमें पहला मार्क है, और दूसरा एक जहाज का क्लर्क है।
मार्क बोला – “उस स्त्री को तो तुम मुश्किल से पहचान सकते हो कि वह दासी है, क्योंकि वह अंग्रेजों-जैसी गोरी है और पुरुष भी वैसा ही है, पर उसके एक हाथ पर जलने का दाग है।”
जार्ज उस समय हाथ बढ़ाकर टिकट ले रहा था। उसका हाथ काँप उठा, पर वह सँभलकर धीरे-धीरे वहाँ से हट गया और वहाँ जा पहुँचा, जहाँ इलाइजा और मिसेज स्मिथ बैठी हुई थीं।
मिसेज स्मिथ हेरी को साथ लेकर स्त्रियों के कमरे में चली गईं।
जहाज ने जब चलने की सीटी दी और घंटा बजा तो जार्ज के हृदय में आनंद की लहरें उठने लगीं और मार्क ठंडी साँसें लेता हुआ जहाज से उतरकर किनारे आया। वह मन-ही-मन निराश होकर कहने लगा कि वकालत के धंधे में आमदनी की सूरत न देखकर दूसरी तरह से उसी देश के प्रचलित कानून की रक्षा के लिए यह नया धंधा किया, पर इसमें भी कुछ होता-जाता नजर नहीं आ रहा है। यही सब सोचते-सोचते मार्क खिन्न मन से अपने देश को लौट गया।
दूसरे दिन जहाज ने एमहर्स्टबर्ग जाकर लंगर डाला। यह कनाडा का एक छोटा-सा कस्बा है। जार्ज, इलाइजा आदि सब आकर किनारे पर उतरे। स्वाधीन भूमि पर पैर रखते ही उनका हृदय आनंद से भर गया। आज उन्हें गुलामी से छुट्टी मिली। आज स्त्री और पुत्र को अपना कहने का मानवीय स्वत्व जार्ज को प्राप्त हुआ। स्वामी और स्त्री, दोनों एक-दूसरे के गले से लिपट गए। दोनों के नेत्रों से आनंद के आँसू बहने लगे और घुटने टेककर उन्होंने ईश्वर की प्रार्थना में यह गीत गया-
विपत्ति-सिंधु में तुम्हीं जहाज!
कौन बचावे दीन-हीन को तुम बिन हे महाराज!
निपट निराशा अंधकार था मम-हित महा कुसाज।
उदय हुआ सुख-भानु पूर्व में, तब करुणा से आज।।
जैसे तुम्हें पुकारा दुख में, वैसा पा सुख-साज।
ध्यान तुम्हारा ही करते हैं, गाते सुयश दराज।।
प्रार्थना के बाद सब लोग उठे और मिसेज स्मिथ उन्हें उसी नगर के निवासी एक सज्जन पादरी साहब के पास ले गईं। यह उदार पादरी अपने घर ऐसे ही निराश्रित और भागे हुए दास-दासियों को शरण दिया करता था।
जार्ज और इलाइजा के आज के आनंद का पारावार नहीं है। भला भाषा के द्वारा इनके इस स्वतंत्रता के आनंद का वर्णन कैसे हो सकता है? आज रात भर उन्हें नींद नहीं आई। सारी रात आनंद की उमंगों में बीत गई। इस आनंद में इन लोगों ने एक बार भी यह सोचने तक का कष्ट न उठाया कि आखिर यहाँ करना क्या होगा, जिंदगी कैसे कटेगी! न इनके घर-द्वार है, न कोई साज-सरंजाम। कल तक के खाने के लिए इनके पास कोई ठिकाना नहीं है। फिर भी यह स्वतंत्रता-प्राप्ति के आनंद में ऐसे फूले हुए हैं कि उन्हें और किसी बात की चिंता ही नहीं है। वास्तव में पूछिए तो मनुष्य-जीवन में स्वतंत्रता की अपेक्षा और अमूल्य वस्तु है ही क्या, जिसकी मनुष्य परवाह करे? जो लोग प्रभुत्व अथवा धन के लोभ से किसी व्यक्ति अथवा जाति-विशेष को ऐसे अनमोल रत्न से वंचित करते हैं, उन्हें अवश्य ईश्वर का कोप-भाजन बनना पड़ेगा – उसके सामने जवाबदेह होना पड़ेगा, पीढी-दर-पीढ़ी उन्हें अत्याचारों का फल चखना पड़ेगा।
41. जयोल्लास
क्या सभी दशाओं में मृत्यु कष्टकर जान पड़ती है? बहुत-से लोग तो इस दु:खों – यंत्रणाओं से भरे संसार में ऐसे होते हैं, जो खुशी-खुशी मरना चाहते हैं। वे मृत्यु को भयानक नहीं समझते। कितने ही ऐसे धर्मवीर हुए हैं, जिन्होंने निर्भीक होकर मृत्यु से भेंट की। सत्य और धर्म के लिए, संसार से अन्याय को दूर करने के लिए, कितने ही धर्मवीर और कर्मवीर प्रसन्नता से मृत्यु की वेदी पर बलि हो गए। क्या उन्हें उस समय मृत्यु कष्टकर जान पड़ी थी? कदापि नहीं! मनुष्य जब सत्य विश्वास से उत्तेजित हो जाता है और हृदय में उमड़े हुए धर्म-प्रेम और प्रेमावेश के कारण अपने-आपको भूल जाता है, उस समय वह बाह्य ज्ञान से सर्वथा रहित हो जाता है। किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट उसकी अंतरात्मा को स्पर्श नहीं कर सकता।
परंतु जिन्हें नित्य मार का कष्ट सहन करना पड़ता है, जिन्हें अत्याचारी लोग बूँद-बूँद रक्त चूसकर मारते हैं और कठोर आचरण सहते-सहते जिनके हृदय की दया, ममता, एवं अन्य सब प्रकार के सद्भावों का शनै:-शनै: नाश हो जाता है, उन्हें भी क्या मृत्यु कष्टकर नहीं है? इससे अधिक कष्टकर मृत्यु संसार में और हो भी क्या सकती है?
नर-पिशाच लेग्री जब टॉम को पीटता था और उसे मार डालने की धमकी देता था, उस समय टॉम मन-ही-मन सोचता था कि अब उसके संसार छोड़ने का समय आ गया है, अब शीघ्र ही मृत्यु आकर उसके सारे दु:ख-दर्दों को दूर किए देती है। अत: उसके भयभीत होने का कोई कारण नहीं था। सत्य-विश्वास से उत्तेजित हो कर, धर्मवीरों की भाँति, बेधड़क हो कर, वह लेग्री के सामने डटकर खड़ा हो जाता और ईश्वर के सद्दृष्टांत के अनुसरण करने का विचार करके मन-ही-मन हर्षित होता था। जब वह उसे ठोंक-पीटकर चला जाता और टॉम देखता कि मृत्यु तो आई नहीं, उस समय हृदय का वह उमड़ा हुआ धर्मवेग और मार के समय की उत्तेजना शनै:-शनै: मंद पड़ जाती और तब उसे मार का दर्द बहुत अखरता। उसका शरीर शिथिल पड़ जाता और साथ ही उसकी अंतरात्मा को भी अवसन्नता धर दबाती। उसके दिल में निराशा आ जाती और अपनी दुर्दशा का स्मरण होते ही उसके दिल में असह्य यंत्रणा की अग्नि धधक उठती।
पहले दिन की मार से ही टॉम का शरीर जगह-जगह से छिल गया था और वह बहुत अशक्त हो गया था। पर लेग्री ने वह अशक्तता दूर होने के पूर्व ही, मारे हठ के, उसे खेत के काम में जोत दिया। अन्य कुलियों के साथ उसे काम पर जाना पड़ता था। अपनी इस कमजोरी की हालत में भी वह जी लगाकर खेत का काम करता था, परंतु खेत के रखवाले केवल अपनी हिंसक-वृत्ति को चरितार्थ करने के लिए समय-समय पर उसे बेंत लगाते रहते थे। भला इस निष्ठुर आचरण पर भी कोई सहिष्णु रह सकता था? परंतु टॉम बड़ी ही शांत प्रकृति का आदमी था। उसके धीरज और सहिष्णुता की सीमा नहीं थी। परंतु कभी-कभी सांबो और कुइंबो के हृदयहीन आचरण से उसका मन भी सहिष्णुता को भुला बैठता था। टॉम की समझ में अभी तक यह बात नहीं आई थी कि लेग्री के खेत के कुली ऐसे मनुष्यत्व-विहीन और दुश्चरित्र क्यों हो गए हैं! उनका हृदय केवल हिंसा, द्वेष, वैर-विरोध स्वार्थपरता, निष्ठुरता का घर क्यों बन गया है! वह इस बात से हैरान था कि इन कुलियों के जड़-हृदय में क्षण भर के लिए भी सहानुभूति का संचार क्यों नहीं होता? परंतु अब उसे उनके किसी आचरण से आश्चर्य नहीं रहा। अब उसने सहज ही समझ लिया कि अपनी इस प्रकृति का निष्ठुर आचरण के अवश्यंभावी फल के सिवा और कोई कारण नहीं है, पर वह अपने मन में बहुत डरा कि समय पाकर वह निष्ठुर आचरण कहीं उसकी प्रकृति को भी भ्रष्ट न कर दे। इस डर से वह जब जरा-सा अवकाश पाता, तुरंत अपनी बाइबिल लेकर बैठ जाता। परंतु आजकल काम का इतना जोर था कि रविवार तक काम के बोझ से छुट्टी नहीं मिलती। कपास चुने जाने के दिनों में कई महीनों तक लेग्री कुलियों को रविवार की भी छुट्टी नहीं देता था। क्यों देता? धर्म तो उसका कुछ था ही नहीं, उसके लिए तो देवता और देवता का मंदिर वही कपास का खेत था और था नगदनारायण!
पहले टॉम खेत से लौटने पर नित्य रात्रि को रोटी बनाने के समय, चूल्हे के उजाले में बैठकर, बाइबिल के एक-दो उपदेश पढ़ लिया करता था, किंतु आजकल वह इतना कमजोर हो गया था कि खेत से लौटने पर पल भर भी उससे बैठा न जाता था। आते ही थकावट के मारे वह झोपड़ी में पड़ा रहता और दर्द से छटपटाने लगता।
यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जब-तब टॉम-सरीखे पक्के धर्म-विश्वासी का मन भी डावांडोल होने लगा। जिस सुदृढ़ विश्वास के कारण उसने सारे जीवन किसी भी कष्ट की परवाह नहीं की, उसी अदम्य धर्म-विश्वास के, निष्ठुर आचरण के सामने परास्त होने की संभावना होने लगी। अज्ञेय अंधकारपूर्ण जीवन-पहेली के संबंध में उसके मन में भाँति-भाँति के प्रश्न उठने लगे। हृदय सुस्त पड़ने लगा। अपने मन में वह प्रश्न करने लगा “जगत्-पिता कहाँ है? वह चुप क्यों है? क्या संसार में सचमुच पाप ही की जय होती है?” फिर आप-ही-आप सोचने लगा – नहीं, परमात्मा मुझे कभी नहीं भुलाएगा। संभव है, मिस अफिलिया के पत्र पाने पर केंटाकी से कोई मेरा उद्धार करने आता हो।
यों सोचते-सोचते वह व्याकुल होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। वह प्रतिदिन सवेरे उठकर बड़ी आशा से मार्ग की ओर देखता था कि केंटाकी से कोई उसे मुक्त कराने के लिए आ रहा है या नहीं। यों ही देखते-देखते कितने ही दिन बीत गए, परंतु कोई कहीं से आया-गया नहीं। तब फिर उसके मन में वही पुराना प्रश्न जाग उठा, ‘क्या ईश्वर ने मेरी सुध बिल्कुल ही बिसार दी है?’
एक दिन संध्या के उपरांत खेत से आकर वह ऐसा शक्तिहीन हो गया कि धड़ाम से जमीन पर गिर गया। आज उसकी उठने की शक्ति एकदम जाती रही। लेटे-लेटे ही रोटियाँ बनाने की फिक्र में लगा। बीच में उसकी बाइबिल पढ़ने की इच्छा हुई। तब चूल्हे की आग जरा तेज करके निशान लगाए हुए अपनी पसंदवाले बाइबिल के अंशों को पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते मन-ही-मन प्रश्न करने लगा-क्या संसार से शास्त्र की शक्ति जाती रही है? क्या यह धर्मशास्त्र भग्न हृदयों को बल और निष्प्रभ चक्षुओं में ज्योति नहीं देता? इसके बाद ठंडी साँस लेकर उसने ज्यों ही बाइबिल बंद की, त्योंही उसे पीछे से किसी का विकट हास्य सुनाई दिया। गर्दन घुमा कर देखने पर उसने लेग्री को अपने पीछे खड़ा पाया।
लेग्री बोला – “अब तो समझ लिया न, कि धर्म तेरी कुछ मदद नहीं करने का? मैंने तो पहले ही कहा था कि तेरा धर्म-कर्म सब हवा कर दूँगा।”
धर्म के संबंध में इस व्यंग्य ने टॉम के हृदय में बरछी मार दी। इतना कष्ट उसे दिन भर की भूख-प्यास से भी नहीं हुआ था।
लेग्री ने कहा – “तू निरा गधा है। मैंने खरीद के समय तुझे कोई बड़ा ओहदा देने की बात सोची थी। मैं तुझे सांबो और कुइंबो से भी ऊँची जगह देता। आज वे तुझे कोड़े लगाते हैं, लेकिन मेरी बात मानकर तू उन सबको कोड़े लगा सकता था। मैं तुझे बीच-बीच में थोड़ी व्हिस्की या ब्रांडी भी पीने को दिया करता। मैं अब भी कहता हूँ कि तू अपने ये सब ढोंग छोड़ दे। अपनी उस फटी-पुरानी पोथी को चूल्हे में झोंककर मेरा धर्म अंगीकार कर!”
टॉम ने शांति से कहा – “ईश्वर न करे ऐसा हो!”
लेग्री बोला – “तू देखता तो है कि ईश्वर तेरी कुछ भी मदद नहीं कर रहा है। अगर उसे तेरी मदद करना मंजूर होता तो वह तुझे मेरे हाथ में ही न पड़ने देता। टॉम, तेरा यह धरम-करम एक तरह का झूठा ढोंग है। मैं अच्छी तरह जानता हूँ। मेरी बात मानकर चलना ही तेरे लिए अच्छा रहेगा। मैं सामर्थ्यवान आदमी हूँ और तेरा कुछ उपकार कर सकता हूँ।”
टॉम ने उत्तर दिया – “नहीं सरकार, मैं अपना संकल्प नहीं छोडूँगा। भगवान मेरी सहायता करे या न करे, पर मैं उसकी शरण में रहूँगा और अंत तक उस पर विश्वास रखूँगा।”
लेग्री ने ठोकर मारकर उस पर थूकते हुए कहा – “तू बड़ा मूर्ख है! खैर, कुछ परवा नहीं, मैं तुझे समझूँगा। तू देखेगा कि मैं तुझसे कैसे अपनी बात मनवाता हूँ।” यह कहकर लेग्री वहाँ से चला गया।
यंत्रणा के बड़े भार से जब आत्मा सर्वथा अवसन्न हो जाती है और धैर्य सीमा को पहुँच जाता है, उस समय देह और मन की सब शक्तियाँ उस भार को अलग फेंकने के लिए तिलमिलाने लगती हैं। इसी से प्राय: घोरतम यंत्रणा के उपरांत तत्काल हृदय में आनंद और साहस का स्रोत बहते देखा जाता है। यही दशा इस समय टॉम की थी।
निर्दयी मालिक के नास्तिकता-पूर्ण तानों ने उसके दु:ख से बोझिल हृदय को और अधिक अवसन्न कर दिया। यद्यपि उसका विश्वास उस अनंत परमेश्वर से डिगा नहीं, पर निराशा से वह सर्वथा शिथिल हो गया। टॉम चूल्हे के पास संज्ञा-शून्य की भाँति बैठा रहा। सहसा उसके चारों ओर के पदार्थ मानो शून्य में विलीन हो गए और काँटो का ताज पहने, रक्त से आरक्त, आहत ईसा की मूर्ति उसके नेत्रों के सम्मुख उपस्थित हुई। भय और आश्चर्य से उस आगत के चेहरे के महान सहिष्णु भाव की ओर वह निहारने लगा। उन गंभीर और करुणा से उद्दीप्त युगल नेत्रों की दृष्टि उसके अंतस्तल पर पड़ी, इससे उसकी अवसन्न और मुमूर्षु आत्मा जाग उठी। वह घुटने टेककर और दोनों हाथ आगे फैलाकर बैठ गया। उसी समय शनै:-शनै: उस आकृति का रूप बदलने लगा। काँटों के मुकुट की जगह किरणें चमकने लगीं। एक अपूर्व प्रभा-मंडल से उद्भासित उस मुख ने स्नेह-चक्षुओं से उसकी ओर देखा। उस कंठ से सुधा की धारा बह निकली। टॉम ने सुना, वाणी कह रही थी – “जैसे मैंने पाप और अत्याचारों पर विजय प्राप्त कर, पिता के साथ पवित्र सिंहासन पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त किया, वैसे ही वह भी मेरे साथ इस सिंहासन पर बैठ सकेगा, जो संसार में पाप और अत्याचारों पर विजय प्राप्त करेगा।”
टॉम कितनी देर तक वहाँ पड़ा रहा, इसका उसे कुछ भी होश न था। जब वह होश में आया, तब उसने देखा कि आग बुझ गई है, उसके कपड़ों और शरीर को ओस ने तर कर दिया है, परंतु आत्मा का वह संकट-काल निकल गया है। अब उसे हृदय में एक अपूर्व आनंद भरा हुआ है। उस आनंद की उमंग में भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, अपमान और नैराश्य आदि की सभी यंत्रणाओं को उसने बिसार दिया है। इस जीवन की समस्त आशाओं को तिलांजलि देकर उसने अपना चित्त अनादि देव के चरणों में लगा दिया। आकाश के उज्ज्वल तारों की ओर आँखें लगाकर टॉम आकाश को प्रतिध्वनित करता हुआ आत्मा के गंभीर आनंद में मगन हो कर, यह गीत गाने लगा –
हिम सम पृथ्वी गल जाएगी, भानु भस्म हो जाएगा।
तब भी मैं प्रभु, तेरा हूँगा, तू मेरा कहलाएगा।।
होगा पूर्ण धरा का जीवन, जड़ शरीर यह मंद।
शांति-सरोवर में तैरूँगा, पाकर के मैं ब्रह्मानंद।।
वर्ष सहस्र यहाँ पर रहकर फिर प्रकाश-युत भानु-समान।
गाता नित्य रहूँगा वैसे जैसे था जब छेड़ा गान।।
यह कोई नई घटना नहीं थी। धर्म-विश्वासी गुलामों में ऐसी अचरज-भरी घटनाएँ प्राय: होती रहती थीं। मनोविज्ञानी पंडितों का मत है कि ऐसी भी अवस्थाएँ हुआ करती हैं, जिनमें मन के भाव और कल्पनाएँ इतनी उत्तेजित और प्रबल हो जाती हैं कि उस समय समस्त बाहरी इंद्रियों पर उनका प्रभाव हो जाता है, और ऐसी अवस्था में कल्पित पदार्थ प्रत्यक्ष-से दीख पड़ने लगते हैं। सर्वव्यापी परमेश्वर मनुष्य को वे शक्तियाँ देकर उसके जीवन में जो अनेक घटनाएँ घटाता है, उनकी गिनती कौन कर सकता है? और इस बात का निर्णय कौन कर सकता है कि वह किन-किन उपायों के द्वारा निराश और असहाय आत्माओं में नए बल का संचार करता है? यदि यह दास विश्वास करे कि ईसा ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया था, उससे बातें की थीं, तो कौन उसकी बात का प्रतिवाद करेगा!
दूसरे दिन प्रात:काल, जब हड्डियों के ढाँचे बने गुलाम लोग खेतों की ओर चले, तब उन चीथड़ों में लिपटे, जाड़े से काँपते अभागों में केवल एक ही व्यक्ति ऐसा था, जो उमंग से पैर रखता मस्तानी चाल से जा रहा था। कारण यही था कि ईश्वर के अनंत प्रेम पर उसका अटल विश्वास जम गया था। अरे लेग्री! तू अब अपनी सारी शक्ति आजमा कर देख ले। अति दारुण यंत्रणा, शोक, अपमान सब-के-सब इसके लिए शांति-निकेतन ही सीढ़ियाँ बनकर इसे स्वर्ग की ओर अग्रसर करने में सहायता करेंगे।
उत्पीड़ित टॉम का विनीत हृदय अब और भी अधिक शांतिपूर्ण हो गया। नित्य-पवित्र परमेश्वर ने उसके श्रद्धापूर्ण हृदय को अपना पवित्र मंदिर बना लिया। इस जीवन का मर्मांतक परिताप बीत चुका। इस जीवन की आशा, भय और आकांक्षा का उद्वेलन पीछे छूट गया और पल-पल की संग्राम-क्लिष्ट रुधिराक्त मानवीय इच्छाएँ संपूर्ण रूप से ईश्वरीय इच्छा में विलीन हो गईं। टॉम को अपनी जीवन-यात्रा का बचा भाग बहुत अल्प प्रतीत होने लगा और अनंत शांति तथा अनंत सुख इतना पास और इतना स्पष्ट जान पड़ने लगा कि जीवन के दुस्सहतम कष्ट भी उसके हृदय पर असर न कर सके।
उसका यह बाहरी परिवर्तन सबको दिखाई पड़ने लगा। उसका मुख हर समय प्रफुल्ल रहने लगा और हर काम में उसका फुर्तीलापन फिर दिखाई देने लगा। वह बड़े धीरज, सहिष्णुता और शांति के साथ अत्याचार और निष्ठुर व्यवहार सहने लगा। किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार से उसके मन में उद्विग्नता या उत्कंठा नहीं पैदा होती थी। यह देखकर एक दिन लेग्री ने सांबो से कहा – “टॉम पर आजकल कौन-सा भूत सवार हो गया है? थोड़े दिन हुए तब तो वह बिल्कुल हिल गया था, लेकिन आजकल तो वह बड़ी तेजी दिखलाता है!”
सांबो ने कहा – “कुछ ठीक नहीं मालूम, सरकार! शायद यहाँ से भाग जाने की जुगत कर रहा होगा।”
लेग्री ने अपनी छिपी इच्छा व्यक्त की – “एक बार भागने की कोशिश करे तो अपना काम ही बन जाए। मैं भी यही चाहता हूँ।”
सांबो ने हँसते हुए कहा – “जान पड़ता है, हम लोगों को जल्दी ही वह दिन देखना नसीब होगा। जरूर वह भागने की ताक में है। भागने पर जब शिकारी कुत्ते उसे दाँतों में दबा लाएँगे तब बड़ा मजा आएगा। एक बार जब भोली नाम की दासी भागी थी तो कैसा तमाशा हुआ था। मेरा तो उस वक्त हँसते-हँसते पेट फटा जा रहा था। कुत्तों ने जाकर उसे पकड़ा और हम लोगों के पहुँचने से पहले ही उसका आधा शरीर नोच डाला। उसे देखकर मुझे ऐसी हँसी छूटती थी कि क्या कहूँ!”
लेग्री बोला – “मालूम होता है, लूसी अब शीघ्र ही कब्र में आराम करेगी; लेकिन सांबो, जब भी कोई दास या दासी बहुत खुश और तेज दिखाई पड़े तो तुम्हें फौरन उसका मिजाज दुरुस्त करने की ओर ध्यान देना चाहिए।”
सांबो ने उत्तर दिया – “आप बेखटक रहिए। मैं खुद ही सब ठीक कर लूँगा।”
यह तीसरे पहर की बात थी, जब लेग्री घोड़े पर सवार होकर पास के किसी कस्बे में जा रहा था। उसने मन-ही-मन सोचा था कि उधर से लौटते हुए कुलियों के झोपड़े देखता चलूँगा।
कस्बे से लौटते हुए जब वह कुलियों की झोपड़ियों से थोड़ी दूर रह गया, तब उसे किसी के गाने की आवाज सुनाई पड़ी। उसने जरा ठहरकर सुना तो मालूम हुआ कि टॉम गा रहा है:
जब देखूँगा, लिखा हुआ है स्वर्ग-द्वार पर मेरा नाम,
भय-भावना बिदा कर दूँगा, अश्रु पोंछ लूँगा विश्राम।
वैरी बन जग लड़ने आवे और नरक से बरसें बाण,
तो भी धरा भृकुटि को निर्भय देखूँ गिनूँ तुच्छ शैतान।
प्रलय-समु्द्र उमड़ आवे या घोर शोक का हो तूफान,
मुझको कुछ परवाह न होगी, कुछ न पड़ेगा मुझको जान।
मिले निरापद मुझे स्वर्ग-गृह परम पिता सर्वस्व-समान।
यह गीत सुनकर लेग्री मन-ही-मन कहने लगा – “हा-हा, बदमाश सोचता है कि स्वर्ग जाऊँगा। इसका गीत सुनकर मेरे तो कान जल उठते हैं!”
इसके बाद वह टॉम के सामने पहुँचा और चाबुक ऊँचा उठाकर बोला – “हरामजादे! इतनी रात में बाहर पड़ा क्या गोलमाल कर रहा है?”
बहुत ही प्रसन्न और विनम्र-भाव से “जो हुकुम सरकार” कहकर जब टॉम अपनी झोपड़ी में जाने लगा, तो उसकी प्रसन्नता देखकर लेग्री के मन में असीम क्रोध की ज्वाला भड़क उठी और तत्काल उसने उसके कंधों और पीठ पर कोड़े बरसाते हुए कहा – “क्यों रे सूअर, तू यहाँ बड़ी मौज उड़ा रहा है!”
परंतु यह चाबुक की मार ऊपर-की-ऊपर ही रह गई, टॉम के भीतर हदृय पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। उसे इस मार का कोई दुख नहीं हुआ। वह अब जीवनमुक्त हो चुका है। उसकी यह पंचभौतिक काया आत्मा से पृथक हो चुकी है। अत: कोई भी बाह्य कष्ट उसे नहीं जान पड़ता था। टॉम सिर झुकाए खड़ा रहा। लेग्री ने महसूस किया कि इसे अपने ढंग पर लाना शक्ति से बाहर है। उसने समझा, ईश्वर अत्याचारों से इसकी रक्षा कर रहा है। ऐसा सोचकर वह ईश्वर को गालियाँ देने लगा। ताने, धमकियों और बेतों की मार, किसी से भी टॉम के हृदय की शांति को लेग्री नष्ट नहीं कर सका। इन दशाओं में जब उसने टॉम को विनम्रता और प्रफुल्लता से दिन काटते देखा, तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। ईसा को सतानेवालों ने, उन्हें प्रसन्नता से अत्याचारों को सहते देखकर कहा था – “ईसा, तू क्या हम लोगों के हृदय की अग्नि को समय से पूर्व ही सुलगा देगा?” लेग्री के हृदय में भी आज यही भाव उत्पन्न हुआ। वह टॉम को दुखी देखने के लिए कोड़े लगाता, परंतु टॉम इससे तनिक भी दु:खी न होता। यह देखकर लेग्री के हृदय में अशांति की भयानक आग धधकने लगी।
लेग्री के खेत में काम करनेवाले दीन-दुखी कुलियों की दुर्दशा देखकर टॉम के हृदय में बड़ा ही क्लेश हुआ। उसके अपने दु:खों का अंत हो गया है, स्वयं वह स्वर्गीय शांति का अधिकारी बन चुका है, अब वह अपनी इस शांति-संपदा का कुछ अंश इन दीन-दुखियों को बाँटने की चिंता करने लगा। उसने कुलियों के साथ धर्म-चर्चा करके उन्हें शांति के रास्ते पर लाने की बात सोची, परंतु उनके साथ धर्म-चर्चा करने का बिल्कुल ही अवकाश नहीं था। केवल खेत में आते-जाते समय बातें करने का कुछ अवसर था। टॉम ने इन्हीं क्षणों का सदुपयोग करके अभागे कुलियों के साथ धर्म-चर्चा प्रारंभ कर दी। पहले तो उसके सद्विचार का मर्म कोई भी नहीं समझ सका, परंतु धीरे-धीरे उनका वह कठोर हृदय भी पसीजने लगा। कभी वह आप भूखा रहकर अपना भोजन किसी दूसरे को दे डालता, कभी किसी सर्दी से परेशान रोगी कुली का कष्ट देखकर उसे अपना फटा कंबल दे देता और खुद जमीन पर ही पड़ा रहता। कभी किसी कमजोर स्त्री मजदूर को कपास चुनने में असमर्थ देखकर अपनी चुनी हुई कपास उसकी टोकरी में डाल देता। यह सब करते हुए उसने एक बार भी परवा नहीं की कि इन कार्रवाइयों से उसकी पीठ की चमड़ी उधेड़ी जा सकती है।
उसका ऐसा दयालुतापूर्ण आचरण देखकर खेत के सारे कुलियों का हृदय उसकी ओर आकर्षित होने लगा। कुछ समय बाद कपास चुनने के दिन निकल गए, अत: कुलियों को अब उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। उन्हें काफी अवकाश रहता था। इस समय वे अक्सर टॉम के पास बैठकर धर्म-कथाएँ सुनते तथा टॉम के साथ-साथ प्रार्थना किया करते थे।
परंतु प्रार्थना से लेग्री बहुत चिढ़ता था। वह जब सुनता कि कुली लोग टॉम के पास बैठकर धर्म-चर्चा कर रहे हैं, तो वह वहाँ पहुँचकर उन्हें बहुत मारता-पीटता। इससे उनकी धर्म-चर्चा की तृष्णा और भी बढ़ गई। वास्तव में धर्म-विद्वेषियों का अपना स्वयं का आचरण ही धर्म-प्रचार में सर्वाधिक सहायक होता है।
निरंतर अत्याचारों और हृदयहीनता के कारण लूसी का धर्मभाव सर्वथा नष्ट होनेवाला था, पर टॉम के उपदेशों और धर्म-संगति से उसका मृतप्राय विश्वास पुन: सजीव हो उठा। औरों की बात जाने दीजिए, कासी जो इतनी प्रतिहिंसक, क्रूर और उन्मत्त हो गई थी, उसके हृदय में भी भक्ति, विश्वास और प्रेम का संचार हो गया।
कासी का हृदय पहले से ही असह्य यंत्रणाओं की आग में जल रहा था, संतान-शोक के कारण वह प्राय: सनकी-सी हो गई थी, इससे उसने मन-ही-मन ठान लिया था कि मौका मिलने पर वह इस अत्याचारी लेग्री को उसके कुकर्मों का मजा जरूर चखाएगी।
एक दिन रात के समय, जब और सब लोग सो रहे थे, टॉम ने एकाएक उठ कर देखा कि कासी उसे इशारे से बाहर बुला रही है।
टॉम कुटिया से बाहर आया। रात के दो बजे होंगे। चारों ओर चाँदनी छिटकी हुई थी। टॉम ने आज कासी के चेहरे पर विलक्षण आशा और उत्साह का भाव देखा। वैसे उसका चेहरा सदा निराशा की मूर्ति बना रहा था, परंतु आज उस सर्वग्रासी निराशा की जगह पर आशा की चमक थी।
कासी ने बड़ी व्यस्तता से टॉम की कलाई इस सख्ती से पकड़कर, मानो उसके हाथ इस्पात के बने हों, उसे आगे को खींचते हुए कहा – “पिता टॉम, इधर आओ, तुमसे एक खास बात कहनी है।”
टॉम ने कुछ शंकालु-भाव से पूछा – “क्यों, क्या बात है?”
कासी ने कहा – “क्यों, तुम स्वतंत्र होना पसंद नहीं करते?”
टॉम बोला – “जब ईश्वर की मर्जी होगी, तब स्वतंत्रता मिलेगी।”
कासी ने बड़े उल्लास से कहा – “लेकिन तुम्हें आज ही रात को स्वतंत्रता मिल सकती है। इधर आओ, इधर आओ!”
इसके बाद कासी चुपके-चुपके टॉम के कान में कहने लगी – “अभी लेग्री नींद में बेहोश है। मैंने ब्रांडी में अफीम मिला दी है। अत: जल्दी नींद नहीं खुलेगी। इधर आओ। पिछवाड़े का दरवाजा खुला है। वहाँ मैंने पहले से ही एक कुल्हाड़ी रख छोड़ी है। मैं तुम्हें मार्ग बताए देती हूँ। मैं अपने हाथों से काम कर लेती, पर मेरे हाथों में इतना बल नहीं है। तुम मेरे साथ आओ।”
टॉम ने बड़ी दृढ़ता से कहा – “संसार भर का राज्य मुझे मिले तो भी मैं ऐसा पाप-कर्म नहीं करूँगा।”
कासी बोली – “पर जरा इन अभागों की दुर्दशा पर तो विचार करो। हम लोग इन सब गुलामों को मुक्त कर देंगे और फिर किसी द्वीप में चलकर बसेंगे।”
टॉम बोला – “मिस कासी, मैं तुम्हें भी मना करता हूँ। ऐसा बुरा काम कभी न करना। बुरे काम का नतीजा कभी अच्छा नहीं होगा। ईश्वर के लिए कष्ट सहो, पर इस पाप से हाथ न रंगो। कासी, ऐसा काम मत करना। नहीं-नहीं, तुम एक तो यों ही पाप के समुद्र में डूब रही हो, उस पर अब यह नया पाप मोल मत लो। हमें कष्ट सहते हुए समय का इंतजार करना चाहिए।”
कासी कुछ क्रोध में बोली – “इंतजार! क्या मैंने इंतजार नहीं किया? मैंने बहुत इंतजार किया है। अब इस हाड़-मांस के शरीर से ज्यादा नहीं सहा जाता।”
टॉम ने कासी को समझाया – “देखो कासी, ईसा ने अपना रक्त दिया, लेकिन किसी दूसरे का खून नहीं गिराया। हमें शत्रु को भी प्यार करना चाहिए।”
कासी बोली – “प्यार करूँ? ऐसे दुश्मन को प्यार करूँ? क्या मेरा शरीर लोहे का बना हुआ है?”
टॉम ने कहा – “हम लोगों की सच्ची जीत तभी होगी तब हम शत्रु को भी क्षमा करके उसके कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर सकें।”
इतना कहकर टॉम आकाश की ओर देखने लगा।
टॉम का यह हृदय-ग्राही उपदेश सुनकर कासी का हृदय पिघल गया। तब उसने कहा – “पिता टॉम, मैं तो पहले ही कह चुकी हूँ कि मुझपर शैतान सवार है। मैं प्रार्थना करना चाहती हूँ, पर कर नहीं सकती। तुमने जो कहा है, सच है, लेकिन मेरा हृदय न जाने कैसी प्रतिहिंसा से भरा हुआ है कि मैं जब भी प्रार्थना करती हूँ, मेरे हृदय में शत्रु के विरुद्ध आग धधकने लगती है।”
टॉम बोला – “हाय, तुम्हारी आत्मा में कितनी अशांति भरी हुई है। मैं तुम्हारे कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगा। कासी बहन, ईश्वर में मन लगाओ!”
कासी चुपचाप खड़ी रही। उसकी आँखों से आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदे गिरने लगीं।
टॉम ने फिर कहा – “कासी बहन, तुम यदि यहाँ से भागकर कहीं निकल सको तो मैं तुम्हें और एमेलिन को भागने की सलाह देता हूँ।”
कासी ने पूछा – “क्या तुम भी हम लोगों के साथ चलोगे?”
टॉम ने बताया – “मैं पहले तो चला भी जाता, लेकिन अब मुझे यहाँ एक काम है। मैं इन दीन-दुखी दास-दासियों को धर्म की ओर ले जाने की चेष्टा करूँगा। ईश्वर ने मुझे यह काम सौंपा है। लेकिन तुम लोगों का यहाँ से भाग जाना ही ठीक है। तुम लोग यहाँ रहोगी तो धीरे-धीरे दूसरी बुराइयों में फँस जाओगी।”
कासी ने कहा – “भागने की कोई सुविधा नहीं है। कहाँ जाएँ? कब्र के सिवा हम लोगों के लिए कहाँ जगह है? जहाँ भी हम जाएँगी, लेग्री शिकारी कुत्तों से पकड़वा मँगाएगा। साँपों और मगरों को रहने की जगह है, पर हम लोगों के लिए इस दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं है।”
टॉम ने कुछ देर चुपचाप कासी की बात सुनी, फिर कहा – “जिसने दानियल को सिंह की मांद से बचाया था, अपनी विश्वासी संतानों की अग्नि-कुंड से रक्षा की थी, जो समुद्र पर से चलाया गया था, और जिसके हुक्म देते ही हवा भी रुक गई थी, वह अब भी विद्यमान है। मुझे जान पड़ता है, वह निश्चय ही यहाँ से भाग जाने में तुम लोगों की सहायता करेगा। तुम लोग एक बार यत्न करके देखो, तुम लोगों के उद्धार के लिए मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा।”
ईश्वर की महिमा विचित्र है! कौन जान सकता है कि किन विचित्र नियमों के अनुसार हमारे मानसिक कार्य-कलापों और चिंताओं का शासन होता है! टॉम की बात सुनकर कासी के मन में अकस्मात एक विचार उत्पन्न हुआ। पहले उसे भागना असंभव जान पड़ता था, पर अब संभव जान पड़ने लगा। कासी ने पहले तो भागने के विषय में बहुत-कुछ सोचा-विचारा था, पर निश्चय न कर सकी थी कि भाग निकलने की भी कोई सूरत है, लेकिन आज उसे ऐसा लगने लगा कि उसके लिए भागना बहुत ही सहज है। इससे उसके मन में आशा का संचार हो गया। वह टॉम से बोली – “पिता टॉम! मैं चेष्टा करूँगी।”
टॉम ने आकाश की ओर देखते हुए कहा – “परमपिता परमात्मा तुम्हारे सहायक हों!”
42. पलायन की योजना
पहले बताया जा चुका है कि बहुत धनी और बड़े जमींदार के दिवालिया हो जाने पर लेग्री ने बहुत सस्ते में उसका यह मकान और खेत खरीद लिया था। यह मकान बहुत बड़ा था, इसमें बहुत पुरानी कोठरियाँ थीं। जमींदार के शासन में यहाँ अनजान लोग रहते थे; पर जब से यह मकान लेग्री के हाथ में आया है, तब से इसके चार-पाँच सहन तो बिल्कुल सूने पड़े रहते हैं। लेग्री का व्यापार कोई बहुत लंबा-चौड़ा न था, और न वह वैसा संपन्न ही था। कुछ दिनों पहले, जब वह जहाज का कप्तान था, उसने इधर-उधर से लूट-खसोट तथा चोरी-जारी करके दो-चार हजार की पूँजी बना ली थी और उसी से बड़े सस्ते में यह घर और खेत खरीदकर काम चालू कर दिया था। पहले मालिक के पास इतने बड़े खेत में काम करने के लिए पाँच सौ के लगभग कुली थे, पर अब उसी खेती का काम लेग्री केवल 50 गुलामों से कराता है। इसी से लेग्री के खेत में काम करनेवाले कुल दो-तीन वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहते थे।
मकान में जो 5-6 कमरे खाली पड़े थे, उनमें उत्तर की ओर एक बड़ा कमरा था। यह कमरा कासी के सोने के कमरे से सटा हुआ था। कासी के कमरे के बाईं ओर लेग्री का शयनागार था। उस मकान में रहनेवाले सब लोगों के मन में यह खयाल जमा हुआ था कि लेग्री के उत्तर दिशावाले कमरे में भूत रहता है। रात की कौन कहे, दिन में भी लोगों की उस कमरे में जाने की हिम्मत नहीं होती थी। कई वर्ष हुए, लेग्री ने इस कमरे में एक कुली स्त्री-मजदूर को तीन सप्ताह तक भूखी-प्यासी रखकर उसकी जान ले ली थी। तभी से सबको विश्वास हो गया था कि यह कमरा भूतों का अड्डा है। इसी घटना से भूत-कथा का सूत्रपात हुआ। स्वयं लेग्री की भी कमरे में घुसने की हिम्मत न होती, लेकिन वह अपना भय किसी के सामने जाहिर नहीं करता था।
एक दिन कासी, बिना लेग्री से पूछे-ताछे ही, बड़ी घबराहट में सारा माल-असबाब उठाकर अपना कमरा बदलने लगी। दास-दासियों को बुलाकर उसने सारा सामान उठाकर दूसरे कमरे में ले जाने को कहा। कुली लोग बहुत डरते-काँपते हुए वहाँ की सब चीजें उठाकर दूसरे कमरे में जाकर रखने लगे। उस समय लेग्री घूमने गया हुआ था। जब वह लौटा तो यह उलटफेर देखकर उसने पूछा – “कासी, क्या बात है? इस कमरे की चीजें उठाकर वहाँ क्यों लिए जा रही हो?”
कासी ने कहा – “मुझे इस कमरे में नींद नहीं आती।”
लेग्री ने पूछा – “क्यों, क्या बात है?”
कासी ने कहा – “मैं वह सब कहना नहीं चाहती।”
लेग्री बोला – “कहने में क्या हर्ज है?”
तब कासी ने कहा – “इस उत्तरवाले कमरे में ऐसी-ऐसी विचित्र आवाजें आती हैं कि मुझे बड़ा डर लगता है और इसी से नींद नहीं आती।”
लेग्री ने फिर पूछा – “क्या आवाज आती है? वह कैसी आवाज है?”
कासी ने कहा – “क्या तुम्हें मालूम नहीं, वह किसकी आवाज है, कैसी आवाज है?”
इस बात पर लेग्री आपे से बाहर हो गया और जमीन पर जोर से पैर मारकर उसने कासी के मुँह पर चाबुक चलाई। इस कमरे में कुली स्त्री की मौत हुई थी, इस बात को लेग्री किसी पर प्रकट नहीं होने देता था। इसी से कासी पर बहुत क्रुद्ध हुआ। चाबुक खाकर कासी एक किनारे हट गई और जोर-जोर से कहने लगी – “लेग्री, तुम्हीं एक रात इस कमरे में सो कर देखो। देखती हूँ, तुम डरते हो कि नहीं।”
कासी की इस बात से लेग्री के मन में भय जमकर बैठ गया। असल में जिन अशिक्षित लोगों में धर्म के प्रति विश्वास का भाव नहीं होता, उनके मन में ऐसे कुसंस्कार-मूलक भय का भाव बड़ी जल्दी पैदा हो जाता है।
कासी ने अच्छी तरह जान लिया कि लेग्री के मन में भय समा गया है। इससे वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। इसके बाद कासी उस उत्तरवाले कमरे के पास की एक कोठरी में अपना बिछौना वगैरह तथा सात दिन तक की खाने-पीने की सामग्री रख आई। बीच-बीच में वह ठीक आधी रात को वहाँ जाकर छिपे-छिपे लेग्री के कमरे का दरवाजा खटखटाती और विचित्र प्रकार की आवाज करती। इससे लेग्री का कुसंस्कारमूलक भय दिन-ब-दिन बढ़ता गया। इस संबंध में कासी दास-दासियों के मन में अधिक भय पैदा करने की नीयत से नित्य नए-नए उपद्रवों के किस्से गढ़कर सुनाती। इससे उन सबका डर बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़ गया कि रात को वे उस कमरे की ओर आँख उठाकर देखने में भी भय खाने लगे।
तीन-चार दिन में जब कासी ने देख लिया कि अब भूत-संबंधी संस्कार सब के मन में खूब गहरे जम गए हैं तो वह भागने की तैयारी करने लगी। बिछौने आदि तो पहले ही रख आई थी, अब अपने और एमेलिन के कपड़े भी ले जाकर वहाँ रख आई थी।
तीसरे पहल लेग्री बहुत देर से अपने किसी पड़ोसी के यहाँ गया था। यह सुअवसर पाकर, संध्या के बाद, जब चारों ओर अँधेरा छा गया, कासी ने एमेलिन से कहा – “चल, झटपट उठकर चल। भागने का इससे अच्छा दाँव फिर नहीं मिलेगा।”
वे दोनों घर से निकलकर दलदल की ओर चलीं। पहले उन्होंने निश्चय किया था कि पश्चिम की ओर दलदल में चलेंगी, पर यह सोचकर कि वहाँ रहने से लेग्री उन्हें शिकारी कुत्तों द्वारा पकड़वा मँगाएगा, उन्होंने कुछ दूर पश्चिम और फिर उत्तर जाकर, वहाँ से पूर्व की ओर मुँहकर कुछ बढ़ने पर, सामने की खाई पार करके, भुतहे घर में पहुँचकर पाँच-छह दिन वहीं रहने का निश्चय किया और सोचा कि अपने भागने के बाद लेग्री संभवत: चार-पाँच दिन उन्हें दलदल में ही इधर-उधर खोजेगा अथवा शिकारी कुत्तों से खोज कराएगा; परंतु जब चार-पाँच दिन में वह खोजकर थक जाएगा तब मौके से किसी दिन रात को निकलकर चल देंगी। चलते-चलते जब वे दोनों दलदल के पास पहुँची, तब उन्हें पीछे से “पकड़ो! पकड़ो! दासी भागी जा रही हैं!” का शोर सुनाई दिया। कासी ने पहले तो अनुमान किया कि सांबो चिल्ला रहा है, पर पीछे उसे आवाज से मालूम हुआ कि वह आवाज सांबो की नहीं, स्वयं लेग्री की है। इस चिल्लाहट से एमेलिन बहुत डरी और कासी का हाथ पकड़कर बोली – “कासी माँ, मुझे तो बेहोशी आ रही है।”
कासी बोली – “यदि इस समय तुझे बेहोशी आ गई तो मैं तेरी जान ही ले लूँगी, नहीं तो चुपचाप मेरे पीछे दौड़ती चली आ!”
कासी के भय से एमेलिन जी-जान से दौड़ने लगी और शीघ्र ही लेग्री की आँखों से ओझल हो गई। लेग्री ने देखा कि अब इस अंधेरे में बिना शिकारी कुत्तों के इनको पकड़ने की कोई सूरत नहीं है, अत: वह कुत्तों तथा लोगों को साथ लेने के लिए खेत की ओर लौटा और सांबो, कुइंबो तथा अन्य दास-दासियों, शिकारी कुत्तों और बंदूकों को लेकर उन्हें फिर पकड़ने चला।
लेग्री मन-ही-मन जानता था कि वे दोनों सहज ही भागकर नहीं निकल सकेंगी। उसके सह हब्शी गुलाम चारों दिशाओं में फैलकर उनकी खोज करने लगे।
सांबो ने लेग्री से पूछा – “अच्छा, कासी को देख पाऊँ तो क्या करूँ?”
लेग्री बोला – “कासी को गोली मार सकता है, पर एमेलिन को जान से मत मारना। और जो इन दोनों को जीवित पकड़कर ला सके, उसे पाँच सौ रुपया इनाम दूँगा।”
इधर कासी और एमेलिन अपने निश्चय के अनुसार रास्ता तय करके उस ठिकानेवाले कमरे में जा पहुँची। घर में पहुँचने पर, जंगले के पास खड़ी होकर, एमेलिन ने कासी को बुलाकर कहा – “वह देख, शिकारी कुत्तों को साथ लिए कितने आदमी चले जा रहे हैं। चल, हम लोग चलकर किसी अँधेरी कोठरी में छिप जाएँ।”
कासी बोली – “डर क्या है? यहीं बरामदे में बैठ कर दोनों तमाशा देखेंगी। वे इधर कदापि नहीं आएँगे।”
सारे दास-दासियों तथा कुत्तों को साथ लिए लेग्री दलदल की ओर निकल गया। घर एकदम सूना पड़ा था। एमेलिन को साथ लेकर कासी धीरे से दक्षिण दिशावाला दरवाजा खोलकर लेग्री के सोने के कमरे में घुस गई। वहाँ उसे लेग्री के संदूक की कुंजी बिस्तर पर पड़ी हुई मिली, जिसे वह जल्दी में वहीं पड़ी छोड़ गया था। कुंजी पाकर कासी को बहुत खुशी हुई। उसने तत्काल संदूक खोला और उसमें से तीन-चार हजार रुपयों के नोट निकालकर अपने कपड़ों में छिपा लिए। यह देखकर एमेलिन बहुत डरी। उसने कहा – “ओ कासी माँ, यह तुम क्या कर रही हो? ऐसा बुरा काम मत करो।”
इस पर कासी ने कुछ झुँझलाकर कहा “चुप रहो! बिना पैसों के जहाज का भाड़ा और रास्ते का सफर-खर्च कहाँ से आएगा? क्या दलदल में सड़कर मरना है?”
एमेलिन बोली – “जो भी हो, लेकिन यह तो चोरी ही है।”
कासी ने बड़ी घृणा के साथ कहा – “चोरी है? जो मनुष्यों की आत्मा और शरीर-सब कुछ चुरा लेते हैं, वे हमसे क्या कह सकते हैं? लेग्री ने ये रुपए कहाँ से पाए हैं? इन कुलियों का खून चूस-चूसकर ही तो ये रुपए बटोरे हैं। यह दास-दासियों का खून है। चोर का माल ले जाने में क्या दोष है? यह सारे-का-सारा माल चोरी का है।”
इसके बाद कासी एमेलिन का हाथ पकड़कर से उत्तर के कमरे में ले गई। वहाँ जाकर बोली – “मैंने काफी रोशनी का प्रबंधकर रखा है और समय बिताने के लिए कुछ पुस्तकें भी लाकर रख दी हैं। मुझे निश्चय है कि वे हम लोगों को खोजने यहाँ नहीं आएँगे। हाँ, यदि आ ही गए तो सचमुच उन्हें भूतों का तमाशा दिखाकर डराऊँगी।”
एमेलिन ने पूछा – “क्या तुम्हें निश्चय है कि वे लोग हम दोनों की खोज में यहाँ न आ सकेंगे?”
कासी बोली – “मैं तो चाहती हूँ कि लेग्री एक बार यहाँ आए, पर वह यहाँ नहीं आएगा और न दास-दासी ही आना स्वीकार करेंगे।”
एमेलिन ने सीधी-सादी तौर पर पूछा – “अच्छा, तुमने उस समय मुझे मार डालने की धमकी किस मतलब से दी थी?”
कासी ने बताया – “जिससे तुम्हें मूर्च्छा न आ जाए। यदि उस समय तुम्हें मूर्छा आ जाती, तो फिर वे सब तुम्हें पकड़ लेते।”
यह सुनकर एमेलिन काँप उठी। कुछ देर के बाद वे दोनों चुप हो गईं। फिर कासी एक पुस्तक पढ़ने लगी और पढ़ते-पढ़ते उसे नींद आ गई।
आधी रात के वक्त लेग्री जब अपना दल-बल लिए निराश होकर घर लौटा, तो बड़ा शोरगुल होने लगा। शोर-गुल होने से कासी और एमेलिन की नींद टूट गई। एमेलिन जागते ही चीख उठी, लेकिन कासी ने उसे धीरज बँधाकर कहा – “कोई भय की बात नहीं है। वह दलदल में हम लोगों को खोजकर लौट आया है। वह देखो, लेग्री के घोड़े के बदन पर कितना कीचड़ लगा हुआ है। लेग्री के बदन पर भी कीचड़ लिपटा है। कुत्ते कैसे थके हुए जीभ लपलपा रहे हैं!”
एमेलिन ने कहा – “धीरे-धीरे बातें करो। चुप रहो, कोई सुन लेगा।”
किंतु कासी ने और जोर से बोलते हुए कहा – “ऐसा क्या डर पड़ा है? हम लोगों की बात कोई सुनेगा तो भूत के डर से और भी डरेगा।”
धीरे-धीरे अधिक रात बीत गई। लेग्री बहुत थक गया था, अत: वह अपने भाग्य को कोसता हुआ सोने के कमरे में चला गया।
43. कसौटी
चलते-चलते हजारों मील की मंजिल तय हो जाती है और देखते-देखते अमावस्या की घोर निशा बीतकर प्रभात का सूर्य निकल आता है। काल का अबाध-अनंत प्रवाह पाप-पंक में डूबे दुराचारियों को धीरे-धीरे उस घोर अमा-निशा की ओर धकेल रहा है, परंतु साधुओं और महात्माओं को विपत्ति-वेदनाओं से हटाकर धीरे-धीरे सूर्य की शत-शत किरणों से प्रदीप्त दिवस की ओर ले जा रहा है।
पार्थिव पद और प्रभुत्व से शून्य टॉम के जीवन में कितने ही उलटफेर हुए। पहले वह स्त्री-पुरुषों सहित सुख से सानंद जीवन बिताता था, अकस्मात् दिन फिरे, और सुख की घड़ियों की जगह दु:ख की घड़ियों ने उसे घेर लिया। स्त्री-पुत्रों से वियोग हो गया। उस समय उसे दासता की बेड़ियाँ बहुत अखरीं। समय ने फिर पलटा खाया और सहृदय हाथों में जा पड़ा। इसी लिए वह दासता की लोहे-जैसी कठिन बेड़ी कुसुम-जैसी कोमल हो गई। परंतु विधाता से उसका यह सुख भी अधिक दिनों तक नहीं देखा गया। देखते-देखते वह ऐसे हाथों में चला गया, जहाँ उसकी सांसारिक सुख-रूपी आशा-लताओं को जड़-मूल से उखाड़कर नष्ट कर डाला गया। उसके पश्चात् दुर्भेद्य गहरे अंधकार को भेदकर स्वर्गीय उज्ज्वल तारों की अपूर्व ज्योति उसके नेत्रों के सम्मुख चमकने लगी, उसके लिए स्वर्ग का द्वार उन्मुक्त हो गया।
कासी और एमेलिन के भाग जाने के बाद लेग्री की क्रोधाग्नि एकदम भभक उठी और बेचारा टॉम ही उस धधकती हुई क्रोधाग्नि का शिकार हुआ। लेग्री जब दोनों दासियों को पकड़ने के लिए सब गुलामों को बुला रहा था, उस समय टॉम की आँखों से खुशी टपक रही थी। टॉम ने हाथ उठाकर आकाश की ओर देखा। लेग्री ने उसका यह भाव देख लिया था। दूसरे इस बात से भी वह टॉम की नीयत जान गया कि सब गुलाम तो भगोड़ी दासियों को पकड़ने के लिए दौड़-धूप करने लगे, पर टॉम ने उसका साथ नहीं दिया। लेग्री ने एक बार टॉम को पकड़नेवालों के साथ जबर्दस्ती भेजने की सोची, लेकिन फिर उसके पहले आचरण का स्मरण करके उसने उसे भेजना व्यर्थ समझा, क्योंकि टॉम जिस बात को बुरा समझता है, उसे वह जीते-जी कभी न करेगा।
लेग्री के लाव-लश्कर सहित एमेलिन और कासी को पकड़ने चले जाने पर खेत पर केवल टॉम तथा दो-एक वे लोग रह गए, जिन्होंने टॉम से प्रार्थना करना सीखा था। ये लोग मिलकर कासी और एमेलिन के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगे।
बहुत खोज के बाद आधी रात के समय लेग्री जब निराश और परेशान होकर घर लौटा, तब टॉम पर उसकी क्रोधाग्नि एकदम भभक उठी। वह मन-ही-मन सोचने लगा कि जब से उसने टॉम को खरीदा है तब से आज तक उसने उसकी आज्ञा का उल्लंघन-ही-उल्लंघन किया है। यह चिंता नरकाग्नि की तरह उसके हृदय को जलाने लगी। ज्योंहि वह अपने बिस्तर पर बैठा, अपने-आप से बोला – “मैं टॉम से नफरत करता हूँ। मुझे उससे जबर्दस्त नफरत है। क्या वह मेरी चीज नहीं है? क्या मैं उससे मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता? अच्छा देखता हूँ, मुझे रोकनेवाला कौन है।” – ऐसा कहकर वह बार-बार जमीन पर पैर पटकने लगा। लेकिन उसने फिर सोचा कि टॉम को मैंने अधिक दामों पर खरीदा है, ऐसी कीमती चीज को यों नष्ट करना ठीक नहीं है। कल उससे कुछ कहना-सुनना मुनासिब नहीं होगा।
उसने निकट के खेतों से ढूँढ़ने वाले, शिकारी कुत्ते, बंदूकें और बहुत से गुलाम इकट्ठे किए। अब उसने निश्चय किया कि जितनी दलदली जमीन है, उसका चप्पा-चप्पा खोज डाला जाएगा। यदि कासी और एमेलिन मिल गईं, तब तो ठीक, नहीं तो टॉम के प्राण लेने का उसने पक्का संकल्प किया। वह अंदर से उबलकर दाँत पीसने लगा। उसके पापासक्त मन ने इस भयंकर नर-हत्या के संकल्प का पूरी तरह समर्थन किया।
कानून गढ़नेवाले कहा करते कि मनुष्य अपना स्वार्थ सोचकर दास-दासियों के प्राण नहीं ले सकता, पर क्रुद्ध होने पर ये हत्यारे अपने-पराए तथा भले-बुरे का होश खो बैठते हैं। इनके हाथों में बेचारे गुलामों के प्राण सौंपकर उन लोगों ने नि:संदेह बड़ा पापपूर्ण काम किया था।
प्रात:काल जब लेग्री अपने आदमी इकट्ठे कर रहा था, तब कासी उत्तर दिशावाले दालान के एक सूराख से उसकी सब कार्रवाई देख-सुन रही थी। पकड़नेवाले दल में दो तो पास के दूसरे दो खेतों के परिदर्शक थे और बाकी लेग्री के शराबी सहचर थे। सभी बड़े उत्साह से तैयार हो रहे थे और गिलासों में भर-भरकर शराब उड़ा रहे थे। उनकी सारी बातचीत सुनने की इच्छा से कासी घर की एक दीवार से कान लगाए चुपचाप खड़ी थी।
उनमें से एक परिदर्शक कह रहा था – “मेरा शिकारी कुत्ता भगोड़ों को पकड़ते ही नोच डालता है।” दूसरे ने कहा – “जैसे ही भगोड़ी दासियाँ मेरी नजर के सामने पड़ेंगी, मैं उन्हें तुरंत बंदूक का निशाना बनाकर भागने का मजा चखा दूँगा।”
उन दोनों राक्षसों की बातें सुनकर कासी बोल उठी – “हे भगवान! क्या इस संसार में सब पापी-ही-पापी बसते हैं? हमने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जो हम लोगों पर ये इतना अत्याचार करते हैं।” फिर एमेलिन की ओर मुँह करके बोली – “बेटी, तू अगर आज मेरे साथ न होती तो मैं अभी उन सबके पास जाकर कहती, ‘लो, मुझे गोली से मारकर अपनी साध पूरी कर लो।’ स्वाधीन होकर ही मेरा क्या हुआ जाता है? अब मुझे अपनी दोनों संतानों का मुँह देखने को मिलेगा? मैं फिर पहले-जैसा पवित्र जीवन प्राप्त कर सकूँगी?”
कासी के मुँह का भाव देखकर एमेलिन सहम गई और भय से कुछ भी न बोल सकी। उसने एक भयभीत बालक की भाँति कासी का हाथ पकड़ लिया।
कासी ने हाथ छुड़ाते हुए कहा – “मेरा हाथ छोड़ दे, मैं तुझे प्यार नहीं करना चाहती। अब संसार में किसी को भी प्यार करने की मुझे इच्छा नहीं होती।”
एमेलिन ने कहा – “दुखिया कासी माँ, इतना दु:ख मत करो। यदि ईश्वर हमें स्वतंत्रता देता है तो शायद वह तुम्हें तुम्हारी बेटी से भी मिला देगा। यह न हो सका तो मैं तुम्हारी बेटी बनकर रहूँगी। अब अपनी दुखिया माँ को देखने की आशा मैंने भी छोड़ दी है। मैं अब तुम्हीं को अपनी माँ समझूँगी। कासी माँ, तुम मुझपर प्यार करो या न करो, मैं तुम्हें अवश्य प्यार करूँगी।”
कासी बोली – “ओह, अपनी दोनों संतानों के लिए मेरा हृदय कैसा हाहाकार कर रहा है। मेरी आँखें उन्हें देखने के लिए तरस रही हैं।” फिर उसने अपनी छाती पीटते हुए कहा – “हे भगवान! मुझे अपनी संतानों से मिला दे। मैं तभी शांतिपूर्ण हृदय से प्रार्थना कर सकूँगी।”
एमेलिन ने कहा – “उस पर विश्वास करो – वह हमारा पिता है!”
कासी बोली – “हम लोगों पर भगवान का कोप बरस रहा है। वह हम लोगों पर नाराज हो रहा है।”
एमेलिन ने बताया – “नहीं कासी, वह अवश्य हम लोगों पर कृपा करेगा। हम लोगों को उसका भरोसा करना चाहिए।”
इन दोनों में जब ये बातें हो रही थीं, उस समय लेग्री अपने आदमियों सहित निराश और परेशान होकर घर लौट आया था। जब वह बहुत उदास मुँह बनाए घोड़े की पीठ से उतरा, उस समय कासी बड़ी प्रसन्नता से, सूराख के रास्ते, उसे देख रही थी। उतरते ही उसने कुइंबो से कहा – “जल्दी जा और टॉम को यहाँ ला। इस मामले में जरूर उसका हाथ है। उसके काले चमड़े के अंदर से सारी बातें बाहर निकालनी होंगी।”
टॉम को पकड़कर लाने के उद्देश्य से सांबो और कुइंबो, दोनों बड़ी प्रसन्नता से उछलते-कूदते हुए चले। आपस में इन दोनों की एक घड़ी नहीं बनती थी, लेकिन टॉम पर इन दोनों की ही शनि-दृष्टि थी, क्योंकि लेग्री ने टॉम को अपना मुख्य परिदर्शक बनाने का संकल्प लिया था।
सांबो और कुइंबो ने टॉम से जाकर कहा – “चलो, साहब बुला रहे हैं।” और हाथ पकड़कर वे उसे ले जाने लगे। टॉम ने जान लिया कि कासी और एमेलिन के भागने का वृत्तांत पूछने के लिए ही लेग्री उसे बुला रहा है। टॉम सब बातें जानता था और वे इस समय कहाँ हैं, इसका भी उसे पता था, पर उसने मन-ही-मन ठान लिया था कि चाहे जान चली जाए, पर वह इस गुप्त भेद को प्रकट करके उन दोनों अनाथ औरतों को सर्वनाश के मुँह में नहीं जाने देगा। यह सोचकर, वह ईश्वर के चरणों में अपने को सौंपकर, मृत्यु के लिए कटिबद्ध हो गया। वह हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा – “ओ परम पिता, मैं आपके हाथों में अपने प्राणों का समर्पण करता हूँ, आज तक आपने ही मेरी रक्षा की है।”
उसे ले जाते हुए कुइंबो कहने लगा – “अहा-हा! अब की बार बच्चू को छठी का दूध याद आ जाएगा, आज मालिक बेहद गुस्सा हो गए हैं। अब छिपने-छिपाने की गुंजाइश नहीं है, सारी बातें पेट से बाहर निकालनी पड़ेंगी। गुलामों को भागने में मदद देने से क्या मजा आता है, यह अबकी बार ही मालूम पड़ेगा। अबकी बार तेरी खोपड़ी दुरुस्त हो जाएगी।”
कुइंबो की असभ्य और क्रूर बातें टॉम के कानों में नहीं पहुँचीं। जिस समय कुइंबो यह सब बकवास कर रहा था, उस समय टॉम के कानों में अति मधुर कंठ के ये शब्द सुनाई दे रहे थे – “शारीरिक यातना देनेवालों से भय मत करो, क्योंकि इसके आगे उनका कोई बस नहीं है।”
इस उत्साहपूर्ण वाक्य को सुनने से टॉम को अपनी हड्डियों तक में नए बल का अनुभव हुआ। लगा, जैसे ईश्वर के स्पर्श-मात्र से उसके शरीर में नया रक्त और उत्साह दौड़ने लगा है। सैकड़ों आत्माओं का बल मानो उस अकेले की आत्मा में प्रवेश कर रहा है। आगे बढ़ते हुए वह ज्यों-ज्यों पेड़-पत्तों, लता-पादपों एवं दासों के झोपड़ों को पीछे छोड़ता जाता था, त्यों-त्यों उसे मालूम हो रहा था, मानो वह अपनी दुरावस्था को भी पीछे छोड़ता जा रहा है। उसकी आत्मा आनंद में नृत्य करने लगी। उसके पिता का घर निकट आ गया है, उसकी दासता की बेड़ियों के टूटने का समय आ पहुँचा है!
लेग्री ने टॉम के कोट का कालर पकड़कर खींचते हुए बड़े क्रोध से कहा – “टॉम, तू जानता है कि मैंने तुझे मार डालने का संकल्प कर लिया है!”
टॉम ने धीरता से कहा – “यह आपके लिए बहुत सहज काम है सरकार!”
लेग्री बोला – “टॉम, तू इन भगोड़ी दासियों के संबंध में जो कुछ जानता है, मेरे सामने कह दे, नहीं तो आज मैंने तेरी जान लेने की ठान ली है।”
टॉम इस प्रश्न पर चुप खड़ा रहा।
खूंखार शेर की तरह गरजते हुए तथा जमीन पर पैर मारते हुए लेग्री बोला – “मैं जो पूछ रहा हूँ, उसका जवाब दे!”
टॉम ने दृढ़ता और धीरज से साफ शब्दों में कहा – “सरकार, मुझे कुछ नहीं कहना है।”
लेग्री गालियाँ देते हुए बरसा – “पाजी, काले ईसाई, तू मुझसे यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि तू उनके बारे में कुछ नहीं जानता?”
टॉम चुप खड़ा था।
लेग्री उसे मारते हुए जोरों से गरजा – “जल्दी बोल! तू क्या जानता है?”
टॉम ने कहा – “सरकार, मैं जानता हूँ, पर बता नहीं सकता। मुझे मरना स्वीकार है।”
यह सुनकर लेग्री कुछ देर गुस्से को थामकर बोला – “सुन बे टॉम! एक बार मैंने तुझे छोड़ दिया, इससे तू यह मत समझ कि अब की बार भी छोड़ दूँगा। इस बार मैंने ठान लिया है कि कुछ रुपयों का नुकसान हो जाए तो कोई परवा नहीं। मैं या तो तुझे अपने काबू में करूँगा, या तेरे शरीर से रक्त की एक-एक बूँद निकालकर तेरी जान ले लूँगा।”
टॉम ने एक बार उसकी आँखों में अपनी आँखें डालकर देखा और उत्तर दिया – “सरकार, अगर आप बीमार होते, किसी आफत में फँसे होते, या आपकी जान के लाले पड़े होते और मेरे प्राण देने से आप बच सकते, तो मैं आपके लिए प्रसन्नता के साथ अपने प्राण न्यौछावर कर देता। अब भी अगर मेरी इस तुच्छ देह के रक्त से आपकी आत्मा का कल्याण हो सके तो मैं बड़ी खुशी से आपके लिए अपने शरीर का सारा खून बहाने के लिए तैयार हूँ; परंतु सरकार, इस नर-हत्या रूपी भयंकर पाप से अपनी आत्मा को कलंकित न कीजिए। इस काम में मेरी निस्बत आपकी ही अधिक बुराई होगी। मेरे प्राण आप खुशी से ले सकते हैं – इससे मेरे तो सारे ही दु:खों का खात्मा हो जाएगा, परंतु अपने पिछले पापों तथा इस नवीन नर-हत्या रूपी पाप के कारण आपका बहुत ही अमंगल होगा। सरकार, एक बार इस पर गौर करके देखिए।”
टॉम की यह बात सुनकर उस पाषाण-हृदय नर-पिशाच अंग्रेज के मन में भी पल भर के लिए डर पैदा हो गया। उसे ऐसा मालूम पड़ा जैसे स्वर्ग से उतरा कोई देवदूत उपदेश दे रहा हो।
लेग्री चकित होकर टॉम का मुँह देखने लगा। उस समय वहाँ खड़े सब लोग एकदम सन्न थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था कि सुई भी गिरती तो सुनाई देती। यह लेग्री के चरित्र को सुधारने का अंतिम सुयोग था।
पापी मनुष्य को अपकर्मों से दूर होने के लिए मंगलमय परमात्मा समय-समय पर, पल-पल पर, अवसर देते हैं; क्षण-क्षण पर पापी की आँखों के सामने ऐसी अवस्थाएँ आती हैं कि वह इस ईश्वर-प्रदत्त सुअवसर का सदुपयोग करके, सहज में आत्म-संयम करके, अपने जीवन की गति को बदल सकता है। लेग्री, खूब सोच लो, तुम्हारे लिए यह अंतिम अवसर है।
परंतु सारे जीवन नर-हत्या करते-करते इन अर्थ-पिशाच स्वार्थी गोरों का हृदय पत्थर से भी ज्यादा सख्त हो गया था। अत: साधु-भाव क्षण भर से अधिक इस हृदय पर नहीं टिक सका। लेग्री दो-चार पल ठहरा। एक बार मन में विचार आया कि क्या करूँ? इस चिंता ने मन को डाँवाडोल किया, किंतु अभ्यस्त पैशाचिक भाव के मन में आते ही, तत्काल लेग्री का क्रोध भड़क उठा और वह गाय के चमड़े से बने चाबुक से टॉम को पीटने लगा।
उस दिन के भीषण लोमहर्षक कांड का वर्णन करने में लेखनी एकदम असमर्थ है। नृशंस प्रकृति का मनुष्य बिना हिचकिचाहट के जो भयंकर अत्याचार करता है, उसे सुनने में भी सहृदय मनुष्य कानों पर हाथ रख लेते हैं। सिर्फ हाथ ही नहीं रखते, कभी-कभी उन कठोर अत्याचारों की बात सुनकर उनके हृदय में बरछी-सी लग जाती है और उनकी मौत का कारण बन जाती है। इसी से दूसरों का कष्ट देखकर इवान्जेलिन के हृदय की ग्रंथि खुल गई और वह संसार को त्यागकर परमपिता की गोद में चली गई।
परम कारुणिक ईसा ने संसार के कल्याण के लिए बड़ी-से-बड़ी यातनाएँ, घोर-से-घोर संकट तथा दुस्सह अपमान सहे थे, इसी से वे मृत्यु के उपरांत देवता समझे गए। फिर उन्हीं ईसा का प्रचारित ईसाई-धर्म जिनकी एकमात्र पूँजी है, वे भला क्यों इस यातना को सहने में असमर्थ होने लगे? जिन राजाओं के भी राजा परमेश्वर ने 1900 वर्ष पूर्व ईसा की सूली के पास आकर कहा था – “बेटा, कोई डर नहीं है! चले आओ! तुम्हारे लिए स्वर्ग-राज्य का द्वार खुला हुआ है।” – वही अनंत मंगलमय जगत-पिता आज, पार्थिव पद और प्रभुत्व से हीन दीन टॉम के पास खड़ा होकर उसे आश्वस्त कर रहा है और मधुर कंठ से कह रहा है – “कोई भय नहीं है, टॉम! तुम्हारी दु:ख-निशा का अंत हो गया। स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए मुक्त है। तुम राजमुकुट धारण करके स्वर्ग-राज्य में प्रवेश करो। तुम्हें उठा लेने के लिए मेरी भुजाएँ फैली हुई हैं।”
मार खाते-खाते जब टॉम बेदम हो गया और उसके प्राण निकलने की तैयारी होने लगी, तब भी उसे लुभाने के लिए लेग्री ने कहा – “भागी हुई दासियाँ कहाँ हैं? अब भी बता दे, तो तुझे छोड़ सकता हूँ।”
परंतु जिसने परमपिता के हाथों में आत्म-समर्पण कर दिया है, उसे कौन लुभा सकता है। उसके मुख से ‘हे पिता!’ ‘हे परमेश्वर!’ के सिवा कोई आवाज नहीं निकली।
टॉम का धीरज देखकर क्रूर हत्यारे सांबो का हृदय भी क्षण भर के लिए पिघल गया। उसने लेग्री से कहा – “सरकार, अब और मार की दरकार नहीं। इसकी जान तो यों ही निकल जाएगी।”
लेकिन पापिष्ठ लेग्री ने फिर कहा – “अभी और मार! और मार! जब तक कोई बात नहीं बताएगा, तब तक मैं इसे नहीं छोडूँगा।”
इसी समय धरा पर क्षत-विक्षत पड़े हुए मुमूर्ष टॉम ने लेग्री की ओर देखकर कहा – “ओ अभागे! तू मेरा और अधिक कुछ नहीं कर सकता। जा, मैं तेरे सारे अपराधों को क्षमा करता हूँ।” इतना कहते-कहते वह अचेत हो गया।
उसके शरीर को हिला-डुला कर देखते हुए लेग्री ने कहा – “मालूम होता है, मर गया। अच्छा हुआ, अब इसका मुँह बंद हो गया।”
यह ठीक है लेग्री, कि तूने उसका मुँह तो बंद कर दिया, पर उसकी आवाज तो तेरे अंत:करण में सदा गूँजती रहेगी! उसे कौन बंद कर सकेगा?
फिर लेग्री वहाँ से चला गया। लेकिन टॉम के प्राण अभी शरीर से नहीं निकले थे। मार के समय टॉम ने जो प्रार्थना की थी, उसे सुनकर सांबो और कुइंबो जैसे नर-पिशाचों का हृदय भी पिघलने लगा। लेग्री के चले जाने पर वे दोनों तुरंत उसे उठाकर एक झोपड़ी के अंदर ले गए और टॉम को बचाने की चेष्टा करने लगे।
सांबो बोला – “हम लोगों ने बड़ा पाप-कर्म किया है। आशा है, इसके लिए मालिक ही को जवाब देना पड़ेगा, हम लोगों का कुछ न होगा।”
फिर वे दोनों टॉम के जख्मों को धोने लगे। घावों को धोकर उन्होंने उसे एक खाट पर लिटा दिया। इसके बाद उनमें से एक लेग्री के पास गया और अपने पीने का बहाना बनाकर थोड़ी-सी ब्रांडी ले आया और थोड़ी-थोड़ी करके टॉम के गले में डालने लगा।
कुछ देर में टॉम को होश आ गया। कुइंबो बोला – “टॉम भाई! हम लोगों ने तुम पर बड़े-बड़े अत्याचार किए हैं।”
टॉम ने कहा – “मैं हृदय से तुम लोगों को क्षमा करता हूँ।”
सांबो ने कहा – “टॉम, हमें एक बात बताओ कि ईसा कौन है? तुमने जिसे पुकारा था, वह कौन है?”
ईसा का मधुर नाम सुनकर टॉम के शरीर में बल आ गया। वह तेजी के साथ ईसा की दया की कथा कहने लगा। तब इन दोनों नराधमों का दिल भी पसीजा और वे काँपते हुए बोले – “आहा! ऐसा सुंदर नाम हमने पहले कभी नहीं सुना था। हे ईश्वर! हमपर दया कर!”
टॉम ने कहा – “ओ अभागों! तुम्हें धर्म-मार्ग पर ले जाने के लिए मैं सारे कष्ट उठा सकता हूँ।”
इतना कहकर उसने इन दोनों की आत्माओं के उद्धार के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
टॉम की प्रार्थना पूरी हुई। सांबो और कुइंबो ने उसी समय कुपथ छोड़कर सुपथ पर चलने की दृढ़ प्रतिज्ञा की।
44. टॉम की महायात्रा
इसके दो दिनों के बाद एक छोटी गाड़ी पर चढ़कर एक नौजवान लेग्री के यहाँ आया और झटपट गाड़ी से उतरकर वहाँ के लोगों से बोला – “मैं इस घर के मालिक से मिलना चाहता हूँ।”
यह जार्ज शेल्वी था। पाठकों को स्मरण होगा कि टॉम के नीलाम में भेजे जाने के पहले, मिस अफिलिया ने शेल्वी साहब की मेम के पास टॉम को छुड़ाने के लिए एक पत्र भेजा था। पर विधि की विडंबना देखिए, डाकखाने की गलती से वह पत्र इधर-उधर मारा-मारा फिरा और दो महीने बाद श्रीमती शेल्वी को मिला। वह टॉम के भावी अमंगल की बात सोचकर बहुत घबड़ाई।
पर इस समय उसके हाथ में टॉम की सहायता का कोई उपाय न था। उसके पति रोग-शय्या पर पड़े थे, उन्हीं की सेवा शुश्रूषा एवं काम-काज के झंझट में वह बेतरह फँसी हुई थी। कुछ दिनों बाद शेल्वी साहब इस दुनिया से कूच कर गए। इतने सारे काम का बोझ उसी के कंधों पर आ गया। उसके पति पर बहुत ऋण था, उसे चुकाने की उसे बड़ी चिंता हुई। पर उस सुशिक्षिता, सहृदया नारी का हृदय केवल स्त्री-सुलभ कोमलता, स्नेह, दया और धर्म का ही आगार न था, बल्कि काम-काज सँभालने में भी उसने अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। उसने कुछ हिस्सा खेत का और घर की बहुत-सी फालतू चीजें बेचकर बहुत शीघ्र ही अपने पति का सारा ऋण चुका दिया और सारे कामों का सिलसिला ठीक कर लिया। उसका तरुण पुत्र अपनी माता के सब कार्यों में हाथ बँटाने लगा।
जब सब ठीक-ठीक हो गया, तब माता और पुत्र दोनों मिलकर टॉम के उद्धार का उपाय सोचने लगे। जिस वकील ने सेंटक्लेयर के दास-दासी एवं घर का माल-असबाब बेचने का भार उठाया था, बुद्धिमती मिस अफिलिया ने अपने पत्र में उसका नाम-पता लिख दिया था। इससे टॉम के पते के लिए पहले पत्र लिखा गया, पर वह वकील टॉम के वर्तमान खरीदार का ठिकाना नहीं जानता था।
इस संवाद से माता और पुत्र को बड़ी चिंता हुई। इसके छ: महीने बाद माता के किसी काम से जार्ज शेल्वी को दक्षिण की ओर जाना पड़ा। इस अवसर पर उसने स्वयं नवअर्लिंस में आकर टॉम की खोज करने का निश्चय किया। दो महीने तक तो कहीं कुछ पता न लगा, पर अकस्मात् एक दिन एक आदमी से भेंट हो गई। उससे मालूम हुआ कि लेग्री नाम का एक आदमी उसे खरीद ले गया है। यह संवाद पाकर वह तुरंत रेड नदी में खड़े हुए एक जहाज पर सवार हो लिया और आज यहाँ पहुँचा।
लेग्री से भेंट होते ही जार्ज शेल्वी ने कहा – “मुझे पता चला है कि नवअर्लिंस से आपने टॉम नाम के एक दास को खरीदा है। वह पहले मेरे पिता के खेत में काम करता था। मैं उसे फिर खरीदने आया हूँ।”
उसकी बात सुनकर लेग्री का मुँह फीका पड़ गया। वह खीझकर बोला – “हाँ, मैंने इस नाम के एक आदमी को खरीदा है। बड़ा अच्छा सौदा निकला! ऐसा बेअदब, हठी और पाजी तो किसी ने कभी न देखा होगा। हमारे गुलामों को भड़काकर भगाता है, अभी दो दासियाँ उसकी सलाह से भाग गई हैं, जिनका दाम 800 रु या 1000 रु से कम न होगा। कहता है, उसने उन्हें भागने की सलाह दी थी। उसी की सलाह से वे भागी हैं, पर जब पता बताने को कहा गया तो उसने साफ इनकार कर दिया। इतनी मार खाने पर भी, जितनी और किसी गुलाम ने नहीं खाई होगी, उसने पता नहीं बताया। मालूम होता है, अब वह मरने बैठा। मैं नहीं कह सकता कि मरेगा या नहीं।”
ये बातें सुनकर जार्ज का चेहरा सुर्ख हो गया। उसकी आँखों से आग की चिनगारियाँ बरसने लगीं। पर झगड़ा करने में कोई अक्लमंदी न समझकर उसने केवल इतना ही पूछा – “वह कहाँ है? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
बाहर जो गुलाम जार्ज का घोड़ा पकड़े हुए खड़ा था, वह बोल उठा – “टॉम इसी कुटिया में है।”
लेग्री ने उस गुलाम को एक लात जमाई, पर जार्ज ने वहाँ पल भर की भी देर न की और झट से कुटिया की ओर बढ़ा।
टॉम दो दिन से इस कुटिया में पड़ा था। शारीरिक कष्ट अनुभव करने की उसकी शक्ति चली गई थी। आत्मा जीवनमुक्त हो गई थी। पर शरीर पहले खूब हष्ट-पुष्ट था, इस कारण देह-पिंजर से आत्मा सहज में बाहर नहीं होने पाती थी। इसी से अब भी उसमें प्राण बाकी था। टॉम सदा लेग्री के भूखे दास-दासियों की सहायता किया करता था, कभी-कभी स्वयं भूखा रहकर अपना आहार उन्हें दे देता था। इससे टॉम की इस दशा के कारण सब बड़े दु:खी हो रहे थे। लेग्री के डर के मारे टॉम को देखने जाने की उनकी हिम्मत न होती थी, पर रात को वे छिपकर उसकी कुटिया में जाते और यथा-शक्ति उसकी सेवा-शुश्रूषा करते थे। अधिक इनसे और क्या होता, जब-तब दो बूँद जल उसके मुख में डाल देते थे।
कासी को टॉम की विपत्ति का सब हाल मालूम हो गया। उसके दु:ख की बात जानकर उसका हृदय शोक से भर गया। टॉम ने उसके और एमेलिन के लिए ही यह अलौकिक त्याग स्वीकार किया था। यह सोचते-सोचते उसके हृदय में कृतज्ञता की लहरें उठने लगीं। वह सारी आफतों को तुच्छ समझकर पहली रात को टॉम को ही देखने के लिए उसकी कुटिया में पहुँची। टॉम अपने उस अंतिम समय में अस्फुट स्वर से कासी को स्नेहपूर्वक जो धर्मोपदेश करने लगा, उसे सुनकर उसके हृदयाकाश से निराशा का अंधकार सर्वथा दूर हो गया। वह शोकदग्ध वज्रसम कठोर हृदय पसीजकर नरम पड़ गया। वह रोती हुई प्रार्थना करती चली गई।
टॉम की कुटिया में प्रवेश करते ही उसकी दुर्दशा देखकर जार्ज को चक्कर आने लगा। उसके हृदय में गहरी चोट लगी। वह टॉम के बगल में घुटनों के बल बैठकर जोर से बोला – “क्या यह संभव है? क्या मनुष्य मनुष्य के साथ इतना अत्याचार कर सकता है? टॉम काका! मेरे दु:खी टॉम काका!”
मृत-प्राय टॉम के कानों में इस कंठ-स्वर से अमृत-सा बरस गया। वह संज्ञाशून्य-सा पड़ा था, पर यह स्वर सुनकर धीरे-धीरे उसने सिर हिलाया, होठों पर जरा हँसी आई। अस्फुट स्वर से बोला – “ईश-कृपा से क्या संभव नहीं है? मृत्युशय्या भी सुख से भर उठती है!”
जार्ज सिर झुकाए एकटक टॉम के मुँह की ओर देख रहा था। आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। शोक से रुँधे कंठ से कहने लगा – “प्यारे टॉम काका! उठो, एक बार बोलो! आँखें ऊपर उठाकर देखो। तुम्हारा मास्टर जार्ज आया है, तुम्हारा प्यारा मास्टर जार्ज आया है। क्या तुम मुझे नहीं पहचानते हो?”
टॉम ने आँख खोलकर क्षीण कंठ से कहा – “मास्टर जार्ज! मास्टर जार्ज!” … वह चौकन्ना होकर इधर-उधर देखने लगा। फिर बोला – “मास्टर जार्ज!” … मानो धीरे-धीरे अंत में यह बात उसकी समझ में आई। उसकी शून्य आँखें क्रमश: चमकने लगीं, उसका मुख प्रफुल्लित हो गया। नेत्रों से अश्रु-धारा बह निकली। वह हाथ जोड़कर क्षीण स्वर में कहने लगा – “धन्य भगवान! अंत में मेरी इच्छा पूर्ण कर दी। वे मुझे भूले नहीं। इससे मेरी आत्मा को संतोष मिल गया। धन्य भगवान! धन्य भगवान! अब मैं सुख से मरूँगा।”
जार्ज ने कहा – “तुम्हें मरना नहीं होगा। तुम नहीं मरोगे। इस बात का विचार भी मन में मत लाओ। मैं तुम्हें खरीदकर घर ले चलने के लिए आया हूँ।”
टॉम ने कहा – “ओह, मास्टर जार्ज, तुम बड़ी देर से आए। अब समय नहीं रहा। मैं तो ईश्वर के हाथ बिक चुका हूँ। वह मुझे अपने साथ अमृत-धाम को ले जाएगा। वहाँ जाने को जी चाह रहा है। केंटाकी से स्वर्ग कहीं अच्छा है।”
जार्ज बोला – “टॉम काका, ऐसा मत कहो। तुम्हारी बातें सुनकर मेरी छाती फटी जाती है। हाय, तुम्हें कितना सताया गया हे! कैसे मैले में डाल रखा है हाय, तुम्हारी दशा देखकर मेरे प्राण मुँह को आ रहे हैं! ओफ!”
टॉम ने मुस्कराते हुए कहा – “मुझे दु:खी मत कहो। मैं दु:खी था, पर अब वे सब बातें गई-गुजरी हो गईं। मैं पिता की गोद में जा रहा हूँ। जार्ज, यह देखो स्वर्ग का द्वार खुला हुआ है। धन्य ईसा! धन्य परमेश्वर!”
जार्ज टॉम के इन सच्चाई से भरे, विश्वास-पूर्ण तेजोमय वाक्य सुनकर स्तंभित रह गया। वह अवाक् होकर उसके मुख की ओर देखने लगा।
टॉम ने जार्ज का हाथ पकड़कर कहा – “तुम रोओ मत! छोई से मेरी इस दशा का हाल कहना। ओफ! उसे कितना दु:ख होगा। लेकिन तुम उससे कहना कि मेरी मृत्यु शांति से हुई है। मेरे लिए कोई दु:ख न करे। उससे यह भी कह देना कि भगवान सर्वत्र मेरे साथ थे। उन्होंने सदा मुझे दु:खों पर विजय दी है। मुझे बच्चों के लिए सदा दु:ख होता था। उन्हें मेरे मार्ग पर चलने को कहना। अपने माता-पिता और घर के हर आदमी को मेरा प्रेम कहना। मेरे दिल में हर जीवधारी के लिए प्रेम है। मैं जहाँ गया, वहाँ प्रेम के अलावा और कुछ नहीं किया। ओह, मास्टर जार्ज, प्रेम भी क्या ही अनोखी चीज है! वाह, धर्म के रास्ते पर चलने में कितना आनंद है!”
इसी समय लेग्री वहाँ कुटिया के द्वार तक आया और एक बार अंदर की ओर देखकर घृणा प्रकट करते हुए लौट गया।
जार्ज उसे देखकर क्रोध से बोला – “शैतान कहीं का! ईश्वर एक दिन इसे अपने किए का फल देगा।”
टॉम ने कहा – “जार्ज, ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। वह बड़ा अभागा जीव है। उसकी बातें सोच-सोचकर दु:ख होता है। अब भी अगर वह पश्चाताप करे तो ईश्वर इसे क्षमा करेंगे। पर यह कभी पश्चाताप नहीं करेगा।”
जार्ज बोला – “उसका पश्चाताप न करना ही अच्छा है। उसे स्वर्ग न मिले, यही मैं चाहता हूँ।”
टॉम ने बड़े दु:ख से कहा – “जार्ज, ऐसी बातें मत कहो। मुझे हैरानी होती है। मन में ऐसा भाव मत रखो। उसने मेरा कोई बिगाड़ नहीं किया। मेरे लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार खोल दिया।”
जार्ज को देखकर टॉम आनंद से उत्तेजित हो गया था। उसी उत्तेजना से उसका शरीर और भी सुस्त पड़ गया। आँखें बंद हो गईं। साँस जल्दी-जल्दी चलने लगी और उसकी आत्मा संसार से विदा हो गई। मृत्यु के समय उसके मुँह से ये शब्द निकल रहे थे – “ईसा के प्रेम से हम लोगों को कौन वंचित करेगा!”
जार्ज स्तब्ध होकर एकटक उसके मुख की ओर देख रहा था। उसे जान पड़ने लगा कि टॉम का यह मृत्यु-गृह पवित्र स्थल है। उसने घूमकर देखा तो लेग्री को अपने पीछे खड़ा पाया।
टॉम का अंतिम वाक्य सुनकर जार्ज का उत्तेजित भाव कुछ मंद पड़ गया था, नहीं तो आज वह लेग्री की अवश्य खबर लेता। पर लेग्री का मुँह देखकर उसके हृदय में घृणा उत्पन्न हो गई। जार्ज तुरंत वहाँ से उठ जाने को तैयार हुआ और उससे बोला – “तुमसे जो बन सका तुमने कर लिया, अब मैं इस मृत शरीर को साथ ले जाना चाहता हूँ। बोलो, इसकी मृत देह के लिए तुम्हें क्या देना है? मैं अच्छी तरह से इसका क्रिया-कर्म करूँगा।”
लेग्री बोला – “मैं मुर्दे हब्शी नहीं बेचता। जहाँ और जब तुम्हारा जी चाहे, इसे ले जाकर दफन करो।”
वहाँ दो-तीन दास खड़े हुए लाश की ओर देख रहे थे। जार्ज ने उनसे कहा – “तुम लोग मेरे साथ आकर इस लाश को गाड़ी में रखवा दो और मुझे एक कुदाल लाकर दो।”
लेग्री की आज्ञा की कोई अपेक्षा न करके उनमें से एक कुदाल लाने के लिए दौड़ा, और दो ने उस लाश को गाड़ी पर रखवा दिया। लेग्री भी गाड़़ी के पास जाकर देखने लगा।
जार्ज ने अपना लबादा खोलकर गाड़ी में बिछाया और उस पर टॉम की मृत देह को लिटा दिया। उसके बाद गाड़ी हाँकते समय लेग्री से कहा – “तुमने जो नर-हत्या की है, इसकी सजा पाओगे। यह मत समझना कि मैं तुम्हें यों ही छोड़ दूँगा। मैं मजिस्ट्रेट के सामने जाकर अभी बयान दूँगा।”
यह सुनकर लेग्री ने ताने से हँसकर कहा – “जाओ, जहाँ तुम्हारा जी चाहे, बयान दो। ओफ, मुझे तो अब डर के मारे नींद ही नहीं आएगी! पर अंग्रेज गवाह तुम कहाँ से पाओगे। ऐसे मुकदमे में गुलामों की गवाही नहीं मानी जाती।”
जार्ज ने मन-ही-मन सोचा – “यह ठीक कहता है। देश के कानून के अनुसार गोरों के विरुद्ध कालों की गवाही नहीं मानी जाती।” यह सोचकर जार्ज को बड़ा कष्ट हुआ।
लेग्री आप-ही-आप कहने लगा – “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता कि एक मुर्दे हब्शी के लिए एक पढ़ा-लिखा अंग्रेज इतना बखेड़ा क्यों करता है? कितने ही कुली पुरुष और स्त्रियाँ यों ही मारे जाते हैं। यह मुकदमा चलाने चला है! कोई समझदार अंग्रेज-विचारक तो ऐसे तुच्छ विषय को सुनेगा ही नहीं। कौन भारी अपराध किया है, बस एक कुली ही न मारा है!”
आग लगने से जैसे बारूद का गोदाम भभक उठता है, वैसे ही लेग्री की यह बात सुनकर जार्ज का क्रोध भभक उठा। जार्ज वकीलों की तरह कानून के पन्ने उलटकर कर्तव्य निश्चय नहीं किया करता था। उसमें बड़ा तेज और बल था। उसने कानून नहीं पढ़ा था कि मनुष्यता से विहीन हो जाए। वह तुरंत गाड़ी से कूदकर लेग्री के मुँह पर जोर-जोर से घूँसे जमाने लगा। लेग्री की नाक से खून की नदी बह निकली। कायर लेग्री अधिक न सह सका और मुर्दे की भाँति जमीन पर गिर पड़ा। जार्ज ने अकेले होते हुए भी वह वीरता दिखाकर प्रात: स्मरणीय जार्ज वाशिंगटन का नाम सार्थक कर दिया।
संसार में कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं कि लात खाने पर ही सीधे रहते हैं, ठीक से व्यवहार करना सीखते हैं। लेग्री उन्हीं व्यक्तियों में से था। अब उसने भलमनसी अख्तियार की, धूल झाड़कर उठ बैठा और जब तक जार्ज का गाड़ी आँखों से ओझल न हो गई, तब तक अपना मुँह नहीं खोला।
लेग्री के खेत से हटकर एक वृक्ष-लता से आच्छादित सुंदर स्थान में जार्ज ने कुलियों को कब्र खोदने की आज्ञा दी। कब्र तैयार हो जाने पर कुलियों ने जार्ज के पास आकर कहा – “हुजूर, यह लबादा खोल लिया जाए?” जार्ज ने कहा – “नहीं-नहीं, इसी के साथ इसे दफना दो!” फिर टॉम की मृत देह को संबोधित करके कहने लगा – “हाय टॉम काका, मेरे पास इस समय और कोई अच्छा कपड़ा नहीं है, जिसे तुम्हारे साथ दूँ। यही मेरी श्रद्धा का अंतिम चिह्न है।”
टॉम को मिट्टी दे दी गई और कब्र पर फूल बिछा दिए गए। तब जार्ज ने कुलियों को कुछ पैसे देकर कहा – “अब तुम लोग जा सकते हो।” वे जार्ज से कहने लगे – “हुजूर, हम लोगों को खरीद लीजिए। हम दिन-रात जी-जान से आपका काम करेंगे। यहाँ हम लोगों को बड़ी तकलीफ है।”
जार्ज ने कहा – “मैं यहाँ किसी को नहीं खरीद सकता। यह असंभव है। तुम लोग लौट जाओ।”
वे निराश होकर धीरे-धीरे चलते बने।
जार्ज टॉम की समाधि पर घुटनों के बल बैठकर आँखें और हाथ ऊपर करके कहने लगा – “हे अनंतस्वरूप परमात्मन्! मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ कि देश से इस घृणित दास-प्रथा को दूर करने के लिए, मैंने आज से अपने तन-मन को समर्पित कर दिया है। आप मेरे इस सत्संकल्प में सदा सहायक हों!”
टॉम के समाधि-स्थल पर कोई स्मृति-चिह्न नहीं बना, पर उसका जीवन ही उसका एकमात्र उज्ज्वल स्मृति-चिह्न था।
टॉम के लिए दु:खित होने का कोई कारण नहीं है। ऐसे जीवन और मृत्यु पर तरस खाने की कोई आवश्यकता नहीं है। टॉम दया का पात्र या दु:खी व्यक्ति नहीं था। वह जिस धन का धनी था, वह धन बड़े-बड़े महाराजाओं के भंडार में भी नहीं मिलता।
टॉम के हृदय की सत्यप्रियता, न्यायपरता, धर्म-जिज्ञासा, प्रेम, भक्ति और उसका सतत्-विश्वास क्या संसार के और सारे धनों से अधिक मूल्यवान न था!
45. भूत-कथा
कासी और एमेलिन के भाग जाने के बाद लेग्री के दास-दासियों में भूतों की चर्चा ने बड़ा जोर पकड़ा। हर घड़ी उन्हीं की चर्चा होने लगी।
रात को बंद किए हुए दरवाजे खुले मिलते, रात को किसी के दरवाजा खटखटाने की-सी आवाज आती, इससे सबने यही नतीजा निकाला कि यह सारी कार्रवाई भूतों के सिवा और किसी की नहीं है। दासों में से कोई-कोई कहता – “भूतों के पास सब दरवाजों की तालियाँ जरूर हैं। बिना ताली के वे दरवाजा कैसे खोल सकते हैं? दूसरे उसका खंडन करते – “यह कोई बात नहीं, भूत बिना ताली के भी दरवाजे खोल सकते हैं।”
भूत की सूरत-शक्ल के बारे में भी बड़ा मतभेद होने लगा। किसी ने कहा – “भूतों के सिर नहीं होते। उसके दोनों कंधों पर दो आँखें होती हैं।” पर दूसरे ने उसकी बात काटकर कहा – “मैं तो खुद अपनी आँखों से दो-तीन भूत देख चुका हूँ। कोई भी भूत बिना सिर का नहीं होता।” तीसरे ने कहा – “हाँ-हाँ सिर तो होता है। यह तो मैं भी मानता हूँ, लेकिन वह पीठ की ओर फिरा हुआ होता है। मैंने जितने भूत देखें हैं उनमें एक का भी सिर छाती की तरफ नहीं था।” इस पर चौथा दास बोला – “मालूम होता है, तुम सब लोगों ने जितने भूत देखे हैं, सबके सब विलायती थी, देशी उनमें एक भी नहीं था।”
दास-दासियों में भूत के रूप-रंग के विषय में यों ही तर्क-वितर्क होते रहे, पर कोई बात तय नहीं हुई। मतभेद ज्यों-का-त्यों बना रहा।
दास-दासियों की ये भूत-संबंधी चर्चाएँ लेग्री के कानों तक भी पहुँचने लगीं। उसने हजार यत्न किए, पर इन चर्चाओं का अंत न हुआ। दिन-पर-दिन भूत-चर्चा का बाजार गर्म होता गया। उत्तर के कमरे में बहुधा रात को किसी के पैरों की आहट सुनाई देती थी। इससे उठते ही सवेरे उसकी बात छिड़ जाती थी। रोज-रोज भूतों की कथाएँ सुनते-सुनते गँवार, धर्मज्ञानहीन लेग्री के मन में बुरी तरह डर समा गया। इन भयंकर स्मृतियों को मन से दूर रखने के लिए वह पहले से दूनी-चौगुनी शराब पीने लगा।
जिस दिन सवेरे टॉम की मृत्यु हुई, उस दिन वह पास के एक दूसरे खेत में गया था। वहाँ से घर लौटने में अधिक रात हो गई। घर पहुँचते ही वह सोने के कमरे में गया और सारी किवाड़ें बंद करने लगा। उत्तर की ओर का दरवाजा बंद करके किवाड़ों के पीछे उसने एक कुर्सी रख दी। अपने सिरहाने एक भरी हुई पिस्तौल रखी। डटकर शराब चढ़ाई। फिर लेट गया। कुछ देर बाद उसे नींद आ गई। नींद में पहले की भाँति उसे अपनी माता की मूर्ति दिखाई दी। अनंतर चिल्लाहट सुनाई दी। इससे उसकी आँख खुल गई और उसे साफ-साफ आदमी के पैरों की आहट सुनाई पड़ी। दरवाजे पर नजर पड़ते ही उसने देखा कि दरवाजा चौपट पड़ा है, घर की रोशनी बुझ गई है, अंधेरे में किसी ने उसके बदन पर ठंडे हाथ लगाए, जिससे वह खाट से उछलकर दूर जा खड़ा हुआ। इतने में श्वेत-वस्त्रधारी मूर्ति अंतर्धान हो गई। लेग्री ने दरवाजे के पास जाकर देखा तो दरवाजे को बाहर की ओर से बंद पाया। देखते ही देखते बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। सवेरे जागने पर देखा गया कि खाट की जगह वह जमीन पर पड़ा है।
इसके दूसरे दिन से लेग्री ने शराब की मात्रा और बढ़ा दी। उसने मन-ही-मन दो-तीन रात शराब पीकर एकदम बेहोशी ही हालत में बिताने का निश्चय किया, जिससे कोई भी दुश्चिंता उसके पास न फटकने पाए, पर दो-तीन दिन इस प्रकार खूब शराब पीने के कारण उसे भयानक ज्वर आया और वह पागल-जैसा हो गया। पहले किए अपने बुरे कामों तथा निष्ठुर आचरणों की बातें बकने लगा। वे सब लोमहर्षक बातें आदमी के दिल को कँपा देनेवाली थीं। इससे उस दशा में कोई उसके पास खड़ा नहीं होता था। दिन-रात वह अकेला बेसुध पड़ा रहता। तीन दिन के बाद उसके मुँह से खून गिरने लगा। और उसी के कुछ क्षणों बाद वह पापात्मा, नराधम अंग्रेज अपने चिर-कलंकित जीवन से मुक्त हो गया।
उसकी लाश का उसके गुलामों ने रेड नदी में बहा दिया और उसके पास जो माल-टाल था, उसे लेकर उत्तर की ओर निकल भागे।
जिस रात को लेग्री मूर्च्छित हुआ था, उस रात को तीन-चार गुलामों ने देखा कि दो स्त्रियाँ सफेद चादर से अपना बदन ढके हुए घर से निकलकर बाहर चली गईं। उसके दूसरे ही दिन सवेरे बाहरी मकान का दरवाजा भी खुला हुआ पाया गया। इससे लेग्री के दिल में और भी डर समा गया था।
सूर्योदय के कुछ ही पहले कासी और एमेलिन नगर के निकट पेड़ों के नीचे बैठकर विश्राम कर रही थीं। वृक्षों की ओट में बैठकर कासी ने स्पेन देश की कुलीन स्त्रियों के वस्त्र धारण किए और एमेलिन ने उसकी परिचारिका का-सा वेश बना लिया। कासी भले घर में जन्मी थी और सभ्य जनों की-सी उसने शिक्षा पाई थी। इससे उसे देखकर कोई भगोड़ी दासी नहीं समझ सकता था। उसने नगर में जाकर एक संदूक मोल लिया। उसमें सब कपड़े रखे और उसे एक कुली के सिर पर उठवाकर निकट के एक होटल में जाकर रहने लगी।
उस होटल में पहुँचते ही पहले जार्ज शेल्वी से उसकी भेंट हुई। जार्ज शेल्वी भी यहाँ जहाज के लिए ठहरा था। कासी ने अपने गुप्त स्थान से जार्ज शेल्वी को टॉम की लाश ले जाते देखा था। जब उसने लेग्री को पीटा था, तब भी वह उसे देख रही थी। इससे जार्ज का चेहरा उससे सर्वथा अपरिचित न था, विशेषकर जार्ज के चले जाने के बाद कासी ने दूसरे दास-दासियों की बातचीत से पता लगा लिया था कि वह टॉम के पूर्व मालिक का पुत्र है। अत: उसने आग्रहपूर्वक जार्ज से घनिष्ठता बढ़ाने का यत्न किया।
कासी के कुलीन स्त्रियों के-से वस्त्र एवं आचार-व्यवहार के कारण किसी को उस पर संदेह न हुआ, खासकर होटल में जो खाने-पीने आदि की चीजों का दाम देने में कंजूसी नहीं करता, उससे सब संतुष्ट रहते हैं। कासी इन बातों को खूब जानती थी। इसी से वह लेग्री के संदूक से अच्छी रकम ले आई थी।
संध्या होते-होते जहाज आ गया। जार्ज शेल्वी ने बड़े शिष्टाचार से कासी का हाथ पकड़कर उसे नाव पर चढ़ाया और स्वयं विशेष कष्ट सहकर जहाज के बीच का एक अच्छा कमरा उसके लिए किराए पर ले दिया। जहाज जब तक रेड नदी में था, तब तक कासी कमरे से बाहर न निकली। शारीरिक अस्वस्थता का बहाना बनाकर कमरे में ही सोती रही, पर जब जहाज मिसीसिपी नदी के मुहाने पर पहुँचा तो कासी आई। जार्ज ने फिर इस नदीवाले जहाज में भी उसके लिए एक कमरा किराए पर ले दिया। इस जहाज में आते ही कासी की शारीरिक अस्वस्थता दूर हो गई और जहाज में वह इधर-उधर टहलने लगी।
जहाज के अन्य यात्री उसके वस्त्र और सौंदर्य देखकर आपस में कहने लगे – “जवानी में यह स्त्री बड़ी सुंदर रही होगी।”
जार्ज ने जब से कासी को देखा, उसके मन में यह विचार उठ रहा था कि उसने ऐसा ही सुंदर चेहरा और कहीं देखा है। इससे वह बड़े ध्यान से कासी के मुख की ओर देखता था। खाते-पीते, बातें करते, बराबर जार्ज की आँखें उसके मुँह पर लगी रहती थीं।
यह देखकर कासी के मन में उद्विग्नता उत्पन्न हो गई। वह सोचने लगी कि वह आदमी निश्चय ही मुझपर संदेह करता है। पर जार्ज की दया पर भरोसा करके उसने आदि से अंत तक अपना सारा वृत्तांत उसे कह सुनाया।
सुनकर जार्ज को बड़ा दु:ख हुआ। उसने उससे सहानुभूति दिखाई और ढाढ़स बँधाया। लेग्री के दास-दासियों का कष्ट वह अपनी आँखों से देख आया था। इससे वहाँ से भागी हुई स्त्रियों पर सहज ही उसके मन में दया हो आई थी। उसने कासी को विश्वास दिलाया कि तुम डरो नहीं। मैं जी-जान से तुम्हारी रक्षा करूँगा।
कासी के कमरे से सटे हुए कमरे में मैडम डिथो नाम की एक फ्रेंच भद्र महिला सफर कर रही थी। जब उस फ्रेंच महिला को जार्ज की बातचीत से पता चला कि वह केंटाकी का आदमी है, तो वह उसके साथ बातचीत करने के लिए विशेष उत्सुक हुई। शीघ्र ही उसने जार्ज से परिचय कर लिया। उसके बाद जार्ज प्राय: उसी के कमरे के द्वार पर कुर्सी डालकर उससे बातें किया करता। कासी अपनी जगह से उसकी सारी बातें सुनती रहती।
एक दिन मैडम डिथो ने बातें-ही-बातों में जार्ज से कहा – “पहले मैं भी केंटाकी में ही थी।” और उसने केंटाकी प्रदेश के जिस गाँव का नाम लिया, जार्ज शेल्वी का घर भी वहीं था। जार्ज को उसकी बातों से बड़ा आश्चर्य हुआ।
इसके बाद एक दिन मैडम डिथो ने जार्ज से पूछा – “अपने गाँव में तुम हेरिस नाम के आदमी को जानते हो?”
“हाँ, इस नाम का एक बूढ़ा आदमी हमारे गाँव में है।” जार्ज ने उत्तर दिया – “उसके बहुत से दास-दासी हैं न?”
“उसके एक जार्ज नाम के वर्णसंकर दास को आप जानते हैं? शायद आपने उसका नाम सुना होगा” मैडम डिथो ने पूछा।
जार्ज बोला – “क्या? उसका तो मेरी माता की एक दासी से विवाह हुआ था। पर अब तो वह कनाडा भाग गया है।”
मैडम डिथो ने कहा – “अच्छा कनाडा भाग गया है? ईश्वर का धन्यवाद है!”
जार्ज मैडम डिथो की बात सुनकर बड़ा चकित हुआ, पर उससे आगे कुछ नहीं पूछा। मैथम डिथो दोनों हाथों से मुँह ढककर आनंद से अश्रु बहाने लगी। फिर कुछ सँभलकर बोली – “जार्ज मेरा भाई।”
जार्ज ने बहुत विस्मित होकर कहा – “ओह, ऐसा!”
मैडम डिथो ने गर्व से सिर उठाकर कहा – “हाँ मिस्टर शेल्वी जार्ज, जार्ज हेरिस मेरा भाई है।”
“मुझे आपकी बात सुनकर बड़ा अचंभा हुआ।”
“मिस्टर शेल्वी, जिस समय जार्ज बहुत छोटा था। उसी समय हेरिस ने मुझे दक्षिण के एक दास-व्यवसायी के हाथ बेच डाला था। उस दास-व्यवसायी से मुझे एक सहृदय फ्रांसीसी ने खरीद लिया और गुलामी की बेड़ी से मुक्त करके शास्त्र के अनुसार मुझसे विवाह कर लिया। कुछ दिन हुए मेरे स्वामी की मृत्यु हो गई। अब मैं अपने उस छोटे भाई जार्ज को खरीदकर दासता से मुक्ति देने की इच्छा से केंटाकी जा रही हूँ।”
जार्ज बोला – “जार्ज हेरिस मुझसे कई बार कहा करता था कि मेरी एमिली नाम की एक बहन को हेरिस ने दक्षिण में बेच डाला है।”
मैडम डिथो ने कहा – “मेरा ही नाम एमिली है।”
“आपका भाई बड़ा बुद्धिमान और चरित्रवान युवक है, पर गुलाम होने के कारण कोई उसके गुणों का आदर नहीं करता। हमारे यहाँ की दासी से उसका विवाह हुआ था। इसी से मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूँ।” जार्ज ने कहा।
“उसकी स्त्री कैसी है?”
“वह भी एक रत्न है। परम सुंदरी और बुद्धिमती है, मधुर बोलने वाली, सुशील और धर्मपरायण है। मेरी माता ने अपनी कन्या की तरह बड़े यत्न से उसका लालन-पालन किया था। वह लिखने-पढ़ने, सीने-पिरोने तथा घर के सभी कामों में बड़ी निपुण है।”
“क्या वह आप ही के घर जन्मी थी?”
“नहीं, मेरे पिता उसे नवअर्लिंस से मेरी माता को उपहार में देने के लिए खरीद लाए थे। उस समय वह आठ-नौ बरस की थी। उन्होंने उसे कितने में खरीदा था, यह बात माता के सामने कभी प्रकट नहीं की, पर थोड़े दिन हुए उनके कागज-पत्रों से हम लोगों को मालूम हुआ कि उसके लिए उन्होंने बहुत अधिक मूल्य दिया था। ऐसा लगता है, उसके अपूर्व सौंदर्य के लिए ही इतने ज्यादा दाम दिए गए थे।”
कासी जार्ज के पीछे बैठी थी। उसके इन बातों को बड़े ध्यान से सुनने का पता जार्ज को नहीं था। पर जार्ज की बात समाप्त होते ही कासी ने उसकी बाँह पर हाथ रखकर कहा – “मिस्टर शेल्वी, क्या आप बता सकते हैं कि आपके पिता ने उसे किससे खरीदा था?”
जार्ज ने कहा – “याद पड़ता है कि सिमंस नाम के किसी आदमी से उन्होंने खरीदा था।”
“हे भगवान!” यह कहकर कासी तुरंत मूर्च्छित होकर गिर पड़ी।
कासी की इस आकस्मिक मूर्च्छा का कारण मैडम डिथो और जार्ज की समझ में नहीं आया। वे मिलकर उसे होश में लाने का उपाय करने लगे। होश में आने पर कासी बालिका की भाँति जोर-जोर से रोने लगी।
माँ कहलानेवाली महिलाएँ पूरी तरह से कासी के मनोभाव को समझ सकेंगी। कासी यह मानकर कि वह अब अपनी कन्या से नहीं मिल पाएगी, निराश हो गई थी, पर ईश्वर की कृपा से फिर मन में उसे देख पाने की आशा बँध गई और इसी से वह हृदय के उमड़े वेग को सँभाल न सकने के कारण बच्चे की तरह रोने लगी।
46. टॉम काका के बलिदान का सुफल
जार्ज शेल्वी ने अपने घर लौटने के कुछ ही दिन पहले अपनी माता को जो पत्र लिखा था, उसमें केवल अपने घर पहुँचने की तारीख के सिवा और किसी बात की चर्चा नहीं की थी। टॉम की मृत्यु का समाचार देने की उसकी हिम्मत न पड़ी। कई बार उसने लेखनी उठाई कि टॉम की मृत्यु के समय की घटनाएँ विस्तार से लिखे, पर कलम उठाते ही उसका हृदय शोक से भर जाता था। दोनों आँखों में आँसू बहने लगते थे। वह तुरंत कागज को फाड़कर फेंक देता था और कलम एक ओर को रखकर आँसू पोंछते हुए अलग जाकर हृदय को शांत करने की चेष्टा करता था।
जिस दिन जार्ज ने घर पहुँचने को लिखा था, उस दिन घर के लोग बड़ी प्रसन्नता से उसके आने की बाट जोह रहे थे। सबको आशा थी कि आज वह टॉम काका को साथ लेकर लौटेगा।
तीसरे पहर का समय था। मिसेज शेल्वी कमरे में बैठी हुई थीं। क्लोई पास खड़ी भोजन की मेज पर काँटा-चम्मच सजा रही थी। क्लोई आज बड़ी प्रसन्न थी। पाँच बरस बाद स्वामी के दर्शन होंगे। आज क्लोई एक-एक चीज को पाँच-पाँच बार सजाती थी। मिसेज शेल्वी से वह इस विषय पर बातें करना चाहती थी। मेज के किस तरफ किस कुर्सी पर जार्ज बैठेगा, इत्यादि विषयों पर मालकिन से तरह-तरह की बातें हो रही थीं। अंत में क्लोई बोली – “मेम साहब, मिस्टर जार्ज की चिट्ठी आई है?”
मेम ने कहा – “हाँ आई तो है, लेकिन एक ही लाइन की है। बस आज पहुँचने की बात लिखी है।”
क्लोई बोली – “मेरे बूढ़े की कोई बात नहीं लिखी?”
“नहीं, क्लोई!”
क्लोई ने उदास होकर कहा – “मिस्टर जार्ज की तो यह पुरानी आदत है। उन्हें ज्यादा लिखना पसंद नहीं। सब बातें सामने ही कहना उन्हें अच्छा लगता है।”
क्लोई थोड़ी देर को अपने में खो गई। फिर बोली – “मेरा बूढ़ा घर आकर लड़कों को नहीं पहचान सकेगा। लड़की को भी मुश्किल से पहचानेगा। उसको ले गए तब तो यह बहुत छोटी थी। अब कितनी बड़ी हो गई। पोली जैसी भोली है वैसी ही चालाक भी है। मैं भोजन बनाकर इधर-उधर चली जाती हूँ तो वह बैठी भोजन की रखवाली किया करती है। आज मैंने ठीक वैसा ही भोजन बनाया है, जैसा बूढ़े को ले जानेवाले दिन बनाया था। हे परमेश्वर! उस दिन मेरा जी कैसा करने लगा था।”
मिसेज शेल्वी ने क्लोई की बातें सुनकर ठंडी साँस ली। उसे अपने हृदय पर बड़ा बोझ-सा जान पड़ा। उसका मन उचट गया। जब से उसे अपने पुत्र का पत्र मिला था, उसी दिन से उसके मन से तरह-तरह की शंकाएँ उठ रही थीं। वह सोचती थी कि जार्ज के पत्र में टॉम की बात न लिखने का कोई-न-कोई विशेष कारण होगा।
क्लोई ने कहा – “मेम साहब, मेरे भाड़े के रुपयों के बिल मँगा रखे हैं न?”
“हाँ, मँगाए पड़े हैं।”
“मैं बूढ़े को ये रुपए दिखलाऊँगी।”
फिर क्लोई ने उल्लास से कहा – “उसे मालूम होगा कि मैंने कितने रुपए पाए हैं। वह मिठाईवाला मुझे और कुछ दिन वहाँ रहने को कहता था। मैं रह भी जाती, लेकिन बूढ़े के आने के कारण मेरा मन वहाँ नहीं लगा। मिठाईवाला आदमी बड़ा अच्छा है।”
क्लोई अपने कमाए रुपए दिखाने के लिए बड़ा आग्रह करती थी। मिसेज शेल्वी ने उसके संतोष के लिए उसके बिल और उसमें लिखे रुपए वहाँ ला रखे थे।
क्लोई फिर कहने लगी – “बूढ़ा पोली को नहीं पहचान सकेगा। कैसे पहचानेगा?”
“ओफ, उसको गए पाँच बरस हो गए। तब तो पोली बहुत छोटी थी। जरा-जरा खड़ा होना सीखती थी। चलने के समय उसे गिरते-पड़ते देखकर बूढ़ा कैसा खुश होता था। तुरंत दौड़कर उसे गोद में उठा लेता था। वाह!”
इसी समय गाड़ी के पहियों की घड़घड़ाहट सुनाई दी। “मास्टर जार्ज!” कहते हुए क्लोई खिड़की पर दौड़ गई। मिसेज शेल्वी ने शीघ्र बाहर आकर पुत्र को छाती से लगा लिया।
जार्ज ने वहाँ क्लोई को खड़े देखते ही उसके दोनों काले हाथ अपने हाथों में लेकर कहा – “दुखिया क्लोई चाची! मैं तुमसे क्या कहूँ! मैं अपना सब-कुछ देकर भी टॉम को ला सकता तो ले आता, पर… वह तो ईश्वर के यहाँ चला गया!”
मिसेज शेल्वी हाहाकर कर उठीं, पर क्लोई कुछ न बोली।
सबने घर में प्रवेश किया। वे रुपए, जिनके लिए क्लोई बहुत गर्वित थी, उस समय भी मेज पर पड़े हुए थे।
क्लोई ने उन रुपयों को बटोरकर काँपते हुए हाथों से मेम के सामने रखकर कहा – “मैं अब कभी इन रुपयों को नहीं देखना चाहती हूँ, न इनकी बात ही सुनना चाहती हूँ। मैं पहले से जानती थी कि अंत में यही होना है। खेतवालों ने उसका खून कर डाला!”
क्लोई यह कहकर घर से बाहर चल दी। मिसेज शेल्वी उठीं और उसे हाथ से पकड़ लाकर अपने पास बिठाते हुए बोली – “मेरी दुखिया क्लोई!”
क्लोई उसके कंधे पर सिर रखकर रोती हुई कहने लगी – “मुझे क्षमा कीजिए… मेरा दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया है।”
मिसेज शेल्वी ने कहा – “मैं यह जानती हूँ। मेरे पास सामर्थ्य नहीं कि तुम्हारी इस व्यथा को शांत कर सकूँ, पर ईश्वर समर्थ है, वह सब कर सकता है। वह टूटे हुए हृदय को जोड़ सकता है और हृदय में लगे हुए घावों को भर सकता है।”
कुछ देर बाद वहाँ सभी आँसू बहा रहे थे। अंत में जार्ज उस शोकातुर विधवा के पास आकर बैठ गया और उसके हाथ अपने हाथों में लेकर गदगद कंठ से उसके स्वामी की वीरोचित मृत्यु की घटना सुनाने लगा।
टॉम ने उसके लिए जो प्रेम-संदेश भेजा था, वह भी कह सुनाया।
इसके कोई एक महीने बाद एक दिन प्रात:काल शेल्वी साहब के घर के सारे दास-दासी अपने नए मालिक की आज्ञानुसार कमरे में इकट्ठे हुए। कुछ देर बाद सबने बड़े विस्मय से देखा कि जार्ज कागजों का एक बंडल हाथ में लिए हुए वहाँ आया। उसने प्रत्येक के हाथ में एक-एक कागज देकर बताया कि यह उनकी दासता से मुक्ति का प्रमाण-पत्र है। आज उसने सारे गुलामों को गुलामी की जंजीर से मुक्त कर दिया।
उसने हर एक के सामने उसका प्रमाण-पत्र पढ़कर सुनाया। दास-दासी आनंदमग्न होकर रोने लगे। कोई-कोई शोर मचाने लगे और उनमें से ही कितनों को इस घटना से बड़ी चिंता हुई। वे उस कागज को वापस ले लेने का अनुरोध करने लगे। बोले – “हम जितने आजाद हैं, उससे ज्यादा आजादी नहीं चाहते। हम लोग इस घर को, मेम साहब को और आपको छोड़कर कहीं भी नहीं जाना चाहते।”
जार्ज उन लोगों को सारी बातें अच्छी तरह समझाने का यत्न करने लगा, पर वे सब उसकी बात को अनसुनी करके कहने लगे – “हम लोग यहाँ से नहीं जाएँगे।” अंत में जब सब चुप हो गए तब जार्ज ने कहा – “गुलामी से छूटकर तुम लोगों को हमारा घर छोड़कर जाने की जरूरत नहीं है। यहाँ पहले जितने नौकरों की आवश्यकता थी, अब भी उतनी ही है। घर में जो काम पहले था, वही अब भी है। पर अब तुम लोग पूरी तरह आजाद हो। मैं अब तुम लोगों से तय करके तुम्हें महीने-महीने नौकरी दूँगा। तुम लोगों को आजाद कर देने से तुम्हारा लाभ यह हुआ कि मान लो, अगर मैं किसी का कर्जदार हो जाऊँ या मर जाऊँ, तो तुम्हें कोई पकड़ ले जाकर बेच नहीं सकेगा। मैं अपना काम अपने-आप चलाऊँगा और तुम लोगों को यह बताने का यत्न करूँगा कि इस मिली हुई आजादी का कैसे सदुपयोग करना चाहिए। आशा है कि तुम लोग चरित्रवान बनने का यत्न करोगे और पढ़ाई-लिखाई में मन लगाओगे। मुझे विश्वास है कि ईश्वर की कृपा से मैं तुम लोगों के लिए कुछ कर सकूँगा। मेरे भाइयों, आज के दिन तुमने जो अनमोल स्वाधीनता-धन पाया है, उसके लिए ईश्वर का गुणगान करो, उसे धन्यवाद दो।”
इसके बाद जार्ज ने निम्नलिखित पद्य में अपनी भावना व्यक्त की :
रहे अब तुम न किसी के दास!
परवश जीवन मृत्यु सदृश है, इसमें कौन सुपास?
किसने कब सुख पाया जग में करके पर की आस।।
वह भी जीना क्या जीना है, यदि मन रहा उदास।
इंगित पर औरों के नाचा, सह-सहकर उपहास।
सुख स्वतंत्रता का अनुभव कर, होगा उर उल्लास।
बीतेगा जीवन विनोद में, होंगे विविध विलास।।
भय न रहा अब तुम्हें किसी का, दूर हुआ दु:ख त्रास।
हो स्वच्छंद सुखी हो विचरो जग में बारौं मास।।
एक बहुत ही बूढ़ा हब्शी खड़ा होकर अपने काँपते हुए हाथों को उठाकर कहने लगा – “ईश्वर का धन्यवाद है! हम सब आप की दया-दृष्टि से गुलामी की बेड़ी से मुक्त हुए हैं।” इस बूढ़े के साथ दूसरे दास-दासी भी कृतज्ञता सहित बार-बार ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।
प्रार्थना समाप्त होने पर जार्ज ने उन्हें टॉम की मृत्यु के समय की सारी घटनाओं का हाल सुनाकर कहा – “देखो, मुझे एक बात और कहनी है। तुम सब कृतज्ञता के साथ हमारे टॉम काका को याद करो। यह मत भूलना कि इस सौभाग्य का कारण टॉम काका ही थे। उन्होंने अपनी जान देकर आज तुम लोगों को आजादी दिलवाई। उनकी मृत्यु देखकर मेरे हृदय में बड़ी व्यथा हुई थी। मैंने वहीं उनकी समाधि पर बैठकर परमेश्वर के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं भविष्य में अब कभी दास-प्रथा को आश्रय नहीं दूँगा। स्वयं कभी दास नहीं रखूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा कि किसी को अपनी संतान से अलग होना पड़े। आज मेरी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई। तुम सब स्वाधीन हुए। देखो, जब-जब स्वाधीनता के सुख से तुम्हारे हृदय में आनंद हो, तब-तब मेरे परम बंधु टॉम काका का स्मरण जरूर करना, उसके परिवार पर कृतज्ञता और प्रेम प्रकट करना और जब तक जीते रहो, तब तक टॉम काका की मिसाल सामने रखकर उस पर चलते रहना। टॉम काका का साधु जीवन ही उसका एकमात्र स्मृति-चिह्न है। तुम सब टॉम काका की भाँति चरित्रवान और धर्मपरायण होने की चेष्टा करते हुए अपने-अपने हृदय में उसका स्मृति-मंदिर बना लो!”
47. उपसंहार
जार्ज ने मैडम डिथो से इलाइजा के संबंध में जो बातें की थीं, उन्हें सुनकर कासी को निश्चय हो गया कि हो न हो, इलाइजा ही मेरी बेटी है। उसके निश्चय का विशेष कारण था। जार्ज ने अपने पिता द्वारा इलाइजा के खरीदे जाने की जो तारीख बताई थी, ठीक उसी तारीख को उसकी कन्या बिकी थी। इस प्रकार दोनों तारीखों के एक मिल जाने से यह अनुमान पक्का हो गया कि मृत शेल्वी साहब ने जिस कन्या को खरीदा था, वह कासी की ही लड़की थी।
अब कासी और मैडम डिथो में बड़ी घनिष्ठता हो गई। वे दोनों एक ही साथ कनाडा की ओर चलीं। जब मनुष्य के दिन फिरते हैं तब सारी घटनाएँ अनुकूल-ही-अनुकूल होती जाती हैं। एम्हर्स्टबर्ग में पहुँचने पर इनकी एक पादरी से भेंट हुई। कनाडा पहुँचने पर जार्ज और इलाइजा ने उन्हीं के यहाँ एक रात बिताई थी, इससे पादरी साहब उन्हें अच्छी तरह जानते थे। उन्हें इन नवागत महिलाओं का सारा विवरण सुनकर बड़ा अचंभा हुआ और साथ ही बड़ी दया भी आई। वह तुरंज जार्ज की खोज के लिए मांट्रियल नगर जाने को इनके साथ हो लिए।
गुलामी की बेड़ी से मुक्त होकर जार्ज पाँच वर्षों से सानंद स्त्री-पुत्र सहित मांट्रियल नगर में जीवन बिता रहा है। वह एक मशीन बनानेवाले की दुकान पर काम करता है। उसे जो कुछ मिलता है, उतने से उसके दिन बड़े सुख से कट जाते हैं। यहाँ आने पर इलाइजा को एक कन्या और हुई। वह पाँच बरस की हो गई है और उसका पुत्र हेरी ग्यारहवें वर्ष में पदार्पण कर चुका है। इस समय वह इसी नगर के एक विद्यालय में पढ़ता है।
इनका निवास-स्थान बड़ा साफ-सुथरा है। सामने एक छोटी-सी सुंदर फुलवारी है, जिसे देखकर घर के मालिक की सुरुचि का परिचय मिलता है। घर में तीन-चार कमरे हैं। उन्हीं में से एक कमरे में बैठा हुआ जार्ज पढ़ रहा है। बचपन से ही जार्ज को पढ़ने-लिखने की बड़ी लगन थी। बहुत-सी विघ्न-बाधाओं के होते हुए भी उसने पढ़ना-लिखना सीख लिया था। जब काम से थोड़ा अवकाश पाता, तत्काल पुस्तक लेकर पढ़ने बैठ जाता।
संध्या निकट है। जार्ज अपने कमरे में बैठा एक पुस्तक पढ़ रहा है। इलाइजा बगलवाली कोठरी में बैठी चाय तैयार कर रही है। कुछ देर बाद वह बोली – “सारे दिन तुमने मेहनत की है, अब थोड़ा आराम कर लो। इधर आओ, कुछ बातचीत करेंगे। इतनी मेहनत करोगे तो तंदुरुस्ती खराब हो जाएगी।” इस पर इलाइजा की कन्या ने पिता की गोद में जाकर पुस्तक छीन ली। यह देखकर इलाइजा बोली – “वाह, ठीक किया! छोड़ो किताब को, इधर आओ!” इसी समय हेरी भी स्कूल से आ गया। जार्ज ने उसे देखकर उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा – “बेटा, तुमने यह हिसाब अपने-आप लगाया है?”
हेरी ने कहा – “जी हाँ, मैंने स्वयं लगाया है। किसी की भी मदद नहीं ली।”
जार्ज बोला – “यही ठीक है। बचपन ही से अपने सहारे खड़ा होना चाहिए। खोटी किस्मत के कारण तुम्हारे बाप को लिखना-पढ़ना सीखने की सुविधा नहीं थी, पर तुम्हारे लिए मौका है, इसलिए खूब जी लगाकर पढ़ा-लिखा करो।”
इसी समय जार्ज को दरवाजे पर किसी के खटखटाने की आवाज आई। इलाइजा ने जाकर दरवाजा खोला तो देखा, वही एमहर्स्टबर्गवाले पादरी साहब तीन स्त्रियों को साथ लेकर आए हैं। पादरी साहब इनके एक बड़े उपकारी मित्र थे। उन्होंने निराश्रित अवस्था में इन्हें आश्रय दिया था। इससे इलाइजा उन्हें देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और जार्ज को बुलाया।
पादरी साहब और उनके साथ आई स्त्रियों ने घर में प्रवेश किया। इलाइजा ने सबको बड़े आदर-सत्कार से बिठाया।
एमहर्स्टबर्ग से चलते समय पादरी साहब ने मैडम डिथो और कासी से कह दिया था कि तुम लोग वहाँ पहुँचते ही अपना भेद मत खोल देना। उन्होंने मन-ही-मन एक लंबी-चौड़ी भूमिका बाँधकर व्याख्यान के ढंग पर जार्ज और इलाइजा को इनका परिचय देने का निश्चय कर रखा था। मालूम होता है, वही रास्ते भर इसी बात को सोचते आ रहे थे कि इस विषय में किस ढंग से शुरूआत करेंगे। इसी से जब सब लोग बैठ गए, तब पादरी साहब जेब से रूमाल निकालकर मुँह पोंछते हुए व्याख्यान देने की तैयारी करने लगे। पर मैडम डिथो ने भाषण आरंभ होने के पूर्व ही सब खेल बिगाड़ दिया। जार्ज के देखते ही वह उसके गले से लिपट गई और आँसू बहाती हुई बोली – “जार्ज, क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं तुम्हारी बहन एमिली हूँ।”
कासी अब तक चुप बैठी थी। उसकी भाव-भंगिमा से जान पड़ता था कि यदि मैडम डिथो सब खेल न बिगाड़ती, तो वह पूर्व व्यवस्था के अनुसार मौन धारण किए रहने में बाजी मार जाती। पर इसी समय इलाइजा की कन्या वहाँ आ पहुँची। वह रूप-रंग में बिलकुल इलाइजा-जैसी थी। बस, इतनी ही उम्र में इलाइजा कासी की गोद से अलग की गई थी। कासी उसे देखते ही पागल की तरह दौड़ी और छाती में दबोचते हुए बोली – “बेटी, मैं तेरी माँ हूँ। तू मेरी खोई हुई दौलत है!” कासी ने उसी को अपनी संतान समझा!
इनके यों परिचय देने से इलाइजा और जार्ज, दोनों को बड़ा विस्मय हुआ। वे चौंक पड़े। उन्हें सब स्वप्न-सा जान पड़ने लगा। अंत में हर्ष-मिश्रित क्रंदन रुकने पर पादरी साहब फिर खड़े हुए और सारा भेद खोलकर सुनाया। उनकी बातें सुनते समय सबकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। वास्तव में पादरी साहब की उस दिन की कहानी से उनके श्रोताओं का मन ऐसा पिघला था, जैसा शायद पहले कभी न पिघला होगा।
इसके बाद सब लोग घुटने टेककर बैठे और वह सहृदय पादरी ईश्वर को धन्यवाद देते हुए प्रार्थना करने लगे। उपासना की समाप्ति पर सबने उठकर परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन किया। वे भी मन-ही-मन सोच रहे थे कि ईश्वर की महिमा कितनी अनंत है। जार्ज और इलाइजा को स्वप्न में भी ऐसे अद्भुत मिलन की आशा न थी, पर ईश्वर ने आज बिना माँगे ही उन्हें यह सुख और शांति देने की कृपा की।
कनाडा के एक पादरी के स्मृति-पटल पर भगोड़े दास-दासियों के ऐसे अदभुत मिलन की सहस्रों कहानियाँ अंकित थीं। उसकी पुस्तक पढ़कर पता चलता है कि दास-प्रथा पर लिखे हुए उपन्यासों की काल्पनिक घटनाओं की अपेक्षा मनुष्य के प्रकृत जीवन की घटनाएँ अधिक आश्चर्यजनक होती हैं। छह बरस की अवस्था में संतान माता की गोद से बिछुड़ गई है। फिर तीन वर्ष की अवस्था में उसी का अपनी माता के साथ कनाडा की धरती पर मिलन हुआ है। कोई किसी को पहचान नहीं सकता है। कितने ही भगोड़े दासों के जीवन में अद्भुत वीरता और त्याग के दृष्टांत दीख पड़ते हैं। अपनी माताओं और बहनों को दासता के अत्याचार से मुक्त करने के लिए वे अपनी जान पर खेल गए थे। एक दास युवक था। पहले वह यहाँ अकेला भागकर आया, किंतु पीछे से वह अपनी बहन को छुड़ाने के लिए जाकर एक-एक करके तीन बार पकड़ा गया। उसने बड़ी-बड़ी मुसीबतें और संकट सहे। एक-एक बार की कोड़ों की मार से छ:-छ: महीने खाट पकड़े रहा, पर तब भी किसी तरह उसने अपना निश्चय न छोड़ा। अंत में चौथी बार की चेष्टा में वह अपनी बहन को छुड़ा ही लाया।
क्या यह युवक सच्चा वीर नहीं है? पर अमरीका के पशु-प्रकृति के अंग्रेज उसे चोर समझते थे। न्याय की नजर से देखा जाए तो ये अर्थलोभी गोरे ही असली चोर हैं। अत्याचार-पीड़ित उस युवक का कार्य वास्तव में वीरता का कार्य कहलाने योग्य था।
कासी, मैडम डिथो और एमेलिन, तीनों जार्ज और इलाइजा के साथ रहने लगीं। कासी पहले कुछ सनकी-सी जान पड़ती थी। वह जब-तब आत्म-विस्मृति के कारण इलाइजा की कन्या को छाती से लगाने के लिए इतने जोरों से खींचती कि देखकर सबको आश्चर्य होता था। पर धीरे-धीरे उसकी दशा सुधरने लगी। इलाइजा अपनी माता की यह दशा देखकर उसे बाइबिल सुनाया करती थी, विशेषत: ईश्वर की दया की कथा सुनाती थी। कुछ दिनों बाद कासी का मन धर्म की ओर मुड़ा। उसके हृदय में भक्ति और प्रेम का स्रोत प्रवाहित होने लगा और बहुत थोड़े समय में उसका जीवन अत्यंत पवित्र हो गया।
थोड़े समय बाद मैडम डिथो ने जार्ज से कहा – “भाई, अपने पति के मरने से मैं ही उसके अतुल धन की मालकिन हुई हूँ। तुम अब इस धन को अपनी इच्छानुसार खर्च कर सकते हो। मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार इस धन का सदुपयोग करना चाहती हूँ।”
यह सुनकर जार्ज बोला – “एमिली बहन, मेरी खूब पढ़-लिखकर विद्वान होने की बड़ी लालसा है। तुम मेरी शिक्षा का कोई प्रबंध कर दो।”
इतनी बड़ी उम्र में जार्ज की शिक्षा का क्या प्रबंध होना चाहिए, सब लोग इस विषय पर विचार करने लगे। अंत में सबकी यही राय हुई कि सब लोग फ्रांस चलकर रहें और जार्ज वहाँ के किसी विश्वविद्यालय में भर्ती होकर शिक्षा प्राप्त करे।
यह बात पक्की हो जाने पर ये सब एमेलिन को साथ लेकर जहाज पर सवार हो फ्रांस को चल पड़े। जहाज का कप्तान बड़ा अच्छा आदमी था। उसने एमेलिन का सदाचार, रूप-लावण्य, विनीत भाव और उसके सदगुणों को देखकर उससे विवाह करने की इच्छा प्रकट की, और फ्रांस पहुँचकर उससे विवाह कर लिया। जार्ज ने चार वर्ष तक फ्रांस में रहकर अने शास्त्रों का अध्ययन किया, पर किसी राजनैतिक घटना के कारण उन लोगों को फ्रांस छोड़कर फिर कनाडा लौट आना पड़ा।
अब जार्ज एक सुशिक्षित युवक है। उसके हाथ का लिखा हुआ एक पत्र हम नीचे उदधृत करते हैं। यह पत्र जार्ज ने कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने के कुछ ही पहले अपने किसी मित्र को लिखा था। शिक्षा के प्रभाव से उसका हृदय कितना उच्च हो गया था, इस पत्र को पढ़कर उसका अनुमान किया जा सकता है –
प्रिय मित्र, मुझे तुम्हारे पत्र में यह पढ़कर बड़ा खेद हुआ कि तुम मुझे गोरों के दल में मिलने का अनुरोध कर रहे हो। तुम कहते हो कि मेरा रंग साफ है और मेरी स्त्री, पुत्र, कुटुंबी कोई भी काले नहीं है, इससे मैं बड़ी आसानी से उनके समाज में मिल सकता हूँ, पर मैं तुम्हें सच कहता हूँ कि इनमें मिलने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं है। धनवानों और रईसों पर मेरी तनिक भी श्रद्धा नहीं है। मनुष्य-समाज का इनसे कभी उपकार नहीं हो सकता कि अधिकांश मनुष्य तो पशुओं की भाँति परिश्रम से पिस-पिसकर मरें और कुछ लोग बाबू और रईस बने फिरें तथा चैन की बंसी बजाएँ। ऐसे आदमियों से मनुष्य-समाज का बड़ा अपकार हो रहा है। जिन मनुष्यों को पशुओं की भाँति परिश्रम करना पड़ता है, वे किसी प्रकार का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, जिंदगी भर मूर्ख बने रहते हैं। इससे उन्हें धर्म-अधर्म का कोई विचार नहीं रहता, वे सदा बुराइयों में फँसे रहते हैं। इन बुराइयों के मूल कारण वे ही लोग हैं, जो उनसे इस प्रकार पशुओं की भाँति काम लेते हैं। उन लोगों के पाप और दुर्नीति के अवश्यंभावी कुफल से समग्र मानव-समाज का अकल्याण होता है।
समाज में इतने पाप, दु:ख, अत्याचार और दरिद्रता के फलने-फूलने का क्या कारण है? संसार में सुख-शांति क्यों नहीं है? इस विषय पर मैं जितना सोचता हूँ, उतनी ही इन रईसों और धनवानों पर से मेरी श्रद्धा घटती जाती है। बड़े आदमी ही इसके एकमात्र कारण जान पड़ते हैं।
अत्याचार से सताए हुए दीन-दुखियों पर, मानव-समाज के अन्नदाता पार्थिव-पद-प्रभुत्वहीन गरीब किसानों पर, निर्बल और निस्सहाय अनाथों पर ही अब मेरी श्रद्धा है।
तुम मुझे रईस-मंडली में मिलाकर शान के साथ जीवन बिताने को कहते हो, पर जरा विचारो तो, यह रईस-मंडली है क्या? असहायों, निराश्रयों और कंगालों के कठोर परिश्रम की कमाई को घर-बैठे मुफ्त में भोग-विलास में उड़ाना ही रईसी है या और कुछ? इसी का नाम शायद बड़प्पन है। गरीब दिन-रात खून-पसीना एक करके जो कुछ कमाए, उसे मैं छल-कपट से हड़प लूँ और मेरे पास जो कुछ है, उसमें से किसी को कानी कौड़ी तक न दूँ! मैं विद्वान हूँ, पर उन दुर्बलों को उनके कठोर परिश्रम की कमाई के बदले मैं अपनी विद्या का एक कण भी न दूँ! ऐसे ही आचरणों को भिन्न-भिन्न जाति के लोग रईसाना व्यवहार करते हैं। पर तुम्हीं कहो, क्या ऐसे रईसी जीवन से मुझे सुख मिल सकता है? ऐसा बड़प्पन लेकर क्या कोई कभी संसार से पाप, ताप, अत्याचार और दरिद्रता का मूलोच्छेद कर सकता है? कभी नहीं! बल्कि जो कोई इस रईस मंडली में शामिल होगा, उसको समाज में प्रचलित पापों, अत्याचारों और निष्ठुरताओं का पक्ष लेना पड़ेगा। मैं मानता हूँ कि इस संसार में सब लोग कभी बराबर नहीं हो सकते, सबकी दशा समान नहीं हो सकती, और मैं यह भी मानता हूँ कि सामाजिक वंचनाओं के कारण लोगों की गिरी दशा में कभी सुधार नहीं होगा, वैषम्य बना रहेगा। इससे हमारे लिए यह कदापि उचित नहीं है कि किसी दूसरे का हाथ काटकर उसमें और अपने में भेद उत्पन्न कर लें। कहो, मेरी क्या दशा थी? मैं केवल दासी के पेट से पैदा होने के कारण ही, देश में प्रचलित कानून के द्वारा हर व्यक्ति को प्राप्त स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा गया। भला ऐसे व्यवहार द्वारा मनुष्य-समाज में परस्पर द्वेष उत्पन्न होने के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? अपने पितृ-कुल की ऊँची जाति से मेरी तनिक भी सहानुभूति नहीं है। उच्च जातिवालों ने मुझे कभी किसी घोड़े या कुत्ते से अधिक नहीं समझा। केवल मेरी माता ही थी, जिसकी निगाह में मैं मनुष्य की संतान था। बचपन में जब से मेरा उस स्नेहमयी जननी से वियोग हुआ, तब से आज तक मेरी उससे भेंट नहीं हुई। वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यार करती थी। उसने कैसे-कैसे कष्ट और दु:ख भोगे, मैंने लड़कपन में कैसे-कैसे अत्याचार सहे और कष्ट उठाए, मेरी स्त्री ने बच्चे को बचाने के लिए किस तरह नदी पार की और किस वीरता से नाना प्रकार के दु:खों और यंत्रणाओं का सामना किया, इस सबको जब मैं याद करता हूँ, तो मेरा मन बेचैन हो जाता है। पर जिन लोगों ने हमें इतना सताया, इतने दु:ख दिए, उनके विरुद्ध मैं अपने हृदय में किसी प्रकार का द्वेष नहीं रखता, बल्कि ईश्वर से उनके भी कल्याण की प्रार्थना करता हूँ।”
मेरी माता अफ्रीकावासिनी थी। इससे अफ्रीका मेरी मातृभूमि है। उन पराधीन, अत्याचार-पीड़ित, अफ्रीकावासियों की उन्नति के निमित्त ही मैं अपने जीवन को लगाऊँगा। देश-हित व्रत धारण करके प्राण-पण से बलवानों के अत्याचारों से निर्बलों की रक्षा करने का यत्न करूँगा।
तुम मुझे धर्मप्रचारक का व्रत लेने के राय देते हो, और मैं भी समझता हूँ कि धार्मिक हुए बिना कभी मनुष्य की उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन क्या इन अपढ़ और गँवारों को सहज ही धर्ममार्ग पर लाया जा सकता है? अत्याचार-पीड़ित जाति कभी सत्यधर्म का मर्म नहीं समझ सकती। उसकी अंतरात्मा जड़ होती है।
अत्याचार से पीड़ित पराधीन जाति को उन्नत करने के लिए सबसे पहले देश में प्रचलित कानून का सुधार करना होग, पराधीनता की बेड़ी से इन्हें मुक्त करना होगा। तब जाकर इनका कुछ भला हो सकेगा। मैं तन-मन से इस बात की चेष्टा करूँगा कि अफ्रीका-वासियों में जातीय जीवन का गर्व आ सके और संसार की सभ्य जातियों में इनकी एक स्वतंत्र जाति के रूप में गणना हो सके। इन्हीं दिनों साइबेरिया क्षेत्र में साधारण तंत्र (जन-शासन) की स्थापना हुई है। मैंने वहीं जाने का निश्चय किया है।
तुम शायद समझते हो कि इन घोर अत्याचारों से सताए जानेवाले अमरीका के गुलामों को मैं भूल गया हूँ। पर कभी ऐसा मत समझना। यदि मैं इन्हें एक घड़ी के लिए, एक पल के लिए भी भूलूँ तो ईश्वर मुझे भूल जाए। पर यहाँ रहकर मैं इनका कुछ भला नहीं कर सकूँगा। अकेले मेरे किए इनकी पराधीनता की बेड़ी नहीं टूटेगी। हाँ, यदि मैं किसी ऐसी जाति में जाकर मिल जाऊँ, जिसकी बात पर दूसरी जातियों के प्रतिनिधि ध्यान दें, तो हम लोग अपनी बात सबको सुना सकते हैं। किसी जाति की भलाई के लिए किसी व्यक्ति-विशेष से वाद-विवाद, अभियोग या अनुरोध करने का अधिकार नहीं है। हाँ, वह पूरी जाति अवश्य वैसा करने का पूर्ण अधिकार रखती है।
यदि किसी समय सारा यूरोप स्वाधीन जातियों का एक महामंडल बन गया, यदि अधीनता, अन्याय और सामाजिक वैषम्य के उत्पीड़न से यूरोप सर्वथा रहित हो गया, और यदि सारे यूरोप ने इंग्लैंड और फ्रांस की भाँति हम लोगों को एक स्वतंत्र जाति मान ली, तो उस समय हम विभिन्न जातियों की महा-प्रतिनिधि सभा में अपना आवेदन उपस्थित करेंगे और बलपूर्वक दासता में लगाए हुए, अत्याचार से पीड़ित, दुर्दशाग्रस्त स्वजातीय भाइयों की ओर से सही-सही विचार करने की प्रार्थना करेंगे। उस समय स्वाधीन और सुसभ्य अमरीका देश भी अपने मस्तक से इस दासता-प्रथा रूपी सर्वजन-घृणित घोर कलंक को धोकर बहा देगा।
तुम कह सकते हो कि आयरिश, जर्मन और स्वीडिश जातियों की भाँति हम लोगों को भी अमरीका के साधारण तंत्र में सम्मिलित होने का अधिकार रहे। मैं भी इसे मानता हूँ। हम लोगों को समान भाव से सबके साथ मिलने देना चाहिए। सबसे पहली जरूरत यह है कि जाति और वर्ण के भेद को परे रखकर हम प्रत्येक व्यक्ति को योग्यतानुसार समाज में ऊँचे स्थान पर पहुँचने दें। इतना ही नहीं कि इस देश में जन-साधारण को जो अधिकार मिले हुए हैं, उन्हीं पर हमारा दावा है, बल्कि हमारी जाति की जो क्षति इन लोगों के अत्याचार से हो रही है, उस क्षति की पूर्ति के लिए अमरीका पर हम लोगों का एक विशेष दावा है। ऐसा होने पर भी मैं वह दावा नहीं करना चाहता। मैं अपना एक देश और एक जाति चाहता हूँ। अफ्रीकी जाति की प्रकृति में कुछ विशेषताएँ हैं। अंग्रेजों से अफ्रीकी जाति की प्रकृति बिल्कुल भिन्न होने पर भी ये विशेष गुण, सभ्यता और ज्ञान-विस्तार के साथ-साथ अफ्रीकनों को नीति और धर्म की ओर अग्रसर करने में उच्च और महान प्रमाणित होंगे।
मैं एक लंबे समय से समाज के अभ्युदय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मेरा विश्वास है कि हम इस नवीन युग की पूर्व सीमा पर खड़े हुए हैं। मुझे विश्वास है कि आजकल जो भिन्न-भिन्न जातियाँ भयंकर वेदनाओं से कातर हो रही हैं, उन्हीं की वेदनाओं से सार्वभौम प्रेम और शांति का जन्म होगा।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि अफ्रीका धर्म-बल से ही उन्नति के शिखर पर पहुँच सकेगा। अफ्रीकी चाहे क्षमतावान तथा शक्ति-संपन्न न हों, पर वे सहृदय, उदारचेता और क्षमाशील अवश्य हैं। जिन्हें अत्याचार की धधकती हुई आग में चलना पड़ता है, उनके हृदय यदि स्वर्गीय प्रेम और क्षमा के गुणों से पूर्ण न हों तो उनके हृदय की अग्नि को शांत करने के लिए और उपाय ही क्या है? अंत में यही प्रेम और क्षमा उन्हें विजयी बनाएँगे। अफ्रीका महाद्वीप में प्रेम और क्षमा के मानवीय धर्म का प्रचार करना ही हम लोगों का जीवन-व्रत होगा।
मैं स्वयं इस विषय में कमजोरियों का शिकार हूँ। मेरी नस-नस में आधा खून गर्म-अंग्रेज खून है, पर मेरे सामने सदा एक मधुर-भाषिणी धर्म-उपदेशिका विद्यमान रहती है, यह मेरी सुंदर स्त्री है। भटकने पर यह मुझे कर्तव्य के मार्ग का ज्ञान कराती है, हम लोगों के जातीय उद्देश्य एवं जीवन के लक्ष्य को हमेशा निगाह के सामने जीता-जागता रखती है। देश-हित की इच्छा से, धर्मशिक्षा की कामना से, मैं अपने प्रियतम स्वदेश अफ्रीका को जा रहा हूँ।
तुम कहो कि मैं कल्पना के घोड़े पर सवार हूँ। कदाचित तुम कह सकते हो कि मैं जिस काम में हाथ डाल रहा हूँ, उस पर मैंने पूरी तरह विचार नहीं किया है, पर मैंने खूब सोच-विचार कर रखा है, लाभ-हानि का हिसाब लगाकर देख चुका हूँ। मैं काव्यों में वर्णित स्वर्गधाम की कल्पना करके लाइबेरिया नहीं जा रहा हूँ। मैं कर्मक्षेत्र में डटकर परिश्रम करने का संकल्प करके वहाँ जा रहा हूँ। आशा है, स्वदेश के लिए परिश्रम करने से मैं कभी मुँह नहीं मोडूँगा, हजारों विघ्न-बाधाओं के आने पर भी कर्म-क्षेत्र में डटा रहूँगा और जब तक मेरे शरीर में दम है, देश के लिए काम करता जाऊँगा।
मेरे संकल्प के संबंध में तुम चाहे जो कुछ सोचो, पर मेरे हृदय पर अविश्वास मत करना। याद रखना कि मैं चाहे कुछ भी काम क्यों न करूँ, अपनी जाति की मंगल-कामना को ही हृदय में धारण करके उस काम में लगूँगा।
तुम्हारा
जार्ज हेरिस
इसके कुछ सप्ताह के बाद जार्ज अपने पुत्र तथा घर के दूसरे लोगों के साथ अफ्रीका चला गया।
मिस अफिलिया और टप्सी को छोड़कर उपन्यास में आए हुए नामों में से अब हमें और किसी के बारे में कुछ नहीं कहना है।
मिस अफिलिया टप्सी को अपने साथ वारमांड ले गई। पहले अफिलिया के पिता के घर के लोग टप्सी को देखकर बहुत विस्मित हुए और चिढ़े भी, पर मिस अफिलिया किसी तरह अपने कर्तव्य से हटनेवाली नहीं थी। उसके अपूर्व स्नेह और प्रयत्न से दास-बालिका थोड़े ही दिनों में सबकी स्नेह-पात्र बन गई। बड़ी होने पर टप्सी अपनी खुशी से ईसाई हो गई। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि, कर्मठता और धर्म के प्रति उत्साह देखकर कुछ मित्रों ने उसे अफ्रीका जाकर धर्म-प्रचार करने की सलाह दी।
पाठक यह सुनकर सुखी होंगे कि मैडम डिथो की खोज से कासी के पुत्र का भी पता लग गया।
यह वीर युवक माता के पलायन के बहुत पूर्व कनाडा भाग आया था। यहाँ आकर दास-प्रथा के विरोधी, अनाथों के बंधु अनेक सहृदय व्यक्तियों की सहायता से उसने अच्छी शिक्षा पाई थी। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी माता और बहन अफ्रीका जा रही हैं, तब वह भी अफ्रीका की ओर चल दिया।